Tuesday, December 1, 2015

लाल किताब के सिद्ध टोटके और उपाय

‘लाल किताब’ में धर्माचरण और सदाचरण के बल पर ग्रह दोष निवारण का झण्डा ऊँचा किया है, जिससे हमारा इहलोक तो बनेगा ही, परलोक भी बनेगा।  ‘लाल किताब’ में विभिन्न प्रकार के ग्रह दोषों से बचाव के लिए सैकड़ों टोटकों का विधान है। जीवन का कोई ऐसा पक्ष नहीं है, जिससे संबंधित टोटके न बतलाये गये हों।
यह ज्योतिष के सिधान्तो और हस्तरेखा के सिधान्तो को सरल रूप से समझाता है।

1. इस ग्रन्थ में मानव मस्तिष्क के 42 प्रभागों को जन्म कुंडली के विभिन्न घरों से संबंधित कर दिया गया है। हस्तरेखा के सिधान्तो और व्यक्ति की जन्म कुंडली में विभिन्न ग्रहों की स्थिति से व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओ का बताया जा सकता है।
2. लाल किताब में कष्ट निवारण के लिए कुछ सरल उपाय बताये गए है, जो की मुसीबत में फसे व्यक्ति के लिए वरदान स्वरुप है।
3. उपाय के तौर पर महंगे यज्ञ और हवन आदि महेंगी रस्मो की आवश्यकता नही है।
4. लाल किताब कुछ सरल उपायों की मदद से जटिल समस्याओ का हल बता सकती है।
5. यन्त्र मंत्र और तंत्र से ये उपाय बहुत अलग है।
6.लाल किताब में सुझाये उपाय बहुत ही सरल और सुरक्षित है। ये किसी भी तरह से किसीको हानि नही पहुचाते और पुरी तरह से ग्रहों के कस्त्दायक प्रभाव को नियंत्रित करते है।

लाल किताब के सिद्ध टोटके और उपाय 

1.  आर्थिक समस्या के छुटकारे के लिए :
यदि आप हमेशा आर्थिक समस्या से परेशान हैं तो इसके लिए आप 21 शुक्रवार 9 वर्ष से कम आयु की 5 कन्यायों को खीर व मिश्री का प्रसाद बांटें !

2.  घर और कार्यस्थल में धन वर्षा के लिए :
इसके लिए आप अपने घर, दुकान या शोरूम में एक अलंकारिक फव्वारा रखें ! या एक मछलीघर जिसमें 8 सुनहरी व एक काली मछ्ली हो रखें ! इसको उत्तर या उत्तरपूर्व की ओर रखें ! यदि कोई मछ्ली मर जाय तो उसको निकाल कर नई मछ्ली लाकर उसमें डाल दें !

3.  परेशानी से मुक्ति के लिए :
आज कल हर आदमी किसी न किसी कारण से परेशान है ! कारण कोई भी हो आप एक तांबे के पात्र में जल भर कर उसमें थोडा सा लाल चंदन मिला दें ! उस पात्र को सिरहाने रख कर रात को सो जांय ! प्रातः उस जल को तुलसी के पौधे पर चढा दें ! धीरे-धीरे परेशानी दूर होगी !

4.  कुंवारी कन्या के विवाह हेतु :
१.       यदि कन्या की शादी में कोई रूकावट आ रही हो तो पूजा वाले 5 नारियल लें ! भगवान शिव की मूर्ती या फोटो के आगे रख कर “ऊं श्रीं वर प्रदाय श्री नामः” मंत्र का पांच माला जाप करें फिर वो पांचों नारियल शिव जी के मंदिर में चढा दें ! विवाह की बाधायें अपने आप दूर होती जांयगी !
२.      प्रत्येक सोमवार को कन्या सुबह नहा-धोकर शिवलिंग पर “ऊं सोमेश्वराय नमः” का जाप करते हुए दूध मिले जल को चढाये और वहीं मंदिर में बैठ कर रूद्राक्ष की माला से इसी मंत्र का एक माला जप करे ! विवाह की सम्भावना शीघ्र बनती नज़र आयेगी

5.  व्यापार बढाने के लिए :
१.       शुक्ल पक्ष में किसी भी दिन अपनी फैक्ट्री या दुकान के दरवाजे के दोनों तरफ बाहर की ओर थोडा सा गेहूं का आटा रख दें ! ध्यान रहे ऐसा करते हुए आपको कोई देखे नही !
२.      पूजा घर में अभिमंत्रित श्र्री यंत्र रखें !
३.      शुक्र्वार की रात को सवा किलो काले चने भिगो दें ! दूसरे दिन शनिवार को उन्हें सरसों के तेल में बना लें ! उसके तीन हिस्से कर लें ! उसमें से एक हिस्सा घोडे या भैंसे को खिला दें ! दूसरा हिस्सा कुष्ठ रोगी को दे दें और तीसरा हिस्सा अपने सिर से घडी की सूई से उल्टे तरफ तीन बार वार कर किसी चौराहे पर रख दें ! यह प्रयोग 40 दिन तक करें ! कारोबार में लाभ होगा !

6.   लगातार बुखार आने पर :
१.       यदि किसी को लगातार बुखार आ रहा हो और कोई भी दवा असर न कर रही हो तो आक की जड लेकर उसे किसी कपडे में कस कर बांध लें ! फिर उस कपडे को रोगी के कान से बांध दें ! बुखार उतर जायगा !
२.      इतवार या गुरूवार को चीनी, दूध, चावल और पेठा (कद्दू-पेठा, सब्जी बनाने वाला) अपनी इच्छा अनुसार लें और उसको रोगी के सिर पर से वार कर किसी भी धार्मिक स्थान पर, जहां पर लंगर बनता हो, दान कर दें !
३.      यदि किसी को टायफाईड हो गया हो तो उसे प्रतिदिन एक नारियल पानी पिलायें ! कुछ ही दिनों में आराम हो जायगा !

7.   नौकरी जाने का खतरा हो या ट्रांसफर रूकवाने के लिए :
पांच ग्राम डली वाला सुरमा लें ! उसे किसी वीरान जगह पर गाड दें ! ख्याल रहे कि जिस औजार से आपने जमीन खोदी है उस औजार को वापिस न लायें ! उसे वहीं फेंक दें दूसरी बात जो ध्यान रखने वाली है वो यह है कि सुरमा डली वाला हो और एक ही डली लगभग 5 ग्राम की हो ! एक से ज्यादा डलियां नहीं होनी चाहिए !

8.  कारोबार में नुकसान हो रहा हो या कार्यक्षेत्र में झगडा हो रहा हो तो :
यदि उपरोक्त स्थिति का सामना हो तो आप अपने वज़न के बराबर कच्चा कोयला लेकर जल प्रवाह कर दें ! अवश्य लाभ होगा !

9.  मुकदमें में विजय पाने के लिए :
यदि आपका किसी के साथ मुकदमा चल रहा हो और आप उसमें विजय पाना चाहते हैं तो थोडे से चावल लेकर कोर्ट/कचहरी में जांय और उन चावलों को कचहरी में कहीं पर फेंक दें ! जिस कमरे में आपका मुकदमा चल रहा हो उसके बाहर फेंकें तो ज्यादा अच्छा है ! परंतु याद रहे आपको चावल ले जाते या कोर्ट में फेंकते समय कोई देखे नहीं वरना लाभ नहीं होगा ! यह उपाय आपको बिना किसी को पता लगे करना होगा !

10.  धन के ठहराव के लिए :
आप जो भी धन मेहनत से कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च हो रहा हो अर्थात घर में धन का ठहराव न हो तो ध्यान रखें को आपके घर में कोई नल लीक न करता हो ! अर्थात पानी टप–टप टपकता न हो ! और आग पर रखा दूध या चाय उबलनी नहीं चाहिये ! वरना आमदनी से ज्यादा खर्च होने की सम्भावना रह्ती है !

11.  मानसिक परेशानी दूर करने के लिए :
रोज़ हनुमान जी का पूजन करे व हनुमान चालीसा का पाठ करें ! प्रत्येक शनिवार को शनि को तेल चढायें ! अपनी पहनी हुई एक जोडी चप्पल किसी गरीब को एक बार दान करें !

12.  बच्चे के उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु के लिए :
१.       एक काला रेशमी डोरा लें ! “ऊं नमोः भगवते वासुदेवाय नमः” का जाप करते हुए उस डोरे में थोडी थोडी दूरी पर सात गांठें लगायें ! उस डोरे को बच्चे के गले या कमर में बांध दें !
२.      प्रत्येक मंगलवार को बच्चे के सिर पर से कच्चा दूध 11 बार वार कर किसी जंगली कुत्ते को शाम के समय पिला दें ! बच्चा दीर्घायु होगा !

13.  किसी रोग से ग्रसित होने पर :
सोते समय अपना सिरहाना पूर्व की ओर रखें ! अपने सोने के कमरे में एक कटोरी में सेंधा नमक के कुछ टुकडे रखें ! सेहत ठीक रहेगी !

14.   प्रेम विवाह में सफल होने के लिए :
यदि आपको प्रेम विवाह में अडचने आ रही हैं तो :
शुक्ल पक्ष के गुरूवार से शुरू करके विष्णु और लक्ष्मी मां की मूर्ती या फोटो के आगे “ऊं लक्ष्मी नारायणाय नमः” मंत्र का रोज़ तीन माला जाप स्फटिक माला पर करें ! इसे शुक्ल पक्ष के गुरूवार से ही शुरू करें ! तीन महीने तक हर गुरूवार को मंदिर में प्रशाद चढांए और विवाह की सफलता के लिए प्रार्थना करें !

15.  नौकर न टिके या परेशान करे तो :
हर मंगलवार को बदाना (मीठी बूंदी) का प्रशाद लेकर मंदिर में चढा कर लडकियों में बांट दें ! ऐसा आप चार मंगलवार करें !

16.  बनता काम बिगडता हो, लाभ न हो रहा हो या कोई भी परेशानी हो तो :
हर मंगलवार को हनुमान जी के चरणों में बदाना (मीठी बूंदी) चढा कर उसी प्रशाद को मंदिर के बाहर गरीबों में बांट दें !

17.  यदि आपको सही नौकरी मिलने में दिक्कत आ रही हो तो :
१.       कुएं में दूध डालें! उस कुएं में पानी होना चहिए !
२.      काला कम्बल किसी गरीब को दान दें !
३.      6 मुखी रूद्राक्ष की माला 108 मनकों वाली माला धारण करें जिसमें हर मनके के बाद चांदी के टुकडे पिरोये हों !

18.  अगर आपका प्रमोशन नहीं हो रहा तो :
१.       गुरूवार को किसी मंदिर में पीली वस्तुये जैसे खाद्य पदार्थ, फल, कपडे इत्यादि का दान करें !
२.      हर सुबह नंगे पैर घास पर चलें !

19.  पति को वश में करने के लिए :
यह प्रयोग शुक्ल  पक्ष में करना चाहिए ! एक पान का पत्ता लें ! उस पर चंदन और केसर का पाऊडर मिला कर रखें ! फिर दुर्गा माता जी की फोटो के सामने बैठ कर दुर्गा स्तुति में से चँडी स्त्रोत का पाठ 43 दिन तक करें ! पाठ करने के बाद चंदन और केसर जो पान के पत्ते पर रखा था, का तिलक अपने माथे पर लगायें ! और फिर तिलक लगा कर पति के सामने जांय ! यदि पति वहां पर न हों तो उनकी फोटो के सामने जांय ! पान का पता रोज़ नया लें जो कि साबुत हो कहीं से कटा फटा न हो ! रोज़ प्रयोग किए गए पान के पत्ते को अलग किसी स्थान पर रखें ! 43 दिन के बाद उन पान के पत्तों को जल प्रवाह कर दें ! शीघ्र समस्या का समाधान होगा !

20.  यदि आपको धन की परेशानी है, नौकरी मे दिक्कत आ रही है, प्रमोशन नहीं हो रहा है या आप अच्छे करियर की तलाश में है तो यह उपाय कीजिए :
किसी दुकान में जाकर किसी भी शुक्रवार को कोई भी एक स्टील का ताला खरीद लीजिए ! लेकिन ताला खरीदते वक्त न तो उस ताले को आप खुद खोलें और न ही दुकानदार को खोलने दें ताले को जांचने के लिए भी न खोलें ! उसी तरह से डिब्बी में बन्द का बन्द ताला दुकान से खरीद लें ! इस ताले को आप शुक्रवार की रात अपने सोने के कमरे में रख दें ! शनिवार सुबह उठकर नहा-धो कर ताले को बिना खोले किसी मन्दिर, गुरुद्वारे या किसी भी धार्मिक स्थान पर रख दें ! जब भी कोई उस ताले को खोलेगा आपकी किस्मत का ताला खुल जायगा !

21. यदि आप अपना मकान, दुकान या कोई अन्य प्रापर्टी बेचना चाहते हैं और वो बिक न रही हो तो यह उपाय करें :
बाजार से 86 (छियासी) साबुत बादाम (छिलके सहित) ले आईए ! सुबह नहा-धो कर, बिना कुछ खाये, दो बादाम लेकर मन्दिर जाईए ! दोनो बादाम मन्दिर में शिव-लिंग या शिव जी के आगे रख दीजिए ! हाथ जोड कर भगवान से प्रापर्टी को बेचने की प्रार्थना कीजिए और उन दो बादामों में से एक बादाम वापिस ले आईए ! उस बादाम को लाकर घर में कहीं अलग रख दीजिए ! ऐसा आपको 43 दिन तक लगातार करना है ! रोज़ दो बादाम लेजाकर एक वापिस लाना है ! 43 दिन के बाद जो बादाम आपने घर में इकट्ठा किए हैं उन्हें जल-प्रवाह (बहते जल, नदी आदि में) कर दें ! आपका मनोरथ अवश्य पूरा होगा ! यदि 43 दिन से पहले ही आपका सौदा हो जाय तो भी उपाय को अधूरा नही छोडना चाहिए ! पूरा उपाय करके 43 बादाम जल-प्रवाह करने चाहिए ! अन्यथा कार्य में रूकावट आ सकती है !

22. यदि आप ब्लड प्रेशर या डिप्रेशन से परेशान हैं तो :
इतवार की रात को सोते समय अपने सिरहाने की तरफ 325 ग्राम दूध रख कर सोंए ! सोमवार को सुबह उठ कर सबसे पहले इस दूध को किसी कीकर या पीपल के पेड को अर्पित कर दें ! यह उपाय 5 इतवार तक लगातार करें ! लाभ होगा !

23. माईग्रेन या आधा सीसी का दर्द का उपाय :
सुबह सूरज उगने के समय एक गुड का डला लेकर किसी चौराहे पर जाकर दक्षिण की ओर मुंह करके खडे हो जांय ! गुड को अपने दांतों से दो हिस्सों में काट दीजिए ! गुड के दोनो हिस्सों को वहीं चौराहे पर फेंक दें और वापिस आ जांय ! यह उपाय किसी भी मंगलवार से शुरू करें तथा 5 मंगलवार लगातार करें ! लेकिन….लेकिन ध्यान रहे यह उपाय करते समय आप किसी से भी बात न करें और न ही कोई आपको पुकारे न ही आप से कोई बात करे ! अवश्य लाभ होगा !

24. फंसा हुआ धन वापिस लेने के लिए :
यदि आपकी रकम कहीं फंस गई है और पैसे वापिस नहीं मिल रहे तो आप रोज़ सुबह नहाने के पश्चात सूरज को जल अर्पण करें ! उस जल में 11 बीज लाल मिर्च के डाल दें तथा सूर्य भगवान से पैसे वापिसी की प्रार्थना करें ! इसके साथ ही “ओम आदित्याय नमः “ का जाप करें !

नोट :
1. लाल किताब के सभी उपाय दिन में ही करने चाहिए ! अर्थात सूरज उगने के बाद व सूरज डूबने से पहले !
2. सच्चाई व शुद्ध भोजन पर विशेष ध्यान देना चाहिए !
3. किसी भी उपाय के बीच मांस, मदिरा, झूठे वचन, परस्त्री गमन की विशेष मनाही है !
4. सभी उपाय पूरे विश्वास व श्रद्धा से करें, लाभ अवश्य होगा !
5. एक दिन में एक ही उपाय करना चाहिए ! यदि एक से ज्यादा उपाय करने हों तो छोटा उपाय पहले करें !    एक उपाय के दौरान दूसरे उपाय का कोई सामान भी घर में न रखें !
6. जो भी उपाय शुरू करें तो उसे पूरा अवश्य करें ! अधूरा न छोडें !

दयनीय है देश में महिलायों की स्थिति: प्रतिभा पाटिल

भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने देश में महिलायों की स्थिति को "दयनीय" बताया है. राष्ट्रपति ने कहा कि इस सिलसिले में जल्द से जल्स ठोस कदम उठाए जाने चाहिए.
नन्ही छान संस्थान द्वारा आयोजित किए गए एक समारोह में राष्ट्रपति ने कहा, "2011 की जन गणना के अस्थाई आंकडें हाल ही में जारी किए गए हैं. यह देखने में आया है कि हमारी आबादी में औरतों की संख्या बहुत ही कम है. हर हजार पुरुषों पर केवल 940 महिलाएं ही हैं. मुझे लगता है कि यह एक दयनीय स्थिति बनती जा रही है."
समाज में स्त्री और पुरुष के बीच हो रहे भेदभाव को आड़े हाथ लेते हुए प्रतिभा पाटिल ने कहा, "आबादी में यह असंतुलन समाज में फैली गलत धारणाओं का नतीजा है. इन धारणायों के कारण ही लोग भ्रूण हत्या और शिशु हत्या जैसे निंदनीय काम करते हैं. मेरे विचार में इस स्थिति के सुधार के लिए ठोस कदम उठाने होंगे और मुझे नहीं लगता कि कोई भी इस बात से असहमत होगा."
प्रतिभा पाटिल ने कहा कि देश में ऐसे सुधारों की सख्त जरूरत है जिनके चलते समाज में महिला और पुरुष के बीच के भेद भाव खत्म किए जा सकें और लोग यह समझ सकें कि एक खुशहाल परिवार और अच्छे भविष्य के लिए जरूरी है कि दोनों साथ मिल कर काम करें.
दहेज प्रथा के बारे में राष्ट्रपति ने कहा, "यह धारणा कि बेटी बोझ होती है, दहेज जैसी सामाजिक बुराइयों से उत्पन्न होती है. दहेज के कारण बच्चियों के प्रति प्रेम और स्नेह जैसी भावनाएं खत्म हो रही हैं."
रिपोर्ट: एजेंसियां/ईशा भाटिया
http://www.dw.com/hi/%E0%A4%A6%E0%A4%AF%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%AF-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AD%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%B2/a-14979043

बेतुके नियम

हम भारतीय होने पर गर्व करते हैं और भारत का सम्मान करते हैं, इस बात का सुबूत देने के लिए हमें क्या करना चाहिए? बहुत से तरीके हो सकते हैं देशभक्ति दिखाने के, लेकिन अगर राष्ट्रगान पर खड़े नहीं हुए तो क्या इसका ये अर्थ है कि हम देश का अपमान कर रहे हैं?
मुंबई के कुर्ला स्थित सिनेमा घर में राष्ट्रगान के लिए न खड़े होने पर एक मुस्लिम परिवार को सिनेमा घर से बाहर कर दिया गया. हालांकि परिवार ने माफी मांगी कि उनसे गलती हुई, लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या ये वाकई गलती थी?
कुछ दिनों पहले भी टीवी एक्टर कुशाल टंडन ने ट्वीट करके अभिनेत्री अमीषा पटेल पर भी राष्ट्रगान पर खड़े नहीं होने की बात कही थी. ये मामला सुर्खियों में तो आया लेकिन किसी और वजह से. अमीषा पटेल ने राष्ट्रगान पर खडे नहीं होने का कारण अपनी स्वास्थ संबंधी समस्या को बताया. जो उंगली उनकी देशभक्ति पर उठी थी वो अचानक किसी और दिशा में मुड़ गई. अपनी पीरियड्स की समस्या पर किए ट्वीट की वजह से मामले का रुख ही बदल गया था. पर इस बार राष्ट्रगान पर खड़े नहीं होने का मामला फिर सुर्खियों में आ गया, वजह ये भी हो सकती है कि वो एक मुस्लिम परिवार था. अचानक कुछ लोगों की देशभक्ति जगी और उन्होंने इस परिवार के साथ बदसलूकी की. परिवार में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे. उन्हीं के सामने देशभक्ति के नाम पर अपशब्द कहे गए. आश्चर्य होता है ऐसे लोगों पर जब उनकी देशभक्ति इस तरह लोगों के सामने जागती है. और उस देशभक्ति के नशे में चूर ये लोग ये भी नहीं सोचते कि महिलाओं और बच्चों के सामने वो क्या कह रहे हैं और देशभक्ति की कौन सी परिभाषा समझाने की कोशिश कर रहे हैं. यहां ये बताना जरूरी है कि 2003 में महाराष्ट्र सरकार ने ये आदेश पारित किया था कि हर सिनेमा हॉल में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान का प्रसारण किया जाएगा. और इस दौरान सभी दर्शकों का खड़ा होना अनिवार्य होगा.
राष्ट्रगान पर क्या कहता है कानून?-
राष्ट्रगान बजने पर देश के नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वो सावधान होकर खड़े रहें. प्रिवेंशन ऑफ इंसल्‍ट्स टू नेशनल ऑनर एक्‍ट, 1971 के सेक्‍शन तीन के अनुसार ‘जान-बूझ कर जो कोई भी किसी को भारत का राष्‍ट्रगान गाने से रोकने की कोशिश करेगा या इसे गा रहे किसी समूह को किसी भी तरह से बाधा पहुंचाएगा, उसे तीन साल तक कैद या जुर्माना भरना पड़ सकता है. इस एक्‍ट में राष्‍ट्रगान गाने या बजाने के दौरान बैठे रहने या खड़े होने के बारे में कुछ नहीं कहा गया है. सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले पर कह चुका है कि ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है कि किसी को राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य किया जाए.
क्या बंद नहीं होना चाहिए ये नियम?
तनाव भरे जीवन से थोड़ी देर निजात पाने के लिए एक व्यक्ति तीन घंटे की फिल्म देखने के लिए जाता है. वो डेढ़ दो सौ रुपये का टिकट सिर्फ खुद को रिलैक्स करने के लिए खरीदता है. अब अंदर आकर पहले उसे अपनी देशभक्ति का परिचय देना होगा फिर वो फिल्म देखेगा. जरा सोचिए कोई 'हेट स्टोरी-2' जैसी फिल्म देखने जाये तो वो किन भवनाओं से जाएगा.. और शुरुआत में ही उसे देशभक्ति वाली भावनाएं जागृत करनी होंगी, तो कितना मुश्किल होता होगा ऐसे में भावनाओं से लड़ पाना. और यहां सवाल ये भी उठता है कि ऐसे मूड में जब व्यक्ति अनमने ढंग से राष्ट्रगान सुनता है, फिर आजू बाजू वालों को देखता है, अगर सब खड़े हैं तो खड़ा होता है, नहीं तो खड़े होने की जहमत नहीं उठाता, ऐसे में राष्ट्रगान को मजबूरी समझना क्या राष्ट्रगान का अपमान नहीं है? 
सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान को प्रसारित करने का ये नियम निहायती बेमानी लगता है. जिस तरह से हम राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करते हैं, जिस तरह ध्वज को कहीं पर भी फहराया नहीं जा सकता उसी तरह राष्ट्रगान को भी किसी भी जगह गाना या बजाना नहीं चाहिए. क्योंकि अगर उस जगह मौजूद व्यक्ति राष्ट्रीय ध्वज या राष्ट्रगान को सम्मान नहीं दे पाता तो उसे उसका अपमान करने का भी कोई मौका नहीं देना चाहिए.

कॉमन सिविल कोड के पक्षधर थे आंबेडकर

हालांकि बाबासाहेब आंबेडकर यह कतई नहीं चाहते थे कि यूनीफॉर्म सिविल कोड नागरिकों पर जबरन थोपा जाए.
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने 2 दिसंबर 1948 को संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में यूनीफॉर्म सिविल कोड को शामिल करने के फैसले का बचाव करते हुए कहा था कि भविष्य में राज्य इसे उचित जगह पर रख सकेगी.
हालांकि आंबेडकर ने यह साफ-साफ कहा था कि इस प्रावधान को नागरिकों पर जबरन नहीं थोपा जा सकता क्योंकि मुसलमान को भड़काकर इसे लागू करना महज पागलपन होगा. इससे कुछ दिनों पहले 23 नवंबर, 1948 को कहा था कि भविष्य में संसद इसे उन लोगों के लिए लागू करे जो स्वेच्छा से यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए तैयार हैं.
पिछले कुछ दिनों में आंबेडकर और संविधान पर संसद में बहस देखने को मिली है. इस बहस के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने भाषण में कहा कि यदि आज अंबेडकर हमारे बीच खड़े होकर यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने का प्रस्ताव दें, तो सदन के मौजूदा सदस्यों से किस तरह की प्रतिक्रिया मिलती.
संविधान सभा से आंबेडकर ने कहा था- ‘मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह समझ नहीं आता कि धर्म को इतना वृहद अधिकार क्यों दिया जाए कि वह हमारे पूरे जीवन पर अधिपत्य कर ले और यहां तक कि विधायिका को भी उस क्षेत्र में घुसने से रोक सके. आखिर यह स्वतंत्रता हमें किस लिए मिली है? यह स्वतंत्रता हमें इसलिए मिली है कि हम अपने सामाजिक ढांचे को सुधार सकें. यह ढांचा अनेकों विषमताओं, असमानताओं और भेदभावों से बुरी तरह ग्रस्त है और यह सभी हमारे मौलिक अधिकारों के संघर्ष में खड़े हैं.’
हालांकि आंबेडकर ने कहा कि नीति निर्देशक तत्वों में दिए यूनीफॉर्म सिविल कोड का प्रवाधान राज्य को इसे लागू करने के लिए बाध्य नहीं करता, बस उसे शक्ति देता है कि इस दिशा में आगे बढ़ सके. “इसे लेकर डरने की जरूरत नहीं है... क्योंकि राज्य इस शक्ति का इस्तेमाल ऐसे किसी तरीके से नहीं कर सकता जिसपर देश के मुसलमानों, इसाइयों या अन्य किसी समुदाय को आपत्ति हो” आंबेडकर ने कहा.
कोई भी सरकार अपनी शक्तियों का इस्तेमाल ऐसे तरीके से नहीं कर सकती कि देश का मुस्लिम समुदाय विरोध में खड़ा हो जाए. मेरी समझ से कोई पागल सरकार ही ऐसा कुछ करने की कोशिश करेगी.
इसके बावजूद 23 नवंबर, 1948 को आंबेडकर ने कुछ मुसलमान सदस्यों के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया कि नीति निर्देशक में इस प्रावधान का नागरिकों के व्यक्तिगत कानून पर कोई असर नहीं पड़ेगा. हालांकि उनके प्रस्ताव पर आंबेडकर ने कहा कि भविष्य में यूनीफॉर्म सिविल कोड की दिशा में कोई भी संभावित कदम उन लोगों के लिए उठाया जाएगा जो स्वेच्क्षा से इसके अधीन आना चाहते हैं.
“यह प्रावधान कतई नहीं कहता कि इस कानून के बनने के बाद राज्य अपने सभी नागरिकों पर इस कानून को लागू महज इसलिए करे कि वह उसके नागरिक हैं. यह पूरी तरह से संभव है कि भविष्य में संसद इस कोड को लागू करने की शुरुआत करे और वह महज उन लोगों पर लागू हो जो स्वेच्छा से इसे कबूलने के लिए तैयार हों” आंबेडकर ने कहा.

नोगिया पदक जीतने पर आप सभी को बहुत बहुत बधा



राजस्थान विश्विद्यालय में आयोजित एथिलेटिक्स प्रतियोगिता में मेरे छोटे भाई दीपक नोगिया ने दौड में 4×4×100 मीटर और 4×100मीटर में स्वर्ण पदक तथा 1×100 मीटर में कांस्य पदक जीतने पर आप सभी को बहुत बहुत बधाई ।।।
गजेन्द्र नोगिया वार्ड पंच चतरपुरा 

सड़क पर रहने वाले बेघर और कामकाजी बच्चों का अखबार ‘बालकनामा’


सड़क पर रहने वाले बेघर और कामकाजी बच्चों का अखबार बालकनामा
आबादी के लिहाज़ से भारत में सड़क के किनारे पर रहने वाले बेघर और कामकाजी बच्चों की संख्या सबसे ज़्यादा है। जब आप स्लम के बच्चों के बारे में सोचते है, तो आपके जेहन में केवल उनकी गंदगी, गरीबी, अशिक्षा, बाल श्रम, बाल उत्पीड़न, कुपोषण और स्वास्थ्य देखभाल की कमी इत्यादि के बारे में ख्याल आता है l समाज में आम आदमी और पुलिस द्वारा ऐसे बेघर और कामकाजी बच्चों के साथ दुर्व्यवहार होता है और घृणा की दृष्टि से देखा जाता है l इन सब बातो को ध्यान में रखते हुए चेतना नामक गैर-सरकारी संस्था ने 2002 में दिल्ली के 35 बच्चो की एक बढते कदम नाम की संस्था खड़ी की l ऐसे में आपने कभी सोचा भी नहीं होगा कि झुग्गी बस्ती, स्लम व सड़क के किनारे पर रहने वाले बेघर बच्चों में भी पत्रकारिता की भावना व प्रतिभा होती होगी l
दिल्ली में पिछले 10 वर्षों से झुग्गी बस्ती, स्लम व सड़क के किनारे पर रहने वाले बेघर और कामकाजी बच्चों ने साऊथ दिल्ली से “बलाकनामा” नामक अख़बार प्रकाशित करते है जिसके पत्रकार से लेकर संपादक तक सभी स्लम के बच्चे ही है l समाचार पत्र ‘बालकनामा’ से जुड़े बच्चे न सिर्फ बाल मज़दूरी कर रहे बच्चों को विकल्प दे रहे हैं बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का काम भी कर रहे हैं। और 8 पन्नो का अखबार सिर्फ 2 रुपए की कीमत पर उपलब्ध है जो भारत के 4 राज्यों दिल्ली, उतर प्रदेश, मध्य प्रदेश और उतरांखंड में वितरित होता है और 12,000 से अधिक बच्चे इस अखबार से जुड़े  है l
बीबीसी ने हाल मे मिसाल कायम करने वाली देश की 100 दमदार महिलाओ को चुना, इनमे एक नाम दिल्ली की 20 वर्षीय ‘शन्नो’ का भी है। वह हिन्दी और इंग्लिश मे निकलने वाले बेघर और कामकाजी बच्चों के पाक्षिक अखबार बालकनामाकी पूर्व सम्पादिका व वर्तमान मे सलाहकार है। बालकनामाअपने आप मे एक अनूठा अखबार माना जाता है। आईये हम आपको ‘बालकनामा’ की टीम से रू-ब-रू करवाते है:-
शन्नो (पहले एडिटर, अब सलाहकार)
शन्नो 18 वर्ष की उम्र तक अख़बार की संपादिका थी लेकिन 18 वर्ष पूरे होते ही वह अपने संपादिका के पद से मुक्त होकर अब वह सलाहकार के तौर पर अख़बार से जुडी हुई है l इस अख़बार का नियम है कि रिपोर्टर हो या सम्पादक 18 साल की उम्र तक ही उसे जिम्मेदारी दी जाती है l शन्नो कहती है “एक रिपोर्टर के तौर पर किसी बच्चे की खबर छपती है, तो उस पर असर होता ही है, उसके अभिभावक पर भी काफी असर पड़ता है l” हम अख़बार के माध्यम से बच्चो से जुडी सरकारी योजनाये, व NGO के संचालन तथा पालिसी आदि की जानकारी देते है l अब देखिये नियम तो यह है कि 14 साल तक के बच्चे मेहनत-मजदूरी नहीं करेंगे, पर असलियत यह नहीं है, हमे लगता है कि हमारे लिखने से कुछ तो असर जरुर होगा l
चांदनी (मुख्य संपादिका)
16 वर्षीय चांदनी की कहानी भी संघर्ष से भरी है l जब वह 4 साल की थी, उसका परिवार यूपी के बरेली से दिल्ली खाने कमाने के लिये आया था l बाद में वह अपने पिता के साथ सडको पर खेल तमाशा दिखाने लगी l 2008 में पिता की मौत के बाद वह कबाड़ बीनने लागी l इसी दौरान वह NGO ‘चेतना’ के संपर्क में आई और ‘बालकनामा’ से जुड़ गई l और अब अखबार में खबरों और कहानियों को चित्रित करने का निर्णय लेती है।
चांदनी (मुख्य संपादिका) ने ‘बालकनामा’ अख़बार के शुरुआत के बारे में कहना है कि साल 2003 में इस अख़बार की शुरुआत NGO ‘चेतना’ ने ही की थी, जोकि अब झुग्गी बस्तियों में रहने वाले बच्चो के बढ़ते कदम की आवाज़ है l हमारे बारे में कोई नहीं जान पाता, हम कैसे रहते है, किस स्थिति में रहते है, इन बच्चो की दुनिया अँधेरी है l सभी बच्चे चाहते थे कि उन्हें उसी रूप में दर्शाया जाय जिस हाल में वे दिन भर काम ...बाल मजदूरी करते है l इसलिये इस आइडिया पर काम शुरू किया गया कि हम बच्चे अपना अख़बार निकाले l हम चाहते है कि बच्चे परेशानियों से लड़ना सीखे और परेशानियों को अपनी ताकत बनाये l
आरिफ (चीफ रिपोर्टर)
15 वर्षीय आरिफ बताता है कि परिवार के गुजर-बसर के लिये वह रोजाना करीब 200 मुर्गे काटता है, परिवार में बीमार माँ और चार भाई बहनों में वह अकेला कमाने वाला है l लेकिन आरिफ परिवार का पेट पालने के साथ वह ‘बालकनामा’ अख़बार में रिपोर्टर की जिम्मेदारी भी निभाता है l

शम्भू (रिपोर्टर)
16 वर्षीय, शंभू,  जो रात के दौरान एक होटल में काम करता है और दिन के दौरान कारों को साफ करता है । शंभू,  कहता है कि मेरा सपना था कि मेरा फोटो एक दिन अख़बार में छपे l अख़बार में जब मेरी फोटो छपी तो मुझे बेहद ख़ुशी हुई l फिर मैंने सोचा कि मेरे जैसे कितने बच्चे है जो कामकाजी है और बेघर है, मैं एक-एक कर सभी के नाम और फोटो छपवाऊंगा l अब वह रिपोर्टर है और अख़बार के लिये समाचार और कहानियाँ लिखने के लिए समय निकाल ही लेता है। पहले वह नशा भी करता था पर अब नहीं करता उसका मानना है कि बच्चे नशे के कारण आगे नहीं बढ़ पाते l
ज्योति (रिपोर्टर)
14 वर्षीय ज्योति जोकि दिल्ली के सराय काले खॉं अंतर्राज्‍यीय बस अडडे के पास रैन बसेरा मे रहती है। जो सङको पर से कबाङ बीन कर परिवार की मदद करती है। इसलिये इसके दिन की शुरूआत तङके सुबह 4 बजे से ही हो जाती है। ज्योति को नशे की आदत थी जो चेतना NGO की मदद से छुटाई गई फिर एक बार ज्योति बदली तो हमेशा के लिये बदल गई। वह पढाई लिखाई सीखकर अब एक रिपोर्टर के तौर पर उसकी जिम्मेदारी कुछ और है। वह दुसरो के दुख सुख को सुनती है, और उनके बिजली पानी और गंदगी की समस्याओ को सुनने के बाद अखबार मे प्रकाशित करती है।





कितनी दयनीय दशा थी उस वक़्त महिलाओं की।

सोशल मीडिया अपनी भूमिका में असरकारी सिद्ध हो रहा है . ' यह देश हमारा है ' नाम से संचालित फेसबुक पेज इस देश में व्याप्त स्त्री और दलित विरोधी परम्पराओं /रुढियों की तस्वीरें सामने रख रहा है. पिछले दिनों केरल की गैर सवर्ण महिलाओं के खिलाफ १९वी शताब्दी के मध्य तक व्याप्त कुप्रथा की एक तस्वीर इस पेज पर देखने को मिली. इस प्रथा पर स्त्रीवादी काम भी हुए हैं . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए 'यह देश हमारा है' से साभार 

स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह

केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।

नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।
यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अवहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।

लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे। आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।

सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे। आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं।


इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों और उनके दुकानों के सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया।
मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक भी छीन कर लिया।

समय के साथ औरतों की स्तिथि हर समाज में हर धर्म में बदली है वरना समाज की कई भयानक परम्पराएँ तो मैंने अपनी आँखों से देखी है मेरी मां .. जब घर से बाहर जाती थी तो बाहर पोल में बैठे मर्द लोगों के सामने से अपनी चप्पल खोल कर हाथ में लेकर तिरछी होकर गुजरती थी .. पापा का विरोध करना मेरे पापा के चाचा ताऊ दादा को गंवारा न हुआ . मेरी दूर की दादी ताईयां .. मासिक धर्म के दौरान मेरा या बड़ी बहनों का पलंग पर सोना घर से बाहर जैसे स्कूल जाना आदि बर्दास्त नहीं कर पाती थी .. जब इस आधुनिक शिक्षित समाज में हम इतनी विसंगतियों से गुजरे हैं तो उस दौर की औरतों के साथ यह सब घटा होगा सहज विस्वसनीय है .. गांवों में आज भी जांत पांत घुंघट .. चप्पल हाथ में उठाना .. ,, सभ्रांत घरों के पुरुष के सामने से निम्न जाती के लोगों का नहीं गुजरना या स्वर्ण कुंएं से पानी नहीं भरने देना रुढ़िवादी परम्पराएं आज भी प्रचलित है ..

कितनी दयनीय दशा थी उस वक़्त महिलाओं की। महिलाओं के साथ इस तरह की सोच एक सभ्य भारत को नही दर्शाती। कई जगह तो आज भी कुछ नही बदला। जैसी मध्य प्रदेश में एक दलित लड़की की पिटाई सिर्फं इसलिए कर दी क्योंकि उसकी छाया एक पिछड़ी जाति के ब्राह्मणवादी व्यक्ति पर पद रही थी। दोस्तों कुछ लोग आज बोलते हैं की आरक्षण को बंद कर देना चाहिए। इससे देश का नुकसान होता है। तो क्या इस तरह की रूढ़ियों से देश का नुकशान नही होता। आज भी हरयाणा में में एक सवर्ण द्वारा एक अदालत मजदूर का हाथ इसलिए काट दिया जाता है क्योंकि उसने खेत में रखे उसके मटके से पानी पि लिया था, उस मटके से पक्षी पानी पी सकता है आदमी नही। आज भी महिलाओं के साथ बहुत बड़ा भेदभाव होता है चाहे वह किसी भी जाति या धरम की हो। यह इसलिए है क्योंकि इस देश का संविधान आज तक सही तरीके से लागू ही नही हुआ।