Monday, May 2, 2016

पेड़ों के जरिये ही मानवता बच सकेगी

बदलते परिप्रेक्ष्य के साथ ही विश्व की भौगोलिक परिस्थितियां भी बदल रही है समस्याओं से घिरी इस दुनिया में आज सबसे बड़ी समस्या प्राणी, संसार और वनस्पति जगत के बीच बिगड़ता हुआ संतुलन है । आबादी की बेतहाशा बढ़ोतरी ने इस संतुलन को बिगाड़ा है और हमारे लिए आर्थिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी अनेक समस्याएं उत्पन्न कर दी हैं। कटते जंगलों से मानव-सभ्यता को भी खतरा पैदा हो गया है। मौसम में काफी परिवर्तन आ गया है। ऐसे में वृक्षारोपण करना मानवता को संजीवनी देना ही है , कागजों में विरक्षरोपण की बाते होती है लेकिन धरातल पर गंभीरता कभी नजर नही आती लेकिन डेगाना के मनोज पेंटर ने क्षेत्र में लगभग ५००० पौधे लगाकर मिशाल कायम की है उन्होंने सिर्फ पौधा लगाकर इतिश्री नही की है बल्कि कई वर्षों से वे सुबह जल्दी उठकर पौधों को सींचते है उनकी देखभाल करते है ये उनके लिए दिनचर्या का अंग है उनके प्रयास को शहरवासी भी सराह रहे है
डेगाना के मुक्ति धाम को ग्रीन गार्डन का रूप दिया
जेहन में मुक्ति धाम का नाम आते है वीरानी सी नजर आती है लेकिन मनोज पेंटर की वृक्षारोपण मुहीम से आज डेगाना के मुक्ति धाम ने हरे भरे गार्डन का रूप ले लिया है जिसे देखते ही लोगों की निगाहें बरबस ही रूक जाती है उन्होंने कतारबद्ध तरीके से ऐसे पौधे लगाये जिससे मुक्ति धाम ने सुंदर बगीचे का रूप ले लिया है वे रोजाना यहा पहुंचकर पौधों की देखभाल करते है वही डेगाना के राजकीय महाविद्यालय में पेड़ों की श्रृंखला नजर आती है ये मनोज पेंटर की ही देन है वे वर्षों से इन पौधों की देखरेख कर रहे है वे कई स्तरों पर प्रयास करके पौधों का जुगाड़ करते है और उन्हें उगाकर पेड़ बनने तक उसकी सेवा करते है
पेड़ों के जरिये ही मानवता बच सकेगी - मनोज
पर्यावरण प्रेमी मनोज कहते है कि अपने लिए तो सभी जीते हैं हमे दूसरों के लिए भी जीना चाहिए तभी जीवन सार्थक होगा। पेंड़ हमें सद्भावना एवं त्याग की प्रेरणा देते हैं इसलिए हम सबको मिलकर पेड़ लगाने चाहिए। पेड़ों पर आप कितनी भी अमानवीयता करें लेकिन वे हर हाल में फल एवं छाया नि:स्वार्थ भाव से देते रहेंगे। वृक्ष मानव ही नहीं प्राणी जगत के लिए भी लाभकारी होते हैं। पेड़ों की सहायता से ही आगामी युग में मानवता को बचाया जा सकेगा

इस बात की पीड़ा है कि नागौर में पिछले एक साल से क़ानून और व्यवस्था की बिगड़ी स्थिति को लेकर नागौर जिले के मंत्रियों  और अन्य जनप्रतिनिधियों और राजनेताओं ने जिले का नेतृत्व नहीं किया है। एकाध अपवाद को छोड़कर केवल अफसरों के भरोसे व्यवस्था नहीं चलती है। अफसरों की अपनी सीमा होती है। वे निर्णय का पालन कर सकते हैं,निर्णय लेना उनका काम थोड़े  ही है ? 
ऐसा ही नागौर नहर परियोजना और अवैध टोल वसूलियों के बारे में हुआ है। नागौर नहर को लेकर आजतक गंभीरता से कोई बैठक ही जिले में नहीं हुई है। नहर का नाम आते ही अजीब सी चुप्पी छा जाती है। न मुख्यमंत्री ने अपने दौरों में न किसी प्रभारी या परबारी मंत्री ने अब तक जनता को परियोजना के बारे में जनता को जागरूक किया है। कि किस दिन कैसे पानी किस गाँव या शहर में पहुंचेगा, 
बार बार कहा जाता हैं पानी लाकर रहेंगे ! कब लायेंगे, कोई कागज तो दिखाओ, ठेकेदार कम्पनियां बीच बीच में भाग जाती हैं और फिर सरकार को काम रोक देने का कहकर ब्लेकमेल करती हैं।  ब्लेकमेल के बाद घालमेल ! ऐसा ही टोल वसूली मामले में हुआ है।  बिना सुविधाओं के और बिना काम पूरा किये अजमेर से नागौर के बीच टोल चालू हो गया है।  सारे बाईपास अधूरे पड़े हैं, बाडी घाटी से जयपुर रोड तक का 22 किमी का सबसे महत्वपूर्ण काम और रेन, मूंडवा, भडाना और इनाणा के बाईपास बाकी हैं। 
और भाई ने जयपुर में कुछ लोगों से मिलकर टोल शुरू कर दिया। डरी हुई और अबोध जनता को लूटने में कोई पीछे नहीं हैं। जब बाड़ ही खेत को खाए तो ?  भला हो मीडिया और अदालत का कि जनता की आस ज़िंदा है। हर मामले में. वर्ना तो राजतन्त्र से भी बुरा हाल है। 

रिपोर्टर हो तो ऐसा

रिपोर्टिंग के नाम पर मीडिया मालिक पत्रकार की जान को जोखिम में डालने का परहेज कर सकें तो अच्छा। पत्रकार छोटा हो या बड़ा- सबकी जान बेशकीमती है। शहीद हुए या बुरी तरह पिट कर आए पत्रकार को याद करने का समय मालिकों के पास अक्सर नहीं होता।
रिपोर्टर हो तो ऐसा ……
रिपोर्टर हो तो अभिषेक उपाध्याय जैसा-अजीत अंजुम
रिपोर्टर हो तो अभिषेक उपाध्याय जैसा-अजीत अंजुम
बीते कुछ महीनों के दौरान आज पाँचवी या छठी बार मैंने अभिषेक उपाध्याय से पूछा – तुम रिपोर्टिंग के काम से लगातार दिल्ली से बाहर रहते हो , तुम्हारी बेटी और पत्नी तुम्हें कुछ कहती नहीं ?
श्रीनगर से अभिषेक ने उसी अंदाज में आज भी जवाब दिया -अरे सर …काम है तो जाना तो पड़ेगा न ? मैनेज कर लेता हूँ .
ये हमारे चैनल का रिपोर्टर अभिषेक उपाध्याय है . कल रात साढ़े बारह बजे ग्यारह दिन बाद पेरिस और कनाडा से पीएम की विदेश यात्रा को कवर करके लौटा और सुबह दस बजे की फ़्लाइट से श्रीनगर चला गया . जब वो कनाडा में था , तभी उसे कह दिया गया था कि लौटते ही कश्मीर जाना है . अब अगर चैनल की ज़रूरत के हिसाब से उसे दस -पंद्रह दिन भी कश्मीर रहना पड़े तो मैं जानता हूँ कि कोई बहुत इमर्जेंसी न हो तो वो एक बार भी
नहीं कहेगा कि बहुत दिन हो गए सर, अब दिक़्क़त हो रही है , या अब वापस बुला लीजिए . ऐसा पहले भी कई बार हुआ है कि अभिषेक दस दिन तक कश्मीर में रहा और हमें उसकी ज़रूरत बनारस में हुई तो हमने इसे कश्मीर से शाम को बुलाया और सुबह बनारस भेज दिया और वहाँ से लौटने से पहले कहीं और के लिए उसका टिकट बुक करा दिया गया . कैमरामैन बदलते रहे , शहर और असाइनमेंट बदलता रहा लेकिन अभिषेक लगातार रिपोर्टिंग के लिए यात्राएँ करता रहा . मुझे याद है दिवाली के पहले हमने बाढ़ की कवरेज के लिए उसे श्रीनगर भेजा था . कई दिन तक तमाम मुश्किल हालात में वो वहाँ 13-14 घंटे हर रोज़ काम करता रहा . इसी बीच दीवाली आ गई . मुझे चिंता हुई कि अब क्या करें . उसकी हमें वहाँ ज़रूरत भी थी . हमने दिवाली के एक दिन पहले उसे फोन किया कि क्या करें ..अगर तुम्हें रोकता हूँ तो तुम्हारी दीवाली ख़राब हो जाएगी . शायद कोई दूसरा होता तो हाँ ही कहता लेकिन उसने कहा -कोई बात नहीं सर, मैनेज कर लूंगा . मैं रूक जाऊँगा लेकिन हमने किसी तरह मैनेज किया और दीवाली की शाम उसे वापस बुला लिया . शाम को जब दिए जल रहे होगे , तब वो अपने घर पहुँचा होगा . होली के दो दिन पहले हमें होली पर किसी प्रोग्राम के लिए उसे बनारस भेजना था . मैंने फिर पूछा -अगर होली में रुकना पड़े तो ? उसने कहा -रुक जाऊँगा . लेकिन हमने होली के दिन उसे वापस बुला लिया . अब अगर ऐसा रिपोर्टर हो तो उसकी तारीफ़ तो होनी चाहिए न ?
टीवी में अपने बीस सालों के तजुरबे से मैं कह सकता हूँ कि अच्छा काम करने वाले , हर मामले की ठीक -ठीक समझ रखने वाले , अच्छी कॉपी लिखने वाले , दिन रात मेहनत करने वाले तो कई रिपोर्टर हैं लेकिन ऐसे रिपोर्टर कम हैं , जो अभिषेक की तरह बिना रुके ,बिना थके और सबसे बड़ी बात बिना शिकायत किए लगातार…लगातार काम करते रहें …इंडिया टीवी में आठ महीने के अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि ये लड़का बेजोड़ है . भरोसेमंद है और मेहनत के मामले में बहुतों पर भारी है . बाढ़ में बिना खाए-पिए गर्दन तक पानी में घुस -घुस तक लगातार दस दिन रिपोर्टिंग तो कई लोग कर लेते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं , जो तमाम मुश्किलों का सामना करके भी कभी शिकायत नहीं करते . एक असाइनमेंट से दूसरे असाइनमेंट पर भेजे पर कभी आनाकानी नहीं करते . कभी अपने क़द और पद के हिसाब से स्टोरी करने की बात नहीं करते . अभिषेक ऐसा ही है . अगर वो कभी शिकायत करता भी है तो एक ही कि ..अरे इतना शूट कर लिया , फ़ीड ही नहीं जा पा रही है . जिस भी असाइनमेंट पर अभिषेक होता है , हमें भरोसा रहता है कि वो बेहतर करेगा . आज तो सिर्फ़ अभिषेक की बात , अगली बार किसी की ….

मुनाफे और शोषण पर आधारित पूंजीवादी समाज में मजदूर और मालिक के बीच कभी दोस्ताना व्यवहार नहीं हो सकता.

‘भूतों का इलाज’ देवेन्द्र कुमार मिश्रा द्वारा लिखा गया एक रोचक एवं पठनीय कहानी संग्रह है. इस कहानी संग्रह में समाज के छुए-अनछुए पहलुओं पर बड़ी ही गहनता और मार्मिक रूप से लिखा गया है. संवाद शैली ऐसी है कि कहानी को एक बार पढना शुरू किया जाए तो पूरी पढ़े बिना नहीं रहा जाता. समाज के विभिन्न पहलुओं पर लिखी गयी कहानियां दिल को छू जाती हैं और यह सोचने को मजबूर कर देती हैं कि इतने समृद्ध कहे जाने वाले समाज में कुछ चीजें आज भी ज्यों की त्यों हैं.
मुनाफे और शोषण पर आधारित पूंजीवादी समाज में मजदूर और मालिक के बीच कभी दोस्ताना व्यवहार नहीं हो सकता. समाज में इन दो वर्गों के बीच हमेशा लड़ाई रही है और लड़ाई रहना लाज़मी है. व्यवस्था के पोषक “धर्म के लिए हजारों व्यर्थ उड़ा देंगे. खून-पसीने की कमाई खाने वालों का हक मरेंगे. भिखारियों को मुफ्त पैसा बाँटना धर्म है और मेहनत करने वाले को वाजिब दाम देना बेवकूफी समझते हैं. हमसे अच्छे तो ये भिखारी हैं. इनके लिए पेट्रोल-डीजल की कीमत है. खून-पसीने की कमाई की कोई कीमत नहीं.”
आज के वैज्ञानिक युग में लोग अवैज्ञानिक तत्वों पर ज्यादा यकीन रखते हैं. किसी भी बीमारी और समस्या का समाधान वे अंधविश्वास के रूप में खोजते है. पांडो-पुरोहित, मुल्ला-मौलवियों द्वारा तन्त्र-मन्त्र, भूत प्रेत जैसी चीजों का इलाज करवाते हैं. बजाय इसके वे समस्या के भौतिक कारणों को जाने, उल्टा वे इन आडम्बरों, अंधविश्वासों के चंगुल में जा फंसते हैं-
“पूर्णिमा, अमावस्या को मेरी बीवी अचानक जोर जोर से साँसे भरने लगती है. …वह थर-थर कांपने लगती है. वह जोर जोर से चीखने लगती है बचाओ-बचाओ. वो मुझे अपने साथ ले जायेगा. …जब तक माइके रहती है ठीक ही रहती है. ससुराल आते ही फिर वही सब शुरू हो जाता है.
“किसी मनोचिकित्सक को दिखाया.”
“भूत प्रेत का साया है और क्या? मैं डॉक्टर हूँ तो क्या मानता नहीं हूँ इन सब बातों को.”
देवेन्द्र कुमार मिश्रा ने महिलाओं या लड़कियों के प्रति समाज के रवैये को बहुत ही मार्मिक ढंग से पेश किया है जो यह दर्शाता है कि आज भी औरत को एक वस्तु के अलावा और कुछ नही समझा जाता है. लड़की की खूबसूरती! उसे तो अभिशाप समझा जाता है. इस खूबसूरती के कारण परिवार व समाज में उसका जीना मुश्किल कर दिया जाता है. समाज के पिछड़ी मानसिकता के लोग हर खूबसूरत चीज को पा लेने की चाह में इस हद तक गिरते हैं कि सामने वाले का जीना दूभर हो जाये. नतीजन घर वाले भी लड़की को तरह-तरह की हिदायतें देने लगते हैं कि घर जल्दी आये, ज्यादा से ज्यादा घर पर ही रहे. कोई बाहर का इंसान बैठने आये तो घर के अंदर चली जाये और ना जाने क्या-क्या…. और तो और कभी उसे अपनी पढाई घर रहकर करनी पड़ती है. इस घटिया सोच का खामियाजा एक बेकसूर, मासूम लडकी को भुगतना पड़ता है. “ज्यादा इतराओ मत. हम में से किसी एक को चुन लो. नहीं तो बदनाम कर देंगे. …कुछ ऐसा कर गुजरेंगे कि किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी. …अगर हमारे खिलाफ आवाज उठाई तो एसिड से चेहरा बिगाड़ देंगे.”
“एक रोज कॉलेज जाते समय उस गुंडे ने उस पर एसिड भरा बल्ब फेंक दिया.”
देवेन्द्र ने ‘फांसी’ कहानी का गठन बहुत ही बेजोड़ ढंग से प्रस्तुत किया है. भारतीय न्यायव्यवस्था राजनीति पर आधारित जान पडती है. गरीब को न्याय नहीं, मीडिया पहले ही व्यक्ति को मुजरिम करार देती है. “देखो भाई! राजनीति, मीडिया के दबाव के चलते तो न जाने कितने केस बनाए होंगे. कितने बेगुनाहों को थर्ड डिग्री दी होगी. हां, कुछ मुठभेड़ जरूर हुई जो बिलकुल फर्जी थी, लेकिन हमें तो ऊपर वालों के आदेश का पालन करना था.”
प्रस्तुत कहानी संग्रह में देवेन्द्र कुमार मिश्रा की ‘सेवा संगठन’, ‘जीत या हार’, ‘प्रश्न’, ‘गुमनाम शिकायतें’, ‘खुदाई’, ‘आभिजात्य’ एवं ‘ईमानदार लाश’ भारतीय समाज के यथार्थवादी जीवन का सटीक वर्णन है.
क्योंकि औरत कट्टर नहीं होती’ डॉ. शिखा कौशिक ‘नूतन’ द्वारा लिखा गया लघु कथा संग्रह है जिसमें स्त्री और पुरुष की गैर बराबरी के विभिन्न पहलुओं को छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से सशक्त रूप में उजागर किया है. इस संग्रह में हमारे समाज की सामंती सोच को बहुत ही सरल और सहज ढंग से प्रस्तुत किया है, खासकर महिला विमर्श के बहाने समाज में उनके प्रति सोच व दोयम दर्जे की स्थिति को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है. फिर मामला चाहे अस्तित्व का हो या अस्मिता का ही क्यों न हो.
लेखिका डॉ. शिखा कौशिक ‘नूतन’ अपनी कथाओं के जरिये बताती हैं कि बेशक आज देश उन्नति के शिखरों को चूम रहा हो लेकिन असल में लोगों की सोच अभी भी पिछड़ी, दकियानूसी और सामंती है. इसी सोच का नतीजा है कि हमारे समाज में आज भी महिलाओं को हमेशा कमतर समझा जाता है. किसी भी किस्म की दुश्मनी का बदला औरत जात को अपनी हवस का शिकार बनाकर ही किया जाता है, फिर मामला चाहे सांप्रदायिक हो या जातिगत -“जिज्जी बाहर निकाल उस मुसलमानी को!! …हरामजादों ने मेरी बहन की अस्मत रौंद डाली…मैं भी नहीं छोडूंगा इसको…!!!
लेखिका ने समान रूप से काम करने वाले बेटे-बेटी के बीच दोहरे व्यवहार को बखूबी दर्शाया है जो अक्सर ही हमारे परिवारों में देखने, सुनने या महसूस करने को मिल जाता है- “इतनी देर कहाँ हो गयी बेटा? एक फोन तो कर देते! तबियत तो ठीक है ना ? बेटा झुंझलाकर बोला- ओफ्फो… आप भी ना पापा… अब मैं जवान हो गया हूँ… बस ऐसे ही देर हो गयी. पिता ठहाका लगाकर हंस पड़े. अगले दिन बेटी को घर लौटने में देर हुई तो पिता का दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच गया. बेटी के घर में घुसते ही पूछा …घड़ी में टाइम देखा है! किसके साथ लौटी हो?…पापा वो ऐसे ही. बेटी के ये कहते ही उलके गाल पर पिता ने जोरदार तमाचा जड़ दिया.”
डॉ. शिखा ने भारतीय समाज में व्याप्त लिंगीय भेदभाव पर बहुत ही तीखा प्रहार किया है और उन मिथकों को तोड़ने की भरसक कोशिश की है जो एक स्त्री होने की वजह से हर दिन झेलती है. लेखिका इस बात पर शुरू से लेकर अंत तक अडिग है कि औरत ही औरत की दुशमन नहीं होती बल्कि सामाजिक तथा आर्थिक सरंचना से महिलायें सामन्ती एवं पुरुष प्रधान मानसिकता से ग्रसित हो जाती हैं – “ऐ… अदिति… कहाँ चली तू? ढंग से चला फिरा कर… बारवें साल में लग चुकी है तू… ये ढंग रहे तो तुझे ब्याहना मुश्किल हो जायेगा. कूदने-फादने की उम्र नहीं है तेरी. दादी के टोकते ही अदिति उदास होकर अंदर चली गयी. तभी अदिति की मम्मी उसके भाई सोनू के साथ बाजार से शोपिंग कर लौट आयीं. सोनू ने आते ही कांच का गिलास उठाया और हवा उछालने लगा. …गिलास फर्श पर गिरा और चकनाचूर हो गया. सोनू पर नाराज होती हुई उसकी मम्मी बोली- “कितना बड़ा हो गया है अक्ल नहीं आई! …अरे चुपकर बहु एक ही बेटा तो जना है तूने …उसकी कदर कर लिया कर… अभी सत्रहवें ही में तो लगा है… खेलने-कूदने के दिन हैं इसके…”
प्रेम करना आज भी एक गुनाह है. अगर किसी लड़की ने अपनी मर्जी से अपना जीवन साथी चुना तो परिवार व समाज उसके इस फैंसले को कतई मंजूरी नहीं देते बल्कि इज्जत और मर्यादा के नाम पर उसको मौत के घाट उतार दिया जाता है. प्रेम के प्रति लोगों की सोच को नूतन कुछ इस तरह व्यक्त करती हैं- “याद रख स्नेहा जो भाई तेरी इज्जत की बचाने के लिए किसी की जान ले सकता है वो परिवार की इज्जत बचाने की लिए तेरी जान ले सकता है. …स्नेहा कुछ बोलती इससे पहले ही आदित्य रिवाल्वर का ट्रिगर दबा चुका था.”
हमारे समाज में आज भी लोगों के मन में जातिवाद घर बनाये हुए है. जातिवाद प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने आ ही जाता है. स्कूल, कॉलेज, नौकरी-पेशा, शादी-विवाह या किसी भी कार्यक्रम के आयोजन ही क्यों न हो जाति कभी पीछा नहीं छोडती- “जातिवाद भारतीय समाज के लिए जहर है. इस विषय के संगोष्ठी के आयोजक महोदय ने अपने कार्यकर्ताओं को पास बुलाया और निर्देश देते हुए बोले- देख! वो सफाई वाला है ना. अरे वो चूड़ा. उससे धर्मशाला की सफाई ठीक से करवा लेना. वो चमार का लौंडा मिले. …उससे कहना जेनरेटर की व्यवस्था ठीक-ठाक कर दे. बामन, बनियों, सुनारों, छिप्पियों इन सबके साइन तू करवा लियो… ठाकुर और जैन साहब से कहियो कुर्सियों का इंतजाम करने को.”
किसी भी स्त्री और पुरुष की ताकत, हुनर, पहलकदमी, तरक्की को देखने का नजरिया एकदम अलग-अलग होता है. लेकिन स्त्री जाति के विषय में बात एकदम अलग है क्योंकि किसी भी स्त्री को डर, धमकी या मार द्वारा उसके लक्ष्य से कोई भी डिगा नहीं सकता. सिर्फ पुरुषवादी सोच ही स्त्री को चरित्रहीन कहकर ही उसको अपमानित करती है. “रिया ने उत्साही स्वर में कहा जनाब मुझे भी प्रोमोशन मिल गया है. ‘अमर’ हाँ, भाई क्यों न होता तुम्हारा प्रोमोशन, तुम खूबसूरत ही इतनी हो.”

पत्रकारिता में नाकारात्मक सोच के नतीजे ठीक नही

एक अच्छेे पत्रकार का भटकाव दिखता जा रहा है कभी इनके प्राइम टाइम को बहुत रुझान से देखते थे। लेकिन समय ने इन्हें बदल दिया। अपने मन की छुपी इच्छाओं को जमीर का नाम नहीं देना चाहिए। जमीर कभी यह नहीं कहता कि आप नितिश लालू की खुळी तरफदारी करें। बिना बात टीवी का काला पर्दा दिखाकर लोगों को भयभीत करो।
रातों रात किसी कन्हैया को जयप्रकाश नारायण बना दो। जमीर यह भी नहीं कहता कि टीवी वार्ता में जिसकी बात पसंद न आए उसके सामने से कैमरा हटा दो। जमीर यह भी नहीं कहता कि जो लालू राज पंद्रह साल तक बिहार को बर्बाद करता रहा उस पर तीखी टिप्पणियों के बजाय उनके चुटकीलों मुहावरों पर रंग जाओ। जमीर तो यह भी कहता है कि बहुत मैं मैं भी अच्छा नहीं। टीवी की चर्चाओं को आत्मकेंद्रित करना भी एक अपने ढंग का अंहकार है। अपने ढंग की एक सत्ता का गुरूर है। जमीर आपको यह सोचने को विवश नहीं करता कि पत्रकारिता केवल दिल्ली में बैठे पच्चीस लोगों की दुकान नहीं। पत्रकारिता गांव गांव कस्बों में फैली है। आपका जमीर कब आपको बताएगा कि आप पत्रकारिता के स्वयंभू नहीं हो। महज एक पत्रकार हो।
राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, श्यामा प्रसाद काला, हरीश चंदोला, वी करंजिया, पी साईनाथ कितने ही शानदार पज्ञकारों ने दशकों अपना काम किया। कभी मैं मैं नहीं किया। कुछ तो आपके खासमखासों ने आपको भगवान बना दिया और कुछ आप भी पत्रकारिता के भगवान बनने के लिए जरूरत से ज्यादा आतुर दिखते हैं। प्लीज आप बौद्धिक है, क्रिएटिव है। आगे बहुत अच्छी पत्रकारिता करेंगे। लेकिन सेलिब्रिटी होने का अलग अंदाज आपको मूल पत्रकारिता नहीं करने दे रहा है। जबकि समाज में हम जैसे सामान्य लोग आपसे केवल पत्रकारिता ही चाहते हैं। हां अब तक जो भी किया हो। आप करे या न करें मगर आपके साथ चाटुकारिता शब्द जुडना ही दुख देता है। क्योंकि आपको कुछ और होना था। आप एक कन्हैया के लिए नहीं, देश के लाखों कन्हैया के
लिए है। वो कन्हैया मौज मार रहा है। आप बिना वजह चिंतक बने हैं। सुधीर, रजत, अर्नब, चौरसिया से भी यही सवाल है दूसरेे नहीं।
पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जिससे जुड़े लोग बहुमुखी प्रतिभा के धनी होते हैं. 
छतरपुर – गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब प्रान्तीय समिति, प्रान्तीय अध्यक्ष संतोष गंगेले द्वारा सामाजिक समरसता का जो आयोजन शहनाई गार्डन छतरपुर में जिला के पत्रकारों का सम्मेलन, प्रतिभा पत्रकार सम्मान समारोह, दश हरा मिलन, ईद मुबारकवाद, का हुआ जिसमें जिला के लगभग एक सैकड़ा संपादक, पत्रकारो, साहित्यकारों, समाजसेवी नागरिकों अधिकारियों ने भाग लिया । कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला के वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेन्द्र शर्मा (शिरीष ) मुख्य अतिथ्य श्री के0 सी 0 जैन डी आई जी छतरपुर रेंज, बिषिष्ट अतिथ्य पुलिस अधीक्षक श्री ललित शाक्यवार, , छतरपुर एस.डी.एम. श्री डी पी द्विवेदी, नौगाॅव एसडीएम श्रीमती दिव्या अवस्थी,, संपादक डा0 रज्जब खाॅ, संपादक श्री सुरेन्द्र अग्रवाल, बरिष्ठ पत्रकार श्री राकेश शुक्ल (अधिबक्ता) संचालन युवा पत्रकार श्री अंकुर यादव ने किया । कार्यक्रम सरस्वती पूजन व श हीद गणेश शंकर विद्यार्थी जी के चित्र पर पुष्प माला अर्पित करते हुए हुआ । कार्यक्रम में युवा पत्रकार श्री रविन्द्र अरजरिया एवं श्री मनेन्द्रु पहारिया ने ओजस्व पूर्ण विचार रखे ।
पत्रकारिता में नाकारात्मक सोच के नतीजे ठीक नही होते है- डी आई जी
मुख्य अतिथ्य श्री के0सी0 जैन डी आई जी छतरपुर ने अपने बिचार रखते हुये कहा कि यदि पत्रकारिता अगर सकारात्मक सोच से होगी तो उसके अच्छे नतीजे होंगे । नाकारात्मक सोच के नतीजे ठीक नही होते है । आलोचना होनी चाहिए लेकिन वह भी सकारात्मक हो । आपने आगे कहा कि हम बाहर जाते है तो वहां की व्यवस्था में ढल जाते है लेकिन यहां रहकर हम व्यवस्थाओं में नही ढलते, जबकि नियम कानून यहां भी बने हुये है । आपने उदाहरण दिया कि हम लोगों से कहते हे कि हेलमेट लगाओं लेकिन लेाग नही लगाते , इसी प्रकार लोग सफाई व्यवस्था को लेकर भी लापरवाही करते है । पत्रकारों को चाहिए िकवह ऐसी अव्यवस्थाओं के बिरूध्द जन अभियान छोड़े ताकि समाज में सुधार हो सकें । सुरक्षा को लेकर अगर सभी एलर्ट रहेगें तो वह सुरक्ष्ज्ञित रहेगे । आपने जीवन में इंसानियत , अनुषासन, सहनषीलता एवं संवेदनषीलता अपनाने पर भी जोर दिया ।
साहित्यकार एवं पत्रकार एक ही सिक्के के दो पहलू -सुरेन्द्र श र्मा
गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब का सामाजिक समरसता समारोह की अध्यक्षता कर रहे बरिष्ठ साहित्यकार सुरेन्द्र श र्मा (षिरीश ) ने कहा कि साहित्यकार एवं पत्रकार एक सिक्के के दो पहलू हैं, जो साहित्यकार होता है वहीं पत्रकार होता है । जिस तरह साहित्य के लिए साधना करनी पड़ती है उसी तरह पत्रकार के लिये भी मेहनत करनी पड़ती है । आपने पत्रकारों से अपेक्षा की कि वे गणेश शंकर विद्यार्थी के जीवन से प्रेरणा लेकर पत्रकारिता करे । इस संगठन के प्रदेषाध्यक्ष संतोश गंगेले ने जो आयोजन किया उसकी खुले कंठ से सराहना होनी चाहिए ।
मतभेद होना चाहिए, मनभेद नही -एस पी
छतरपुर पुलिस अधीक्षक ललित शाक्यवार ने कहा कि जहां चार बर्तन होते है उसमें कभी न कभी टकराव हो ही जाता है, लेकिन मतभेद होना चाहिए, मन भेद नहीं, क्योंकि जहंा मतभेद हो जाता हैं वहीं प्रगति से रूकने लगती है । इसलिए मतभेद होते रहते है, मनभेद नही होना चाहिए । उन्होने कहा कि मीडिया का अपना एक महत्व है यदि मैं एसपी नही हेाता तो पत्रकार होता । आपने बरिष्ठ पत्रकारों से अपेक्षा की कि वह नये पत्रकारों को पत्रकारिता की सही राह दिखायें । पत्रकारों को चाहिए कि -वह जो भी समाचार प्रकाषित करें वही सही होना चाहिए ।
विद्यार्थी जी के जीवन से प्र्रेरणा लें – डी पी द्विवेदी
एसडीएम श्री डी पी व्दिवेव्दी ने कहा कि ष्षहीद गणेश शंकर विद्यार्थी ने पत्रकारिता के माध्यम से जो चेतना जगाई है उससे प्रेरण लेकर सकारात्मक पत्रकारिता होनी चाहिए । आपने पत्रकार एवं प्रषासन को एक दूसरे का पूरक बताते हुये कहा कि लोग एक पैर से भी चल लेते है लेकिन यदि दूसरा पैर साथ दे तो और अच्छा होता है ।
समाज को आईना दिखाते हैं पत्रकार- दिव्या अवस्थी
राज्य प्रशासनिक सेवा अधिकारी श्रीमती दिव्या अवस्थी (नौगाॅव ) ने पत्रकारिता के व्यवसायीकारण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि समाज को पत्रकार आईना दिखतें है वे जो प्रकाषित करते है समाज उसे सही मान लेता है, इसलिए किसी भी खराब छवि प्रदर्षित नही होनी चाहिए । बल्कि समाचार प्रकाषित करने के पूर्व उसकी सत्यता का पता लगाया जाना चाहिए ।
प्रेस एवं प्रशासन में समन्वय जरूरी है-राकेश शुक्ल
पूर्व लोक अभियोजक एवं बरिष्ठ पत्रकार श्री राकेश शुक्ल ने कहा कि अगर पत्रकारों में एकता है तो वह किसी भी परिस्थितियों में जूझ सकते है, उन्होने पत्रकारों के संघर्ष एवं सफलताओं ने अनेक उदाहरण देते हुए कहा कि पत्रकारिता में छतरपुर जिला का अपना एक इतिहास रहा है । उन्होने कहा कि पत्रकारिता जुझारू एवं संघर्षषील होना जरूरी है ।
जिला के पत्रकारों को संगठित होकर पत्रकारिता करना चाहिए-हरि अग्रवाल
समाजसेवी संपादक श्री हरि अग्रवाल ने अपने उदवोधन में कहा कि ष्षहर की गंगा जमनी संस्कृति बनी रहे , जिला के सभी पत्रकारों को संगठित होकर पत्रकारिता करना चाहिए, संगठन में ही ष्षक्ति है, मेरी सभी को शुभ कामनाऐंह ै, आपने समाज में अच्छे काय करने वालों का जिक्र करते हुए कहा कि समाज में पारस दुवे (डब्बू महाराज) एवं संजयष्षर्मा जैसे समाजसेवी है, जो निःस्वार्थ भाव से सेवा का काम करते है ।
छतरपुर की पत्रकारिता का गौरवशाली इतिहास रहा है-डा0 रज्जव
संपादक डा0 रज्जब खाॅ ने ष्षायरी के साथ अपने बिचार व्यक्त करते हुये कहा कि छतरपुर की पत्रकारिता का गौरवषाली इतिहास रहा है । युवा पीढ़ी को कुछ सीखना चाहिए । उन्होने गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब का सामाजिक समरसता समारोह की सराहना करते हुये कहा कि संतोश गंगेले ने जो संगठन तैयार किया है यह प्रदेश में अपना जल्दी ही स्थान बना लेगा ।
प्रशासन की भूमि सकारात्मक – डा. अजय दोसाज
छतरपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष एवं संपादक डा0 अजय दोसाज ने कहा कि परिस्थितियों बश कभी-कभी पत्रकार एवं प्रषासन के बीच भ्रान्तियाॅ उत्पन्न हो जाती है , फिर भी प्रषासन की भूमिका सकारात्मक रहती है । पत्रकारों को ऐसे आयोजन समय समय पर करते रहना चाहिए । इससे भ्रांतियाॅ को दूर करने मंे मदद मिलती है ।
जैसा नाम, बैसा काम – रमाशंकर मिश्रा
भारतीय संस्कृति एंव संस्कारों को लेकर समाज सेवा करने वाले साहित्यकार पं. श्री रमाशंकर मिश्र (मनीषी जी ) ने कहा कि श हीद गणेश शंकर विद्यार्थी जी का जैसा नाम था, वैसा ही उनका काम था । समाज अच्छा होगा, तो हर क्षेत्र में काम करने वाले लोग भी अच्छे होगे । क्यों कि सभी लोग समाज से ही आते है । पत्रकारों को चाहिए कि वह समाज के लोगों के अधिकारों की रक्षा करने में अपनी भूमिका का निर्वाह करे ।
मेरा जीवन पत्रकारिता के लिए समर्पित रहेगा – संतोश गंगेले
गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब का सामाजिक समरसता समारोह के आयोजक प्रान्तीय अध्यक्ष संतोश गंगेले ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों एवं उपस्थित सभी संपादकों, पत्रकारों, साहित्यकारों, समाजसेवी नागरिकों एवं अपने सहयोगी श्री के0के0 रिछारिया, श्री राजेश षिवहरे, श्री कमलेश जाटव, श्री नन्हेराजा, श्री स्वदेश पाठक श्री खेमचन्द्र रैकवार मुन्ना सहित सभी का आभार प्रर्दश न करते हुये कहा कि 35 सालों की पत्रकारिता में अनेक ऊॅचाईयों को देखा है, बर्तमान पत्रकारिता को साथ लेकर चलने के लिए प्रदेश में सगठन का विस्तार किया जा रहा है जो मेरा जीवन है वह समाज के लिए समर्पित रहेगा । इस अवसर पर युवा कवि रतनदीप गंगेले ने अंग्रेजी में अपना भाश ण देकर देश प्रेम की एक कविता का पाठन किया । जिसकी सभी ने सराहना की है ।

पुरस्‍कार वितरण समारोह

युवा छात्रों के साथ समय बिताने में मुझे जितनी प्रसन्‍नता होती है उससे अधिक प्रसन्‍नता किसी और चीज से मुझे नहीं मिलती है। और आप सर्वोत्‍तम में सर्वोत्‍तम, उम्‍मीद की उज्‍ज्‍वल किरणों का प्रतिनिधित्‍व करते हैं जो आने वाले वर्षों में इस देश को आगे ले जाने की राह दिखाएंगे। मैं यह केवल मंत्री के रूप में या भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में नहीं कह रही हूँ, अपितु स्‍वयं मां के रूप में और इस अनोखे देश के एक नागरिक के रूप में कह रही हूँ। 

सामूहिक रूप से आप सभी उस बहुरंगी विविधता का भी प्रतिनिधित्‍व करते हैं जिसके दम पर भारत जिंदा है। आप सभी देश के भिन्‍न – भिन्‍न भागों से आए हैं, घर पर अलग – अलग भाषाएं बोलते हैं, अलग – अलग किस्‍म के भोजन ग्रहण करते हैं – फिर भी आप सभी एक साथ स्‍कूल के समान कठोर नियमों का पालन करते हैं, एक जैसा गृह कार्य करते हैं, और एक जैसी परीक्षाएं भी देते हैं। क्‍या विविधता में एकता का इससे बेहतर उदाहरण हो सकता है। 

आप सभी के यहां आने का कारण यह है कि विदेश मंत्रालय के हम लोगों ने देश के सभी केंद्रीय विद्यालयों के समक्ष एक साधारण प्रश्‍न रखा – नीति बनाना क्‍यों मायने रखती है? और हमने सात अलग – अलग क्षेत्रों से अपना उत्‍तर तैयार करने के लिए छात्रों से कहा – भारत की साफ्ट पावर; अंतर्राष्‍ट्रीय योग दिवस; भारत और संयुक्‍त राष्‍ट्र; भारत और उसके पड़ोसी; जलवायु परिवर्तन पर भारतीय दृष्टिकोणे; समकालीन विश्‍व में महात्‍मा गांधी जी प्रासंगिकता; और भारत – अफ्रीका संबंध : भविष्‍य के लिए साझेदारी।

मुझे उम्‍मीद है कि इस कवायद के माध्‍यम से हम विशाल तरीकों के बारे में सोचने के लिए छात्रों को एक्‍सपोज करने में समर्थ हुए हैं जिनमें विदेश नीति के हमारे विकल्‍प हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित करते हैं, क्‍योंकि मूल रूप में विदेश नीति राष्‍ट्र की घरेलू प्रगति के लिए अनुकूल विदेशी माहौल सृजित करने के लिए तैयार की जाती है। यदि किसी राष्‍ट्र के लिए युद्ध या आर्थिक अस्थिरता का खतरा निरंतर मौजूद होगा, तो कैसे वह प्रगति कर सकता है? 

आज भी, ऐसे अनेक लोग हैं जो घरेलू प्रगति एवं विदेशी संपर्क के बीच इस संबंध से अनभिज्ञ हैं। उदाहरण के लिए, वे पूछते हैं, कि कैसे आंध्र प्रदेश का किसान या राजस्‍थान का दुकानदार या महाराष्‍ट्र का निजी फर्म का कर्मचारी उस समय लाभांवित होगा जब हमारे प्रधानमंत्री जी किसी विदेशी नेता से हाथ मिलाएंगे? 

इसका सीधा सा उत्‍तर यह है कि हाथ मिलाना सहमति का प्रतीक है जिससे निवेश का मार्ग प्रशस्‍त होता है जिससे विकास की गति तेज होगी और नौकरियों का सृजन होगा। 

परंतु विदेश नीति निवेश एवं नौकरियों तक ही सीमित नहीं है। जैसा कि हम इस बहादुर नई शताब्‍दी में आगे बढ़ रहे हैं, यह भी उत्‍तरोत्‍तर स्‍पष्‍ट होता जा रहा है कि कल की सबसे बड़ी समस्‍याओं का समाधान राष्‍ट्रों द्वारा अकेले काम करके नहीं किया जा सकता है। मैं जब यहां बोल रही हूँ, मेरे एक सहयोगी पेरिस में हैं तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से लड़ने के लिए करार करने का प्रयास कर रहे हैं, जो वैश्विक तापन के खतरों को स्‍वीकार करते हुए भारत के संपोषणीय विकास के अधिकार की रक्षा करेगा। हम हर रोज आतंकवाद के खतरे से जूझ रहे हैं जिसकी कोई सीमा नहीं होती है – हम अधिक सुरक्षित इसलिए हैं कि देश एक – दूसरे से निरंतर बातचीत करते हैं – सूचित करते हैं, सलाह देते हैं, अलर्ट करते हैं। साइबर अपराध से लेकर उच्‍च सागरों में मुक्‍त आवागमन, अंतर्राष्‍ट्रीय संस्‍थाओं में सुधार से लेकर दूर – दराज के द्वीपों में शांति स्‍थापना तक – हम कल की समस्‍याओं का समाधान तभी कर सकते हैं जब हम आज साथ मिलकर काम करेंगे। 

और हमें उन लाखों भारतीयों को नहीं भूलना चाहिए जो भारत के बाहर रहते हैं और काम करते हैं जिनको सामूहिक रूप से भारतीय डायसपोरा कहा जाता है। उनके हितों एवं सरोकारों की रक्षा करना भी हमारी सरकार के लिए एक महत्‍वपूर्ण प्राथमिकता है। और इस कारण से भी विदेश नीति मायने रखती है।

इस प्रकार, शांति के लिए वादा से लेकर महामारियों के खतरे तक, निवेश करार के नट एवं बोल्‍ट से लेकर अंतर्राष्‍ट्रीय संस्‍थाओं के पुनर्गठन तक, छात्रों के लिए विनिमय कार्यक्रम से लेकर अफ्रीका में टेली मेडिसीन कार्यक्रम तक – प्रत्‍येक हैंडसेक प्रगति के पथ पर हमें अग्रसर करने के प्रयास का प्रतिनिधित्‍व करता है – एक ऐसे इको सिस्‍टम का सृजन करने के लिए जो भारत के अपने विकास को बढ़ावा देगा और इस मार्ग में भारत के दोस्‍तों एवं साझेदारों की मदद करेगा। सीधे स्‍पष्‍टीकरणों की सरलता से आगे बढ़कर, हमारी विदेश नीति संबंधों का एक जटिल जाल बुनती है, धीरे – धीरे। इसके बगैर हमें अननुमेय अंतर्राष्‍ट्रीय प्रणाली से जूझना पड़ेगा; उसके साथ हम भविष्‍य की अज्ञात गहराइयों में कुशलता के साथ नौवहन कर सकते हैं। 

मैं आशा करती हूँ कि इस निबंध प्रतियोगिता के माध्‍यम से हम युवा छात्रों में विश्‍व के साथ अपनी भागीदारी के महत्‍व को स्‍थापित करने में समर्थ हुए हैं। इससे भी अधिक महत्‍वपूर्ण यह है कि हम आपकी नजरों से विश्‍व को देखने में समर्थ हुए हैं। 

मैं आप सभी की सफल भागीदारी तथा इस प्रतियोगिता में सर्वोत्‍तम प्रविष्ठि के रूप में आंके जाने पर आप सभी को बधाई देना चाहती हूँ। शब्‍दों के साथ आपका कौशल तथा हमारी दुनिया के बारे में आपका ज्ञान महत्‍वपूर्ण साधन हैं जिसकी इस देश को जरूरत है। आपके निबंधों ने आपकी बुद्धि की प्रखरता एवं दया भाव का पता चलता है – विश्‍व में भारत के स्‍थान के बारे में आपके संदर्शों तथा हमारी विदेश नीति का अभिप्राय क्‍या है – इस बारे में सीखने के लिए बहुत कुछ है।

मैं निबंध प्रतियोगिता में पूरे जोश से भाग लेने के लिए केंद्रीय विद्यालय संगठन तथा सभी केवीएस विद्यालयों के अधिकारियों को भी बधाई देना चाहती हूँ जिनका प्रतिनिधित्‍व यहां 25 क्षेत्रों से 25 शिक्षकों द्वारा किया गया है। मुझे बताया गया है कि प्रतियोगिता के लिए चुने गए विषयों से संबंधित अनेक कार्यकलापों का आयोजन किया गया ताकि वास्‍तविक रूप में निबंध लिखने से पूर्व छात्रों में जागरूकता एवं उत्‍सुकता का माहौल सृजित हो सके। यह प्रतियोगिता के उद्देश्‍य को ध्‍यान में रखते हुए है, अर्थात अंतर्राष्‍ट्रीय महत्‍व के मुद्दों के बारे में युवा पीढ़ी में जागरूकता पैदा करना।

आप सभी के लिए जिन्‍होंने भाग लिया है, चाहे आप जीते हों या न जीते हों, मेरा यह आग्रह है कि आप प्रतियोगिताओं में भाग लेना जारी रखें। जैसा कि गांधी जी ने आजादी की लंबी लड़ाई के दौरान बार-बार कहा – पूर्ण प्रयास पूर्ण विजय है।

जल्‍दी ही यहां से आपकी पढ़ाई पूरी हो जाएगी और उच्‍च शिक्षा संस्‍थाओं से भी आप अपनी पढ़ाई पूरी करके प्रोफेशन एवं करियर में प्रवेश करेंगे। यद्यपि आपका ज्ञान एवं कौशल अमूल्‍य होगा, आप जो सिद्धांत एवं मूल्‍य लाएंगे उससे भारत की नियति का निर्माण होगा। आप कल के बच्‍चे हैं और आप जो प्राप्‍त कर सकते हैं उसकी कोई सीमा नहीं हो सकती है। 

मेरा आप सभी निवेदन है कि सरकारी सेवा एवं विदेश नीति में करियर के बारे में विचार करें। यह शताब्‍दी एशिया की शताब्‍दी, हमारी शताब्‍दी होने वाली है। राजनीति, अर्थशास्‍त्र, व्‍यापार, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, शिक्षा तथा सभी अन्‍य क्षेत्रों में विश्‍व के साथ भारत की भागीदारी गहन एवं तीव्र होगी। विश्‍व में भारत के स्‍थान को परिभाषित करने का इससे बेहतर तरीका क्‍या हो सकता है कि हम अपनी विरासत एवं मूल्‍यों के दूत और विदेश में भारत के हितों के संवर्धक के रूप में काम करें? 

परंतु अंत में, आप जो भी करें, पूर्ण प्रतिबद्धता एवं समर्पण के साथ करें।

मैं आप सभी के लिए एक संदेश देना चाहूँगी जो स्‍वर्गीय राष्‍ट्रपति एपीजे अब्‍दुल कलाम युवाओं को दिया करते थे : ''अलग ढंग से सोचने का साहस करें, अन्‍वेषण करने, यात्रा करने और उन रास्‍तों पर चलने का साहस करें जिन पर अभी तक कोई नहीं चला है, असंभव को खोजने तथा समस्‍याओं पर विजय प्राप्‍त करने एवं सफल होने का साहस करें।''

पत्रकार

मैंने पहले एक कालम में इस घटना का जिक्र किया था वह फिर अगस्ता कांड के कारण याद हो आई। घटना कुछ इस प्रकार थी कि हम लोग 1982 में असम विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग करने गए थे। राज्य में करीब 8-10 दिन रहे। वहां के एक व्यवसायी गोयनका परिवार ने हमारी काफी मदद की और उनसे हमारी अच्छी दोस्ती हो गई। जिस दिन हम लोग वापस लौटने वाले थे उसकी पूर्व संध्या पर उन्होंने हमारे सम्मान में रात्रि भोज का आयोजन किया जिसमें शहर की तमाम हस्तियां आयीं। बड़े गर्व से वे लोगों को हमसे मिलवाते हुए बता रहे थे कि देखों दिल्ली के पत्रकार मेरे दोस्त हैं।
खाना खत्म होने पर उन्होंने अपने दादा से हमें मिलवाने की इच्छा जताई। वे हमें लेकर एक कोठरी में गए। जहां उनके बुजुर्ग दादा लेटे हुए थे। उन्होंने कहा, ‘लाला इनसे मिलो ये दिल्ली से आए हुए पत्रकार हैं। बुजुर्ग लालाजी ने हमें ऊपर तक देखा और फिर पूछा पत्रकार है वो तो ठीक है। पर धंधों के है? रोटी पानी कैसे चले हैं?
तब हमें लगा कि जैसे किसी ने हम पर घड़ों पानी डाल दिया हो। उस समय एक आम आदमी के मन में पत्रकारों को लेकर कुछ इस तरह की धारणा रहती थी। पत्रकार का मतलब एक फक्कड़, तंगहाली से गुजरता हुआ इंसान माना जाता था। पर अब जब अगस्ता डील में पत्रकारों को करोड़ों रुपए बांटने की खबर पढ़ी तो मन गर्व से भर गया। सच कहूं तो इस पूरे विवाद में यह खुलासा होने के बाद मेरा और कुछ पढ़ने जानने का मन ही नहीं कर रहा है। मैं उन पत्रकारों के नाम जानने के लिए बेहद उत्सुक हूं। मेरा बस चले तो पत्रकारों को सम्मानित करने वाली किसी दुकान से अनुरोध कर इन सभी को पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके इस उत्कर्ष कार्य के लिए सम्मानित किए जाने का आग्रह करुंगा।
हां, मैं इसके लिए बाकायदा हस्ताक्षर अभियान भी चलाने को तैयार हूं। वजह यह है कि इस खबर ने पत्रकारों की जो हैसियत बढ़ाई हैं उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। आम धारणा यही रहती आयी थी कि पत्रकारों को महज मुरगा खिलाकर, शराब पिलाकर कुछ भी लिखवाया जा सकता है। इसी कालम में मैंने यह भी लिखा था कि जब पत्रकारश्रेष्ठ खुरानाजी को पहली बार ज्ञानी जैल सिंह से किसी बंदूक का लाइसेंस दिलवाने की एवज में डेढ़ लाख रुपए मिले थे तो वे बौखला गए थे। पूरी रात सो नहीं सके थे। यह किस्सा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि यार हम तो खा पीकर ही काम करवा देते थे। कोई बहुत खुश हुआ तो छोटी मोटी गिफ्ट थमा दिया करता था। जब एक बेहद उद्यमी भाजपा के अध्यक्ष बने जो कि केंद्रीय मंत्री भी हैं तो उनसे किसी ने कहा कि आप दिल्ली जा रहे हैं। वहां के पत्रकारों से जरा बचकर रहिएगा। बहुत तेज होते हैं तो उन्होंने छूटते ही कहा था कि तुम उनकी चिंता मत करो। पांच-पांच हजार के कुछ और पैकेट तैयार करवा लूंगा। हालांकि बाद में वे पत्रकारिता का ही शिकार हुए। उन्होंने पैकेट दिए नहीं या इतनी रकम से पत्रकारों को मोह पाने में नाकाम रहे, कह नहीं सकता।
आमतौर पर पत्रकारों को प्रेस कान्फ्रेस में छोटे-मोटे उपहार मिला करते हैं। पहले घड़ी का चलन शुरु हुआ फिर केलकुलेटर मिलने लगे। जब इलेक्ट्रानिक सामान की भरमार हुई तो सैलफोन, पैन ड्राइव, टेबलेट आदि दिए जाने लगे। मेरा मानना है कि उन्हें 50 रुपए के टंबलर से लेकर 10-15 हजार रुपए तक के गिफ्ट दिए जाते हैं। यह देने वाले की हैसियत और उसके उत्पाद पर निर्भर करता है। जैसे कि हाल में जिंगल बैल नामक सैल फोन कंपनी ने पत्रकारों को सेल फोन बांटे। बाबा रामदेव रिपोर्टरों को अपने उत्पाद का हैंपर और चैनल मालिक को विज्ञापन बांटते हैं। पत्रकारों की कितनी कम कीमत लगाई जाती रही इसका भी जिक्र पुनः करना जरुरी हो जाता है। दिल्ली के एक बहुत बड़ी हलवाई श्रृंखला के मालिक की बेटी ने पानी में नृत्य प्रस्तुत किया। इसका आयोजन तालकटोरा स्थित स्विमिंग पुल में किया गया था। जब पत्रकार प्रदर्शन देख रहे थे तभी वहां लालाजी आ गए। उन्होंने जोर से कहा, ‘अबे पम्मों, समय क्यों बरबाद कर रहा है, नाचवाच दिखवाना बंद कर इन्हें अंदर ले जा। दारु पिला। मुरगे खिला वरना खबर कैसे छपेगी।’
तब भी पत्रकारों की बहुत कम कीमत आंकी जाती थी। वैसे मैं पत्रकारों की इज्जत व हैसियत बढ़ाने का पहला श्रेय ‘नीरा राडिया’ टेप्स को देना चाहता हूं। जिनके प्रकाशन से यह खुलासा हुआ कि किस तरह से कुछ पत्रकार इस सरकार की नीतियां तक बदल देने की हैसियत रखते थे। महिला पत्रकारों की तो पहुंच प्रधानमंत्री के किचन कैबिनेट तक थी जहां वे कुछ भी पकवा सकने की ताकत रखती थीं। उनके तार इतने गहरे जुड़े थे कि यह सुनिश्चित करने लगी कि संचार मंत्रालय किसे सौंपा जाए। हालांकि किवदंती तो यह भी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में कुछ पत्रकारों ने उत्तरप्रदेश सरीखे अहम राज्य में भाजपा के टिकट वितरण में बहुत अहम भूमिका अदा की थी। मुझे इस बात पर गर्व है कि कम से कम हिंदी के किसी पत्रकार को यह गौरव हासिल हुआ।
अभी तक अपना अनुभव यही रहा है कि हिंदी व भाषायी पत्रकारों की माल बांटते समय भी अनदेखी की जाती रही है। करीब डेढ़ दशक पहले हिंदी के तीन पत्रकारों द्वारा किसी इनकम टैक्स कमिश्नर का मनचाही जगह तबादला करवा देने के बदले में डेढ़ करोड़ रुपए लेने की खबर आयी थी। तब अनिल बंसल ने कहा था कि हिंदी पत्रकारिता के लिए यह बहुत गर्व की बात है क्योंकि उन पर तो बेल का शरबत या मिठाई, मुरगा, दारु लेकर ही काम करवाने की खबरें सुनने को मिलती रही है। वैसे अगस्ता कांड के खुलासे के मुताबिक हर पत्रकार को 10 लाख रुपए प्रतिमाह दिए जा रहे थे। पत्रकार तो क्या जब हिंदी के संपादक तक महज डेढ़ दो हजार रू के लिए अपना अखबार छोड़कर चैनल पर बहस करने पहुंच जाते हो, उनका इस सूची में नाम आना सचमुच गर्व की बात है। लगता है अगस्ता की सूची में अंग्रेजी के ही पत्रकार है। अगर किसी हिंदी के पत्रकार का नाम आया तो मैं तुरंत गुवाहाटी फोन मिलाकर लाला से जरूर कहूंगा, ‘असली धंधो तो ये हैं।’

Sunday, May 1, 2016

शुगर _रामबाण औषधि


बिना पढ़े मत छोड़ना _शुगर _रामबाण औषधि _बिना कोई साइड इफेक्ट के
🌴 शुगर शुगर शुगर 🌴

🌻शुगर के लिए आसान उपाय🌻
🌻 जिसे हर कोई अपनाए 🌻

दोस्तों आज शुगर रोग मानवता के लिए एक नासूर बन गया है एलोपैथी में हजारों रुपए की दवाएं लोग खाते खाते थके जा रहें हैं पुरुष हो या स्त्री दोनों जातियों में यह रोग घुन लगा रहा है और बहुतयात से पाया जाता है जब इनबॉक्स में रोगियों एक बड़ी संख्या शुगर शुगर शुगर पुकार ने लगी और प्रति दिन वाटसअप पर सैकड़ों की संख्या में मैसेज आने लगे तो मुझे अबतक के सबसे तीव्र और अनूठे इस शुगर नाशक महा योग से पर्दा उठाना ही पड़ा इसलिए कि मानवता से बढ़कर कोई चीज नहीं आप सामग्री ध्यान में रखें 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴
🌱इन्द्रजो कडवा 🌱२५०
🌱बादाम गिरी 🌱२५०
🌱भुने चने पाक 🌱२५०

🌻यह योग बिल्कुल अजूबा योग है अनेकों रोगियों पर आजमाया गया है मेरे द्वारा 100%रिजल्ट आ या है आप इस नुस्खे के रिजल्ट का अंदाजा यूं लगा सकते हैं कि अगर इसको उसकी मात्रा से ज्यादा लिया जाए तो शुगर इसके सेवन से लो होने लगती है बादाम को इस वजह से शामिल किया गया यह शुगर रोगी की दुर्बलता कमजोरी सब दूर कर देता है चने को इन्द्रजो की कड़वाहट थोड़ी कम करने के लिए मिलाया गया 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴
बनाने कि विधी तीनों औषधियों का अलग अलग पावडर बनाए और कांच के जार में रख लें और खाने के बाद एक चाय वाला चम्मच एक दिन में केवल एक बार खाएं सादे जल से 🌴अगर आप दोस्तों में से कोई शुगर रोग से ग्रस्त हो तो स्वयं इस योग का सेवन कर नया जीवन पाईये और
अगर कोई आपका अपना शुगर रोगी है तो उसे यह योग शेयर करके नया जीवन गिफ्ट में दीजिए सभी दोस्तों से अनुरोध है कि यह पोस्ट रुकनी नहीं चाहिए सम्पूर्ण भारत वासियों को यह योग मालूम हो जा ना चाहिये
मानवता का दुख अपना दुख यह मेरा मानना है और
आज पता चल जाएगा की मानवता के दुख को
कोन अपना दुख मानता है और कोन कोन मित्र शेयर करके निर्धन गरीब लोगों को नयी उम्मीद और नयी रोशनी दिखाता है
इसी में मेरा और आपका कल्याण है
चित्र में केवल इन्द्रजो तल्ख (कडवा) दिखाया गया है बाकी दो सामग्रियों को आप भली भांति जानते हो🌴🌴
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