Wednesday, April 4, 2018

ग्राम प्रधान के विरुद्ध उक्त पद पर रहते हुए (आवेदन की तिथि तक) कितनी शिकायतें प्राप्त हुई एवं उन पर हुई कार्यवाही का विस्तृत ब्यौरा प्रदान करे, उनके कार्यकाल के दौरान उनपर हुए अनुशासनात्मक जांच की जानकारी भी प्रदान करे | (प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराये)
6. ग्राम प्रधान के उक्त कार्यकाल के दौरान उन्हें कभी अभ्यारोपित किया गया, अगर किया गया है तो उसकी विस्तृत जानकारी दे | (प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराये)



केन्द्रीय सतर्कता आयोग द्वारा दिनांक ..............से .................... के बीच प्राप्त की गई शिकायतों का संक्षिप्त विवरण, क्या शिकायत गुमनाम थी, शिकायत की तिथि, उस अधिकारियों या प्राधिकरण का पूरा विवरण (नाम, पद तथा संपर्क का पता आदि) जिसके खिलाफ शिकायत की गई है।
2. उपयुर्क्त में से कौन सी शिकायतें तुरन्त ख़ारिज़ कर दी गई तथा कौन सी आगे की जांच के लिए स्वीकार की गईं। केस के अनुसार शुरूआती जाँच की तिथि या ख़ारिज करने का संक्षिप्त कारण का विवरण भी दें।
3. आगे की जांच के लिए स्वीकार की गई शिकायतों में से कितने मामलों में जांच बन्द हो चुकी है? प्रत्येक के बन्द होने का संक्षिप्त विवरण दें।
4. विभिन्न कानून, नियम, निर्देश, प्रकिया, मैन्युअल आदि के अनुसार केन्द्रीय सतर्कता आयोग में शिकायत दर्ज कराने के बाद कितने समय बाद जांच पूरी हो जाती है। कृपया ऐसे दिशानिर्देशों की प्रति उपलब्ध् कराएं, जिसमें शिकायत प्राप्ति से लेकर उस पर कार्रवाई और दण्डारोपण तक के विभिन्न चरणों के लिए समय सीमा का वर्णन हो।
5. दिनांक.............से अब तक आयोग को कुल कितनी शिकायतें प्राप्त हुई हैं? उनमें से कितनी तत्काल ख़ारिज कर दी गई तथा कौन-कौन सी आगे की जांच के लिए रखी गई? जांच के लिए रखी गई शिकायतों में से कितनी शिकायतों की छानबीन में उपरोक्त समय सीमा का पालन किया गया?

आरटीआई एक्ट का उलंघन

आरटीआई एक्ट का उलंघन : भृष्ट अफसरों के बारे में सूचना न देने पर हाई कोर्ट ने दिया सरकार को नोटिस...

रोहतक । भ्रष्टाचार में संलिप्त हरियाणा काडर के आई.ए.एस., आई.पी.एस., एच.सी.एस. एवं एच.पी.एस अधिकारियों के बारे में हरियाणा सूचना अधिकार मंच के राज्य संयोजक को सूचना न देने पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के जज जसवन्त सिंह ने हरियाणा सरकार व राज्य सूचना आयोग को नोटिस जारी किया है। 
ज्ञातव्य है कि हरियाणा सूचना अधिकार मंच के राज्य संयोजक एवं आर.टी.आई. कार्यकर्ता सुभाष द्वारा मु य सचिव कार्यालय से 1 जनवरी, 2000 से 31 अक्तूबर, 2013 तक हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों कार्यरत एवं सेवानिवृत्त हुए आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई,आर एस, एच.सी.एस. एवं एच.पी.एस अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों, भ्रष्टाचार के दर्ज मामले के स बन्ध में जानकारी मांगी थी। मु य सचिव कार्यालय के राज्य जन सूचना अधिकारी ने यह जानकारी देने से मना करते हुए कहा है कि यह नियोक्ता और नियुक्ति प्राप्त करने वाले के बीच का मामला है। साथ ही यह जानकारी व्यापक जनहित में नहीं है इसलिए यह जानकारी आवेदक को नहीं दी जा सकती है। इसके साथ ही इससे किसी भी तरह के मामले में लिप्त अधिकारी के मनोबल पर असर पड़ेगा। आर.टी.आई. कार्यकर्ता सुभाष का कहना है मु य सचिव कार्यालय के राज्य जन सूचना अधिकारी के जवाब से तो यही साबित होता है कि जो अधिकारी भ्रष्टाचार या किसी भी प्रकार के मामले में लिप्त हैं यदि उनकी जानकारी सार्वजनिक हो जाएगी तो उनका भ्रष्टाचार करने का हौंसला टूट जाएगा। यानि यह तो एक तरह से उन्हें संरक्षण देने का मामला है। मु य सचिव कार्यालय के अपील अधिकारी ने भी अपने राज्य जन सूचना अधिकारी से सहमत होते हुए जानकारी ना देने पर अपनी मुहर लगा दी थी। मामला आयोग में गया। मु य सूचना आयुक्त नरेश गुलाटी ने भी अपने फैसले में मु य सचिव कार्यालय के जन सूचना अधिकारी एवं प्रथम अपील अधिकारी के रूख से सहमति जताते हुए जन सूचना अधिकारी के पक्ष में फैसला दिया था।
आर.टी.आई. कार्यकर्ता सुभाष ने अपने वकील प्रदीप रापडिय़ा के माध्यम से हरियाणा एवं पंजाब हाई कोर्ट में याचिका दायर करते हुए कहा कि सभी सरकारी अधिकारी जनता के नौकर हैं और जनता को ये जानने का पूरा हक है कि कौन अधिकारी भ्रष्टाचार में संलिप्त है और उनके खिलाफ सरकार ने क्या कार्यवाही की है। ऐसी सूचना व्यक्तिगत नहीं हो सकती। याचिका में यह ाी कहा गया है कि जब किसी आम आदमी के खिलाफ मुकदमा दर्ज होता है तो मीडिया और अन्य लोग खुलकर मुकदमे के बारे में बोल सकते हैं, लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों के बारे में सूचना देने से मना करके ऐसे अधिकारियों के मीडिया व अन्य लोगों का मुंह बन्द कर दिया गया है। ऐसे में एक आम आदमी व भ्रष्ट अधिकारी के बीच भेदभाव किया जा रहा है। हाई कोर्ट ने मामले का संज्ञान लेते हुए सरकार को 15 जनवरी 2015 तक जवाब देने को कहा है।
क्या मांगी थी जानकारी -
1 जनवरी, 2000 से 31 अक्तूबर, 2013 तक हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों कार्यरत एवं सेवानिवृत्त हुए आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई,आर एस, एच.सी.एस. एवं एच.पी.एस कैडर के कितने अधिकारियों के खिलाफ मामले (किसी भी प्रकार के ) दर्ज हुए हैं ऐसे सभी अधिकारियों के नाम एवं पद नाम दिये?
2. ऐसे अधिकारियों के खिलाफ राज्य सरकार ने क्या कार्यवाही की अवगत करवाया जाए?
3. उपरोक्त अवधि में कितने ऐसे मामले हैं जिनमें कार्यवाही अभी भी लंबित हैं? लंबित होने का कारण बताया जाए।
4. राज्य सरकार के नियमावली के अनुसार किसी अधिकारी/कर्मचारी के खिलाफ केस दर्ज होने के बाद उसके कौन-कौन से लाभ रोके जा सकते हैं? विवरण दिया जाए।
5. उपरोक्त अवधि में कितने अधिकारी ऐसे हैं जिनका लाभ रोके गए हैं, उन सभी का विवरण दिया जाए।
6. केस दर्ज होने के बावजूद ऐसे कितने अधिकारी हैं (सभी के नाम एवं पद) जिन्हें सभी प्रकार के लाभ दिए गए- यथा, सेवा बहाली, वेतनवृद्धि, तरक्की एवं सेवाविस्तार आदि लाभ दिये गये।
7. प्रश्र नं 6 से स बंधित ऐसे सभी अधिकारियों को केस दर्ज होने के बावजूद सेवालाभ आदि देने वाले आदेश एवं आदेश जारी करने वाले अधिकारियों के नाम एवं पदनाम दिये जाएं तथा ऐसे सभी आदेशों की प्रति प्रदान की जाए। है।



भोपाल। प्रदेश सरकार RTI के तहत किसी भी अधिकारी-कर्मचारी के भ्रष्टाचार या अनियमितता की जांच से जुड़े दस्तावेज ये कहकर देने से इंकार नहीं कर सकती कि वो व्यक्तिगत जानकारी का हिस्सा है। राज्य सूचना आयुक्त हीरालाल त्रिवेदी ने ये महत्वपूर्ण फैसला तीन आईएएस अफसरों के मामले में सूचना के अधिकार के तहत मांगे गए दस्तावेजों की अपील पर सुनवाई करते हुए दिया। उन्होंने सामान्य प्रशासन विभाग के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसके तहत जानकारी के लोकहित से जुड़े नहीं होने और तीसरे पक्ष से संबंधित बताकर दस्तावेज देने से इंकार किया जा सकता था।

ऐसे तो कोई जानकारी नहीं दी जा सकेगी 
सूचना आयुक्त हीरालाल त्रिवेदी ने आदेश में कहा कि भ्रष्टाचार और मानव अधिकार से जुड़े मुद्दे सरकारी अधिकारी-कर्मचारी के खिलाफ होते रहते हैं। हर प्रकरण में किसी न किसी का नाम जुड़ा होता है, यदि किसी का नाम आने मात्र से वह व्यक्तिगत जानकारी मान ली जाए, तो ऐसी कोई जानकारी नहीं बचेगी, जो दी जा सके। भ्रष्टाचार के मामले को व्यक्तिगत कहकर जानकारी नहीं देना सूचना का अधिकार कानून की मूलभावना के खिलाफ है।

वहीं, दुबे का कहना है कि आईएएस अधिकारियों से जुड़ा मामला होने की वजह से जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा रही थी। आयोग के फैसले के बाद अब जांच से जुड़े दस्तावेज देने ही पड़ेंगे। उन्होंने इसके लिए शुक्रवार को मुख्य सचिव और सचिव सामान्य प्रशासन 'कार्मिक" के यहां आवेदन लगाकर तीनों अधिकारियों की जांच से जुड़े दस्तावेज देने की मांग की है।

इन अफसरों की मांगी थी जानकारी
बीएम शर्मा- तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ, छिंदवाड़ा। मनरेगा के तहत खरीदी से जुड़े सभी दस्तावेज।
सुखबीर सिंह- तत्कालीन कलेक्टर सीधी। मनरेगा के तहत जेट्रोफा पौधारोपण में अनियमितता।
चंद्रशेखर बोरकर- तत्कालीन सीईओ सीधी। मनरेगा के तहत जेट्रोफा पौधा रोपण में अनियमितता।

ये था सामान्य प्रशासन विभाग का तर्क 
इस मामले में सामान्य प्रशासन विभाग ने ये कहते हुए जानकारी देने से इंकार कर दिया था कि इससे लोकहित का समाधान नहीं होता है। जानकारी तीसरे पक्ष से जुड़ी है। फैसले के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के गिरिश रामचंद्र देशपांडे विरुद्ध केंद्रीय सूचना आयुक्त में पारित आदेश को आधार बनाया गया। इसमें कहा गया कि दंड, जांच, अनुशासनात्मक कार्रवाई और शासकीय सेवक व नियोक्ता के बीच सेवा संबंधी मामले व्यक्तिगत सूचना की श्रेणी में आते हैं।

शिकायत और जांच व्यक्तिगत नहीं
आदेश में कहा गया कि सामग्री खरीदना, शासकीय काम करना, उसकी शिकायत और जांच सूचना का अधिकार की धारा 8 (1) में नहीं आता है। इससे जुड़े दस्तावेज किसी अधिकारी-कर्मचारी के व्यक्तिगत नहीं हैं। हाईकोर्ट जबलपुर ने भी सेवा पुस्तिका या व्यक्तिगत नस्ती को ही व्यक्तिगत रिकार्ड माना है। भ्रष्टाचार या अनियमितता जैसी चीज को व्यक्तिगत जानकारी का हिस्सा नहीं माना जा सकता है।
http://www.bhopalsamachar.com/2017/05/mprsa.html

बारात गांव के बीच से नहीं निकलेगी

UP: 'ऊंची जाति' के हिसाब से निकले दलित की बारात, पुलिस ने पेश किया नक्शा

लोगों और प्रशासन, दोनों का कहना है कि परंपरा बनाए रखने के लिए समुदाय विशेष को बारात नहीं निकालनी चाहिए

भारत बंद, दलितों के प्रदर्शन और SC-ST act से जुड़ी तमाम बातें चल रही हैं. इस बीच दलितों से जातीय भेदभाव का एक और मामला सामाने आया है. हाथरस के संजय कुमार की शादी कासगंज जिले के निजामपुर गांव में शीतल से है. गांववालों का कहना है कि बारात गांव के बीच से नहीं निकलेगी. बल्कि घर से 80 मीटर दूर तक जाएगी. पुलिस ने मामले में परंपरा का हवाला देते हुए बारात का नक्शा पेश किया है. इसमें बारात गांव के बीच से नहीं जाएगी.
संजय जाटव समुदाय से हैं और गांव में कथित ऊंची जाति के लोग नहीं चाहते हैं कि कोई कथित नीची जाति का युवक घोड़ी पर बैठ कर गांव के बीच से बारात निकाले. इसके विरोध में संजय ने कोर्ट में याचिका दायर की है. 20 अप्रैल को होने वाली इस शादी के लिए संजय ने प्रशासन से मदद मांगी. प्रशासन की तरफ से भी संजय को कुछ खास मदद मिलती नहीं दिख रही. जबकि संजय का कहना है कि वो भी भारत के नागरिक हैं और उन्हें ये हक है कि अपनी बारात अपने हिसाब से और घोड़ी पर चढ़कर निकालें. शादी से पहले ये मामला क्या मोड़ लेगा देखना बाकी है.
https://hindi.firstpost.com/india/dalit-in-kasganj-hathras-barat-route-not-allowed-by-high-cast-police-supports-higher-cast-am-101990.html

SC-ST Act मजबूत होना चाहिए

एससी एसटी एक्ट में ढील देना इसलिए ठीक नहीं है क्योंकि इस देश में अब भी दलित को घुड़सवारी करने पर उसे मौत के घाट उतार दिया जा रहा है

SC-ST Act: जिस देश में घोड़ा चढ़ने पर दलित की हत्या कर दी जाती हो वहां मजबूत एक्ट की बिल्कुल जरूरत है
कुछ बातें सुनने में बड़ी अच्छी लगती हैं. मसलन- सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट को खत्म थोड़े ही किया है, इस एक्ट का दुरुपयोग न हो इसलिए गिरफ्तारी से पहले जांच को जरूरी कर दिया है. इस एक्ट में फेरबदल वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कुछ और अच्छी-अच्छी बातें अचानक से होने लगी हैं. जैसे- आरक्षण जाति के आधार पर नहीं बल्कि आर्थिक आधार पर मिलना चाहिए, बिना जाति पूछे सरकार हर गरीब के बच्चे को आरक्षण दे, दिव्यांगों को आरक्षण का लाभ मिले, अनाथों के लिए आरक्षण होना चाहिए, देश के लिए शहीद होने वाले सैनिकों के बच्चों को आरक्षण मिलना चाहिए.
इन अच्छी बातों के केंद्र में बस एक ही बात है कि आरक्षण जाति के आधार पर नहीं मिलना चाहिए. बहस को इस तर्क के आधार पर धार देने की कोशिश की जाती है कि अब कहां होते हैं दलितों पर अत्याचार, पहले कभी हुआ करता था ये सब, आजादी के इतने सालों बाद अब तो जातिगत आधार पर भेदभाव नहीं होते. इसलिए एससी-एसटी एक्ट पर दिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर इतना बवाल करने की जरूरत नहीं है. उलटे बहस तो इस बात पर होनी चाहिए कि क्यों न आरक्षण आर्थिक आधार पर दिया जाए.
एक बार को लगता है कि अगर आरक्षण जाति के आधार पर न होकर आर्थिक आधार पर दिया जाए तो इसमें बुराई क्या है. लेकिन यहां सवाल ये उठता है कि क्या दलितों और पिछड़ों को आरक्षण सिर्फ उनकी आर्थिक हैसियत दुरुस्त करने के लिए दिया गया था? और अगर ऐसा है भी तो क्या अब उनकी आर्थिक स्थिति दुरुस्त करने की नौबत खत्म हो चुकी है. एक बात समझने वाली है कि आरक्षण को सिर्फ आर्थिक नजरिए से देखकर इसे खत्म करने की बात करना नाइंसाफी होगी. ये सिर्फ आर्थिक स्थिति से जुड़ा मसला नहीं है. आरक्षण सिर्फ आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक और राजनैतिक रूप से पिछड़े होने की वजह से भी दिया गया है. वो चाहे सुप्रीम कोर्ट का दलित एक्ट में फेरबदल का फैसला हो या फिर आरक्षण में बदलाव को लेकर जनमानस की बहस, इस पर गहराई से विचार करने की जरूरत है.
ज्यादा पुरानी बात नहीं है. पिछले हफ्ते की दो घटनाएं काफी हैं दलितों के प्रति हमारे समाज के क्रूर रवैये को दिखाने और समझाने के लिए. गुजरात के भावनगर में एक दलित युवक की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि उसने ऊंची जाति के लोगों के सामने घोड़े पर चढ़ने का कसूर किया था. 21 साल के प्रदीप राठौर ने कुछ महीने पहले ही एक घोड़ा खरीदा था. पिता कह रहे थे कि बेटा बाइक खरीद ले लेकिन घुड़सवारी के शौक के चलते उसने बाइक के बजाए घोड़ा खरीद लिया. भावनगर के उमराला तहसील के उसके गांव टिंबी के ऊंची जाति के लोगों को ये पसंद नहीं आया.
dalit-4
मृतक दलित युवक प्रदीप राठौर
पहले एकाध बार धमकाया कि दलितों को ये हक नहीं कि वो घोड़े की सवारी करें. एक बार इलाके के एक दबंग ने घोड़ा चढ़ने पर जान से मारने की धमकी भी दी. इसके बाद भी प्रदीप ने अपनी घुड़सवारी जारी रखी तो उसकी हत्या कर दी गई. सोचिए कि इक्कीसवीं सदी के इस दौर में जब हम सबकी बराबरी की बात कर रहे हैं, वहां गुजरात जैसे तथाकथित विकसित राज्य में एक दलित की घोड़ा चढ़ने के जुर्म में हत्या कर दी जाती है. उत्तरी गुजरात के बनासकांठा और साबरकांठा में शादी विवाह में भी दलितों के घोड़ी चढ़ने पर ऊंची जाति के लोग आपत्ति जताते हैं. यहां दलितों के लिए घुड़सवारी करना अपराध है.
हम किस मुंह से बराबरी की बात करते हैं. समाज की सोच कहां बदली है कि सामाजिक हैसियत की बराबरी के मद्देनजर आरक्षण जैसी व्यवस्था में बदलाव की वकालत करें. इस मामले में भी एससी-एसटी एक्ट के तहत ही मामला दर्ज किया गया. अगर कानून के दुरुपयोग के मामले को ही समझना हो तो हम इसी मामले से इसे क्यों न समझें? ऊंची जाति के जिन लोगों ने घोड़ा चढ़ने की वजह से एक युवक की हत्या कर दी वो अपनी हैसियत और रुतबा बचाने के लिए कानून का किस स्तर और किस हद तक जाकर दुरुपयोग कर सकते हैं, इसे बताने की जरूरत भी नहीं है.
यूपी का एक मामला है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले का एक दलित युवक पिछले कई महीनों से पुलिस प्रशासन से लेकर नेता मंत्री तक से गुहार लगा चुका है. हाथरस के बसई बबास गांव के 27 साल के संजय कुमार की मांग बस इतनी सी है कि उसे अपनी शादी में बारात निकालने की अनुमति दी जाए. कहने को संविधान ने उसे भी वो सब अधिकार दे रखे हैं, जो इस देश के सभी नागरिकों को हासिल हैं. लेकिन असलियत ये है कि संजय सिर्फ दलित होने की वजह अपनी दुल्हन के घर बारात लेकर नहीं जा सकता.
Dalit
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक संजय की शादी नजदीक के कासगंज जिले के निजामाबाद में तय हुई है. जिस रास्ते से शादी की बारात गुजरनी है, वो ठाकुरों के मोहल्ले से होकर जाता है. और इलाके के ठाकुरों को ये मंजूर नहीं है कि दलितों की इतनी हैसियत हो कि वो अपनी बारात निकाल सकें. संजय हर सरकारी अधिकारी के सामने जाकर गिड़गिड़ाया. एसपी-डीएसपी से लेकर उसने सीएम और एससी-एसटी कमिशन तक को लिखा है. मीडिया से लेकर वो इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण में गया है. सबसे वो एक ही सवाल करता है- ‘क्या वो हिंदू नहीं है. जब संविधान कहता है कि देश के सभी नागरिक बराबर हैं. जब राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि हम सब हिंदू हैं तो फिर उसे ऐसी स्थिति का सामना क्यों करना पड़ रहा है.’
संजय बराबरी की ही बात कर रहा है. वो चाहता है कि जैसे दूसरी आम शादियों में घोड़ी पर सवार दूल्हे के साथ गाजे-बाजे के साथ बारात निकलती है और किसी को कोई दिक्कत नहीं होती. वैसी ही उसके बारात के साथ भी हो. लेकिन उसे डर है कि बराबरी की मांग की कीमत कहीं जान देकर न चुकानी पड़ी.
एससी एसटी एक्ट में ढील देना इसलिए ठीक नहीं है क्योंकि इस देश में अब भी दलित को घुड़सवारी करने पर उसे मौत के घाट उतार दिया जा रहा है. इस एक्ट के दुरुपयोग की बात कहके इसमें ढील देना इसलिए ठीक नहीं है कि तमाम दावों के बाद भी एक दलित को अपनी बारात निकालने तक का हक नहीं है. सामाजिक पिछड़ेपन को देखते हुए जातिगत आधार पर आरक्षण इसलिए जरूरी है क्योंकि अब तक जातिगत आधार पर ही भेदभाव हो रहा है.
https://hindi.firstpost.com/politics/why-strong-sc-st-act-is-important-in-this-country-bjp-dalit-atrocity-supreme-court-dalit-protest-101931.html

दलित शब्द के प्रयोग से बचना चाहिए

एनडीए सरकार ने केंद्रीय विभागों और राज्यों से सभी सरकारी कामकाज में अनुसूचित जाति के सदस्यों के लिए दलित शब्द के इस्तेमाल से बचने के लिए कहा है. सुप्रीम कोर्ट में 20 मार्च को एससी-एसटी एक्ट में हुए कुछ बदलावों से पहले ही सरकार ने यह निर्देश जारी किया था. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलित संगठनों ने देश भर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया था. सोमवार को हुए भारत बंद ने हिंसक रूप ले लिया और इसमें करीब 14 लोगों की जान चुकी है.
15 मार्च को राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को भेजे गए एक पत्र में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने कहा है कि उन्हें अनुसूचित जाती (शेड्यूल कास्ट) और इसी शब्द का अनुवाद अन्य भाषाओं में उपयोग करना है.
मंत्रालय द्वारा भेजे गए इस पत्र की फ़र्स्टपोस्ट ने समीक्षा की. इसमें लिखा गया है, सभी राज्य सरकार/केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन से अनुरोध किया जाता है कि सभी सरकारी कामकाज, मामले, लेनदेन, प्रमाण पत्र आदि के लिए संवैधानिक शब्द अनुसूचित जाति और अन्य भाषाओं में इसी शब्द का अनुवाद ही अनुसूचित जाति से संबंध रखने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल हों, जो राष्ट्रपति के आदेश के तहत भारत के संविधान के अनुच्छेद 341 में है.
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के ग्वालियर बेंच द्वारा पारित एक आदेश का हवाला देकर इस पत्र को केंद्रीय मंत्रालयों, केंद्रीय लोक सेवा आयोग और चुनाव आयोग को भेजा गया है. 15 जनवरी 2018 को मनोहर लाल माहौर की जनहित याचिका पर बेंच ने अपना फैसला सुनाया था.
बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि केंद्र और राज्य सरकार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंध रखने वाले लोगों के लिए दलित शब्द के प्रयोग से बचना चाहिए क्योंकि यह भारत के संविधान में उल्लिखित नहीं है.
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने यह भी तर्क दिया है कि 10 फरवरी 1982 को गृह मंत्रालय ने राज्य को एक आदेश देते हुए यह बताया था कि जिस विभाग के पास अनुसूचित जाती का प्रमाण पत्र जारी करने का काम है, वह इसमें हरिजन शब्द को नहीं डालेगा बल्कि केवल उस जाति का उल्लेख करेगा जिसे राष्ट्रपति के आदेश के तहत अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता दी गई है. इसके बाद 18 अगस्त 1990 को कल्याण मंत्रालय (अब सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय) ने राज्य सरकारों से अनुसूचित जाति और इसके अनुवाद को इस्तेमाल करने का अनुरोध किया था.
इस पूरे मामले पर फ़र्स्टपोस्ट से बात करते हुए प्रसिद्ध दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कहा कि दलित शब्द सरकार में एक प्रकार का डर पैदा करता है. लोग अपने आप को अनुसूचित जाति से नहीं बल्कि चमार और दलित से बुलाना चाहते हैं. सरकार का तर्क है कि दलित शब्द संविधान में नहीं है जो भ्रामक है. दलित शब्द गतल नीतियों के खिलाफ विद्रोह का प्रतीक है. सरकार इसे मिटाकर शोषित वर्ग के गुस्से को दबाने का प्रयास कर रही है.

https://hindi.firstpost.com/india/centre-asks-states-to-avoid-nomenclature-dalit-for-scheduled-castes-in-official-communication-ta-101907.html

Wednesday, March 7, 2018

भीड़ की घटनाओं से आहत एक नागरिक का देश की जनता के नाम खुला पत्र

सेवा में, 
भारत की जनता 
विषयः- देश भर में भीड़ की आड़ में हत्याओं के विरूद्ध एकजुट हो। 
प्रिय देशवासियों, 
मैं खुला पत्र प्रधान मंत्री के नाम लिखना चाहता था कि देश में बढ़ रही नफरती हिंसा के भेड़ियों पर व त्वरित कार्यवाही करें लेकिन प्यारे देशवासियों आपके नाम लिख रहा हूँ मैं प्रधान मंत्री को लिखना चाहता था कि भीड़ की आड में या भीड़ बनकर जो लोग देश भर में अल्पसंख्यकों की हत्या कर रहे हैं। कहीं बीफ के शक में कहीं गोवंश का व्यापार करते हुए, इतना ही नहीं ट्रेन में कहीं भी अल्पसंख्यकों को दलितों को पीट पीटकर मार दे रहे हैं। और मोदी जी जो देश के प्रधान मंत्री हैं सिर्फ इतना बोलते हैं कि गोरक्षा के नाम पर किसी इंसान की जान लेने का हक नहीं है उन्होंने तीन सवाल जनता के समक्ष उठाये हैं जिनके जवाब पिछले तीन वर्षों से हम और आप सब स्वयं जानना चाहते होंगे कि नफरत क्यों बढ़ी है। उन्होंने कहा कि मरीज के न बचने पर डाक्टर से मार पीट अस्पताल में तोड़ फोड़ हो रही है इससे उन्हें पीड़ा होती है, दो वाहन टकरा जाने पर मौत हो जाये तो वाहन जला देते हैं इससे उन्हें पीड़ा होती है। गोरक्षा के नाम पर हमें किसी इंसान को मारने का हक मिल जाता है क्या? क्या यह गो भक्ति है? क्या यह गोरक्षा है? यह गांधी जी, विनोबा जी का रास्ता नहीं हो सकता अहिंसा हम लोगों का जीवन धर्म रहा है हम कैसे आपा खो रहे हैं उपरोक्त शब्द किसी संत के नहीं देश के प्रधानमंत्री के हैं जिसके हाथ में पूरी कार्यपालिका की शक्ति है। साल भर पहले भी उन्होंने कहा था कि कुछ लोग गोरक्षा के नाम पर देश का सामाजिक ताना बना तहश नहश करना चाहते हैं लेकिन देश का सामाजिक ताना बाना तहश नहश करने वालों के खिलाफ और भीड़ की आड़ में नफरती साम्प्रदायिक हिंसक गिरोहों के खिलाफ त्वरित कार्यवाही करने के निर्देश सक्षम प्रशासन और गृह मंत्री को नहीं देते। इतना ही नहीं गृह मंत्री तो महीनों से इस मामले पर चुप्पी मारे बैठे हैं। प्रधान मंत्री श्री मोदी जी ने नफरती हिंसा के खात्मे के लिये कठोर कार्यवाही तो दूर चेतावनी भी नहीं दे सके है। चूंकि उन्होंने नफरती हिंसा से निपटने के लिये गेंद आप सबके पाले में डाल दी है इसलिये अब हम आप सबकी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि देश में फैलायी गयी साम्प्रदायिक नफरती हिंसा का प्रतिवाद करें विरोध करें, जहां कहीं नफरती हिंसा के लक्षण दिखे उसका प्रतिरोध दुर्घटना होने से पहले करें, क्योंकि हम सब जब इकट्ठे होते हैं तो एक भीड़ होते हैं और हमारा मानना है कि भीड़ कभी न तो हिंसक होती है और न हत्यारी होती है। 
भीड़ हत्यारी होती तो देश में मेले न लगते 
भीड़ हत्यारी होती तो मदारी खेल न दिखाते 
भीड़ हत्यारी होती तो बाजारे न लगती 
भीड़ हत्यारी होती तो स्टेशन बस अड्डे बन्द हो जाते 
भीड़ हत्यारी होती तो शादी बारात में लोग इकट्ठे न होते 
भीड़ हत्यारी होती तो आप स्कूल, अस्पताल न जाते 
भीड़ हत्यारी नहीं होती न ही देश हत्यारा होता है 
हत्यारी होती है नफरत 
हत्यारा है साम्प्रदायिक नफरती प्रचार 
हत्यारा है नफरत का विचार 
इसलिए भीड़ में खड़ा होकर यदि कोई भेड़िया कहे 
मारो इसको मारो उसको 
तो उसके उकसाने पर मत मारना किसी को 
उठाना मशाल उस भेड़िये के खिलाफ 
जो हिंसा के लिये लेता है तुम्हारी ओट। 
आपका 
मुश्ताक अली 
अन्सारी अध्यक्ष सदभावना युवा जन ग्रामीण विकास संस्थान 
लखीमपुर-खीरी

Kumar का खुला पत्र

यदि बाबा साहब भीम राव आंबेडकर होते तो कभी नहीं कहते कि मेरी 
भक्ति करो । मुझे हीरो की तरह पूजो । वो साफ साफ कहते कि भक्ति से आत्मा की मुक्ति हो सकती है मगर राजनीति में भक्ति से तानाशाही पैदा होती है और राजनीति का पतन होता है । बाबा साहब कभी व्यक्तिपूजा का समर्थन नहीं करते । ये और बात है कि उनकी भी व्यक्तिपूजा और नायक वंदना होने लगी है ।
यदि बाबा साहब भीम राव आंबेडकर होते तो कभी नहीं कहते कि धर्म या धर्म ग्रंथ की सत्ता राज्य या राजनीति पर थोपी जाए । उन्होंने तो कहा था कि ग्रंथों की सत्ता समाप्त होगी तभी आधुनिक भारत का निर्माण हो सकेगा ।
यदि बाबा साहब भीम राव आंबेडकर होते तो कभी नहीं कहते कि तार्किकता पर भावुकता हावी हो । वे बुद्धिजीवी वर्ग से भी उम्मीद करते थे कि भावुकता और ख़ुमारी से परे होकर समाज को दिशा दें क्योंकि समाज को बुद्धिजीवियों के छोटे से समूह से ही मिलती है ।
यदि बाबा साहब भीम राव आंबेडकर होते तो कभी नहीं कहते कि देश छोड़ कर मत जाओ । जरूर कहते कि नए अवसरों की तलाश ही एक नागरिक का आर्थिक कर्तव्य है । इसलिए कोलंबिया जाओ और कैलिफ़ोर्निया जाओ ।उन्होंने कहा भी है कि इतिहास गवाह है कि जब भी नैतिकता और आर्थिकता में टकराव होती है, आर्थिकता जीत जाती है । जो देश छोड़ कर एन आर आई राष्ट्रवादी बने घूम रहे हैं वो इसके सबसे बडे प्रमाण हैं । उन्होंने देश के प्रति कोरी नैतिकता और भावुकता का त्याग कर पलायन किया और अपना भला किया ।
यदि बाबा साहब भीम राव आंबेडकर होते तो कभी नहीं कहते कि पत्नी को परिवार संभालना चाहिए । क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए । बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि पति पत्नी के बीच एक दोस्त के जैसा संबंध होना चाहिए ।
यदि बाबा साहब भीम राव आंबेडकर होते तो कभी नहीं कहते कि हिन्दू राष्ट्र होना चाहिए । भारत हिन्दुओं का है । जो हिन्दू हित की बात करेगा वही देश पर राज करेगा । वे जरूर ऐसे नारों के ख़िलाफ़ बोलते । खुलकर बोलते ।

Ravish-kumar1
Read Also : शायद फिर से मज़ा आने लगे- Ravish
यदि बाबा साहब भीम राव आंबेडकर होते तो कभी नहीं कहते कि किस विरोधी का बहिष्कार करो । जैसा कि कुछ अज्ञानी उत्साही जमात ने आमिर खान के संदर्भ में उनकी फ़िल्मों और स्नैपडील के बहिष्कार का एलान कर किया है । डाक्टर आंबेडकर आँख मिलाकर बोल देते कि यही छुआछूत है । यही बहुसंख्यक होने का अहंकार या बहुसंख्यक बनने का स्वभाव है ।
यदि बाबा साहब भीम राव आंबेडकर होते तो जैसे ही यह कहते कि धर्म और धर्मग्रंथों की सर्वोच्चता समाप्त होनी चाहिए । हिन्दुत्व में किसी का व्यक्तिगत विकास हो ही नहीं सकता । इसमें समानता की संभावना ही नहीं है । बाबा साहब ने हिंदुत्व का इस्तमाल नहीं किया है । अंग्रेजी के हिन्दुइज्म का किया है । उन्होंने संविधान की प्रस्तावना में सेकुलर नहीं लिखा तो हिन्दुत्व भी नहीं लिखा । बाबा साहब ने हिन्दू धर्म का त्याग कर दिया लेकिन समाज में कभी धर्म की भूमिका को नकारा नहीं । आश्चर्य है कि संसद में उनकी इतनी चर्चा हुई मगर धर्म को लेकर उनके विचारों पर कुछ नहीं कहा गया । शायद वक़्ता डर गए होंगे ।
गृहमंत्री जी, आप भी जानते हैं कि आज बाबा साहब आंबेडकर होते और हिन्दू धर्म की खुली आलोचना करते तो उनके साथ क्या होता । लोग लाठी लेकर उनके घर पर हमला कर देते । ट्वीटर पर उन्हें सिकुलर कहा जाता । नेता कहते कि डाक्टर आंबेडकर को आस्था का ख़्याल करना चाहिए था । ट्वीटर पर हैशटैग चलता avoid Ambedkar । बाबा साहब तो देश छोड़ कर नहीं जाते मगर उन्हें पाकिस्तान भेजने वाले बहुत आ जाते । आप भी जानते हैं वो कौन लोग हैं जो पाकिस्तान भेजने की ट्रैवल एजेंसी चलाते हैं ! न्यूज चैनलों पर एंकर उन्हें देशद्रोही बता रहे होते ।
क्या यह अच्छा नहीं है कि आज बाबा साहब भीमराव आंबेडकर नहीं हैं । उनके नहीं होने से ही तो किसी भी आस्था की औकात संविधान से ज्यादा की हो जाती है । किसी भी धर्म से जुड़ा संगठन धर्म के आधार पर देशभक्ति का प्रमाण पत्र बाँटने लगते हैं । व्यक्तिपूजा हो रही है । भीड़ देखकर प्रशासन संविधान भूल जाता है और धर्म और जाति की आलोचना पर कोई किसी को गोली मार देता है ।
पर आपके बयान से एक नई संभावना पैदा हुई है । बाबा आदम के ज़माने से निबंध लेखन का एक सनातन विषय रहा है । यदि मैं प्रधानमंत्री होता । आपके भाषण से ही आइडिया आया कि छात्रों से नए निबंध लिखने को कहा जाए । यदि मैं डाक्टर आंबेडकर होता या यदि बाबा साहब भीम राव आंबेडकर होते ।
आशा है कि आप मेरे पत्र को पढ़कर आंबेडकर भाव से स्वागत करेंगे । मुस्कुरायेंगे। आंबेडकर भाव वो भाव है जो भावुकता की जगह तार्किकता को प्रमुख मानता है ।
आपका
रवीश कुमार
(एनडीटीवी से जुड़े चर्चित पत्रकार Ravish Kumar के ब्लॉग से साभार)
http://www.indiatrendingnow.com/speak-out/an-open-letter-to-rajnath-singh-from-ravish-kumar-1115/2/

Advertiseme