Friday, November 6, 2015

अगर आप उनको मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं तो …?

“अगर उच्च नैतिकता के द्योतक राम सर्वमान्य प्रतीक थे और हैं तो निश्चय ही नैतिकता के मानक सर्वमान्य, निर्विवाद और सार्वभौमिक होना चाहिए, अतः मुझे कुछ भी नहीं कहना. पर अगर आप उनको मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं तो पुरुष होने के नाते मैं इस “मर्यादा पुरुषोत्तम प्रतियोगिता” के बिना उन्हें यह मानद उपाधि तो नहीं दे सकता. वह कौन सी मर्यादाएं थीं वह कौन से मानक थे जिस की कसौटी पर राम “मर्यादा पुरुषोत्तम” थे ? क्या राम को “मर्यादा पुरुषोत्तम” की मानद उपाधि देने वाले विवाहोपरांत बिदा होती अपनी बेटी को आशीर्वाद दे सकेंगे कि –“जाओ बेटी तुम्हारा दाम्पत्य जीवन सीता जैसा हो” ? राम कैसे पिता थे यह लव -कुश के आईने में देखिये. लव -कुश की वेदना की व्याख्या किये बिना आप कौन होते हैं यह बताने बाले ? अपने आधीन महिला के के प्रति राम बनाम रावण आचरण का तुलनात्मक अध्ययन तो कीजिये. राम जी की पत्नी सीता लंका में रावण की बंधक थीं पर पूरी गरिमा के साथ किन्तु सूर्पनखा दंडकारण्य में कि जहां उसके भाईयों का राज्य था घूमती हुयी राम -लक्ष्मण को मिल जाती है तो दोनों भाई उस पर पिल पड़ते हैं और मिल कर उसका नाक कान काट डालते हैं. एक अकेली निहत्थी महिला पर हथियार उठाना …उस पर अंग भंग करने की हिंसा करना वैसे ही है जैसे अक्सर पता चलता है कि किसी लडकी पर किसी ने तेज़ाब फैंक दिया. —यह किस समाज की कौन सी नैतिकता थी ?…कैसे मर्दों की कौन सी मर्यादा थी ? अपनी बहन के प्रति इस घटना से भी उत्तेजित हो कर रावण ने सीता जी के प्रति कोई हिंसा नहीं की— इस कसौटी पर भी महानता का मूल्यांकन करते चलिए. चौदह साल के बनवास के बाद भी और भाई भारत द्वारा चौदह साल सही ढंग से शासन चलाने के बाद भी राम ने भरत को सिंघासन से उतार दिया और खुद उस पर बैठे फिर भी असीम महत्वाकांक्षा ने हिलोरें लीं और राजसूय यज्ञ कर विश्व विजय अभियान चलाया . राजसूय यज्ञ के लिए पत्नी की अनिवार्यता थी और सीता परित्यक्ता थीं तो सोने की सीता बना कर बैठा ली गयीं जैसे सीता उनकी पत्नी नहीं युद्ध की चल वैजन्ती हो. और उदध के मानक क्या गढ़े उस पर भी गौर करें — विभीषण जिसे आज भी राजनीतिक शब्दावली में गाली ही माना जाता है. छिप कर बाली को मारा और पूजा करते में मेघनाद को मारा –यह कौनसी यौद्धिक नैतिकताएं थी ? याद रहे जब कुतुबनुमा गलत होगा तो समाज दिशाहीन होगा और इसका दूसरा पहलू यह भी है कि जब समाज दिशाहीन होता है तो निश्चय ही उसका कुतुबनुमा गलत होता है. चूंकि राम हमारी आस्था के केंद्र हैं उनकी भाग्वाद्ता पर बहस नहीं करना चाहिए किन्तु मैं पुरुष भी हूँ अतः यह सवाल तो मेरे मन में है ही कि राम कैसे पति थे यह सीता से पूछो ? राम कैसे पिता थे –यह लव-कुश से पूछो ? राम कैसे जेठ थे यह उर्मिला (लक्ष्मण की पत्नी ) से पूछो जिसने वियोग झेला ? और प्राकृतिक जीवन का प्रणेता अप्राकृतिक मौत से क्यों मरा ? अपने चारो भाईयों के साथ उन्होंने क्यों जल समाधि ली ? —क्या है कोई उत्तर ? —याद रहे जब कुतुबनुमा गलत होगा तो समाज दिशाहीन होगा.” —— राजीव चतुर्वेदी
http://www.pnews.in/%E0%A4%85%E0%A4%97%E0%A4%B0-%E0%A4%86%E0%A4%AA-%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%B7/

मानव अधिकार है- धर्म की स्वतंत्रता

मानव अधिकारांे के सार्वदेषिक घोषणा पत्र में जिन 30 अधिकारों को मानव अधिकार के रूप में उद्घोषित किया गया है, उनमें अनुच्छेद 18 में प्रत्येक व्यक्ति को विचार, अन्तःकरण और धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार मान्य किया गया है। इस अधिकार में अपने धर्म और विष्वास को परिवर्तित करने की स्वतंत्रता और अकेले या अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर तथा सार्वजनिक रूप से या अकेले षिक्षा, व्यवहार, पूजा और पालन में अपने धर्म और विष्वास को प्रकट करने की स्वतंत्रता भी है।
हमारे लिये यह सम्मान का विषय है कि इस महत्वपूर्ण मानव अधिकार को हमारे संविधान में हमने मौलिक अधिकार के रूप में स्थान दिया है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक में इस संबंध में व्यापक उपबन्ध किये हुए है। सभी व्यक्तियों को अन्तःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है। लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य की दृष्टि से इस स्वतंत्रता को सीमित किया जा सकता है। प्रत्येक धार्मिक समुदाय को धार्मिक प्रयाजनों के लिये संस्थाओं की स्थापना और पोषण करने, अपने धार्मिक विषयो संबंधित कार्यो का प्रबंध करने, जंगम व स्थावर सम्पत्ति का अर्जन और स्वामित्व धारण करने एवं सम्पत्ति के विधि अनुसार प्रषासन करने का अधिकार इसमें निहित है। धार्मिक षिक्षा और उपासना के लिये भी सभी समुदाय स्वतंत्र है।
सारा संसार जिस अधिकार को मानव गरिमा और सम्मान के लिये मान्यता प्रदान करता है और हमारा संविधान उसे अंगीकार करता है उस धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा पर भी कतिपय लोग प्रष्नचिन्ह लगाने से नहीं चूकते है। अंग्रेजी भाषा के शब्द सेकुलर जिसका सरल हिन्दी भावार्थ धर्मनिरपेक्षता है उसे धर्मविहीनता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास प्रायः होता रहा है। निहित प्रयोजनों से इसकी व्याख्या इनके द्वारा अपने ढंग से की जाती रही है। जबकि वास्तव में सेकुलर अथवा धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्मविहीन होना नहीं है, इसका मतलब यह नहीं है कि देष का नागरिक अपने धर्म को छोड़ दे। इसका वास्तविक अर्थ तो वही है जो महात्मा गांधी ने सर्वधर्म समभाव के अपने सिद्वांत के द्वारा प्रतिपादित किया है। एक लोकतांत्रिक देष में प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का समान अधिकार है किन्तु शासन को धर्म के आधार पर भेदभाव करने का अधिकार नहीं है। शासन को किसी के धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिये।
मानव जीवन की सार्थकता के लिये सर्वमान्य यह सर्वधर्म समभाव या धर्म निपरेक्षता का सिद्वांत केवल बौद्धिक विलासिता नहीं है बल्कि सच्चे अर्थो में मानवीय मूल्यों को धरातल पर साकार करने का एक माध्यम है। धर्मनिरपेक्षता के सिद्वांत का अपवाद संविधान में मान्य किया गया है। जिसके द्वारा अल्पसंख्यक वर्ग को उनके धर्म और अन्तःकरण के अधिकार के संरक्षण के लिये विषेष सुविधाऐं प्रदान की जा सकती है। यह प्रावधान संविधान का भाग ही है। इसे तुष्टीकरण के रूप में प्रस्तुत करना वस्तुस्थिति से मुंह मोड़ने के समान होगा। केवल भारत में ही नही  बल्कि प्रत्येक लोकतांत्रिक देष में उस देष के अल्पसंख्यक वर्गो के सुविधाऐं देने का प्रावधान है। समता समाज ही आदर्ष समाज होता है जिसमें असमानताओं को समानता में बदलने के लिये इस प्रकार के प्रावधान अपरिहार्य होते है।
यह एक विडम्बना ही कही जा सकती है कि देष में एक विचारधारा इस प्रकार की भी है जो अपने निहित राजनीतिक स्वार्थो के कारण इस सर्वमान्य धर्मनिरपेक्षता या सर्वधर्म समभाव की अवधारणा को कटघरे में खड़ी करने में ही अपना हित साधन मानती है। जबकि अनेकता में एकता की हमारी संस्कृति का आधार उदारता एवं सभी विचारों, दर्षनों, मान्यताओं और सभ्यतओं के लिये अपने दिल दिमाग के खिड़की, दरवाजे खुले रखने में निहित है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि हम केवल इस भाव का प्रचार नहीं करते कि दुसरों के धर्म के प्रति द्वेष न रखों बल्कि इससे बढ़कर हम सब धर्मो को सत्य समझते है और उसको पूर्ण रूप से अंगीकार करते है। उन्होेंने धार्मिक सामंजस्य व सद्भाव के प्रति सजगता दिखाते हुए बार-बार सभी धर्मो का आदर करने तथा मन की शुद्वि व निर्भय होकर प्राणी मा.त्र से प्रेम करने के रास्ते आगे बढ़ने का सन्देष दिया।
अपनी धार्मिक मान्यता में आस्था रखना और अन्तःकरण के अनुरूप आराधना करने का सबका अधिकार सम्मान किये जाने योग्य है किन्तु किसी अन्य के ऐसे ही अधिकारों का सम्मान करना भी प्रत्येक का कर्तव्य है। यों तो धर्म का अर्थ मनुष्य के कर्तव्य का बोध है। इसलिये न केवल मानव मात्र का बल्कि प्राणी मात्र का धर्म भिन्न हो ही नहीं सकता किन्तु धर्म के प्रचलित अर्थ में विभिन्न सम्प्रदायों की ओर इंगित होता है । वास्तव में ये सम्प्रदाय धर्म की बजाए पंथ के रूप में ही जाने पहचाने जाने चाहिये। इस दृष्टि से हिन्दु उदारता के लिये, मुस्लिम भाई चारे के लिये, इसाई सेवा भाव के लिये, जैन अहिंसा के लिये, बौद्ध समन्वय के लिये, सिक्ख शौर्य के लिये विख्यात है। किन्तु वास्तव में इन समुदायों के मुख्य दर्षन बिन्दु उदारता, भाईचारा, सेवाभाव, अहिंसा, समन्वय, शौर्य सभी का एक ही अर्थ है तथा प्रत्येक शब्द में शेष शब्दों के भावार्थ का भी बोध होता है। सभी धर्म मनुष्य को मानवीय गुणों से सम्पन्न होने की प्रेरणा देते है।
यह एक विडम्बना है कि जो धर्म मनुष्य को कर्तव्य का बोध कराकर गुण सम्पन्न बनाने के ध्येय से मनुष्य अंगीकार करता है वही धर्म पंथ हिंसा, विवाद, द्वंद और अलगाव का माध्यम बन जाता है। यदि सबके धर्म के अधिकार का सम्मान करने का भाव आत्मसात कर लिया जाये तो इन सारी विकृतियों से मनुष्य बच सकता है, अपनी उर्जा का उपयोग अपनी भौतिक, बौद्धिक एवं आत्मिक उन्नति के लिये कर सकता है। इस महत्वपूर्ण मानव अधिकार व संवैधानिक अधिकार के निहितार्थ को समझना और जीवन का अंग बनाना प्रत्येक मनुष्य का ध्येय बन जाये तो मानव मात्र की प्रगति का मार्ग प्रषस्त हो सकता है।

Thursday, November 5, 2015

बढती बलात्कार की घटनाओ को कैसे रोका जाय ?

आजकल इस बात को लेकर काफी चर्चा है कि समाज में नाबालिक छोटी बच्चियों से लेकर नवयुवतियों और यहाँ तक कि अधेड़ और वृद्ध महिलाओ तक के साथ यौनाचार, छेड़छाड़, बलात्कार व सामूहिक बलात्कार की घटनाएँ हो रही है। लगातार सामने आ रही बलात्कार की घटनाओं के कारण आज सड़कों, ऑफिसों या किसी सार्वजनिक स्थान पर नाबालिक बच्चियां और महिलाये अपने आप को असुरक्षित महसूस करती है, इस प्रकार की घटनाओं की वजह से दिल्ली को 'रेप कैपिटल' तक भी कहा जाने लगा है।
ईश्वर ने नर और नारी की शारीरिक संरचना भिन्न इसलिए बनाई कि यह संसार आगे बढ़ सके। मानव सभ्यता की शुरुआत से ही समाज पुरुषसत्तात्मक समाज के रूप में जाना जाता रहा है। लेकिन आधुनिक युग में पहले के मुकाबले ज्यादा लड़कियां पढ़-लिख रही हैं और कार्यक्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं, और कई क्षेत्रों में तो महिलाये पुरुषों से आगे पहुच गई है जिससे महिलाओं के चेहरे से आत्मविश्वास और  स्वच्छंद रवैया झलकता है, फिर भी समाज में नाबालिक छोटी बच्चियों, नवयुवतियों, अधेड़ और वृद्ध महिलाओ के साथ यौनाचार, छेड़छाड़, बलात्कार व सामूहिक बलात्कार की घटनाओं का ग्राफ चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। आज जरुरत है कि कैसे नाबालिक यौन शोषण व बलात्कार जैसे अपराधों की रोकथाम की जाय? इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिये कि भारत के दिल्ली जैसे शहर में ज़्यादा बलात्कार क्यों होते हैं? आखिर यह बेरहमी नाबालिक बच्चो व बच्चियों के साथ अप्राकृतिक शारीरिक यौन-शोषण की प्रवृति कहाँ से पैदा होती है? क्या इसे समय रहते रोका नहीं जा सकता? क्या केवल अपराधियों को दण्डित करना पर्याप्त है?
नाबालिक बच्चो व बच्चियों के साथ अप्राकृतिक शारीरिक यौन-शोषण और बलात्कार एक अपराध होने के साथ-साथ हमारी पारिवारिक व्यवस्था और सामाजिक चेतना का भी विषय है जहाँ कई लोग ऐसे हैं जो इस तरह के अमानवीय व्यवहार को अनुचित नहीं मानते । वहीँ इस कृत्य का बीजारोपण होता है इस बात को समझने के लिये इस तथ्य की ओर ध्यान देना होगा कि बलात्कारियों में एक बड़ी संख्या ऐसे लोगो की है जो पीड़ित नाबालिक बच्चो या महिला के परिवार के सदस्य है, आस-पड़ोस में रहने वाले है, जान-पहचान वाले है, या फिर कुंठा और मनोवैज्ञानिक रूप से विकृत मानसिकता वाले है
इस बात को कुछ विस्तार में समझा जाना चाहिए । हम जानते हैं कि शहरों में ऐसे परिवारों की संख्या सैकड़ो-हजारो में नहीं बल्कि लाखो-करोड़ो में है । जो जगह की कमी और परिवार को सीमित रखने की जरुरत को ना समझने के कारण एक ही कमरे में 8-10 या अधिक सदस्यों के साथ रहने को विवश है। ऐसी परिस्थिति में जब पति-पत्नी स्वाभाविक सेक्स-क्रिया करेंगे और इस दौरान बच्चो की नींद खुल जाय और वे यह देखे तो उनके मन पर क्या प्रभाव पड़ता होगा? क्या उनमे भी इस प्रकार की क्रिया करने की इच्छा पैदा नहीं होगी? क्योंकि बाल्यावस्था में बच्चे अपने माता-पिता को देखकर अनुशरण करते हुए इसे स्वयं करने की कोशिश करते है तो उन्हें यह ज्ञान नहीं होता, कि अभी यह सब देखना, करना और समझना उनकी उम्र के अनुसार ठीक नहीं है, यह अपराध है इसका ध्यान तो उन्हें कभी नहीं आता बल्कि वे इसे केवल एक सामान्य खेल की तरह लेते है और बालक बालिका उसी के अनुरूप व्यवहार करते है और यहीं से उन बच्चो का बड़े होते होते अपराधी कारण होना शुरू हो जाता है, जिसका परिणाम एक सामाजिक विकृति के रूप सामने आता है यही कारण है कि बड़े शहरों में रिपोर्टकिये जाने वाले बलात्कारों में निम्न तथा निम्न-मध्यवर्ग के आरोपी बहुत ज़्यादा अनुपात में होते हैं । अत: स्कूलों में तथा मीडिया द्वारा माता-पिता को बच्चो की शिक्षा, स्वास्थ्य व कुसंगति इत्यादि के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए हर जगह पुलिस का पहरा नहीं लगाया जा सकता, इसलिए लड़कियों को बचपन से ही आत्मरक्षा की ट्रेनिंग अनिवार्य रूप से दी जाये।
दूसरा हम जानते हैं कि शहरों में मीडिया और इंटरनेट की सघन उपस्थिति यौन अभिव्यक्तियोंको सहज उपलब्ध करा देती है । इंटरनेट पर देशी-विदेशी पोर्न व टी.वी. पर दिखाए जाने वाले कई विज्ञापनो में कामुक दृश्य किशोरों और युवाओं, की यौन-इच्छाओं को आमतौर पर भड़काकर उनको उसका दीवाना बना देती है । वे रात दिन नए यौन अनुभवों की कल्पना में डूबे रहते हैं । ये युवा इस माहौल के कारण लगभग बीमारी जैसी हालत में रहते हैं, पर यह ऐसी बीमारी है जो सम्मोहित और मदहोश करती है । वे इससे बचना नहीं चाहते, और यदि चाहें भी तो मित्र-समूह के दबाव के कारण नहीं बच सकते. सड़कों पर चलते समय वे आसपास दिख रही लड़कियों और महिलाओं में स्वाभाविक तौर पर वही छवि खोजते हैं ।  दिल्ली की सड़कों पर घूमता हुआ औसत आदमी मानसिक तौर पर एक वहशी की सी हालत में रहता है । इसका सबूत यह है, कि शाम के बाद दिल्ली की किसी भी सड़क पर कोई लड़की अकेली खड़ी हो तो वहाँ से गुज़र रहे पुरुष गाड़ी या बाइक रोककर उसे भूखी नज़रों से देखते हैं, इस उम्मीद में कि शायद उसे खरीदा या दबोचा जा सके । इस भूखी संस्कृति का ही परिणाम है कि दिल्ली का कामुक नौजवान आगा-पीछा भूलाकर किसी नाबालिक या सुंदर स्त्री को दबोच लेंता है, इसलिए सरकार को सचेत होना चाहिये कि जिस तरह फिल्मों के लिए सैंसर बोर्ड की व्यवस्था है, वैसे ही टी.वी. के विज्ञापनों और कार्यक्रमों के लिए भी होनी चाहिए । रात के 11 बजे से पहले वही कार्यक्रम दिखाए जाने चाहिएँ, जो बच्चों के मन पर अनुचित असर न डालें । साथ ही, स्कूलों में तथा मीडिया द्वारा माता-पिता को बच्चो की शिक्षा, स्वास्थ्य व कुसंगति इत्यादि के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए ।
तीसरा बलात्कार का कारण नशा है, नशा करने के बाद मनुष्य की भावनाएं प्रबल हो जाती हैं । अक्ल का नाश हो जाता है और उसका स्वयं पर नियंत्रण नहीं रहता । नशा करने के बाद उसकी कई गुना बढ़ी वासना उसे कहीं से भी अपने को शांत करने के लिये उकसाती है ऐसे में कोई भी स्त्री उसे मात्र शिकार ही नजर आती है। लेकिन उसका परिणाम क्या होगा उसकी तरफ उसकी अक्ल कुछ भी सोचने नहीं देती। बलात्कार जैसे ज़्यादातर मामलों में अपराधी को नशे में या नशे का आदी ही पाया गया। इसलिए देश में पूरी तरह नशाबंदी घोषित कर दी जाये। इससे न केवल बलात्कार बल्कि दूसरे अपराधों में भी अच्छी खासी कमी हो जायेगी। यह सच है कि इससे सरकार के रेवेन्यू को बहुत बड़ा झटका लगेगा, लेकिन इसके बाद ऊर्जावान युवकों का जो ग्रुप उभरेगा (नशा छोड़ने के बाद) वह इस झटके से देश को पूरी तरह उबार देगा।
चौथा कारण प्रशासन और पुलिस की अक्षमता: वास्तव में प्रशासन और पुलिस कभी कमजोर नहीं होते। कमजोर होती है समस्या से लड़ने की उनकी इच्छा शक्ति। सभी जानते हैं कि बड़े कहे जाने वाले लोग जब आरोपों के घेरे में आते हैं तो प्रशासनिक शिथिलताएं उन्हें कटघरे के बजाय बचाव के गलियारे में ले जाती है। पु‍लिस की लाठी गरीब बेबस पर जितने जुल्म ढाती है सक्षम (धनाढय) के सामने वही लाठी सहारा बन जाती है।

कई बार सबूत के आभाव में न्याय नहीं मिलता और अपराधी छूट जाता है। इसका मतलब साफ है कि बलात्कार के लिए सजा देने के लिए कानून जरूरी रूप से सशक्त नहीं है, जिससे अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं। हालांकि पिछले दिनों सरकार ने बलात्कार के कानून के मजबूत बनाने की पहल शुरू की है। कमजोर कानून और इंसाफ मिलने में देरी यह भी बलात्कार की घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं।
प्राय: बलात्कारों का एक कारण सामाजिक दबावों की अनुपस्थिति में भी छिपा है । इसलिए सबसे बड़ा परिवर्तन समाज के दृष्टिकोण में होना चाहिए. बलात्कार को दुर्घटनाकी तरह देखने की आदत विकसित की जानी चाहिए । जिस तरह सड़क की दुर्घटना में हम पीड़ित के प्रति सहानुभूति रखते हैं और उसे अपराधी नहीं मानते; वैसे ही बलात्कार पीड़ित महिला के प्रति संवेदना का भाव होना चाहिए, उसे ज़िंदगी भर अपमानित नहीं किया जाना चाहिए । अपराधियों का परिवार और समाज में सामाजिक बायकॉट होना चाहिए ताकि ऐसे अपराध करने के प्रति भय पैदा हो. घर के भीतर लिंग समता के गंभीर प्रयास किये जाने चाहिएँ । लड़कों को घर के कामों में सहभागी बनाया जाना चाहिए । परवरिश की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि लड़कों और लड़कियों के बीच अधिकतम समता सुनिश्चित हो । धर्म से जुड़े विश्वासों को भी इस कोण से जाँचा जाना चाहिए कि वे लिंग भेद को प्रोत्साहित तो नहीं करते हैं ।  
मेरा ख्याल है कि समाज को यौन अपराधों तथा उनसे जुड़ी हिंसा जैसी क्रूरता को जड़ से मिटाने के लिये हमें हर सम्भव क़दम उठाकर समाज को काफ़ी हद तक बचा सकते हैं । इसके लिए सिर्फ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति पर्याप्त नहीं है, सामाजिक इच्छाशक्ति की भी बड़ी भूमिका है. जिसके लिए ज़रूरी है कि पुरुष उन अवैध अधिकारों को स्वेच्छा से छोड़ने की ताकत अर्जित करें जो परंपरा ने स्त्रियों का हक़ मारकर उन्हें दिए हैं. तभी स्त्री जाति सुरक्षित और निर्भय होकर जीने का अधिकार प्राप्त कर सकती है ।

तीन ग्रहों की युति के फल :-

तीन ग्रहों की युति के फल :-
१. सूर्य+चन्द्र+बुध=माता-पिता के लिये अशुभ।
मनोवैज्ञानिक। सरकारी अधिकारी। ब्लैक मेलर ।
अशांत। मानसिक तनाव। परिवर्तनशील।
२. सूर्य+चन्द्र +केतू=रोज़गार के लिये परेशान। न दिन
को चैन न रात को चैन। बुद्धि काम ना दे, चाहे
लखपति भी हो जाये। शक्तिहीन।
३. सूर्य+शुक्र+शनि =पति/पत्नी में विछोह। तलाक
हो। घर में अशांति। सरकारी नौकरी में गड-बड़।
४. सूर्य+बुध+राहू =सरकारी नौकरी। अधिकारी।
नौकरी में गड-बड़। दो विवाह का योग। संतान के
लिये हल्का। जीवन में अन्धकार। केमिष्ट।
५. चन्द्र+शुक्र+बुध =सरकारी अधिकारी। कर्मचारी।
घरेलू अशांति। बहू -सास का झगड़ा। व्यापार के
लिये बुरा। लड़कियाँ अधिक। संतान में विघ्न।
६. चन्द्र +मंगल+बुध=मन, साहस , बुद्धि का सामंजस्य।
स्वास्थ अच्छा। नीतिवान साहसी ,सोच-विचार से
काम करे। पाप दृष्टी में होतो, डरपोक /. दुर्घटना /
ख्याली पुलाव पकाए।
७. चन्द्र+मंगल+शनि= नज़र कमजोर। बीमारी का
भय। डॉक्टर , वै ज्ञानिक , इंजीनियर , मानसिक
तनाव। ब्लड प्रेशर कम या अधिक।
८. चन्द्र+मंगल+राहू =पिता के लिए अशुभ। चंचलता।
माता तथा भाई के लिए हल्का।
९. चन्द्र+बुध +शनि=तंतु प्रणाली में रोग। बेहोश हो
जाना। बुद्धि की खराबी से अनेक दुःख हो। अशांत,
मानसिक तनाव। बहमी।
१० चन्द्र +बुध+राहू =माँ के लिए अशुभ। सुख हल्का।
पिता पर भारी। दुर्घटना की आशंका।

बलात्कार: क्यों और कब तक?

ज़्यादा गहरी चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि दिल्ली जैसे शहरों और भारत जैसे देशों में ज़्यादा बलात्कार क्यों होते हैं? इस बात पर भी मंथन की ज़रूरत है कि बीते सप्ताह दिल्ली की चलती बस में हुए बलात्कार के दौरान आरोपियों ने इतनी क्रूरता का परिचय क्यों दिया? उन्होंने लोहे की छड़ से जिस तरह पीड़ित लड़की की देह पर अनगिनत वार किये और संभवतः अप्राकृतिक यौन-क्रिया के अलावा लोहे की छड़ से भी उसके शरीर के अंदरूनी हिस्सों को चोट पहुँचाई, उसकी क्या ज़रूरत थी? आखिर यह बेरहमी कहाँ से पैदा होती है? क्या इसे समय रहते रोका नहीं जा सकता?

दरअसल, बलात्कार एक जटिल फिनोमिना है और अलग-अलग बलात्कारों के पीछे कुछ समान और कुछ भिन्न कारण काम करते हैं. हरियाणा, दिल्ली, मणिपुर और बस्तर के बलात्कारों को एक तरीके से नहीं समझा जा सकता. इसी तरह, पिता, चाचा, मामा, भाई या पड़ोसी द्वारा किया गया बलात्कार अलग समझ की मांग करता है. अमीरों द्वारा गरीब महिलाओं के बलात्कार में ठीक वे कारण काम नहीं करते जो किसी गरीब द्वारा किसी अमीर महिला के बलात्कार के मूल में होते हैं. यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बलात्कार सिर्फ़ महिलाओं/लड़कियों/बच्चियों के साथ नहीं होते; छोटी उम्र के लड़कों, तृतीयलिंगियों और पशुओं के साथ भी होते हैं. इस वैविध्य पर ध्यान देंगे तो पाएंगे कि बलात्कारों के मूल में यौन-इच्छा की आक्रामकता एक कारण के रूप में भले मौजूद हो, पर वास्तव में वह न तो अकेला कारण है और न ही सबसे महत्वपूर्ण. इसलिए, बेहतर होगा कि बलात्कार के विभिन्न रूपों को ध्यान रखते हुए उसके कारणों पर विचार करें.

पहले इस प्रश्न पर गौर करें कि उत्तर-पूर्व के मातृसत्तात्मक (Matriarchal)  समाजों की तुलना में हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश जैसे प्रांतों में बहुत ज़्यादा बलात्कार क्यों होते हैं? दरअसल यह क़ानून-व्यवस्था से ज़्यादा समाज और संस्कृति का मसला है. इसकी जड़ें पुरुषवादी सामाजिक संरचना या ‘पितृसत्ता’ (”Patriarchy’) में धँसी हैं. ऐसे समाजों में बच्चों की परवरिश की प्रक्रिया लिंग-भेद के मूल्यों पर टिकी होती है जिसकी वजह से बचपन में ही बलात्कारी मानसिकता के बीज पड़ जाते हैं. उदाहरण के तौर पर, लड़कों को (लड़कियों को नहीं) बचपन से ही बंदूक, तीर-कमान, तलवार जैसे 'मर्दाना' खिलौने दिए जाने का परिणाम यह होता है कि इन हथियारों में बसी हिंसा उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनने लगती है. उनमें साहस, लड़ाकूपन, आक्रामकता, शारीरिक मजबूती जैसे लक्षणों की प्रशंसा की जाती है और विनम्रता, संवेदनशीलता, अनुभूति-प्रवणता जैसे गुणों का मज़ाक उड़ाया जाता है. किसी लड़के की आँख से दो बूंद आँसू बह जाएँ तो उसे 'लड़की' कह-कह के उसका जीना मुश्किल कर दिया जाता है. उसे घर के काम करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता क्योंकि उन कामों के लिए तो माँ-बहने हैं ही और बाद में पत्नी होगी. उसे ‘राजा बेटा’ कहकर संबोधित किया जाता है जबकि बेटी के लिए इसका समतुल्य संबोधन व्यवहार में नहीं आता. ऐसी परवरिश से वह खुद को औरत का मालिक समझने लगता है. जिस तरह उसकी माँ उसके पिता की गुलामी झेलती है, वैसे ही वह भी पत्नी के रूप में गुलाम की खोज करता है. वह पत्नी को तथाकथित आर्थिक सुरक्षा देकर बदले में उसकी आज़ादी ही नहीं छीन लेना चाहता, उसे वस्तु की तरह इस्तेमाल करने का हक़ भी हासिल कर लेना चाहता है. वह शादी भी करता है तो घोड़ी पर बैठकर और तलवार टांग कर, जैसे कि युद्ध लड़ने या अपहरण करने जा रहा हो. लड़की के घरवाले भी 'कन्यादान' करते हैं मानो उसे कोई 'वस्तु' सौंप रहे हों. सुहागरात के कोमल अवसर पर भी लड़का युद्ध जीतने के मूड में रहता है. वह साबित कर देना चाहता है कि उसने पत्नी के शरीर को भोगने का मुक्त लाइसेंस हासिल कर लिया है. कुछ समुदायों में तो प्रथा है कि सुहागरात की सेज पर बिछाई गई सफ़ेद चादर पर अगर सुबह लाल धब्बे न मिलें तो लड़के के पुंसत्व पर संदेह किया जाता है. यौन-संबंध के लिए पत्नी की सहमति इन समुदायों के पुरुषों की कल्पना से परे की वस्तु है. पत्नी का बलात्कार उनका दैनिक और विवाहसिद्ध अधिकार है. औरतों के प्रति लंबे समय से संचित यही दृष्टिकोण जब सड़कों पर उतरता है तो ‘बलात्कार’ कहलाता है.

यह एक अजीब सा सच है कि बलात्कार की अधिकांश घटनाएँ घर परिवार के भीतर या आस-पड़ोस में घटती हैं. ये घटनाएँ तात्कालिक यौन-तनाव का परिणाम न होकर लंबी योजना का परिणाम होती हैं. इनमें से अधिकांश मामले तो कभी सामने आ ही नहीं पाते क्योंकि शिकायत करने पर औरत को ज़्यादा नुकसान होता है. गौरतलब है कि पितृसत्तात्मक समाजों में औरत की पूरी ज़िंदगी इस बात पर टिकी होती है कि उसका पति और परिवार उसे बेघर न कर दें. लड़कियों को आमतौर पर न शिक्षा मिलती है, न ही पैतृक संपत्ति में हिस्सा. राज्य की ओर से कोई ठोस सामाजिक सुरक्षा भी उन्हें नसीब नहीं है. उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा जुआ यही है कि उन्हें कैसा पति और कैसी ससुराल मिलेगी? इसलिए, बेटी की परवरिश का केंद्रीय बिंदु यही होता है कि कैसे उसे बेहतर पति के लायक बनाया जाए? इस योजना को बाधित कर सकने वाली हर संभावना से बचने की कोशिश की जाती है. बलात्कार ऐसा ही एक खतरा है जो लड़की/स्त्री की सारी भावी ज़िंदगी को बर्बाद कर सकता है. हमारा समाज स्त्री की पवित्रता उसके शरीर से तय करता है, मन से नहीं. वह बलात्कार को स्त्री के साथ हुई एक साधारण दुर्घटना के रूप में नहीं लेता, बल्कि उसे विवाह और सामाजिक संबंधों से बेदखल कर देता है. औरत, जिसके पास सामाजिक सुरक्षा का एकमात्र विकल्प परिवार है, इतना बड़ा खतरा मोल नहीं ले सकती. इसलिए, बलात्कार हो भी जाए तो अधिकांश मामलों में वह न शिकायत करती है, न ही पलटकर जवाब देती है. धीरे-धीरे वह सब कुछ सहन कर लेने की आदी हो जाती है. गौरतलब है कि 90% से ज़्यादा रिपोर्टेड बलात्कार घर के भीतर या आस-पड़ोस में होते हैं. यह भी सच है कि घरों के अंदर के अधिकांश बलात्कार कभी सामने नहीं आ पाते क्योंकि वे उन्हीं पुरुषों द्वारा किये जाते हैं जिनका काम उस महिला को सुरक्षा की गारंटी देना है. अगर वे उसे छोड़ दें तो स्त्री के लिए ज़िंदगी खुद एक चुनौती बन सकती है.

दूसरे स्तर पर ‘बलात्कार’ एक दमनकारी कार्रवाई की भूमिका में आता है. इस भूमिका में इसका इस्तेमाल किसी परिवार या समूह को नीचा दिखाने या उससे बदला लेने के लिए होता है. ध्यान से देखें तो लड़कों की दुनिया में चलने वाली गालियाँ आमतौर पर दूसरों की माँ या बहन का बलात्कार करने की धमकियाँ ही होती हैं. सीधी सी बात है कि किसी की माँ (या उस उम्र की महिला) के प्रति यौन-आकर्षण तो इसका कारण नहीं हो सकता. तो फ़िर ऐसी गालियाँ किस ओर इशारा करती हैं? इसका उत्तर इस बात में छिपा है कि हमारे समाज ने औरतों की यौन-शुचिता को घर की इज्ज़त का प्रतीक बना दिया है. किसी घर या समुदाय की इज्ज़त तार-तार करनी हो तो उसकी औरतों का बलात्कार करना सबसे सरल उपाय है. उदाहरण के लिए, फूलन देवी का गैंगरेप यौनिक नहीं, जातीय दमन का मामला था. हरियाणा में दो महीने पहले 20-25 दिनों के भीतर लगभग 10 दलित लड़कियों के साथ बलात्कार हुए जो दबंग जाति के लड़कों ने किये. इनका उद्देश्य भी यौनिक न होकर उभरती हुई दलित-चेतना को तहस-नहस करना था. सांप्रदायिक दंगों के दौरान हमेशा दबंग समूह कमज़ोर समूह की औरतों का बलात्कार करते हैं, चाहे वह गुजरात का मामला हो या भागलपुर का. सेना और पुलिस के लोग अशांत इलाकों में ऐसे बलात्कार सिर्फ़ अपनी यौन भुखमरी मिटाने के लिए नहीं करते, इसलिए भी करते हैं ताकि विद्रोह करने वाले समूह का आत्मविश्वास डगमगा जाए. कश्मीर, मणिपुर और बस्तर के कई मामले इस श्रेणी में शामिल किये जा सकते हैं. अगर बलात्कार के आँकड़ों को गहराई से देखें तो पाएंगे कि अधिकांश मामलों में यह सिर्फ़ यौन-क्रिया का मामला न होकर दोहरे या तिहरे दमन का मामला होता है. इस ‘दमनकारी कार्रवाई’ के प्रतीक के कारण ही ऐसे बलात्कारों में बात यौन-क्रिया तक सीमित नहीं रहती, उससे आगे बढ़ती है. कई लोग क्रूरता से औरतों का अंग-भंग कर देते हैं तो कुछ अप्राकृतिक सैक्स तथा मार-पिटाई करके उन्हें नोच डालने की कोशिश करते हैं. हाल ही में असम में हुए दंगों के बारे में कहा जाता है कि कुछ दंगाइयों ने दूसरे समुदाय की औरतों के स्तन काट डाले तो कुछ ने तो औरतों के हाथ-पैर काटकर शेष शरीर से बलात्कार किया. यह सब इसलिए होता है कि दूसरा समुदाय डर जाए. डराने के लिए ‘सॉफ्ट टारगेट्स’ के तौर पर महिलाओं को चुना जाता है.

इसका मतलब यह नहीं कि बलात्कार में यौन-आक्रामकता की कोई भूमिका नहीं है. दिल्ली जैसे बड़े शहरों में होने वाले बलात्कारों में इसकी भी बड़ी भूमिका है. दरअसल, किसी समाज में यौन इच्छाओं की तीव्रता और उसकी संतुष्टि के अवसरों में संतुलन होना बहुत ज़रूरी है. इस संतुलन का अभाव बलात्कारों के लिए उर्वर भूमि का काम करता है. समस्या यह है कि बड़े शहरों की संस्कृति ने पिछले कुछ समय में जिस अनुपात में यौन इच्छाएँ भड़काई हैं, उस अनुपात में हर वर्ग को उनकी पूर्ति के अवसर मुहैया नहीं कराए हैं. ख़ास तौर पर बड़े शहरों का निम्नवर्ग इस वंचन का भयानक शिकार है और यही कारण है कि बड़े शहरों में ‘रिपोर्ट’ किये जाने वाले बलात्कारों में निम्न तथा निम्न-मध्यवर्ग के आरोपी बहुत ज़्यादा अनुपात में होते हैं.

इस बात को कुछ विस्तार में समझा जाना चाहिए. हम जानते हैं कि शहरों में मीडिया और इंटरनेट की सघन उपस्थिति ‘यौन अभिव्यक्तियों’ विशेषतः ‘पोर्न’ को सहज उपलब्ध बना देती है. वैसे तो ‘पोर्न’ हर युग में रहा है पर आज का ‘ऑडियो-विजुअल पोर्न’ प्रभाव पैदा करने की ताकत में अपना सानी नहीं रखता. देशी-विदेशी पोर्न की सहज उपलब्धता किशोरों और युवाओं, विशेषतः लड़कों को उसका दीवाना बना देती है. वे रात दिन नए यौन अनुभवों की कल्पना में डूबे रहते हैं. टी.वी. पर दिखाए जाने वाले कई विज्ञापन उनकी यौन-इच्छाओं को गैर-ज़रूरी तौर पर भड़काते हैं. यह बात विशेष रूप से परफ्यूम, कंडोम तथा अंडरविअर आदि के विज्ञापनों में दिखती है जिनमें सुंदर लड़कियों का भयानक वस्तुकरण (Objectification)  होता है. फिल्मों के आइटम सोंग तथा अन्य कामुक दृश्य भी यौन-इच्छाओं को उत्तेजित करते हैं. ‘झंडू बाम’ या ‘फैवीकोल’ जैसे गीतों के बोल ध्यान से सुनें तो हम समझ सकते हैं कि वे यौन व्यवहार को बुरी तरह प्रभावित करने की ताकत रखते हैं. अगर सुंदर नायिका यौनिकता से भरे हाव-भाव के साथ खुद को ‘तंदूरी मुर्गी’ बताते हुए स्वयं को गटक जाने के लिए नायक को आमंत्रित करे तो क्या उसका असर नहीं होगा? ये सब दृश्य उन युवाओं के अवचेतन मन पर धीमा असर डालते रहते हैं. पोर्न-साइट्स देख-देख कर वे अपनी इच्छित प्रेयसियों की छवियाँ गढ़ते हैं. यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जहाँ एक ओर युवाओं पर इन यौन-प्रतीकों का आक्रमण बढ़ा है, वहीं ‘करियर’ बनाने की प्रतिस्पर्धा भी कठिन हुई है जिसके कारण विवाह की औसत उम्र लगातार बढ़ती जा रही है. आज के शहरी युवा को एक लंबा समय इस अंतर्विरोध के भीतर गुज़ारना होता है. इसका सीधा परिणाम है कि यौन इच्छाओं की संतुष्टि के लिए विवाहेतर संस्थाओं की भूमिका बढ़ रही है. गर्भनिरोधकों के विकास ने यौन इच्छाओं की पूर्ति से जुड़े वे खतरे भी खत्म कर दिए हैं जो पहले की पीढ़ियों को यौन सुखों से दूर रहने के लिए बाध्य करते थे. ये युवा इस माहौल के कारण लगभग बीमारी जैसी हालत में रहते हैं, पर यह ऐसी बीमारी है जो सम्मोहित और मदहोश करती है. वे इससे बचना नहीं चाहते. चाहें भी तो मित्र-समूह के दबाव के कारण नहीं बच सकते. सड़कों पर चलते समय वे आसपास दिख रही लड़कियों और महिलाओं में स्वाभाविक तौर पर वही छवि खोजते हैं.

सार यह है कि हम यौन-इच्छाओं के विस्फोट के युग में रहते हैं. हमारे समय के लोगों की जितनी रुचि यौन-अनुभवों या यौन-आकांक्षाओं में है, उतनी शायद कभी नहीं थी. यह भूख साधारण और नैसर्गिक नहीं है, इसका काफ़ी बड़ा हिस्सा बाज़ार, फिल्मों, गीतों और पोर्न द्वारा रचा गया है. दिल्ली की सड़कों पर घूमता हुआ औसत आदमी मानसिक तौर पर एक वहशी की सी हालत में रहता है. इसका सबूत यह है कि शाम के बाद दिल्ली की किसी भी सड़क पर कोई लड़की अकेली खड़ी हो तो वहाँ से गुज़र रहे पुरुष गाड़ी या बाइक रोककर उसे भूखी नज़रों से देखते हैं, इस उम्मीद में कि शायद उसे खरीदा या दबोचा जा सके. इस भूखी संस्कृति का ही परिणाम है कि दिल्ली का बच्चा जल्दी से जल्दी जवान हो जाना चाहता है और बूढ़ा अपनी जवानी बनाए रखने के लिए पुरज़ोर कोशिश करता है. दिल्ली के 8-10 वर्ष की उम्र के बच्चों की निजी बातचीत अगर कोई छिपकर सुन ले तो तनाव में आ जाएगा. उनके बचपनी चेहरे की मासूमियत और उनकी जवान इच्छाओं में तारतम्य बैठाना मुश्किल हो जाएगा. कुछ ऐसी ही हालत बूढ़ों के निजी वार्तालाप को सुनकर हो सकती है.

सवाल है कि जिस समाज की यौन-इच्छाएँ इतने भयानक तरीके से बढ़ी हुई हैं, वहाँ उनकी पूर्ति के क्या विकल्प हैं? दरअसल, इन विकल्पों की दुनिया में काफ़ी ऊँच-नीच है. जैसी विज्ञापनी सुंदरता के भोग के सपने सब लोग पाल रहे हैं, वैसी सुंदरता समाज में कम लोगों तक सीमित है. इससे एक भयानक प्रतिस्पर्धा पैदा होती है जो कभी-कभी हत्या आदि का कारण भी बनती है. इस व्यवस्था को ‘सुंदरता का पूंजीवाद’ कहा जा सकता है. यूँ, यह पूंजीवाद विवाह व्यवस्था के भीतर हमेशा मौजूद रहा है और इसने सबसे सुंदर लड़कियाँ सबसे अमीर और ताकतवर पुरुषों को उपलब्ध कराई हैं, पर आजकल यह अपने सबसे भयानक रूप में मौजूद है. जो सुंदर और आकर्षक किशोर/युवा हैं, वे इस पूंजीवाद के सबसे सफल खिलाड़ी हैं. अंग्रेज़ी स्कूलों या अच्छे कॉलेजों में पढ़ने वाले युवकों को यह मौका हमेशा उपलब्ध है कि वे तथाकथित स्मार्ट लड़कियों या विज्ञापन सुंदरियों से मैत्री साधकर अपनी कुंठाओं से मुक्त हो जाएँ. जो लोग इस वर्ग से बाहर हैं, उनमें भी अमीरों को कोई दिक्कत नहीं है. दुनिया के हर बड़े शहर में सैक्स भी एक उत्पाद है जिसे खरीदा जा सकता है. अगर जेब भरी हो तो वो अपनी पसंद के अनुसार सुंदरता के बाज़ार में कुछ भी हासिल कर सकते हैं और कुंठाओं से बचे रह सकते हैं.

पर, बाकी वर्गों के पास अवैध रूप से बढ़ी हुई इन इच्छाओं  की पूर्ति के कम मौके हैं. गरीब तथा अवर्ण युवक भी मीडिया द्वारा रचे गए जाल के कारण ऐसी ही विज्ञापन सुंदरियों के सपने देखते हैं जिन्हें पूरा करना उनकी हैसियत से बाहर की बात होती है. उन गरीबों की सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियाँ उन्हें उस वर्ग में प्रविष्ट नहीं होने देतीं कि वे ऐसी सुंदरता को हासिल कर सकें. ऐसा नहीं कि उनके वर्ग में सुंदरता नहीं होती. होती है, पर वह भी आमतौर पर पूंजीवादी ताकतों द्वारा उच्च वर्ग में खींच ली जाती है. कुल मिलाकर, इन गरीबों के हिस्से में कुंठा ही आती है- कभी न मिटने वाली कुंठा. यही कुंठा किसी नाजुक क्षण में उन्हें मजबूर करती है कि वे सब आगा-पीछा भूलकर किसी सुंदर स्त्री को दबोच लें और बाद में परिणामों की भयावहता देखकर पछताते रहें.

इससे जुड़े एक और कारण पर गौर करना चाहिए जो शायद बलात्कार से जुड़ी हिंसा पर कुछ प्रकाश डाल सके. इसका संबंध असंतुलित विकास, शहरीकरण और प्रवासन (Migration) जैसे विषयों से है. हम जानते हैं कि दिल्ली जैसे बड़े शहरों में लाखों लोग रोज़गार की तलाश में अपना घर-बार छोड़कर आते हैं. ये रिक्शा, बस, ऑटो चलाते हैं या मजदूरी, चौकीदारी जैसे बोझिल और थकाऊ काम करते हैं. इनकी आय इतनी कम होती है कि आमतौर पर ये पत्नी और परिवार को अपने साथ नहीं रख पाते. इन्हें न पारिवारिक आत्मीयता नसीब होती है, न गार्हस्थिक प्रेम की कोमल और गुलाबी दुनिया. इनका काम इतना बोझिल होता है कि वह सृजनात्मक संतोष नहीं दे पाता. यह संपूर्ण भावनात्मक व सृजनात्मक असंतोष एक ओर इन्हें शराब और नशे की ओर धकेलता है तो दूसरी ओर इनकी यौन आक्रामकता तथा अपराध करने की हिम्मत को बढ़ाता है. मैडिकल साइंस के कुछ लोगों द्वारा प्रतिपादित इस बात को ध्यान रखा जाना चाहिए कि जो 'टैस्टोस्टरोन' नामक हार्मोन पुरुषों में यौन-आक्रामकता पैदा करता है, वह तनाव, असंतोष और गुस्से के कारण और उद्दीप्त होता है. तनाव से भरी ज़िंदगी के समानांतर हर समय आसपास मौजूद दिल्ली की यौन-चकाचौंध इनकी शारीरिक-भूख को बेतरह उद्दीप्त कर देती है, इतनी ज़्यादा कि यौन-असंतोष इनका स्थाई भाव हो जाता है और बार-बार बेचैन करता है. उनके पास यह विकल्प होता है कि वे किसी वेश्या के पास चले जाएँ पर वेश्यावृत्ति भी हमारे देश में गैर-कानूनी है. अगर गैर-कानूनी वाले पक्ष को छोड़ दें तो भी इनकी इतनी हैसियत नहीं होती कि वे पंचतारा होटलों की विज्ञापन सुंदर कॉलगर्ल्स के पास जा सकें. परंपरागत रेडलाइट इलाके में ये जा सकते हैं पर वह इनके सपनों को संतुष्ट नहीं कर पाता. कुछ देशों ने इस असंतोष को दूर करने के लिए ‘यौन-खिलौनों’ (Sex toys) को अनुमति दी है जो काफ़ी हद तक इस अभाव की पूर्ति करने में कारगर साबित होते हैं. पर, चूँकि भारत में यह विकल्प भी गैरकानूनी है, इसलिए कुंठित युवाओं के तनाव का विरेचन हो नहीं पाता. इस सबका परिणाम यह है कि वे दिमाग पर एक बोझ लिए रहते हैं. जब कभी उन्हें कोई आकर्षक लड़की/महिला दिखती है (विशेषतः ऐसी लड़कियाँ या महिलाएँ जिनका पहनावा काफ़ी उदार किस्म का हो) तो उनका मन बुरी तरह ज़ोर मारता है, पर आसपास के माहौल का डर हर बार भारी पड़ता है. ऐसी हर विफलता नारी देह के प्रति इन्हें ज़्यादा भूखा और बीमार बना देती है. यही संचित कुंठा एक अजीब सी क्रूरता को जन्म देती है. यही कारण है कि अगर कभी कोई लड़की इनके जाल में फँस जाती है तो मामला सिर्फ़ यौन-क्रिया तक नहीं रह जाता. उसके बलात्कार के बहाने वो हर पिछली प्यास बुझा लेना चाहते हैं. उसकी देह को नोच-नोचकर हर पुरानी हार का बदला ले लेना चाहते हैं. उसकी हर चीख इनके कुंठित मन को गहराई तक संतुष्ट करती है.

ज़्यादा बलात्कारों का एक कारण सामाजिक दबावों की अनुपस्थिति में भी छिपा है. बलात्कार के अधिकांश अपराधियों को यह भय नहीं होता कि उनका परिवार और समाज उनका बहिष्कार कर देगा. सामंती समाज में लड़के द्वारा किये गए बलात्कार को क्षम्य माना जाता है. कुछ लोग तो उसे 'प्राकृतिक न्याय' (Nature’s justice)  कहकर भी मुक्त हो जाते हैं. दूसरी ओर, बड़े शहरों में होने वाले बहुत से बलात्कार उन लोगों द्वारा किये जाते हैं जो बाहर से आए हैं और अपने समाज के दबावों से तात्कालिक तौर पर मुक्त हैं. जातिवादी या सांप्रदायिक दमन के समय तो सामाजिक दबाव पूरी तरह हट जाता है और यही अपराध सामाजिक प्रशंसा का कारण बन जाता है. यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि अगर समाज इसे अत्यंत घृणित कार्य के रूप में देखे और अपराधी का समाज से बायकॉट कर दे तो अधिकांश लोग ऐसी हिम्मत नहीं कर सकेंगे. कानून से लड़ना आसान है, पर अपने समाज से लड़ने की ताकत बहुत कम लोगों में होती है.

क़ानून के भय का अनुपस्थित होना भी बलात्कारों का एक स्पष्ट कारण है. अपराधियों को पता होता है कि कानून व्यवस्था बहुत लचर है और उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती. अदालतों में प्रायः साबित कर दिया जाता है कि यौन संबंध में लड़की की सहमति शामिल थी. आरोपियों के वकीलों का प्रसिद्ध, परम्परागत और घटिया तर्क है कि अगर सुई हिलती रहे तो उसमें कोई धागा कैसे डाल सकता है? प्रसिद्ध विचारक रूसो तक ने कहा है कि औरत की मर्ज़ी के बिना कोई यौन संबंध नहीं बन सकता. पुलिस के कर्मचारी प्रायः सामंती समाज से ही आते हैं और वे इसे बहुत चिंताजनक कृत्य नहीं मानते. वे खुद लड़की को समझाते हैं कि मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश करे क्योंकि उसके लिए ऐसे मामले में पड़ना ठीक नहीं हैं. सरकारी वकील प्रायः सुविधाओं और इच्छाशक्ति से वंचित होते हैं. अगर आरोपी अमीर है तो उसके वकीलों के सामने वे टिकने की ताकत नहीं रखते. कई मामलों में वे आरोपियों से पैसा लेकर खुद ही मामले को कमज़ोर बना देते हैं. न्यायाधीशों में महिलाओं की संख्या बेहद कम है. कम ही पुरुष न्यायाधीशों से ऐसे मामलों में संवेदनशीलता की उम्मीद की जा सकती है. क़ानून के प्रावधान भी कमज़ोर हैं. अधिकांश मामलों में आरोपी जमानत पर छूटकर बाहर घूमते हैं और शिकायत करने वाली लड़की हमेशा दूसरी दुर्घटना के भय में जीती है. कानूनी प्रक्रिया बेहद लंबी और थका देने वाली है. वह बलात्कार से भी ज़्यादा प्रताड़ित करती है. अदालतों के पास न्यायाधीश और अन्य सुविधाएँ कम होने के कारण मुक़दमे कई-कई साल तक लटके रहते हैं. अगर जुर्म साबित हो जाए (जो कि 10% मामलों में भी नहीं हो पाता ) तो भी बहुत कठोर सज़ा का प्रावधान नहीं है. उसके बाद हाइकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के दरवाज़े भी खुले हैं. वहाँ भी सज़ा हो जाए तो राष्ट्रपति से दया की अपील का प्रावधान है. यह सब होते-होते न्याय का गला पूरी तरह घुट चुका होता है. अपराधियों के मन में कुल मिलाकर भय का संचार नहीं हो पाता.

सवाल यह भी है कि बलात्कारों की इस संस्कृति को कैसे रोका जा सकता है? इसके लिए कानूनी उपाय तो एक छोटा सा पक्ष है, असली समाधान बहुत से उपायों को एक साथ लागू करने में छिपा है. भूलना नहीं चाहिए कि सामाजिक उपाय धीरे-धीरे असर दिखाते हैं, इसलिए अधैर्य से बचते हुए कई उपायों को लागू करना चाहिए. कुछ उपाय ये हो सकते हैं-

1) यौन आक्रमण के मामलों के लिए पूरे देश में ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ बनाई जाएँ. इनमें महिला न्यायाधीशों की उपस्थिति पर बल दिया जाए. इन्हें मामला निपटाने के लिए अधिकतम 3 महीनों का समय दिया जाए. किसी अदालत में ज़्यादा मामले हों तो ऐसी ही दूसरी अदालत को मामला स्थानांतरित किया जाए. हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट भी ऐसी ही अवधि निर्धारित करें. राष्ट्रपति ऐसे मामलों पर अति दयालु होने से बचें और 3 महीनों के भीतर दया याचिका का निपटारा करें. पीड़ित को बार-बार अदालत आने की बाध्यता से मुक्ति मिले. अगर अदालत में तकनीकी सुविधा है तो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की मदद से उसकी गवाही हो ताकि उस पर दबाव न पड़े. 

2) अगर अपराधी न्यायाधीश के सामने गुनाह कबूल कर ले तो पहले अपराध की स्थिति में दंड की मात्रा कुछ कम कर दी जाए ताकि न्याय मिलने में देरी न हो. अगर बलात्कार किसी छोटी बच्ची का हो या उसमें हिंसा भी शामिल हो तो किसी भी स्थिति में जमानत न दी जाए. दुर्लभतम मामलों में मृत्युदंड की व्यवस्था हो, विशेषतः बहुत छोटी बच्चियों या अति हिंसक गैंगरेप जैसे मामलों में. उन पर आर्थिक जुर्माना लगाने की व्यवस्था भी की जाए. 

3) ऐसे मामलों के लिए हर शहर में पुलिस की विशेष शाखाएँ (क्राइम ब्रांच की तरह) हों जिनमें अधिकांश कर्मचारी महिलाएँ हों. जो पुरुष कर्मचारी हों, उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे महिलाओं (या अन्य बलात्कृत व्यक्तियों) के दर्द को महसूस करें, सामंती रवैया न अपनाएँ. तृतीयलिंगियों के अधिकारों तथा उनकी सामाजिक दशा के संबंध में संवेदनशील बनाने के लिए इस विभाग के सभी कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जाए. दीर्घ अवधि में यह प्रशिक्षण सभी पुलिस कर्मचारियों को देने की व्यवस्था की जाए.

4) वेश्यावृत्ति को समाप्त करना किसी समाज के बस की बात नहीं है. इस बात पर गंभीर चर्चा का वक्त आ गया है कि क्या उसे वैधता प्रदान की जाए? इस कदम से बलात्कारों की संभावना तो कम होगी ही, और भी कई लाभ होंगे. जैसे, यह दलालों द्वारा वेश्याओं के आर्थिक व दैहिक शोषण को रोकेगा, उनके बच्चों के मानवाधिकारों को सुरक्षित करेगा तथा एड्स जैसे रोगों के संक्रमण को कम करने में भी सहायक होगा. इसके अलावा, ‘प्लास्टिक सेक्स’ अर्थात ‘यौन-खिलौनों’ को भी वैधता प्रदान करने के बारे में सोचा जा सकता है. अगर यौन-इच्छाओं की संतुष्टि निर्जीव वस्तुओं के सहारे हो जाए तो शायद हम कई संभावित बलात्कारों तथा एड्स जैसी बीमारियों से बच सकते हैं.

5) पुलिस, सेना तथा अर्धसैनिक बलों के कर्मचारियों को नियमित अंतराल पर घर जाने का मौका मिलना चाहिए ताकि उनकी यौन इच्छाएँ संतुष्ट रहें. काम का दबाव और तनाव भी इतना नहीं होना चाहिए कि वही बलात्कार का रूप ले ले. युवा कर्मियों को यथासंभव ऐसी जगहों पर नियुक्त किया जाना चाहिए कि वे चाहें तो अपने परिवार को साथ रख सकें या आसानी से अपने घर आ-जा सकें.

6) शहरों में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की कार्य-स्थितियाँ सुधारने की कोशिश की जानी चाहिए. उन्हें इतना वेतन मिलना चाहिए कि वे अपने परिवार के साथ शहर में रह सकें. छुट्टियाँ भी इतनी ज़रूर मिलें कि वे अमानवीय तनाव से बच सकें और बीच-बीच में अपने घर जा सकें. काम के घंटे भी सामान्य स्थितियों में 8-9 से ज़्यादा न हों.

7) महिलाओं को शिक्षा मिले, यह सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए. शिक्षा रोजगारपरक हो ताकि वे धीरे-धीरे दूसरों पर निर्भरता से मुक्त हो सकें. उन्हें महिलाओं को उपलब्ध अधिकारों की विस्तृत जानकारी दी जानी चाहिए. साथ ही, आत्मरक्षा का बुनियादी प्रशिक्षण उनके पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए ताकि वे ‘सॉफ्ट टारगेट’ न रहें. उन्हें आत्मरक्षा के लिए छोटे-मोटे उपायों (जैसे मिर्च का स्प्रे, सेफ्टी पिन साथ रखना) के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. उन्हें संपत्ति में हिस्सा दिए जाने का मामला गंभीरता से उठाना चाहिए. उनकी सामाजिक सुरक्षा जितनी बढ़ेगी, उतना ही ज़्यादा वे प्रतिरोध कर सकेंगी और अपराध स्वतः कम होंगे. एक ऐसे 'फंड' का निर्माण भी किया जाना चाहिए जिससे बलात्कार पीड़ित महिलाओं के आर्थिक-सामाजिक पुनर्वास की व्यवस्था की जाए. उनके लिए 'विशेष बीमा' जैसी योजना भी चलाई जानी चाहिए ताकि ऐसी किसी दुर्घटना की स्थिति में उनका पुनर्वास आसान हो सके.

8) जिस तरह फिल्मों के लिए सैंसर बोर्ड की व्यवस्था है, वैसे ही टी.वी. के विज्ञापनों और कार्यक्रमों के लिए भी होनी चाहिए. सरकार के अनावश्यक हस्तक्षेप से बचने के लिए इसकी सदस्यता समाजशास्त्रियों, प्राध्यापकों, रिटायर्ड न्यायाधीशों, वरिष्ठ पत्रकारों आदि को दी जा सकती है. रात के 11 बजे से पहले वही कार्यक्रम दिखाए जाने चाहिएँ जो बच्चों के मन पर अनुचित असर न डालें. उसके बाद सिर्फ़ वयस्कों को संबोधित कार्यक्रम दिखाए जा सकते हैं. इंटरनेट पर पोर्न साइट्स को रोकने का उपाय हो सकता हो तो किया जाना चाहिए. साथ ही, स्कूलों तथा मीडिया द्वारा माता-पिता को बताया जाना चाहिए कि बच्चों को इनसे कैसे बचाया जा सकता है?

9) स्कूलों में नवीं कक्षा से यौन शिक्षा (Sex education) अवश्य दी जानी चाहिए. यौन शिक्षा का अर्थ व्यापक स्वास्थ्य शिक्षा से है जिसमें बच्चों को समझाया जाए कि कैसे वे किसी व्यक्ति द्वारा अपने शरीर के गलत स्पर्श आदि को पहचान सकते हैं. दूसरों की शरीर-भाषा (Body language) तथा यौन-संकेतों को समझने की परिपक्वता भी विकसित की जानी चाहिए. इसके अलावा, उन्हें यह भी समझाया जाना चाहिए कि विवाह से पूर्व यौन अनुभवों के क्या नुकसान हो सकते हैं?

10) संसद या किसी भी विधानमंडल या पंचायत आदि के चुनाव में ऐसे सभी व्यक्तियों के प्रत्याशी बनने पर रोक लगाई जानी चाहिए जिन पर बलात्कार जैसे किसी मामले में अपराध सिद्ध हुआ हो या जिसके विरुद्ध न्यायालय को प्रथम दृष्टि में आरोप सत्य दिखाई पड़े.

11) सबसे बड़ा परिवर्तन समाज के दृष्टिकोण में होना चाहिए. बलात्कार को ‘दुर्घटना’ की तरह देखने की आदत विकसित की जानी चाहिए. जिस तरह सड़क की दुर्घटना में हम पीड़ित के प्रति सहानुभूति रखते हैं और उसे अपराधी नहीं मानते; वैसे ही बलात्कार पीड़ित महिला के प्रति संवेदना का भाव होना चाहिए, उसे ज़िंदगी भर अपमानित नहीं किया जाना चाहिए. अपराधियों का सामाजिक बायकॉट होना चाहिए ताकि ऐसे अपराध करने के प्रति भय पैदा हो. घर के भीतर लिंग समता के गंभीर प्रयास किये जाने चाहिएँ. लड़कों को घर के कामों में सहभागी बनाया जाना चाहिए. परवरिश की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि लड़कों और लड़कियों के बीच अधिकतम समता सुनिश्चित हो. धर्म से जुड़े विश्वासों को भी इस कोण से जाँचा जाना चाहिए कि वे लिंग भेद को प्रोत्साहित तो नहीं करते हैं.  

मेरा ख्याल है कि ये सुझाव समाज को यौन अपराधों तथा उनसे जुड़ी हिंसा से काफ़ी हद तक बचा सकते हैं. इन्हें सफल बनाने के लिए सिर्फ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति पर्याप्त नहीं है, सामाजिक इच्छाशक्ति की भी बड़ी भूमिका है. यह रास्ता स्त्रियाँ अकेले पार नहीं कर सकतीं, इसके लिए ज़रूरी है कि पुरुष उन अवैध अधिकारों को स्वेच्छा से छोड़ने की ताकत अर्जित करें जो परंपरा ने स्त्रियों का हक़ मारकर उन्हें दिए हैं.


Tuesday, November 3, 2015

ईश्वर

ईश्वर (सत्य)
भगवान एक ऐसी महाशक्ति है, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, और उसमे जीवन निर्वाह कर रहे प्रत्येक जीव और निर्जीव वस्तु में विधमान है ! और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और उसमे रहने वाले प्रत्येक जीव-जंतु उसके ऋणी है, और उसके आदेशो का पालन करना, उनका धर्म हैं ! वह ऐसा ईश्वर है, जिसमे हर प्रकार की प्रसंशा के गुण समाहित हैं ! उसकी पूजा करने या न करने से उसकी सत्यता पर कोई प्रभाव नही पड़ने वाला ! और न ही उसकी पूजा करने के लिए उसने किसी को बाध्य किया ! बल्कि उसकी पवित्रता और सत्यता को देखकर हम विवश हो जाते हैं उससे मानने और उसकी पूजा करने के लिए ! और वो ऐसी अदभुत शक्ति है जिसे चाह कर भी झुठलाया नहीं जा सकता ! सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर राज करने वाला वो इकलौता ईश्वर ही पूज्निये है! और उसके अलावा किसी और की पूजा करना महापाप है! वो किसी के द्वारा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उसके द्वारा रचा गया, हमेशा से जीवंत, सत्य का साथी, सभी प्राणियों के हृदय में विराजमान, दुखिया का सहारा, पूंजीपतियों का लाभ, प्रत्येक व्यक्ति की आस्था, मोक्ष तक पहुँचने का रास्ता, धर्मो की नहीं बल्कि हृदय की सच्ची पुकार सुनने वाला, बिना आकर और बिना सूरत वाला ईश्वर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आलौकिक शक्तियों के साथ आज भी जीवंत है ! और यही सत्य (ईश्वर) है !
या आप इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं-
“वह तेजस्वियों का तेज, बलियों का बल, ज्ञानियों का ज्ञान, मुनियों का तप, कवियों का रस, ऋषियों (पीर, फकीर, दरवेश, बाबा, भक्त) का गाम्भीर्य और बालक की हंसी में विराजमान है। ऋषि के मन्त्र गान और बालक की निष्कपट हंसी उसे एक जैसी ही प्रिय हैं। वह शब्द नहीं भाव पढता है, होंठ नहीं हृदय देखता है, वह मंदिर में नहीं, मस्जिद में नहीं, प्रेम करने वाले के हृदय में रहता है। बुद्धिमानों की बुद्धियों के लिए वह पहेली है पर एक निष्कपट मासूम को वह सदा उपलब्ध है। वह कुछ अलग ही है। पैसे से वह मिलता नहीं और प्रेम रखने वालों को वो कभी छोड़ता नहीं। उसे डरने वाले पसंद नहीं, प्रेम करने वालो को उसे ढून्ढने की ज़रूरत नहीं। सबसे अलग, सबसे शक्तिशाली, सभी में विराजमान और सबके हृदय में धड़कने वाला वो एक ईश्वर (सत्य, विश्वास) ही है।“
यदि हम ईश्वर को अपने दिल और हर जीवित वस्तु में नहीं देख सकते तो, हम ईश्वर को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का भ्रमण करके भी प्राप्त नहीं कर सकते

Sunday, November 1, 2015

1947. से 1987 के बीच जन्में है, हमें विशेष आशीर्वाद प्राप्त हैँ

हम लोग,
जो 1947. से 1987
के बीच जन्में है,
हमें विशेष आशीर्वाद प्राप्त हैँ
....और ऐसा भी नही कि
आधुनिक संसाधनों से
हमें कोई परहेज है......!!!
लेकिन.....
👍 हमें कभी भी
जानवरों की तरह किताबों को
बोझ की तरह ढो कर स्कूल
नही ले जाना पड़ा ।
👌हमारें माता- पिता को
हमारी पढाई को लेकर
कभी अपने programs
आगे पीछे नही करने पड़ते थे...!
👍 स्कूल के बाद हम
देर सूरज डूबने तक खेलते थे
👍 हम अपने
real दोस्तों के साथ खेलते थे;
net फ्रेंड्स के साथ नही ।
👍 जब भी हम प्यासे होते थे
तो नल से पानी पीना
safe होता था और
हमने कभी mineral water bottle को नही ढूँढा ।
👍 हम कभी भी चार लोग
गन्ने का जूस उसी गिलास से ही
पी करके भी बीमार नही पड़े ।
👍 हम एक प्लेट मिठाई
और चावल रोज़ खाकर भी
मोटे नही हुए ।
👍 नंगे पैर घूमने के बाद भी
हमारे पैरों को कुछ नही होता था ।
👍 हमें healthy रहने
के लिए Supplements नही
लेने पड़ते थे ।
👍 हम कभी कभी अपने खिलोने
खुद बना कर भी खेलते थे ।
👍 हम ज्यादातर अपने parents के साथ या grand- parents के पास ही रहे ।
👌हम अक्सर 4/6 भाई बहन
एक जैसे कपड़े पहनना
शान समझते थे.....
common. वाली नही
एकतावाली feelings ...
enjoy करते थे......!
👍 हम डॉक्टर के पास
नहीं जाते थे,
पर डॉक्टर हमारे पास आते थे
हमारे ज़्यादा बीमार होने पर ।
👍 हमारे पास
न तो Mobile, DVD's,
PlayStation, Xboxes,
PC, Internet, chatting,
क्योंकि
हमारे पास real दोस्त थे ।
👍 हम दोस्तों के घर
बिना बताये जाकर
मजे करते थे और
उनके साथ खाने के
मजे लेते थे।
कभी उन्हें कॉल करके
appointment नही लेना पड़ा ।
👍 हम एक अदभुत और
सबसे समझदार पीढ़ी है क्योंकि
हम अंतिम पीढ़ी हैं जो की
अपने parents की सुनते हैं...
और
साथ ही पहली पीढ़ी
जो की
अपने बच्चों की सुनते हैं ।
We are not special,
but.
We are
LIMITED EDITION
and we are enjoying the
Generation Gap......