Wednesday, April 4, 2018

एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद


नई दिल्ली.एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलितों का सोमवार को भारत बंद का असर देश के 12 राज्यों में देखा गया। इनमें से उन राज्यों में सबसे ज्यादा हिंसा और प्रदर्शन देखने को मिला, जहां इस साल के आखिर में चुनाव होने हैं। इनमें मध्यप्रदेश और राजस्थान शामिल हैं। इनके अलावा पंजाब, बिहार और उत्तर प्रदेश में हिंसक झड़प हुईं। मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा 7, यूपी और बिहार में तीन-तीन, वहीं राजस्थान में एक की मौत हो गई। उधर, पंजाब में बंद के चलते सीबीएसई की परीक्षाएं टाल दी गई हैं। इस मुद्दे पर राजनीति भी शुरू हो गई है। इसकी खास वजह है। दरअसल, जिन राज्यों में उग्र प्रदर्शन हुए वहां की 71 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जिन पर एससी/एसटी वोटर असर डालते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
-सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 के दुरुपयोग को रोकने को लेकर गाइडलाइन जारी की थीं। यह सुनवाई महाराष्ट्र के एक मामले में हुई थी। ये गाइडलाइंस फौरन लागू हो गई थीं।
- सरकारी कर्मी के लिए: तुरंत गिरफ्तारी नहीं। सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत से होगी।
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आम लोगों के लिए: एक्ट के तहत आरोपी सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, तो उनकी गिरफ्तारी एसएसपी की इजाजत से होगी।
- अदालतों के लिए: अग्रिम जमानत पर मजिस्ट्रेट विचार करेंगे और अपने विवेक से जमानत मंजूर या नामंजूर करेंगे।
- एनसीआरबी 2016 की रिपोर्ट बताती है कि देशभर में जातिसूचक गाली-गलौच के 11,060 शिकायतें दर्ज हुईं। जांच में 935 झूठी पाई गईं।
दलित संगठनों की क्या मांग है?
- संगठनों की मांग है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील करे। जो नियम पहले थे, वे यथावत लागू हों।
सरकार ने क्या किया?
-सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एससी/एसटी एक्ट के फैसले पर फिर से विचार करने के लिए एक याचिका दायर की। कोर्ट ने सोमवार को फौरन सुनवाई से मना कर दिया।
13 दिन में आंदोलन के साथ आ गए सियासी दल
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देश में एससी/एसटी की आबादी 20 करोड़ और लोकसभा में इस वर्ग से 131 सांसद (एससी के 84 और एसटी के 47) हैं।
- इस बड़े वर्ग से जुड़े इस मामले से हर दल के हित हैं। इसी वजह से कांग्रेस समेत बड़े विपक्षी दलों ने उसके आंदोलन को समर्थन दिया। भाजपा के सबसे ज्यादा 67 सांसद इसी वर्ग से हैं।
सबसे ज्यादा असर एमपी-राजस्थानऔर छत्तीसगढ़में,क्योंकि इस साल यहां चुनाव होने हैं...
1) मध्यप्रदेश के भिंंड, मुरैना ग्वालियर में ज्यादा हिंसा
-राज्य के करीब 14 से ज्यादा जिलों में विरोध-प्रदर्शन देखा गया। ग्वालियर, भिंड और मुरैना में भारी हिंसा हुई। ग्वालियर में हिंसा के दौरान तीन लोग मारे गए। टोल प्लाजा में तोड़फोड़ की गई। कई जगह सड़क पर वाहन जलाए गए। पांच थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा दिया। वॉटसऐप पर गलत खबरें और अफवाहें ना फैलें इसके लिए इंटरनेट बंद कर दिया गया। प्रदेश के इंदौर, सिवनी, रतलाम, उज्जैन, झाबुआ और जबलपुर में बंद का मिला-जुला असर रहा।
- ग्वालियर में 2, भिण्ड में 2, डबरा में 1और मुरैना में 1की मौत हुई।
क्यों हैं एससी/एसटी अहम? 
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राज्य में साल के आखिर में चुनाव हैं। विधानसभा की कुल 230 सीटों में से एसटी के लिए 47 और एससी की 35 सीट रिजर्व हैं।
2) राजस्थान के अलवर में एक की मौत, महिलाएं भी सड़कों पर उतरीं
- अलवर जिले के खैरथल इलाके हुई हिंसा में एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गई। बाड़मेर में दलित संगठनों और करणी सेना के बीच झड़प हो गई, जिसमें 25 लोग जख्मी हो गए। भरतपुर में महिलाएं हाथों में लाठियां लेकर सड़कों पर प्रदर्शन करती दिखीं।
- अलवर में एक मकान में आग लगाने की कोशिश की गई। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की गाड़ी में आग लगा दी। पुष्कर में कई वाहनों में तोड़फोड़ की गई।
क्यों एससी/एसटी अहम?
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राज्य में इस साल चुनाव हैं। विधानसभा की 200 सीट में से एससी कोटे की 33 और एसटी की 25 सीटें हैं। पिछले तीन चुनावों में टिकट बंटवारे से लेकर सरकार गठन तक एससी-एसटी और जाटों का ही बोलबाला रहा है। कांग्रेस और भाजपा ने 95 से ज्यादा सीटों पर इन्हीं समुदाय के कैंडिडेट्स मैदान में उतारे। बाकी आधी सीटों का राजपूत, ब्राह्मण, मुस्लिम, गुर्जर और दूसरी जातियों को अहमियत दी गई है।
3) छत्तीसगढ़ में आधी सीटें एससी/एसटी असर वाली
-प्रदेश में रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग और भिलाई समेत राज्य में बंद का व्यापक असर देखने को मिला। मेडिकल स्टोर को छोड़कर करीब-करीब सभी बाजार बंद नजर आए। हालांकि, राज्य से हिंसा की कोई खबर नहीं मिली।
- कई जिलों में प्रदर्शनकारियों ने जबरन बाजार बंद कराए।
क्यों हैं एससी/एसटी अहम?
-छतीसगढ़ में कुल 90 सीटें हैं। इनमें से एससी के लिए 10 और एसटी के लिए 29 सीटें रिजर्व हैं। अगर देखा जाए तो करीब आधी सीटों पर एससी/एसटी का असर है।
बाकी 7 राज्यों में क्या रहे हालात?
4) पंजाब: सदा-ए-सरहद बस रोकी, 10वी-12वीं की परीक्षाएंटालीं
- सभी स्कूल-कॉलेज, यूनिवर्सिटी और बैंक बंद रहे। सीबीएसई की 10वी-12वीं की परीक्षाएं टाली गईं। रात 11 बजे तक बसें और इंटरनेट बंद रहने के आदेश दिए गए। सुरक्षा बलों के 12 हजार अतिरिक्त जवानों को फील्ड में उतारा गया।
- दिल्ली और लाहौर के बीच चलने वाली सदा-ए-सरहद बस सेवा भी बाधित हुई। पाकिस्तान जाने वाली बस को पहले पंजाब के सरहिंद में रोका गया। बाद में इसे पटियाला-संगरूर के रास्ते लाहौर रवाना किया। वहीं, दिल्ली आने वाली बसों को अमृतसर में रोक दिया गया।
5) बिहार: एंबुलेंसफंसने से एक बच्चे की मौत
-मधुबनी, आरा, भागलपुर और अररिया में ट्रेनें रोकी गईं। मोतिहारी में तोड़फोड़ की गई।
- वैशाली में प्रदर्शनकारियों ने एक एंबुलेंस को रोक लिया। मां गुहार लगाती रही, लेकिन जाम में फंसे रहने के चलते एक नवजात की मौत हो गई।
6) उत्तर प्रदेश: दोकी मौत, 3 जख्मी
- यूपी के मुजफ्फरनगर में एक शख्स की मौत हो गई। वहीं, तीन जख्मी हो गए। मेरठ, गोरखपुर, सहारनपुर, हापुड़, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, मथुरा और आगरा समेत कई जिलों में प्रदर्शनकारियों ने जमकर उत्पात मचाया।
- मथुरा, हापुड़ और मेरठ में प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ करने के साथ वाहनों और पुलिस थाने में आग लगाई। आग बुझाने पहुंची दमकल की टीम पर पथराव हुआ।
- बिजनौर में एक बीमार व्यक्ति की रैली के दौरान फंसने से मौत गई।
7) झारखंड:जबरन बाजार बंद कराए,ट्रेनें रोकी गईं
-सड़कों पर जाम लगाया गया। कई जगहें ट्रेनें रोकी गईं। प्रदर्शनकारियों ने जबरन बाजार बंद कराए। रांची में पुलिस पर पथराव हुआ। जमशेदपुर में एक ट्रक में आग लगा दी गई।
8) गुजरात:अहमदाबाद में बसों पर पथराव, राजकोट में भी तोड़फोड़
- अहमदाबाद में बस सर्विस को बंद करना पड़ा। कई जगह पथराव किया गया। आंदोलनकारियों ने पाटन, हिम्मतनगर, थराद, नवसारी, भरूच, जूनागढ़, धानेरा, भावनगर, जामनगर, अमरेली, तापी, साणंद के अलावा राज्य के और भी इलाकों में रैलियां निकाली गईं। 
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कच्छ जिले के गांधीधाम शहर में सरकारी वाहन पर पथराव किया गया। जूनागढ़, राजकोट, राजुला, चोटिला के अलावा दूसरे इलाकों से भी आगजनी और पथराव की खबरें आईं। 
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सौराष्ट्र, कच्छ और राजकोट में भी आगजनी-तोड़फोड़ की गई।
9) हरियाणा:पुलिस ने की फायरिंग, पथराव में 50 पुलिसकर्मी जख्मी
- नेशनल हाइवे -1 बंद कर दिया गया। कैथल में प्रदर्शनकारी रोडवेज डिपो में घुस गए। यहां टिकट काउंटरों पर तोड़फोड़ की गई। एक ट्रेन इंजन पर पथराव किया गया। पुलिस ने भीड़ को खदेड़ने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े। यहां पुलिस-प्रदर्शनकारियों में झड़प। पुलिस फायरिंग में 10 लोग घायल हुए। पथराव में 50 पुलिसकर्मी जख्मी हुए।
10. ओडिशा: प्रदर्शनकारियों ने ट्रेनें रोकीं।
राहुल गांधी ने कहा-दलितों को सलाम, संघ का पटलवार
- राहुल ने ट्वीट में कहा- "दलितों को भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर रखना RSS/BJP के DNA में है। जो इस सोच को चुनौती देता है उसे वे हिंसा से दबाते हैं। हजारों दलित भाई-बहन आज सड़कों पर उतरकर मोदी सरकार से अपने अधिकारों की रक्षा की मांग कर रहे हैं। हम उनको सलाम करते हैं।"
- उधर, संघ ने पटलवार करते हुए कहा कि कुछ लोग आरएसएस के खिलाफ जहरीला कैम्पेन चला रहे हैं। कानून में बदलाव के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संघ से कोई लेना देना नहीं है।


ग्राम प्रधान के विरुद्ध उक्त पद पर रहते हुए (आवेदन की तिथि तक) कितनी शिकायतें प्राप्त हुई एवं उन पर हुई कार्यवाही का विस्तृत ब्यौरा प्रदान करे, उनके कार्यकाल के दौरान उनपर हुए अनुशासनात्मक जांच की जानकारी भी प्रदान करे | (प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराये)
6. ग्राम प्रधान के उक्त कार्यकाल के दौरान उन्हें कभी अभ्यारोपित किया गया, अगर किया गया है तो उसकी विस्तृत जानकारी दे | (प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराये)



केन्द्रीय सतर्कता आयोग द्वारा दिनांक ..............से .................... के बीच प्राप्त की गई शिकायतों का संक्षिप्त विवरण, क्या शिकायत गुमनाम थी, शिकायत की तिथि, उस अधिकारियों या प्राधिकरण का पूरा विवरण (नाम, पद तथा संपर्क का पता आदि) जिसके खिलाफ शिकायत की गई है।
2. उपयुर्क्त में से कौन सी शिकायतें तुरन्त ख़ारिज़ कर दी गई तथा कौन सी आगे की जांच के लिए स्वीकार की गईं। केस के अनुसार शुरूआती जाँच की तिथि या ख़ारिज करने का संक्षिप्त कारण का विवरण भी दें।
3. आगे की जांच के लिए स्वीकार की गई शिकायतों में से कितने मामलों में जांच बन्द हो चुकी है? प्रत्येक के बन्द होने का संक्षिप्त विवरण दें।
4. विभिन्न कानून, नियम, निर्देश, प्रकिया, मैन्युअल आदि के अनुसार केन्द्रीय सतर्कता आयोग में शिकायत दर्ज कराने के बाद कितने समय बाद जांच पूरी हो जाती है। कृपया ऐसे दिशानिर्देशों की प्रति उपलब्ध् कराएं, जिसमें शिकायत प्राप्ति से लेकर उस पर कार्रवाई और दण्डारोपण तक के विभिन्न चरणों के लिए समय सीमा का वर्णन हो।
5. दिनांक.............से अब तक आयोग को कुल कितनी शिकायतें प्राप्त हुई हैं? उनमें से कितनी तत्काल ख़ारिज कर दी गई तथा कौन-कौन सी आगे की जांच के लिए रखी गई? जांच के लिए रखी गई शिकायतों में से कितनी शिकायतों की छानबीन में उपरोक्त समय सीमा का पालन किया गया?

आरटीआई एक्ट का उलंघन

आरटीआई एक्ट का उलंघन : भृष्ट अफसरों के बारे में सूचना न देने पर हाई कोर्ट ने दिया सरकार को नोटिस...

रोहतक । भ्रष्टाचार में संलिप्त हरियाणा काडर के आई.ए.एस., आई.पी.एस., एच.सी.एस. एवं एच.पी.एस अधिकारियों के बारे में हरियाणा सूचना अधिकार मंच के राज्य संयोजक को सूचना न देने पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के जज जसवन्त सिंह ने हरियाणा सरकार व राज्य सूचना आयोग को नोटिस जारी किया है। 
ज्ञातव्य है कि हरियाणा सूचना अधिकार मंच के राज्य संयोजक एवं आर.टी.आई. कार्यकर्ता सुभाष द्वारा मु य सचिव कार्यालय से 1 जनवरी, 2000 से 31 अक्तूबर, 2013 तक हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों कार्यरत एवं सेवानिवृत्त हुए आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई,आर एस, एच.सी.एस. एवं एच.पी.एस अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों, भ्रष्टाचार के दर्ज मामले के स बन्ध में जानकारी मांगी थी। मु य सचिव कार्यालय के राज्य जन सूचना अधिकारी ने यह जानकारी देने से मना करते हुए कहा है कि यह नियोक्ता और नियुक्ति प्राप्त करने वाले के बीच का मामला है। साथ ही यह जानकारी व्यापक जनहित में नहीं है इसलिए यह जानकारी आवेदक को नहीं दी जा सकती है। इसके साथ ही इससे किसी भी तरह के मामले में लिप्त अधिकारी के मनोबल पर असर पड़ेगा। आर.टी.आई. कार्यकर्ता सुभाष का कहना है मु य सचिव कार्यालय के राज्य जन सूचना अधिकारी के जवाब से तो यही साबित होता है कि जो अधिकारी भ्रष्टाचार या किसी भी प्रकार के मामले में लिप्त हैं यदि उनकी जानकारी सार्वजनिक हो जाएगी तो उनका भ्रष्टाचार करने का हौंसला टूट जाएगा। यानि यह तो एक तरह से उन्हें संरक्षण देने का मामला है। मु य सचिव कार्यालय के अपील अधिकारी ने भी अपने राज्य जन सूचना अधिकारी से सहमत होते हुए जानकारी ना देने पर अपनी मुहर लगा दी थी। मामला आयोग में गया। मु य सूचना आयुक्त नरेश गुलाटी ने भी अपने फैसले में मु य सचिव कार्यालय के जन सूचना अधिकारी एवं प्रथम अपील अधिकारी के रूख से सहमति जताते हुए जन सूचना अधिकारी के पक्ष में फैसला दिया था।
आर.टी.आई. कार्यकर्ता सुभाष ने अपने वकील प्रदीप रापडिय़ा के माध्यम से हरियाणा एवं पंजाब हाई कोर्ट में याचिका दायर करते हुए कहा कि सभी सरकारी अधिकारी जनता के नौकर हैं और जनता को ये जानने का पूरा हक है कि कौन अधिकारी भ्रष्टाचार में संलिप्त है और उनके खिलाफ सरकार ने क्या कार्यवाही की है। ऐसी सूचना व्यक्तिगत नहीं हो सकती। याचिका में यह ाी कहा गया है कि जब किसी आम आदमी के खिलाफ मुकदमा दर्ज होता है तो मीडिया और अन्य लोग खुलकर मुकदमे के बारे में बोल सकते हैं, लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों के बारे में सूचना देने से मना करके ऐसे अधिकारियों के मीडिया व अन्य लोगों का मुंह बन्द कर दिया गया है। ऐसे में एक आम आदमी व भ्रष्ट अधिकारी के बीच भेदभाव किया जा रहा है। हाई कोर्ट ने मामले का संज्ञान लेते हुए सरकार को 15 जनवरी 2015 तक जवाब देने को कहा है।
क्या मांगी थी जानकारी -
1 जनवरी, 2000 से 31 अक्तूबर, 2013 तक हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों कार्यरत एवं सेवानिवृत्त हुए आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई,आर एस, एच.सी.एस. एवं एच.पी.एस कैडर के कितने अधिकारियों के खिलाफ मामले (किसी भी प्रकार के ) दर्ज हुए हैं ऐसे सभी अधिकारियों के नाम एवं पद नाम दिये?
2. ऐसे अधिकारियों के खिलाफ राज्य सरकार ने क्या कार्यवाही की अवगत करवाया जाए?
3. उपरोक्त अवधि में कितने ऐसे मामले हैं जिनमें कार्यवाही अभी भी लंबित हैं? लंबित होने का कारण बताया जाए।
4. राज्य सरकार के नियमावली के अनुसार किसी अधिकारी/कर्मचारी के खिलाफ केस दर्ज होने के बाद उसके कौन-कौन से लाभ रोके जा सकते हैं? विवरण दिया जाए।
5. उपरोक्त अवधि में कितने अधिकारी ऐसे हैं जिनका लाभ रोके गए हैं, उन सभी का विवरण दिया जाए।
6. केस दर्ज होने के बावजूद ऐसे कितने अधिकारी हैं (सभी के नाम एवं पद) जिन्हें सभी प्रकार के लाभ दिए गए- यथा, सेवा बहाली, वेतनवृद्धि, तरक्की एवं सेवाविस्तार आदि लाभ दिये गये।
7. प्रश्र नं 6 से स बंधित ऐसे सभी अधिकारियों को केस दर्ज होने के बावजूद सेवालाभ आदि देने वाले आदेश एवं आदेश जारी करने वाले अधिकारियों के नाम एवं पदनाम दिये जाएं तथा ऐसे सभी आदेशों की प्रति प्रदान की जाए। है।



भोपाल। प्रदेश सरकार RTI के तहत किसी भी अधिकारी-कर्मचारी के भ्रष्टाचार या अनियमितता की जांच से जुड़े दस्तावेज ये कहकर देने से इंकार नहीं कर सकती कि वो व्यक्तिगत जानकारी का हिस्सा है। राज्य सूचना आयुक्त हीरालाल त्रिवेदी ने ये महत्वपूर्ण फैसला तीन आईएएस अफसरों के मामले में सूचना के अधिकार के तहत मांगे गए दस्तावेजों की अपील पर सुनवाई करते हुए दिया। उन्होंने सामान्य प्रशासन विभाग के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसके तहत जानकारी के लोकहित से जुड़े नहीं होने और तीसरे पक्ष से संबंधित बताकर दस्तावेज देने से इंकार किया जा सकता था।

ऐसे तो कोई जानकारी नहीं दी जा सकेगी 
सूचना आयुक्त हीरालाल त्रिवेदी ने आदेश में कहा कि भ्रष्टाचार और मानव अधिकार से जुड़े मुद्दे सरकारी अधिकारी-कर्मचारी के खिलाफ होते रहते हैं। हर प्रकरण में किसी न किसी का नाम जुड़ा होता है, यदि किसी का नाम आने मात्र से वह व्यक्तिगत जानकारी मान ली जाए, तो ऐसी कोई जानकारी नहीं बचेगी, जो दी जा सके। भ्रष्टाचार के मामले को व्यक्तिगत कहकर जानकारी नहीं देना सूचना का अधिकार कानून की मूलभावना के खिलाफ है।

वहीं, दुबे का कहना है कि आईएएस अधिकारियों से जुड़ा मामला होने की वजह से जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा रही थी। आयोग के फैसले के बाद अब जांच से जुड़े दस्तावेज देने ही पड़ेंगे। उन्होंने इसके लिए शुक्रवार को मुख्य सचिव और सचिव सामान्य प्रशासन 'कार्मिक" के यहां आवेदन लगाकर तीनों अधिकारियों की जांच से जुड़े दस्तावेज देने की मांग की है।

इन अफसरों की मांगी थी जानकारी
बीएम शर्मा- तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ, छिंदवाड़ा। मनरेगा के तहत खरीदी से जुड़े सभी दस्तावेज।
सुखबीर सिंह- तत्कालीन कलेक्टर सीधी। मनरेगा के तहत जेट्रोफा पौधारोपण में अनियमितता।
चंद्रशेखर बोरकर- तत्कालीन सीईओ सीधी। मनरेगा के तहत जेट्रोफा पौधा रोपण में अनियमितता।

ये था सामान्य प्रशासन विभाग का तर्क 
इस मामले में सामान्य प्रशासन विभाग ने ये कहते हुए जानकारी देने से इंकार कर दिया था कि इससे लोकहित का समाधान नहीं होता है। जानकारी तीसरे पक्ष से जुड़ी है। फैसले के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के गिरिश रामचंद्र देशपांडे विरुद्ध केंद्रीय सूचना आयुक्त में पारित आदेश को आधार बनाया गया। इसमें कहा गया कि दंड, जांच, अनुशासनात्मक कार्रवाई और शासकीय सेवक व नियोक्ता के बीच सेवा संबंधी मामले व्यक्तिगत सूचना की श्रेणी में आते हैं।

शिकायत और जांच व्यक्तिगत नहीं
आदेश में कहा गया कि सामग्री खरीदना, शासकीय काम करना, उसकी शिकायत और जांच सूचना का अधिकार की धारा 8 (1) में नहीं आता है। इससे जुड़े दस्तावेज किसी अधिकारी-कर्मचारी के व्यक्तिगत नहीं हैं। हाईकोर्ट जबलपुर ने भी सेवा पुस्तिका या व्यक्तिगत नस्ती को ही व्यक्तिगत रिकार्ड माना है। भ्रष्टाचार या अनियमितता जैसी चीज को व्यक्तिगत जानकारी का हिस्सा नहीं माना जा सकता है।
http://www.bhopalsamachar.com/2017/05/mprsa.html

बारात गांव के बीच से नहीं निकलेगी

UP: 'ऊंची जाति' के हिसाब से निकले दलित की बारात, पुलिस ने पेश किया नक्शा

लोगों और प्रशासन, दोनों का कहना है कि परंपरा बनाए रखने के लिए समुदाय विशेष को बारात नहीं निकालनी चाहिए

भारत बंद, दलितों के प्रदर्शन और SC-ST act से जुड़ी तमाम बातें चल रही हैं. इस बीच दलितों से जातीय भेदभाव का एक और मामला सामाने आया है. हाथरस के संजय कुमार की शादी कासगंज जिले के निजामपुर गांव में शीतल से है. गांववालों का कहना है कि बारात गांव के बीच से नहीं निकलेगी. बल्कि घर से 80 मीटर दूर तक जाएगी. पुलिस ने मामले में परंपरा का हवाला देते हुए बारात का नक्शा पेश किया है. इसमें बारात गांव के बीच से नहीं जाएगी.
संजय जाटव समुदाय से हैं और गांव में कथित ऊंची जाति के लोग नहीं चाहते हैं कि कोई कथित नीची जाति का युवक घोड़ी पर बैठ कर गांव के बीच से बारात निकाले. इसके विरोध में संजय ने कोर्ट में याचिका दायर की है. 20 अप्रैल को होने वाली इस शादी के लिए संजय ने प्रशासन से मदद मांगी. प्रशासन की तरफ से भी संजय को कुछ खास मदद मिलती नहीं दिख रही. जबकि संजय का कहना है कि वो भी भारत के नागरिक हैं और उन्हें ये हक है कि अपनी बारात अपने हिसाब से और घोड़ी पर चढ़कर निकालें. शादी से पहले ये मामला क्या मोड़ लेगा देखना बाकी है.
https://hindi.firstpost.com/india/dalit-in-kasganj-hathras-barat-route-not-allowed-by-high-cast-police-supports-higher-cast-am-101990.html

SC-ST Act मजबूत होना चाहिए

एससी एसटी एक्ट में ढील देना इसलिए ठीक नहीं है क्योंकि इस देश में अब भी दलित को घुड़सवारी करने पर उसे मौत के घाट उतार दिया जा रहा है

SC-ST Act: जिस देश में घोड़ा चढ़ने पर दलित की हत्या कर दी जाती हो वहां मजबूत एक्ट की बिल्कुल जरूरत है
कुछ बातें सुनने में बड़ी अच्छी लगती हैं. मसलन- सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट को खत्म थोड़े ही किया है, इस एक्ट का दुरुपयोग न हो इसलिए गिरफ्तारी से पहले जांच को जरूरी कर दिया है. इस एक्ट में फेरबदल वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कुछ और अच्छी-अच्छी बातें अचानक से होने लगी हैं. जैसे- आरक्षण जाति के आधार पर नहीं बल्कि आर्थिक आधार पर मिलना चाहिए, बिना जाति पूछे सरकार हर गरीब के बच्चे को आरक्षण दे, दिव्यांगों को आरक्षण का लाभ मिले, अनाथों के लिए आरक्षण होना चाहिए, देश के लिए शहीद होने वाले सैनिकों के बच्चों को आरक्षण मिलना चाहिए.
इन अच्छी बातों के केंद्र में बस एक ही बात है कि आरक्षण जाति के आधार पर नहीं मिलना चाहिए. बहस को इस तर्क के आधार पर धार देने की कोशिश की जाती है कि अब कहां होते हैं दलितों पर अत्याचार, पहले कभी हुआ करता था ये सब, आजादी के इतने सालों बाद अब तो जातिगत आधार पर भेदभाव नहीं होते. इसलिए एससी-एसटी एक्ट पर दिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर इतना बवाल करने की जरूरत नहीं है. उलटे बहस तो इस बात पर होनी चाहिए कि क्यों न आरक्षण आर्थिक आधार पर दिया जाए.
एक बार को लगता है कि अगर आरक्षण जाति के आधार पर न होकर आर्थिक आधार पर दिया जाए तो इसमें बुराई क्या है. लेकिन यहां सवाल ये उठता है कि क्या दलितों और पिछड़ों को आरक्षण सिर्फ उनकी आर्थिक हैसियत दुरुस्त करने के लिए दिया गया था? और अगर ऐसा है भी तो क्या अब उनकी आर्थिक स्थिति दुरुस्त करने की नौबत खत्म हो चुकी है. एक बात समझने वाली है कि आरक्षण को सिर्फ आर्थिक नजरिए से देखकर इसे खत्म करने की बात करना नाइंसाफी होगी. ये सिर्फ आर्थिक स्थिति से जुड़ा मसला नहीं है. आरक्षण सिर्फ आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक और राजनैतिक रूप से पिछड़े होने की वजह से भी दिया गया है. वो चाहे सुप्रीम कोर्ट का दलित एक्ट में फेरबदल का फैसला हो या फिर आरक्षण में बदलाव को लेकर जनमानस की बहस, इस पर गहराई से विचार करने की जरूरत है.
ज्यादा पुरानी बात नहीं है. पिछले हफ्ते की दो घटनाएं काफी हैं दलितों के प्रति हमारे समाज के क्रूर रवैये को दिखाने और समझाने के लिए. गुजरात के भावनगर में एक दलित युवक की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि उसने ऊंची जाति के लोगों के सामने घोड़े पर चढ़ने का कसूर किया था. 21 साल के प्रदीप राठौर ने कुछ महीने पहले ही एक घोड़ा खरीदा था. पिता कह रहे थे कि बेटा बाइक खरीद ले लेकिन घुड़सवारी के शौक के चलते उसने बाइक के बजाए घोड़ा खरीद लिया. भावनगर के उमराला तहसील के उसके गांव टिंबी के ऊंची जाति के लोगों को ये पसंद नहीं आया.
dalit-4
मृतक दलित युवक प्रदीप राठौर
पहले एकाध बार धमकाया कि दलितों को ये हक नहीं कि वो घोड़े की सवारी करें. एक बार इलाके के एक दबंग ने घोड़ा चढ़ने पर जान से मारने की धमकी भी दी. इसके बाद भी प्रदीप ने अपनी घुड़सवारी जारी रखी तो उसकी हत्या कर दी गई. सोचिए कि इक्कीसवीं सदी के इस दौर में जब हम सबकी बराबरी की बात कर रहे हैं, वहां गुजरात जैसे तथाकथित विकसित राज्य में एक दलित की घोड़ा चढ़ने के जुर्म में हत्या कर दी जाती है. उत्तरी गुजरात के बनासकांठा और साबरकांठा में शादी विवाह में भी दलितों के घोड़ी चढ़ने पर ऊंची जाति के लोग आपत्ति जताते हैं. यहां दलितों के लिए घुड़सवारी करना अपराध है.
हम किस मुंह से बराबरी की बात करते हैं. समाज की सोच कहां बदली है कि सामाजिक हैसियत की बराबरी के मद्देनजर आरक्षण जैसी व्यवस्था में बदलाव की वकालत करें. इस मामले में भी एससी-एसटी एक्ट के तहत ही मामला दर्ज किया गया. अगर कानून के दुरुपयोग के मामले को ही समझना हो तो हम इसी मामले से इसे क्यों न समझें? ऊंची जाति के जिन लोगों ने घोड़ा चढ़ने की वजह से एक युवक की हत्या कर दी वो अपनी हैसियत और रुतबा बचाने के लिए कानून का किस स्तर और किस हद तक जाकर दुरुपयोग कर सकते हैं, इसे बताने की जरूरत भी नहीं है.
यूपी का एक मामला है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले का एक दलित युवक पिछले कई महीनों से पुलिस प्रशासन से लेकर नेता मंत्री तक से गुहार लगा चुका है. हाथरस के बसई बबास गांव के 27 साल के संजय कुमार की मांग बस इतनी सी है कि उसे अपनी शादी में बारात निकालने की अनुमति दी जाए. कहने को संविधान ने उसे भी वो सब अधिकार दे रखे हैं, जो इस देश के सभी नागरिकों को हासिल हैं. लेकिन असलियत ये है कि संजय सिर्फ दलित होने की वजह अपनी दुल्हन के घर बारात लेकर नहीं जा सकता.
Dalit
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक संजय की शादी नजदीक के कासगंज जिले के निजामाबाद में तय हुई है. जिस रास्ते से शादी की बारात गुजरनी है, वो ठाकुरों के मोहल्ले से होकर जाता है. और इलाके के ठाकुरों को ये मंजूर नहीं है कि दलितों की इतनी हैसियत हो कि वो अपनी बारात निकाल सकें. संजय हर सरकारी अधिकारी के सामने जाकर गिड़गिड़ाया. एसपी-डीएसपी से लेकर उसने सीएम और एससी-एसटी कमिशन तक को लिखा है. मीडिया से लेकर वो इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण में गया है. सबसे वो एक ही सवाल करता है- ‘क्या वो हिंदू नहीं है. जब संविधान कहता है कि देश के सभी नागरिक बराबर हैं. जब राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि हम सब हिंदू हैं तो फिर उसे ऐसी स्थिति का सामना क्यों करना पड़ रहा है.’
संजय बराबरी की ही बात कर रहा है. वो चाहता है कि जैसे दूसरी आम शादियों में घोड़ी पर सवार दूल्हे के साथ गाजे-बाजे के साथ बारात निकलती है और किसी को कोई दिक्कत नहीं होती. वैसी ही उसके बारात के साथ भी हो. लेकिन उसे डर है कि बराबरी की मांग की कीमत कहीं जान देकर न चुकानी पड़ी.
एससी एसटी एक्ट में ढील देना इसलिए ठीक नहीं है क्योंकि इस देश में अब भी दलित को घुड़सवारी करने पर उसे मौत के घाट उतार दिया जा रहा है. इस एक्ट के दुरुपयोग की बात कहके इसमें ढील देना इसलिए ठीक नहीं है कि तमाम दावों के बाद भी एक दलित को अपनी बारात निकालने तक का हक नहीं है. सामाजिक पिछड़ेपन को देखते हुए जातिगत आधार पर आरक्षण इसलिए जरूरी है क्योंकि अब तक जातिगत आधार पर ही भेदभाव हो रहा है.
https://hindi.firstpost.com/politics/why-strong-sc-st-act-is-important-in-this-country-bjp-dalit-atrocity-supreme-court-dalit-protest-101931.html

दलित शब्द के प्रयोग से बचना चाहिए

एनडीए सरकार ने केंद्रीय विभागों और राज्यों से सभी सरकारी कामकाज में अनुसूचित जाति के सदस्यों के लिए दलित शब्द के इस्तेमाल से बचने के लिए कहा है. सुप्रीम कोर्ट में 20 मार्च को एससी-एसटी एक्ट में हुए कुछ बदलावों से पहले ही सरकार ने यह निर्देश जारी किया था. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलित संगठनों ने देश भर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया था. सोमवार को हुए भारत बंद ने हिंसक रूप ले लिया और इसमें करीब 14 लोगों की जान चुकी है.
15 मार्च को राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को भेजे गए एक पत्र में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने कहा है कि उन्हें अनुसूचित जाती (शेड्यूल कास्ट) और इसी शब्द का अनुवाद अन्य भाषाओं में उपयोग करना है.
मंत्रालय द्वारा भेजे गए इस पत्र की फ़र्स्टपोस्ट ने समीक्षा की. इसमें लिखा गया है, सभी राज्य सरकार/केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन से अनुरोध किया जाता है कि सभी सरकारी कामकाज, मामले, लेनदेन, प्रमाण पत्र आदि के लिए संवैधानिक शब्द अनुसूचित जाति और अन्य भाषाओं में इसी शब्द का अनुवाद ही अनुसूचित जाति से संबंध रखने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल हों, जो राष्ट्रपति के आदेश के तहत भारत के संविधान के अनुच्छेद 341 में है.
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के ग्वालियर बेंच द्वारा पारित एक आदेश का हवाला देकर इस पत्र को केंद्रीय मंत्रालयों, केंद्रीय लोक सेवा आयोग और चुनाव आयोग को भेजा गया है. 15 जनवरी 2018 को मनोहर लाल माहौर की जनहित याचिका पर बेंच ने अपना फैसला सुनाया था.
बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि केंद्र और राज्य सरकार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंध रखने वाले लोगों के लिए दलित शब्द के प्रयोग से बचना चाहिए क्योंकि यह भारत के संविधान में उल्लिखित नहीं है.
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने यह भी तर्क दिया है कि 10 फरवरी 1982 को गृह मंत्रालय ने राज्य को एक आदेश देते हुए यह बताया था कि जिस विभाग के पास अनुसूचित जाती का प्रमाण पत्र जारी करने का काम है, वह इसमें हरिजन शब्द को नहीं डालेगा बल्कि केवल उस जाति का उल्लेख करेगा जिसे राष्ट्रपति के आदेश के तहत अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता दी गई है. इसके बाद 18 अगस्त 1990 को कल्याण मंत्रालय (अब सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय) ने राज्य सरकारों से अनुसूचित जाति और इसके अनुवाद को इस्तेमाल करने का अनुरोध किया था.
इस पूरे मामले पर फ़र्स्टपोस्ट से बात करते हुए प्रसिद्ध दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कहा कि दलित शब्द सरकार में एक प्रकार का डर पैदा करता है. लोग अपने आप को अनुसूचित जाति से नहीं बल्कि चमार और दलित से बुलाना चाहते हैं. सरकार का तर्क है कि दलित शब्द संविधान में नहीं है जो भ्रामक है. दलित शब्द गतल नीतियों के खिलाफ विद्रोह का प्रतीक है. सरकार इसे मिटाकर शोषित वर्ग के गुस्से को दबाने का प्रयास कर रही है.

https://hindi.firstpost.com/india/centre-asks-states-to-avoid-nomenclature-dalit-for-scheduled-castes-in-official-communication-ta-101907.html