Friday, April 1, 2016

भाषा और समाज

एक माता के रूप में मातृभाषा तो अपने समस्त कर्त्तव्य समुचित रूप से निभाती रही, परन्तु हम कृतघ्न इस माँ के उपकारों को भूल कर अंग्रेजी(आंटी) की गोद में जा बैठे। मेरा उद्देश्य यहाँ मातृभाषा पर अंध प्रेम प्रदर्शित करते हुए अंग्रेजी का अतार्किक विरोध करना नहीं है, ऐसे कई मौलिक कारण है जो मातृभाषा के किसी भी राष्ट्र की सफलता के पीछे छुपे महत्व को प्रदर्शित करते हैं। शिक्षक (माता-पिता) संस्कारवर्धन करने कि दवाई भी है, मातृभाषा के संरक्षक प्रतिभावान शिक्षकों (माता-पिता) को मेरा शत-शत नमन। धोती-कुर्ता पहने ये मातृभाषा के वीर जब पाठ्यपुस्तक हाथ में लेकर घर से निकलते हैं तो लगता है जैसे फौज का नौजवान बंदूक लिए अपनी जान को हथेली पर रखकर सीमा पर लड़ने जा रहा हो। उचित भी है- इन मातृभाषा के वीरों की कलम किसी बंदूक की गोली से कम थोड़े ही है।

भारत एक विविधताओं से परिपूर्ण राष्ट्र होते हुए भी अपनी एकल-सांस्कृतिक-चेतना के लिए विश्वविख्यात है। हमारी संस्कृति किसी धर्म या जाति की नहीं, अपितु हमारे भारतीय होने की द्योतक है। किसी भी संस्कृति के चार स्तंभ- राष्ट्रवाद, भाषा, आचार-विचार एवं परम्पराएं; एक रथ के चार पहियों की तरह होते हैं।

कई लोग हमसे यह प्रश्न पूछते है कि हमें आज के तकनिकी युग में हिंदी कि उपयोगिता क्या है? इस बात का उत्तर यह है कि सामाजिक चेतना का विकास मातृभाषा के माध्यम से ही होता है। मातृभाषा ही वह भाषा है जो हमें समाज की बुनियाद से जोड़ती है। इसके बिना तो हम भारतीय किसी भी क्षेत्र में विकास ही नहीं कर सकते। यदि विदेश में जन्मी-पली-बढ़ी, हमारे देश के सत्ताधारी गठबंधन की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी स्वयं इस भाषा के महत्व को समझकर, एक आम नागरिक से जुड़ने के लिए यदि इस भाषा को सिखने का कार्य कर सकती है, तो हम जानकर भी अपनी मातृभाषा को निकृष्ट क्यों समझतें हैं?
  
देश को जगाने वाले महान साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र ने मातृभाषा का महत्व कुछ इस प्रकार से बताया है-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल ।।
अंग्रेजी पढिके जदपि, सब गुन होत प्रबीन ।
पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।।
विविध कला, शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार ।

सब देसन से लै करहु, निज भाषा माँहि प्रचार ।।
                                                                                                                                                                  


मेरी दृष्टि से भाषा मात्र मनुष्य के मनुष्य होने की पहचान और शर्त है। भाषा के बिना मनुष्य नहीं होता, पशु से मनुष्य के विकास में भाषा ही वह सीढ़ी है जिस को पार करके वह मनुष्यत्व प्राप्त करता है। अवधारणा करने की शक्ति और उसके साथ-साथ यह प्रश्न पूछने की शक्ति कि मैं कौन हूँ या कि मैं क्या हूँ या मैं क्यों हूँ। यही मनुष्यत्व की पहचान है,और यह शक्ति तब से प्रारम्भ होती है जब से जीव को भाषा मिलती है। भाषा मिलने के बाद यह मनुष्य रूपी जीव उसी प्रकार के सभी पशु रूपी जीवों से अलग हो जाता है।
भाषा के बिना समाज में अपनी अस्मिता की पहचान नहीं हो सकती। अत: सब से पहले भाषा अपने-आप को पहचानने का साधन है। अगर किसी समाज को उसकी भाषा से काट दिया जाये तो हम उसकी अस्मिता को खंडित कर देते हैं। हिंदी के प्रति मेरा जो लगाव है, उसकी बुनियाद में केवल अपने मनुष्य होने को नहीं बल्कि अपने पहचाने जाने की पहली और मूल भाषा मानता हूँ। हिंदी के बिना मैं, मैं नहीं रहता।
भाषा मूल्यों की सृष्टि करना संभव बनाती है। मनुष्य की जिजीविषा ही अंतिम और स्वयंसिध्द तर्क होता है, जीने के लिए। मनुष्य भाषा के माध्यम से ऐसे मूल्यों की सृष्टि करता है, जिनके लिए वह जीता है।
भाषा के द्वारा हम यथार्थ की एक नए ढंग़ की पहचान कर सकते हैं। जिस चीज को हम पहचान रहे हैं, उसको आत्मसात कर के उसके प्रति किसी तरह की भी विवके पर आधारित प्रतिक्रिया हम भाषा के बिना नहीं कर सकते। प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति और संप्रेष्ण भाषा के बिना संभव नहीं है।
भाषा एक समग्र संस्कृति की आत्माभिव्यक्ति का साधन है, लेकिन उसके साथ-साथ वह स्वरूप रक्षा का भी एक साधन है। समाज के साथ जब हम भाषा को जोडते हैं तो उसकी युगधर्मिता की ओर ध्यान देते हैं। आखिर हमारे सारे सामाजिक व्यवहार का आधार भाषा है, और भाषा है भी सामाजिक व्यवहार के लिए।
भाषा का एक फंक्षनल या प्रयोजनमूलक उपयोग है, हमारे दैनंदिन जीवन में उसका एक स्थान है। हमारे प्रयोजनों का वह साधन है। भाषा के बिना व्यवहार नहीं हो सकता और जिस भाषा का व्यवहार से संबंध नहीं है, वह भाषा समाज से भी टूट जाएगी। इसलिए जब पूरी संस्कृति का अवमूल्यन होता है तो समाज का अवमूल्यन होता है इसलिए भाषा का भी अवमूल्यन होता है।
भाषा में सर्जनशीलता है। हम देखते हैं कि कई समाज ऐसे होते है जिनमें सर्जनशीलता का स्थान उंचा होता है, और कई समाज ऐसे भी हैं जो कि एक खास तरह की मानसिक जड़ता गति का अभाव तथा सर्जनशीलता को विलासिता समझते हैं। यह इसलिए कि भाषा के मामले में सर्जनशीलता के प्रति एक संदेह का भाव है।
जिस परिस्थिति में हम जीते हैं, उसमें हमें निरंतर ध्यान में रखना चाहिए कि पूरा समाज जिस भाषा के साथ जीता है, उसमें और उसके साथ जीते हुए अगर हम उस जीवन संदर्भ को पहचानते हैं, और उस भाषा में रचना करते हैं, तो हमारा समाज भी रचनाशील हो सकता है। नहीं तो वहां भी उस के सामने नयी स्थिति एक चुनौती बन कर आती है। जरूरी नहीं की वह काव्य की कोई समस्या हो, जरूरी नहीं है कि विज्ञापन या रसायन की नई परिस्थिति हो। कोई भी नई चीज अनुवादजीवी समाज के सामने आती है, तो वह तुरंत दूसरे का मुँह देखने लगता है, क्योंकि अपनी शक्ति को पहचानना उसने सीखा ही नहीं। भाषा हमारी शक्ति है, उस को हम पहचाने-वह रचनाशीलता का उत्स है-व्यक्ति के लिए भी और समाज के लिए भी।
भाषा का अपना समाजशास्त्र होता है। कभी भाषा समाज को परिभाषित करती है, तो कभी समाज, भाषा को। समाज की प्रत्येक गतिविधि भाषा के माध्यम से तय होती है। हम अपने प्राचीन काव्य एवं परंपराओं का अवलोकन करें तो भाषिक स्तर पर समाज बँटा मिलेगा। भाषा का समाजशास्त्र ही इस बात का जवाब दे देगा कि मागधी प्राकृत के साथ संस्कृत आचार्यों ने सौतेला व्यवहार क्यों किया। इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि आखिर संस्कृत नाटकों में निम्न श्रेणी के पात्र इसका प्रयोग क्यों करते हैं? संस्कृत नाटकों में माँ प्राकृत बोलती है, बेटा संस्कृत बोलता है। लिंग के हिसाब से किसी समाज की भाषा नही बदलती है। वस्तुत: वर्ण-व्यवस्था के आधार पर भाषा को आरोपित किया गया है। प्राकृत निम्न श्रेणी के पात्रों पर उपर से थोपी गयी है, इसीलिए यह भाषा कृत्रिम है। सवाल है कि क्या भोजपुरी उसी की कोख से पैदा हुयी है? भोजपुरी का समाज यह मानने से रोकता है। भोजपुरी कृषि एवं श्रम-संस्कृति की भाषा है। इसके शब्दों में भोजपुर की माटी की सोंधी गंध है। यह मेहनतकशों और कामगारों, किसानों और मजदूरों की भाषा है।
अत: भाषा और समाज का नितांत गहरा संबंध है। समाज की हर झलक सुख, दुख, पीड़ा, अवसाद, गति, मूल्यों से संश्लिष्ट संस्कृति भाषा में बोलती है। यही भाषा का समाज-शास्त्र है।

समाचार लेखन: कौन, क्या, कब, कहां, क्यों और कैसे?

News Writing: Who, What, When, Why and How?
समाचार लेखनकौनक्याकबकहांक्यों और कैसे?
सुभाष धूलिया

परंपरागत रूप से बताया जाता है कि समाचार उस समय ही पूर्ण कहा जा सकता है जब वह कौनक्याकबकहांक्यों और कैसे सभी प्रश्नों या इनके उत्तर को लेकर लोगों की जिज्ञासा को संतुष्ट करता हो। हिंदी में इन्हें छह ककार ( Five W and a H) के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी में इन्हें पांच डब्ल्यू’, हूवटव्हेनव्हाइ वेह्अर और एक एच’ हाउ कहा जाता है। इन छह सवालों के जवाब में किसी घटना का हर पक्ष सामने आ जाता है लेकिन समाचार लिखते वक्त इन्हीं प्रश्नों का उत्तर तलाशना और पाठकों तक उसे उसके संपूर्ण अर्थ में पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती का कार्य है। यह एक जटिल प्रक्रिया है। पत्रकारिता और समाचारों को लेकर होने वाली हर बहस का केंद्र यही होता है कि इन छह प्रश्नों का उत्तर क्या है और कैसे दिया जा रहा है। समाचार लिखते वक्त भी इसमें शामिल किए जाने वाले तमाम तथ्यों और अंतर्निहित व्याख्याओं को भी एक ढांचे या संरचना में प्रस्तुत करना होता है।

समाचार संरचना

सबसे पहले तो समाचार का इंट्रो’ होता है। यह कह सकते हैं कि यह असली समाचार है जो चंद शब्दों में पाठकों को बताता है कि क्या घटना घटित हुई है। इसके बाद के पैराग्राफ में इंट्रो की व्याख्या करनी होती है। इंट्रो में जिन प्रश्नों का उत्तर अधूरा रह गया है उनका उत्तर देना होता है। इसलिए समाचार लिखते समय इंट्रों के बाद व्याख्यात्मक जानकारियां देने की जरूरत होती है। इसके बाद विवरणात्मक या वर्णनात्मक जानकारियां दी जानी चाहिए। घटनास्थल का वर्णन करनाइस दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि यह घटना के स्वभाव पर निर्भर करता है कि विवरणात्मक जानकारियों का कितना महत्त्व है।

मसलन अगर कहीं कोई उत्सव हो रहा हो जिसमें अनेक सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम चल रहे हों तो निश्चय ही इसका समाचार लिखते समय घटनास्थल का विवरण ही सबसे महत्त्वपूर्ण है। अगर कोई राजनीतिज्ञ प्रेस सम्मेलन करता है तो इसमें विवरण देने (प्रेस सम्मेलन में व्याप्त माहौल के बारे में बताने) के लिए कुछ नहीं होता और सबसे महत्त्वपूर्ण यही होता है कि राजनीतिज्ञ ने जो कुछ भी कहा और एक पत्रकार थोड़ा आगे बढक़र इस बात की पड़ताल कर सकता है कि राजनीतिज्ञ का प्रेस सम्मेलन बुलाकर यह सब कहने के पीछे क्या मकसद था जो उसने मीडिया (यानि जनता) के साथ शेयर की और जिन बातों को उसने सार्वजनिक किया। यह भी कहा जाता है कि जो बताया जा रहा है वह समाचार नहीं बल्कि तो छिपाया जा रहा है वह समाचार है।  ( What is being revealed is not news but what is being canceled is news)

इसके बाद अनेक ऐसी जानकारियां होती हैं जो पांच डब्ल्यू और एक एच’ को पूरा करने के लिए आवश्यक होती हैं और जिन्हें समाचार लिखते समय पहले के तीन खंडों में शामिल नहीं किया जा सका। इसमें पहले तीन खंडों से संबंधित अतिरिक्त जानकारियां दी जाती हैं। हर घटना को एक सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने के लिए इसका पृष्ठïभूमि में जाना भी आवश्यक होता है। क्यो और कैसे’ का उत्तर देने के लिए घटना के पीछे की प्रक्रिया पर भी निगाह डालनी आवश्यक हो जाती है। इसके अलावा पाठक इस तरह की घटनाओं की पृष्ठïभूमि भी जानने की प्रति जिज्ञासु होते हैं। मसलन अगर किसी नगर में असुरक्षित मकान गिरने से कुछ लोगों की मृत्यु हो जाती है तो यह भी प्रासंगिक ही होता है कि पाठकों को यह भी बताया जाए कि पिछले एक वर्ष में इस तरह की कितनी घटनाएं हो चुकी हैं और कितने लोग मरे। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए और वे कहां तक सफल रहे हैं और अगर सफल नहीं हुए तो क्योंयह भी बताना प्रासंगिक होगा कि नगर की कितनी आबादी इस तरह के असुरक्षित घरों में रह रही है और इस स्थिति में किस तरह के खतरे निहित हैं आदि।

एक समाचार की संरचना को मोटे तौर पर इन भागों में बांट सकते हैं :
         इंट्रो
         व्याख्यात्मक जानकारियां
         विवरणात्मक जानकारियां
         अतिरिक्त जानकारियां
         पृष्ठभूमि

एक समाचार की संरचना को दूसरे रूप में तीन मुख्य खंडों में भी विभाजित कर सकते हैं। पहला तो इंट्रो कि क्या हुआ’ इसके बाद अन्य प्रश्नों के उत्तर दिए जा सकते हैं जोक्या हुआ’ को स्पष्ट करते हों। फिर जो कुछ बचा और समाचार को पूरा करने के लिए आवश्यक है उसे आखिरी खंड में शामिल कर सकते हैं।

भाषा और शैली

इसके अलावा समाचार लेखन और संपादन के बारे में जानकारी होना तो आवश्यक है। इस जानकारी को पाठक तक पहुंचाने के लिए एक भाषा की जरूरत होती है। आमतौर पर समाचार लोग पढ़ते हैं या सुनते-देखते हैं वे इनका अध्ययन नहीं करते। हाथ में शब्दकोष लेकर समाचारपत्र नहीं पढ़े जाते। इसलिए समाचारों की भाषा बोलचाल की होनी चाहिए। सरल भाषाछोटे वाक्य और संक्षिप्त पैराग्राफ। एक पत्रकार को समाचार लिखते वक्त इस बात का हमेशा ध्यान रखना होगा कि भले ही इस समाचार के पाठक/उपभोक्ता लाखों हों लेकिन वास्तविक रूप से एक व्यक्ति अकेले ही इस समाचार का उपयोग करेगा।

इस दृष्टि से जन संचार माध्यमों में समाचार एक बड़े जन समुदाय के लिए लिखे जाते हैं लेकिन समाचार लिखने वाले को एक व्यक्ति को केंद्र में रखना होगा जिसके लिए वह संदेश लिख रहा है जिसके साथ वह संदेशों का आदान-प्रदान कर रहा है। फिर पत्रकार को इस पाठक या उपभोक्ता की भाषामूल्यसंस्कृतिज्ञान और जानकारी का स्तर आदि आदि के बारे में भी मालूम होना ही चाहिए। इस तरह हम कह सकते हैं कि यह पत्रकार और पाठक के बीच सबसे बेहतर संवाद की स्थिति है। पत्रकार को अपने पाठक समुदाय के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। दरअसल एक समाचार की भाषा का हर शब्द पाठक के लिए ही लिखा जा रहा है और समाचार लिखने वाले को पता होना चाहिए कि वह जब किसी शब्द का इस्तेमाल कर रहा है तो उसका पाठक वर्ग इससे कितना वाकिफ है और कितना नहीं।

उदाहरण के लिए अगर कोई पत्रकार इकनॉमिक टाइम्स’ जैसे अंग्रेजी के आर्थिक समाचारपत्र के लिए समाचार लिख रहा है तो उसे मालूम होता है कि इस समाचारपत्र को किस तरह के लोग पढ़ते हैं। उनकी भाषा क्या हैउनके मूल्य क्या हैंउनकी जरूरतें क्या हैंवे क्या समझते हैं और क्या नहींऐसे अनेक शब्द हो सकते हैं जिनकी व्याख्या करनाइकनॉमिक टाइम्स’ के पाठकों के लिए आवश्यक न हो लेकिन अगर इन्हीं शब्दों का इस्तेमाल नवभारत टाइम्स’ में किया जाए तो शायद इनकी व्याख्या करने की जरूरत पड़े क्योंकि नवभारत टाइम्स’ के पाठक एक भिन्न सामाजिक समूह से आते हैं। अनेक ऐसे शब्द हो सकते हैं जिनसे नवभारत टाइम्स के पाठक अवगत हों लेकिन इन्हीं का इस्तेमाल जब इकनॉमिक टाइम्स’ में किया जाए तो शायद व्याख्या करने की जरूरत पड़े क्योंकि उस पाठक समुदाय की सामाजिकसांस्कृतिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि भिन्न है।

अंग्रेजी भाषा में अनेक शब्दों का इस्तेमाल मुक्त रूप से कर लिया जाता है जबकि हिंदी भाषा का मिजाज मीडिया में इस तरह के गाली-गलौज के शब्दों को देखने का नहीं है भले ही बातचीत में इनका कितना ही इस्तेमाल क्यों न हो। भाषा और सामग्री के चयन में पाठक या उपभोक्ता वर्ग की संवेदनशीलताओं का भी ध्यान रखा जाता है और ऐसी सूचनाओं के प्रकाशन या प्रसारण में विशेष सावधानी बरती जाती है जिससे हमारी सामाजिक एकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता हो।


लेखक उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में कुलपति हैं. वे इग्नू और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन में जर्नलिज्म के प्रोफेसर रह चुके हैं. एकेडमिक्स में आने  से पहले वे दस वर्ष पत्रकार भी रहे हैं .

उत्तम शिक्षा की बातें

न श्व: श्वमुपासीत। को हि मनुष्यस्य श्वो वेद ।।
- शतपथ ब्राह्म० २।१।३।९

" कल करुंगा,कल करुंगा"- ऐसी बात नहीं सोचनी चाहिये। मनुष्य के कल को कौन जानता है? कल तक जीवन रहेगा ही,इसका क्या निश्चय है?

सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमद: ।
-तू सदा सत्य बोल,धर्म का आचरण कर और स्वाध्याय में कभी प्रमाद मत कर।

अध: पश्यस्व मोपरि सन्तरां पादकौ हर।
मा ते कशप्लकौ दृशन् स्री हि ब्रह्मा बभूविथ ।।
-ऋ० ८।३३।१९

हे नारी ! नीचे देख,ऊपर मत देख। अपने पैरों को संयत करके रख। तेरे शरीर के अंग दिखाई न देने चाहिएं, क्योंकि नारी मानव-समाज की निर्मात्री है।

सदा प्रह्ष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया ।
सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया ।।
-मनु० ५।१५०

स्त्री को चाहिये कि सदा सुप्रसन्न रहे, घर के कार्यों में चतुर हो, घर के बर्तन आदि स्वच्छ एवं यथास्थान रक्खे और व्यय=खर्च करने में बहुत उदार न हो, बेकार धन खर्च न करे।

तिष्ठन्न खादामि हसन्न जल्पे
गतं न शोच्यामि कृतं न मन्ये ।
द्वाभ्यां तृतीयो न भवानि राजन्
कथमस्मि मूर्खों वद कारणेन ।।

राजन ! मैं खडा होकर खाता नहीं हूं, वार्तालाप करते हुए हँसता नहीं हूं,बीती हुई बात की चिन्ता नहीं करता, किसी के प्रति किये हुए उपकार को गाता नहीं फिरता, जहां दो व्यक्ति परस्पर वार्तालाप कर रहे हों, उनमें तीसरा होकर पन्च नहीं बनता,फिर आपने मुझे मुर्ख क्यों कहा ?

विषेश-अर्थात् जो उपरोक्त पांचों चिन्ह मूर्ख के बताये हैं।

मूकं परापवादे परदारनिरीक्षणेअप्यन्ध: ।
पंगुपरधनहरणे स जयति लोकत्रये पुरुष: ।।

जो दूसरों की चुगली करने में गूंगा हो, जो पर स्त्रियों को देखने के विषय में अन्धा हो और दूसरों का धन चुराने के विषय में लंगडा हो- ऐसा मनुष्य तीनों लोकों में श्रेष्ठ माना जाता है।

परस्त्री मातेव क्वचिदपि न लोभ: परधने
न मर्यादाभंग: क्वचिदपि न नीचेष्वभिरति: ।
रिपौ शौर्यं धैर्यं विपदि विनय: सम्पदि सदा
इदं वच्मि भ्रातर्भरत नियतं ज्ञास्यसि मुदे ।।

[श्रीराम उपदेश देते हैं-] हे भाई भरत ! पर-स्त्री को माता के समान समझना,दूसरे के धन का लोभ कभी न करना, कभी मर्यादा का भंग न करना, नीचों की संगति में कभी प्रेम प्रेम मत करना, शत्रु के प्रति शूरता प्रदर्शित करना,विपत्ति में धैर्य रखना और सम्पत्ति में विनीत रहना- ये सब प्रसन्नता के निश्चित हेतु हैं, ऐसा जानो।

आयुष: क्षण एकोअपि सर्वरत्नैर्न लभ्यते ।
नीयते तद् वृथा येन प्रमाद: सुमहानहो ।।
-यो० वा० ६ उ० १७५।७८

आयु का एक क्षण भी संसार के सब रत्न देने पर भी नहीं मिल सकता। ऐसे बहुमूल्य जीवन को जो व्यर्थ खोता है,तो अहो ! यह बडा भारी प्रमाद है।

षड् दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ।।
-विदुरनी० १।८३

ऐश्वर्य चाहने वाले मनुष्य को इस संसार में निम्न छह दोष छोड देने चाहियें-
१. बहुत अधिक सोना, २.ऊँघते रहना, ३. भयभीत होना, ४.क्रोध करना, ५.आलस्य और ६.कार्यों को विलम्ब से करना,एक घण्टे के कार्य में चार घण्टे लगाना।

दीर्घसूत्री विनश्यति ।
कार्यों को बहुत धीरे धीरे करने वाला नष्ट हो जाता है।

एकोअहमसहायोअहं कृशोअहमपरिच्छद: ।
स्वप्नेअप्येवंविधा चिन्ता मृगेन्द्रस्य न जायते ।।

मैं अकेला हूं, मैं सहायकों से रहित हूं, मैं दुर्बल हूं, मैं परिवार रहित हूं-सिंह को स्वप्न में भी ऐसी चिन्ता नहीं होती।

जो अमूल्य मानव देह पाकर भी प्रभु भक्ति नहीं करता, वह कमल पुष्प से छाता बनाता है, चन्दन से हल बनाता है, सोने से कुश बनाता है, रत्नों से कौओं को उडाता है, अमृत से पैर धोता है, हाथी पर जलाने की लकडियां लादकर लाता है, कस्तूरी से स्याही बनाता है, गाय से खेत की जुताई करता है और रेशमी दुपट्टे से घाव बाँधता है।
अजय कर्मयोगी

सामाजिक कार्य परोपकारी तथा प्रजातांत्रिक आदर्शों से विकसित हुआ है

सामाजिक कार्य परोपकारी तथा प्रजातांत्रिक आदर्शों से विकसित हुआ है और इसके नैतिक मूल्य सभी व्यक्तियों की समानता, महत्व एवं गरिमा के सम्मान पर आधारित हैं। लगभग एक शताब्दी पहले से ही, सामाजिक कार्य व्यवसाय का बल मानव-आवश्यकताओं को पूरा करने और मानव-अंतःशक्ति का विकास करने पर रहा है। मानव अधिकार एवं सामाजिक न्याय सामाजिक कार्य-तंत्र के लिए प्रेरणा एवं औचित्य के रूप में कार्य करते हैं। वंचित व्यक्तियों की एकात्मता के लिए यह व्यवसाय उनके सामाजिक अंतर्वेश को बढ़ावा देने के क्रम में गरीबी उपशमन के तथा असुरक्षित एवं उत्पीड़ित व्यक्तियों की स्वतंत्रता के प्रयास करता है। सामाजिक कार्य व्यवसाय समाज में फैली बाधाओं, असमानता तथा अन्याय का पता लगाता है। इसका उद्देश्य व्यक्तियों की पूर्ण अंतःशक्ति का विकास करने, उनके जीवन को समृद्ध करने तथा बुराई को रोकने में उनकी सहायता करना है। व्यावसायिक सामाजिक कार्य का बल समस्या समाधान तथा परिवर्तन पर होता है। इस तरह सामाजिक कार्यकर्ता समाज में व्यक्तियों, परिवारों एवं समुदायों के जीवन में परिवर्तनकर्ता होते हैं। वे संकट, आपात स्थिति एवं प्रतिदिन की व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं का समाधान करते हैं। सामाजिक कार्य में व्यक्तियों तथा उनके आस-पास के माहौल पर कल्याणकारी बल के साथ विभिन्न प्रकार के कौशल, तकनीकों और कार्यकलापों का प्रयोग निहित होता है, सामाजिक कार्यों में प्राथमिक व्यक्ति आधारित मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया से लेकर सामाजिक नीति, नियोजन तथा विकास शामिल होते हैं। इन कार्यों में परामर्श, नैदानिक, सामाजिक कार्य, सामूहिक कार्य, सामाजिक शैक्षणिक कार्य एवं परिवार, उपचार एवं चिकित्सा के साथ-साथ समाज में सेवाएं और संसाधन प्राप्त करने में व्यक्तियों की सहायता करने के प्रयास निहित हैं। इन कार्यों में एजेंसी प्रशासन, सामुदायिक संगठन तथा सामाजिक नीति एवं आर्थिक विकास जैसे कार्यों को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में रत होना भी शामिल है। सामाजिक कार्य का कल्याणकारी उद्देश्य सार्वभौमिक है, किंतु सामाजिक कार्य प्रैक्टिस की प्राथमिकताएं सांस्कृतिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक- आर्थिक स्थितियों के आधार पर अलग-अलग देशों में तथा समय-समय पर भिन्न होंगी।

सामाजिक कार्यकर्ता विपत्ति तथा दुखों से राहत दिलाने एवं उनके निवारण का प्रयत्न करते हैं। उपयुक्त सेवाओं की व्यवस्था करके और उन्हें परिचालित करके तथा सामाजिक नियोजन में योगदान देकर व्यक्तियों, परिवारों, समूहों एवं समाज की सहायता करना उनका दायित्व होता है। वे व्यक्तियों को व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं से निपटने तथा अनिवार्य सेवाएं और संसाधन प्राप्त करने में उन्हें सक्षम बनाने के लिए उनके साथ, उनकी ओर से एवं उनके हित में कार्य करते हैं। उनके कार्यों में अंतर-वैयक्तिक प्रैक्टिस, सामूहिक कार्य, सामुदायिक कार्य, सामाजिक विकास, सामाजिक कार्रवाई, नीति-विकास, अनुसंधान, सामाजिक कार्य शिक्षा तथा इन क्षेत्रों में पर्यवेक्षकीय और प्रबंधकीय कार्य शामिल हो सकते हैं, किंतु उनके कार्य इन कार्यों तक ही सीमित नहीं होते हैं। व्यावसायिक सामाजिक कार्यकर्ताओं के कार्य-क्षेत्र दिन-प्रति-दिन बढ़ते जा रहे हैं।

व्यसन


• बाल-कल्याण
• नैदानिक/मानसिक स्वास्थ्य
• सुधार संस्थाएं/कारागार
• बाल संरक्षण सेवाएं
• सलाह एवं रोगोपचार
• परामर्श एवं सेवाएं
• सामुदायिक विकास
• प्रौढ़ सुरक्षा
• पर्यावरण
• परिवार कल्याण एवं नियोजन
• मानव संसाधन प्रबंधन
• औद्योगिक विकास
• चिकित्सा सामाजिक कार्य
• मानसिक स्वास्थ्य
• मानसिक बाधा
• समाज सेवा प्रबंधन
• मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य
• नीति एवं नियोजन सेवाएं
• गरीबी उन्मूलन
• व्यक्ति एवं विशेष आवश्यकताएं
• अपराधी पुनर्वास
• ग्रामीण एवं शहरी विकास
• संबंध समस्याएं
• विद्यालय सामाजिक कार्य
• सामाजिक अनुसंधान तथा कार्यक्रम मूल्यांकन सेवा
• सामाजिक कार्य प्रशासन एवं नीति
• सामाजिक कार्य शिक्षा एवं अनुसंधान
• सामाजिक विकास
• अक्षम व्यक्तियों के साथ कार्य करना
• युवा कार्य आदि

भारत में व्यवसाय के रूप में सामाजिक कार्य बहुत पहले ही अपने प्रारंभिक काल को पार कर चुका है और पिछले कुछ दशकों में भारत में यह एक अत्यधिक मांगकारी व्यवसाय के रूप में उभरा है। भारत में सामाजिक कार्य में स्नातक (बी.एस.डब्ल्यू) या मास्टर (सामाजिक कार्य में मास्टर या एम.एस.डब्ल्यू) डिग्रीधारी कोई भी व्यक्ति सामान्यतः सामाजिक कार्यकर्ता माना जाता है। जहां तक भारतीय परिदृश्य का संबंध है, व्यावसायिक सामाजिक कार्यकर्ता विभिन्न सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ) तथा सरकारी मंत्रालयों में प्रशासनिक, प्रबंधन तथा नीति नियोजन पदों पर सीधे प्रैक्टिस में पाए जा सकते हैं। यदि आप दी गई किन्हीं भी स्थितियों में कठोर परिश्रम करने के इच्छुक हैं तो सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ) दोनों में रोजगार के अनेक अवसर हैं। अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में भी सामाजिक रूप से जागरूकता है और इसलिए अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक कार्य में अनेक अवसर उपलब्ध हैं। औद्योगिक तथा वाणिज्यिक इकाइयां भी सामाजिक कार्यकर्ताओं की सेवाएं लेती हैं। सामाजिक कार्य में कोई डिग्री या डिप्लोमा विभिन्न क्षेत्रों में लाखों भारतीय युवाओं के लिए अनेकों अवसर सृजित कर रहे हैं।

विभिन्न रोजगार क्षेत्रों/सरकारी क्षेत्रों में सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा प्राप्त किए जाने वाले पदनाम


• लेक्चरर/प्रोफेसर
• निदेशक
• अनुसंधान अधिकारी/अनुसंधानकर्ता
• कल्याण/विकास अधिकारी
• (जैसे बाल/युवा/महिला/श्रमिक आदि) 
• सामुदायिक विकास अधिकारी
• कारागार परिवीक्षाधीन/कल्याण अधिकारी
• नगर नियोजक आदि

गैर-सरकारी क्षेत्र


• परियोजना निदेशक
• कार्यक्रम निदेशक
• कार्यक्रम अधिकारी
• कार्यक्रम समन्वयकर्ता
• सहायक समन्वयकर्ता
• कार्यक्रम सहायक
• परियोजना अधिकारी
• कम्यूनिटी मोबिलाइजर
• कार्यक्रम प्रबंधक
• ब्लॉक/जिला/राज्य/जोनल/क्षेत्रीय समन्वयकर्ता
• सलाहकार
• समाज-वैज्ञानिक
• निगरानी एवं मूल्यांकन अधिकारी
• अनुसंधान अधिकारी/अनुसंधानकर्ता
• एम.आई.एस. समन्वयकर्ता
• क्षेत्र प्रबंधक
• फंड रेजर
• सामाजिक कार्यकर्ता
• पर्यवेक्षक
• संसाधन मोबिलाइजर
• प्रशिक्षण समन्वयकर्ता
• विकास व्यवसायी
• सलाहकार
• परिवीक्षा अधिकारी
• मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ता
• विद्यालय सामाजिक कार्यकर्ता
• समाज विज्ञानी
• व्यावसायिक पुनर्स्थापन
• सलाहकार आदि

उद्योग


• प्रबंधक (मानव संसाधन/कार्मिक/ कल्याण आदि) 
• कार्यपालक प्रशिक्षणार्थी
• श्रमिक कल्याण अधिकारी
• कार्मिक अधिकारी आदि

कार्पोरेट क्षेत्र


• प्रबंधक
• कार्यपालक प्रशिक्षणार्थी
• सामुदायिक विकास अधिकारी
• सामाजिक विकास अधिकारी
• ग्रामीण विकास अधिकारी
• समाज कल्याण अधिकारी आदि

सामाजिक कार्य व्यवसायियों के लिए कार्य की सामान्यतः तीन श्रेणियों का स्तर है। पहला ‘वृद्ध’ सामाजिक कार्य है। जिसमें समाज या समुदाय एक सम्पूर्ण रूप में है। इस प्रकार के सामाजिक कार्य प्रैक्टिस में किसी राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर नीति बनाना एवं उसका समर्थन करना निहित है। कार्य के दूसरे स्तर को ‘माध्यम’ सामाजिक कार्य के रूप में उल्लेखित किया गया है। इस स्तर पर कार्यों में एजेंसियों, छोटे संगठनों तथा अन्य छोटे समूहों के साथ किए जाने वाले कार्य निहित हैं। इस प्रैक्टिस में किसी सामाजिक कार्य एजेंसी में नीति निर्माण अथवा किसी विशेष निकटवर्ती के लिए कार्यक्रम का विकास करना शामिल है। अंतिम स्तर ‘सूक्ष्म’ स्तर है, जिसमें व्यक्तियों या परिवारों को सेवाएं देना निहित है।

सामाजिक कार्यकर्ता व्यक्तियों को निर्धनता, भेदभाव, व्यसन, शारीरिक बीमारी, तलाक, क्षति, बेरोजगारी, शैक्षिक समस्याओं, अक्षमता तथा मानसिक बीमारी जैसी जीवन की कुछ अत्यधिक कठिन चुनौतियों को पूरा करने में सहायता करते हैं। वे संकट का निवारण करते हैं और दैनिक जीवन के तनावों का अधिक प्रभावी रूप से सामना करने में व्यक्तियों तथा परिवारों को परामर्श देते हैं। सामाजिक कार्य एक ऐसा व्यवसाय है जो जीवन की एक उन्नत गुणवत्ता के लिए निवारक तथा पुनर्स्थापन कार्य के इच्छुक व्यक्तियों, परिवारों तथा समुदायों को सेवाएं देता है, जो सामाजिक वातावरण में सामाजिक एवं भावनात्मक विकास पर केंद्रित होता है। सामाजिक कार्य का आयाम राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय है। यह व्यवसाय सामाजिक न्याय तथा कार्य-उन्मुखी है।

एक कल्याणकारी सोच अपनाना और उपचारात्मक संबंध स्थापित करना सामाजिक कार्य से अनन्य नहीं है। इन दोनों को सम्मिलित करना सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका को विशिष्ट बनाता है। सामाजिक कार्यकर्ता व्यक्ति की सम्पूर्ण स्थिति (साकल्यवादी सोच) को समझना और इसके साथ कार्य करना चाहता है। इनकी सेवाओं का उपयोग करने वाले व्यक्तियों से प्रभावी सहायक संबंध का विकास करना सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका का केंद्र-बिंदु रहा है ताकि बेहतर परिणाम सुनिश्चित किए जा सकें। सामाजिक कार्यकर्ताओं को कौशल के ज्ञान तथा नैतिक मूल्यों का सम्मिश्रण करने वाले प्रभावी सुनवाई प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त समय की आवश्यकता होती है।

विकास क्षेत्रों में व्यावसायिक सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए संभावना


वर्तमान में विकास क्षेत्र व्यापक स्तर पर कल्याण अथवा गैर-सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ) द्वारा नियंत्रित एवं प्रबंधित है, जो समाज के सम्पूर्ण विकास की दिशा में पथ-प्रदर्शक का कार्य करते हैं। सामाजिक कार्य में कोई डिग्री (वरीयतः मास्टर डिग्री) को विकास एजेंसियों और गैर-सरकारी संगठनों में अत्यधिक वरीयता दी जाती है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि गैर-सरकारी संगठन क्षेत्रों तथा अन्य विकास क्षेत्रों में व्यावसायिक सामाजिक कार्यकर्ताओं की बहुलता बढ़ती जा रही है। जहां तक विकास क्षेत्र (भारत में) व्यावसायिक सामाजिक कार्यकर्ताओं के वेतन का संबंध है - यह अलग-अलग संगठनों में अलग-अलग है। वेतन पर सामान्यतः साक्षात्कार के समय समझौता किया जाता है। जिस तरह विकास-क्षेत्रों में वेतन पर समझौता किया जाता है, उसी तरह भर्ती-प्रक्रिया में लचीलापन भी होता है। कभी-कभी यह भी देखा जाता है कि किसी विशेष पद पर ऐसे व्यक्ति की भर्ती की जाती है जो न्यूनतम अपेक्षाएं भी पूरी नहीं करता। विकास-क्षेत्र की भर्ती-प्रक्रिया में एम.एस.डब्ल्यू में अंकों की प्रतिशतता पर ध्यान नहीं दिया जाता है; प्रख्यात संगठनों में कोई अच्छा रोजगार प्राप्त करने के लिए एम.एस.डब्ल्यू में 50% से 55% अंक ही पर्याप्त होते हैं। ऐसे संगठन में महत्व संबंधित कार्य-अनुभव परियोजना प्रबंधन उपयुक्त तकनीकी कौशल, गैर-सरकारी संगठन प्रशासन के प्रबंधन के व्यापक ज्ञान का होता है। कभी-कभी भर्ती-संगठन उस शैक्षिक संस्था की प्रतिष्ठा को भी ध्यान में रखते हैं - जहां से उम्मीदवार ने सामाजिक कार्य में डिग्री प्राप्त की है। सामान्यतः टी.आई.एस.एस; एक्स.आई.एस.एस; दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.एस.डब्ल्यू पूरी करने वाले छात्रों को वरीयता दी जाती है और वे प्रारंभ में ही उच्च वेतन प्राप्त करते हैं।

व्यावसायिक सामाजिक कार्यकर्ता के लिए अपेक्षित कौशल


• परियोजना प्रस्ताव तैयार करना
• प्रबंधन सूचना प्रणाली (एम.आई.एस) बनाना
• परियोजना कार्यान्वयन योजना (पी.आई.पी.) बनाना
• जिला/राज्य/राष्ट्रीय स्तर पर परियोजना प्रबंधन और समन्वय
• कार्यक्रम निगरानी एवं मूल्यांकन
• रिपोर्ट लेखन एवं मूल्यांकन प्रस्तुति
• मासिक योजना तथा बजट बनाना
• जिला एवं राज्य प्रशासन, अन्य स्टेक होल्डरों तथा सहभागी संगठनों के साथ समन्वय तथा सम्पर्क करना
• प्रशिक्षण, कार्यशालाएं और सेमिनार आयोजित करना।
• सूचना शैक्षिक संचार (आई.ई.सी.) सामग्री का विकास करना
• प्रलेखन एवं केस अध्ययन
• टीम प्रबंधन
• सुविधा व्यक्ति संघटन
• अधिक घंटों तक कार्य करना और व्यापक दौरे करना
• राज्य तथा जिला स्तर पर परियोजनाओं का प्रबंधन एवं समन्वय करना
• सकारात्मक कार्य अभिवृत्ति
• सत्यनिष्ठा एवं ईमानदारी
• प्रतिकूल स्थिति में अधिक घंटों तक क्षेत्रगत कार्य करना
• अंतर-वैयक्तिक अभिव्यक्ति कौशल हो
• कंप्यूटर में दक्षता हो
• सामुदायिक संसाधनों का ज्ञान हो

अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों में विभिन्न पदों के लिए एक विनिर्दिष्ट वेतन ढांचा होता है - इन संगठनों में जाने के लिए - किसी प्रख्यात विकास संगठन में न्यूनतम तीन से पांच वर्ष का पूर्व कार्य-अनुभव होना आवश्यक है।

सामाजिक कार्य पाठ्यक्रम चलाने वाले कुछ प्रमुख विश्वविद्यालय/संस्थान


• असम विश्वविद्यालय, सिल्चर (असम) 
• आगरा विश्वविद्यालय (उ.प्र.) 
• अमरावती विश्वविद्यालय (अमरावती) 
• आन्ध्र विश्वविद्यालय, वाल्टेयर (आ.प्र.) 
• अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ (उ.प्र.) 
• भरथियार विश्वविद्यालय (कोयम्बत्तूर) 
• बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, बनारस (उ.प्र.) 
• बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी (उ.प्र.) 
• क्राइस्ट यूनिवर्सिटी (बंगलौर) 
• चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ (उ.प्र.) 
• सामाजिक कार्य महाविद्यालय, निर्मला निकेतन, (मुंबई) 
• देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (इंदौर) 
• दिल्ली सामाजिक कार्य विद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, (दिल्ली) 
• डाॅ. आर.एम.एल. अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद (उ.प्र.) 
• गुरु घासीदास विश्वविद्यालय (छत्तीसगढ़) 
• गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद (गुजरात) 
• भारतीय समाज कल्याण एवं व्यवसाय प्रबंधन संस्थान, कलकत्ता विश्वविद्यालय (प.बं.) 
• सामाजिक विज्ञान संस्थान, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा (उ.प्र.) 
• इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) 
• जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, जामिया नगर, (नई दिल्ली) 
• जैन विश्व भारती संस्थान, लाडनूं (राजस्थान) 
• काशी विद्यापीठ, वाराणसी (उ.प्र.) 
• कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) 
• कानपुर विश्वविद्यालय, कानपुर (उ.प्र.) 
• मदुरै कामराज विश्वविद्यालय
• एम.एस. विश्वविद्यालय, बड़ौदा
• मद्रास सामाजिक कार्य विद्यालय, मद्रास विश्वविद्यालय (चेन्नई) 
• एम.एस.एस. कॉलेज, नागपुर (महाराष्ट्र) 
• मैंगलोर विश्वविद्यालय (मैंगलोर) 
• मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद
• नागपुर विश्वविद्यालय (नागपुर) 
• पंजाब विश्वविद्यालय, पटियाला (पंजाब) 
• राजागिरी सामाजिक कार्य महाविद्यालय (केरल) 
• राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर (राजस्थान) 
• श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय (तिरुपति) 
• श्री पद्मावती महिला विश्वविद्यालय (तिरुपति) 
• श्री हरि सिंह गौड़ विश्वविद्यालय (म.प्र.) 
• टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई (महाराष्ट्र) 
• लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ (उ.प्र.) 
• बंबई विश्वविद्यालय (महाराष्ट्र) 
• पुणे विश्वविद्यालय (महाराष्ट्र) 
• उत्कल विश्वविद्यालय (उड़ीसा) 
• विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन (म.प्र.) 
• विद्यासागर विश्वविद्यालय (प.बं.) 
• विश्व भारती विश्वविद्यालय (प.बं.) आदि।
• (उक्त सूची उदाहरण मात्र है।)

निष्कर्ष


व्यावसायिक सामाजिक कार्यकर्ता सामुदायिक जीवन के प्रत्येक पक्ष - वृद्धाश्रमों, अनाथालयों, स्कूलों, अस्पतालों, मानसिक स्वास्थ्य क्लीनिक, कारागारों, निगमों तथा अनेक सार्वजनिक एवं निजी एजेंसियों में होते हैं, जो जरूरतमंद व्यक्तियों तथा परिवारों की सेवा करते हैं। सामाजिक कार्य केवल अच्छे कार्य करने तथा शोषित व्यक्तियों की सहायता करने तक ही सीमित नहीं हैं। काफी समय से यह एक व्यवसाय के रूप में उभरा है। वास्तव में यह कोई परम्परागत करियर नहीं है। बल्कि निरंतर बढ़ती जा रही विकलांगता, निर्धनता, मानसिक रोग-स्वास्थ्य, वृद्धावस्था से जुड़ी समस्याओं आदि मामलों के साथ ही सामाजिक कार्य आज हमारे समाज की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गया है। यदि आप भावात्मक पूर्ति के लिए कोई व्यवसाय चुनने के इच्छुक हैं और आपका कार्य-उद्देश्य केवल धन कमाना नहीं है तो यह आपके लिए एक आदर्श करियर होगा।