Sunday, June 30, 2013


माँ"हु



जिस लडके को नौ महीने पेट मेँ रखा वो,
शादी के बाद
नौ महीने बाद बहु को लेकर अलग हो गया,
मैँ चुप रही: कुछ नही बोली क्योँकिँ मैँ "माँ"हु.
उसका नौँवे दिन फोन आया,
पुत्रवधु को अच्छी जोब मिली है. मैँने
पुछा तूम्हारा खाना ?
उसने कहा " टिफिन मँगवाते है,
मैँ सहम गई
मैँ चुप रही: कुछ नही बोली क्योँकिँ मैँ "माँ"हु.
नवरात्री मेँ लडके का फोन आया
पुत्रवधु प्रगनेन्ट है आप देखभाल करोगी ना ?
मैने हा कही.
मैँ चुप रही: कुछ नही बोली क्योँकिँ मैँ "माँ"हु.
पुत्रवधु ने पुत्र जन्मा , प्रपोत्र का
चेहरा देख कर मैँ रो पडी,
पुत्र ने पुछा
माँ यह खुशी के आँसु है ?
मैँ चुप रही: कुछ नही बोली क्योँकिँ मैँ "माँ"हु.
बेटे ने पुछा , माँ तुम तुम्हारे घर हमारे बेटे
का बेबी सिटिँग करोगी ना ?
मैँ यह सुनकर हँसी.
मैँ चुप रही: कुछ नही बोली क्योँकिँ मैँ "माँ"हु.
बाद मेँ....
प्रपोत्र ने एक दिन पुछा "
दादी जी दादी जी आप हम सेँ अलग क्यु हो ?
यह सुनकर मैँ रो पडी
लेकिन हा
मैँ चुप रही: कुछ नही बोली क्योँकिँ मैँ "माँ"ह......

मुसीबतों से लडें

एक किसान था. वह एक बड़े से खेत में
खेती किया करता था. उस खेत के बीचो-बीच
पत्थर का एक हिस्सा ज़मीन से ऊपर निकला हुआ
था जिससे ठोकर खाकर वह कई बार गिर
चुका था और ना जाने कितनी ही बार उससे
टकराकर खेती के औजार भी टूट चुके थे.
रोजाना की तरह आज भी वह सुबह-सुबह
खेती करने पहुंचा पर जो सालों से होता आ
रहा था एक वही हुआ , एक बार फिर किसान
का हल पत्थर से टकराकर टूट गया.
किसान बिल्कुल क्रोधित हो उठा , और उसने मन
ही मन सोचा की आज जो भी हो जाए वह इस
चट्टान को ज़मीन से निकाल कर इस खेत के बाहर
फ़ेंक देगा.
वह तुरंत भागा और गाँव से ४-५
लोगों को बुला लाया और सभी को लेकर वह उस
पत्त्थर के पास पहुंचा .
” मित्रों “, किसान बोला , ” ये देखो ज़मीन से
निकले चट्टान के इस हिस्से ने मेरा बहुत नुक्सान
किया है, और आज हम सभी को मिलकर इसे जड़ से
निकालना है और खेत के बाहर फ़ेंक देना है.”
और ऐसा कहते ही वह फावड़े से पत्थर के किनार
वार करने लगा, पर ये क्या ! अभी उसने एक-दो बार
ही मारा था की पूरा-का पूरा पत्थर ज़मीन से
बाहर निकल आया. साथ खड़े लोग भी अचरज में
पड़ गए और उन्ही में से एक ने हँसते हुए पूछा ,”
क्यों भाई , तुम तो कहते थे कि तुम्हारे खेत के बीच
में एक बड़ी सी चट्टान दबी हुई है , पर ये तो एक
मामूली सा पत्थर निकला ??”
किसान भी आश्चर्य में पड़ गया सालों से जिसे वह
एक भारी-भरकम चट्टान समझ रहा था दरअसल
वह बस एक छोटा सा पत्थर था !! उसे
पछतावा हुआ कि काश उसने पहले ही इसे निकालने
का प्रयास किया होता तो ना उसे इतना नुक्सान
उठाना पड़ता और ना ही दोस्तों के सामने
उसका मज़ाक बनता .
Friends, इस किसान की तरह ही हम भी कई बार
ज़िन्दगी में आने वाली छोटी-छोटी बाधाओं
को बहुत बड़ा समझ लेते हैं और उनसे निपटने
की बजाये तकलीफ उठाते रहते हैं. ज़रुरत इस बात
की है कि हम बिना समय गंवाएं उन मुसीबतों से
लडें , और जब हम ऐसा करेंगे तो कुछ ही समय में
चट्टान सी दिखने वाली समस्या एक छोटे से
पत्थर के समान दिखने लगेगी जिसे हम आसानी से
ठोकर मार कर आगे बढ़ सकते हैं.

यत्र नारीयस्तु पूजन्ते वसते तत्र देवताः



यत्र नारीयस्तु पूजन्ते वसते तत्र देवताः

नारी क्या है
१- पुरुष का नारी के समान कोई मित्र नहीं है
फिर चाहे बो किसी भी रूप में क्यूँ न हो,
माँ, बीबी, या दोस्त.
२- संसार - वाटिका में नारी सबसे उत्तम फूल है
जिसका लालित्य, जिसकी सुगंध और मनोहरता विचित्र है.


३- काव्य और प्रेम दोनों नारी- ह्रदय की संपत्ति है,
नर विजय का भूंखा होता है, और नारी समर्पण की
पुरुष लूटना चाहता है, नारी लुट जाना.

४- यदि संपूर्ण विश्व का राज्य भी मिले और नारी न हो तो
पुरुष भिक्षुक ही है, परन्तु अच्छे गुण वाली नारी भिक्षुक घर में हो तो
वह राजा है.

५- नारी प्रकृति की बेटी है, उस पर क्रोध न करो..
उसका ह्रदय कोमल है, उस पर विश्वास करो.

६- नारी महान आघातों को क्षमा कर देती है,
लेकिन तुच्छ चोटों को नहीं भूलती.

७- नारी वादा नहीं करती, परन्तु पुरुष के लिए
सब कुछ न्यौछावर कर देती.

प्यार से मेरा दिल मोम हो जाता है|



एक दिन एक चोर किसी महिला के कमरे में घुस गया| महिला अकेली थी, चोर ने छुरा दिखाकर कहा -"अगर तू शोर मचाएगी तो मैं तुझे मार डालूंगा|"
महिला बड़ी भली थी वह बोली -"मैं शोर क्यों मचाऊंगी! तुमको मुझसे ज्यादा चीजों की जरूरत है| आओ, मैं तुम्हारी मदद करूंगी|"
उसके बाद उसने अलमारी का ताला खोल दिया और एक-एक कीमती चीज उसके सामने रखने लगी|चोर हक्का-बक्का होकर उसकी ओर देखने लगा| स्त्री ने कहा - "तुम्हें जो-जो चाहिए खुशी से ले जाओ, ये चीजें तुम्हारेकाम आएंगी| मेरे पास तोबेकार पड़ी हैं|"
थोड़ी देर में वह महिला देखती क्या है किचोर की आंखों से आंसू टपक रहे हैं और वह बिना कुछ लिए चला गया| अगले दिन उस महिला को एक चिट्ठी मिली| उस चिट्ठी में लिखा था --
'मुझे घृणा से डर नहीं लगता| कोई गालियां देता है तो उसका भी मुझ पर कोई असर नहीं होता| उन्हें सहते-सहते मेरा दिल पत्थर-सा हो गया है, पर मेरी प्यारी बहन, प्यार से मेरा दिल मोम हो जाता है| तुमने मुझ परप्यार बरसाया| मैं उसे कभी नहीं भूल सकूंगा|'
झूट की होती है बोहतात सियासत में
सच्चाई खाती है मात सियासत में
दिन होता है अक्सर रात सियासत में
गूँगे कर लेते हैं बात सियासत में
और ही होते हैं हालात सियासत में
जायज़ होती है हर बात सियासत में

सभी उसूलों वाले आदर्शों वाले
जोशीले और जज़्बाती नरों वाले
मर्दाना तेवर वाली मूँछों वाले
सच्चाई के बड़े बड़े दावों वाले
बिक जाते हैं रातों रात सियासत में
जायज़ होती है हरबात सियासत में

दिये तेल बिन जगमग जगमग जलते हैं
सूखे पेड़ भी बे मौसम ही फलते हैं
खोटे सिक्के खरे दाम में चलते हैं
लंगड़े लूले भी बल्लियों उछलते हैं
लम्बे हो जाते हैं हात सियासत में
जायज़ होती है हर बात सियासत में

वोटों के गुल जब कुर्सी पर महकेंगे
नोटों के बुलबुल हर जानिब चहकेंगे
बर्फ़ के तोदे अंगारों से दहकेंगे
ख़ाली पैमाने झूमेंगे बहकेंगे
होगी बिन बादल बरसात सियासत में
जायज़ होती है हर बात सियासत में

इंसाँ कहना पड़ता है शैतानों को
दाना कहना पड़ता है नादानों को
ख़्वाहिशात को, ख़्वाबों को, अरमानों को
रोकना पड़ता है उमड़े तूफ़ानों को
काम नहीं आते जज़्बात सियासत में
जायज़ होती है हर बात सियासत में

जितने रहज़न हैं रहबर हो जाते हैं
पस मंज़र सारे मंज़र हो जाते हैं
पैर हैं जितने भी वो सर हो जाते हैं
बोने सारे क़द आवर हो जाते हैं
बढ़ते हैं सब के दरजात सियासत में
जायज़ होती है हर बात सियासत में

जब हालात की सख़्ती से घबरा जाऊँ
ख़ुशहाली की मंज़िल मैं भी पा जाऊँ
सच्चे रस्ते से मैं भी कतरा जाऊँ
जी करता है राही मैं भी आ जाऊँ
मार के सच्चाई को लात सियासत में
जायज़ होती है हर बात सियासत में
एक बार जरुर पढ़े....

शायद ज़िन्दगी बदल रही है!! जब मैं छोटा था, शायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ
करती थी..
मुझे याद है मेरे घर से "स्कूल" तक का वो रास्ता,
क्या क्या नहीं था
वहां, चाट के ठेले, जलेबी की दुकान, बर्फ के गोले,
सब कुछ, अब वहां "मोबाइल शॉप", "विडियो पार्लर" हैं, फिर
भी सब सूना है..
शायद अब दुनिया सिमट रही है... जब मैं छोटा था, शायद शाम बहुत लम्बी हुआ करती थी.
मैं हाथ में पतंग की डोर पकडे, घंटो करता था,
वो लम्बी "साइकिल रेस",
वो बचपन के खेल, वो हर शाम थक के चूर हो जाना,
अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है और सीधे रात
हो जाती है. शायद वक्त सिमट रहा है.. जब मैं छोटा था, शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुज़ोम बनाकर, वो दोस्तों के घर का खाना,
वो लड़कियों की
बातें, वो साथ रोना, अब भी मेरे कई दोस्त हैं,
पर जाने कहाँ है, जब भी "ट्रेफिक " पे मिलते हैं
"हाई" करते हैं, और अपने अपने रास्ते चल देते हैं,
होली, दिवाली, जन्मदिन , नए साल पर बस SMS आ जाते
हैं
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं.. जब मैं छोटा था, तब खेल भी अजीब हुआ करते थे,
छुपन छुपाई, लंगडी टांग, पोषम पा, कट थे केक,
टिप्पी टीपी टाप.
अब इन्टरनेट, ऑफिस, हिल्म्स, से फुर्सत
ही नहीं मिलती..
शायद ज़िन्दगी बदल रही है. जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है.. जो अक्सर
कबरिस्तान के बाहर बोर्ड पर लिखा होता है.
"मंजिल तो यही थी, बस जिंदगी गुज़र
गयी मेरी यहाँ आते आते " जिंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है.
कल की कोई बुनियाद नहीं है
और आने वाला कल सिर्फ सपने मैं ही हैं.
अब बच गए इस पल मैं..
तमन्नाओ से भरे इस जिंदगी मैं हम सिर्फ भाग रहे
हैं..