Saturday, October 24, 2015

विश्वास अंधा है। और मनुष्य अंधा हो तो ही उसका शोषण हो सकता है।

शिक्षक के माध्यम से मनुष्य के चित्त को परतंत्रताओं की अत्यंत सूक्ष्म जंजीरों में बांधा जाता रहा है। यह सूक्ष्म शोषण बहुत पुराना है। शोषण के अनेक कारण हैं-धर्म हैं, धार्मिक गुरु हैं, राजतंत्र हैं, समाज के न्यस्त स्वार्थ हैं, धनपति हैं, सत्ताधिकारी हैं।
सत्ताधिकारी ने कभी भी नहीं चाहा है कि मनुष्य में विचार हो, क्योंकि जहां विचार है, वहां विद्रोह का बीज है। विचार मूलतः विद्रोह है। क्योंकि विचार अंधा नहीं है, विचार के पास अपनी आंखें हैं। उसे हर कहीं नहीं ले जाया जा सकता। उसे हर कुछ करने और मानने को राजी नहीं किया जा सकता है। उसे अंधानुयायी नहीं बनाया जा सकता है। इसलिए सत्ताधिकारी विचार के पक्ष में नहीं हैं, वे विश्वास के पक्ष में हैं। क्योंकि विश्वास अंधा है। और मनुष्य अंधा हो तो ही उसका शोषण हो सकता है। और मनुष्य अंधा हो तो ही उसे स्वयं उसके ही अमंगल में संलग्न किया जा सकता है।
मनुष्य का अंधापन उसे सब भांति के शोषण की भूमि बना देता है। इसलिए विश्वास सिखाया जाता है, आस्था सिखाई जाती है, श्रद्धा सिखाई जाती है। धर्मों ने यही किया है। राजनीतिज्ञों ने यही किया है। विचार से सभी भांति के सत्ताधिकारियों को भय है। विचार जाग'त होगा तो न तो वर्ण हो सकते हैं, न वर्ग हो सकते हैं। धन का शोषण भी नहीं हो सकता है। और शोषण को पिछले जन्मों के पाप-पुण्यों के आधार पर भी नहीं समझाया और बचाया जा सकता है।
विचार के साथ आएगी क्रांति-सब तलों पर और सब संबंधों में-राजनीतिज्ञ भी उसमें नहीं बचेंगे और राष्ट्रों की सीमाएं भी नहीं बचेंगी। मनुष्य को मनुष्य से तोड़ने वाली कोई दीवाल नहीं बच सकती है। इससे विचार से भय है, पूंजीवादी राजनीतिज्ञों को भी, साम्यवादी राजनीतिज्ञों को भी। और इस भय से सुरक्षा के लिए शिक्षा के ढांचे की ईजाद हुई है। यह तथाकथित शिक्षा सैकड़ों वर्षों से चल रहे एक बड़े षडयंत्र का हिस्सा है। धर्म पुरोहित पहले इस पर हावी थे, अब राज्य हावी है।
विचार के अभाव में व्यक्ति निर्मित ही नहीं हो पाता है। क्योंकि व्यक्तित्व की मूल आधारशिला ही उसमें अनुपस्थित होती है। व्यक्तित्व की मूल आधारशिला क्या है? क्या विचार की स्वतंत्र क्षमता ही नहीं? लेकिन स्वतंत्र विचार की तो जन्म के पूर्व ही हत्या कर दी जाती है। गीता सिखाई जाती है, कुरान और बाइबिल सिखाए जाते हैं, कैपिटल और कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो सिखाए जाते हैं-उनके आधार पर, उनके ढांचे में विचार करना भी सिखाया जाता है! ऐसे विचार से ज्यादा मिथ्या और क्या हो सकता है? ऐसे अंधी पुनरुक्ति सिखाई जाती है और उसे ही विचार करना कहा जाता है!

Friday, October 23, 2015

हमें विशेष आशीर्वाद प्राप्त हैँ

हम लोग, जो 1947. से 1987 के बीच जन्में है, हमें विशेष आशीर्वाद प्राप्त हैँ
....और ऐसा भी नही कि आधुनिक संसाधनों से हमें कोई परहेज है......!!!
लेकिन.....      
हमें कभी भी जानवरों की तरह किताबों को बोझ की तरह ढो कर स्कूल नही ले जाना पड़ा ।
हमारें माता- पिता को हमारी पढाई को लेकर कभी अपने programs आगे पीछे नही करने पड़ते थे...!
स्कूल के बाद हम देर सूरज डूबने तक खेलते थे
हम अपने real दोस्तों के साथ खेलते थे; net फ्रेंड्स के साथ नही ।
जब भी हम प्यासे होते थे तो नल से पानी पीना safe होता था और 
हमने कभी mineral water bottle को नही ढूँढा ।
हम कभी भी चार लोग गन्ने का जूस उसी गिलास से ही पी करके भी बीमार नही पड़े ।
हम एक प्लेट मिठाई और चावल रोज़ खाकर भी मोटे नही हुए ।
नंगे पैर घूमने के बाद भी हमारे पैरों को कुछ नही होता था ।
हमें healthy रहने के लिए Supplements नही लेने पड़ते थे ।
हम कभी कभी अपने खिलोने खुद बना कर भी खेलते थे ।
हम ज्यादातर अपने parents के साथ या grand- parents के पास ही रहे ।
हम अक्सर 4/6 भाई बहन एक जैसे कपड़े पहनना शान समझते थे.....
common
वाली नही एकतावाली feelings ...enjoy करते थे......!
हम डॉक्टर के पास नहीं जाते थे, पर डॉक्टर हमारे पास आते थे हमारे ज़्यादा बीमार होने पर ।
हमारे पास न तो Mobile, DVD's, PlayStation, Xboxes, PC, Internet, chatting,
क्योंकि हमारे पास real दोस्त थे ।
हम दोस्तों के घर बिना बताये जाकर मजे करते थे और उनके साथ खाने के मजे लेते थे। 
कभी उन्हें कॉल करके appointment नही लेना पड़ा ।
हम एक अदभुत और सबसे समझदार पीढ़ी है क्योंकि हम अंतिम पीढ़ी हैं जो की 
अपने parents की सुनते हैं...और साथ ही पहली पीढ़ी जो की अपने बच्चों की सुनते हैं ।
We are not special, but. We are LIMITED EDITION and we are enjoying the 
Generation Gap......


Thursday, October 22, 2015

जापान क्यों हमसे आगे है वो बताते है..

जापान क्यों हमसे आगे है वो बताते है..

जापान क्यों हमसे आगे है वो बताते है..
जापानीज भी वर्णव्यवस्थामेंविश्वास करते है..वहा की सामाजिक व्यवस्था कुछ ईस प्रकारहै पांच वर्णों वाली..!!
डेमीयो=ब्राह्मण
समुराई=क्षत्रिय
जुकौनारु=वैश्य
नौफू=कारीगर वर्ग
और
बुराकुमीन=अछूत
ये बुराकुमीन उपर के चारो वर्ण के 1500 सालो से गुलाम थे..जापान की पूरी आबादीमें 10% ये लोग है..यहाँ के अछूतों के साथ जो व्यवहार होता है वैसा ही व्यवहार बुराकीमीन जाति के लोगों के साथ होता था..जीचिरो मात्सुमोटो नाम के एक महान बुराकीमीनने 18वीं सदीमे आन्दोलन चलाया "हमे मुक्त करो"..40 साल के आन्दोलन में कई हजार बुराकीमीन शहीद हुए..दुनिया के सबसे क्रुर माने जानेवाले जापानी समुराई और डेमियो को जुकना पडा..पुरे सच्चे दिल से जापानने उनको अपना लिया..और मैत्री की एसी मिशाल खडी की कि आज 10% आबादी वाले बुराकीमीन जापानी सरकारमें 15% राजनेता है..जापान के लोगोने अपना अतित मिटा दिया है..
विश्व की सबसे ज्यादा टु व्हीलर बनानेवाली कंपनी होन्डा का मालिक तथा हमारे माननीय प्रधानमंत्री जिस विदेशमंत्री को गले मिले थे वो बुराकीमीन यानी अछुत है..
सरकार चाहे तो कुछ भी हो सकता है..अच्छे दिन नही हमें अच्छे दिल चाहिये..


जापान क्यों हमसे आगे है वो बताते है..

जापान क्यों हमसे आगे है वो बताते है..
जापानीज भी वर्णव्यवस्थामेंविश्वास करते है..वहा की सामाजिक व्यवस्था कुछ ईस प्रकारहै पांच वर्णों वाली..!!
डेमीयो=ब्राह्मण
समुराई=क्षत्रिय
जुकौनारु=वैश्य
नौफू=कारीगर वर्ग
और
बुराकुमीन=अछूत
ये बुराकुमीन उपर के चारो वर्ण के 1500 सालो से गुलाम थे..जापान की पूरी आबादीमें 10% ये लोग है..यहाँ के अछूतों के साथ जो व्यवहार होता है वैसा ही व्यवहार बुराकीमीन जाति के लोगों के साथ होता था..जीचिरो मात्सुमोटो नाम के एक महान बुराकीमीनने 18वीं सदीमे आन्दोलन चलाया "हमे मुक्त करो"..40 साल के आन्दोलन में कई हजार बुराकीमीन शहीद हुए..दुनिया के सबसे क्रुर माने जानेवाले जापानी समुराई और डेमियो को जुकना पडा..पुरे सच्चे दिल से जापानने उनको अपना लिया..और मैत्री की एसी मिशाल खडी की कि आज 10% आबादी वाले बुराकीमीन जापानी सरकारमें 15% राजनेता है..जापान के लोगोने अपना अतित मिटा दिया है..
विश्व की सबसे ज्यादा टु व्हीलर बनानेवाली कंपनी होन्डा का मालिक तथा हमारे माननीय प्रधानमंत्री जिस विदेशमंत्री को गले मिले थे वो बुराकीमीन यानी अछुत है..
सरकार चाहे तो कुछ भी हो सकता है..अच्छे दिन नही हमें अच्छे दिल चाहिये..






आस्था और संस्कार जैसे चेनल बंद कर दिए जाय

Prabhu Dayal Mundotia
धार्मिक दंगों में कौन मरता है? किसका घर और रोजगार बर्बाद होता है? किसके बच्चों का भविष्य खराब होता है? इसका एक ही उत्तर है – गरीब, दलित और मुसलमान ... इन दंगों से किसे फायदा होता है? किसके बच्चे इन दंगों से सुरक्षित रहते हैं ? और किसका रोजगार पक्का होता जाता है? इनका एक उत्तर है – धर्मगुरु, राजनेता और धनिक वर्ग.
अब दूसरी तरफ से देखिये. धर्म के मेलों, जगरातों, पंडालों में और भंडारों में कौन सबसे अधिक जाता है? इसका उत्तर भी यही है – गरीब दलित और हर धर्म का पिछड़ा हिस्सा. क्या आपने ऐसे भंडारों मेलों यात्राओं में धनिकों, राजनेताओं व्यापारियों और अधिकारियों के बच्चों को उस तरह भाग लेते देखा है जैसा वे गरीबों के बच्चों को सिखाते हैं? वे गलती से कभी कभी “आशीर्वाद” या “भाषण” देने भर आते है. शेष समय में वे कहां होते हैं ये हम जानते हैं.
अब इन बातों का मतलब क्या है? सीधा मतलब यही निकलता है कि जो वर्ग चलताऊ किस्म के धार्मिक आयोजनों में सबसे ज्यादा भागीदारी करता है उसी के बच्चे दंगों में सबसे ज्यादा मारे जाते हैं, उन्हीं का रोजगार और भविष्य खराब होता है. इन्हीं बच्चों की भीड़ को आपस में झंडों और धर्म के नाम पर लड़ाया जाता है. आपका बच्चा अगर किसी तरह के भगवान् देवी देवता या शास्त्र का बिना शर्त समर्थन करता है या उसके बारे में उत्तेजित होकर घूमता फिरता है तो तय मानिए कि उसने न सिर्फ अपनी बुद्धि पर ताला लगा लिया है बल्कि वह जल्दी ही किसी राजनीतिक या धार्मिक दंगों का चारा बनेगा.
हमें ये समझना चाहिए कि गरीब हिन्दुओं, मुसलमानों सहित सबसे अधिक दलितों को धर्म और अध्यात्म सिखाने का भयानक प्रयास क्यों हो रहा है. हर गली मोहल्ले में पोंगा पंडित मुल्ला और तकरीर-बाज उतर गये हैं. अगर इन्हें अकेला छोड़ दें, अपने बच्चों और औरतों को इन शातिर अपराधियों के चंगुल से बचा लें तो आप अपने परिवार सहित इस देश की सबसे बड़ी सेवा कर सकते हैं. इसके लिए किसी क्रान्ति की या झंडा लहराने की जरूरत नहीं है.
कुछ मित्रों के परिवारों में ये हमने करके देखा है. उनके छोटे छोटे बच्चों को सिखाया है कि कोई इश्वर भगवान देवी देवता या भूत प्रेत नहीं होता, ये सब बकवास है. सारे धर्म ग्रन्थ घर से निकाल बाहर किये. धर्मों और मिथकों पर आधारित सीरियल्स और कार्टून दिखाना बंद कर दिया इनकी जगह डिस्कवरी चेनल, हिस्ट्री चेनल और यूरोपीय या जापानी कार्टून दिखाये. आस्था और संस्कार जैसे चेनल बंद कर दिए. उन्हें बताया कि सारे त्यौहार सिर्फ उत्सव मनाने के लिए हैं जो आप कभी भी मना सकते हैं. किसी ख़ास दिन का कोई ठेका नहीं है. जिन शास्त्रों की तारीफ की जाती है उनमे जो लिखा है उसका सरल भाषा में अर्थ समझा दीजिये, बच्चे हँसते हुए कहते हैं कि इन बातों में ऐसा क्या ख़ास है जिसके लिए इतना ढोल बजाये जाए? वे खुद उन शास्त्रों से बेहतर कहानियां और कवितायें लिखकर दिखाते हैं.
ये आप भी करके देखिये.
आपके बच्चों की मानसिकता में जमीन आसमान का अंतर आ जाएगा. वे पहले से अधिक निडर, वैज्ञानिक और स्वतंत्र सोच वाले बन जाते हैं. वे अचानक बहुत नए किस्म के प्रश्न पूछने लगते हैं. वे विज्ञान और तकनीक समझने का प्रयास करते हैं.अचानक से बहुत सृजनात्मक हो जाते हैं. और जिन बच्चों को आप भक्ति भाव सिखाते हैं वे डरपोक, अतार्किक, मंदबुद्धि और भीड़ के भगत ही बने रहते हैं. उनमे से बहुत कम लोग सच में ही अपना जीवन अपनी सोच के साथ जी पाते हैं.
जिन बच्चों को धर्म की सडांध से निकाल लिया जाता है वे विज्ञान, तकनीक और मशीनों सहित साहित्य कविता कहानी में रूचि लेने लगते हैं. उनसे जुड़े प्रश्न पूछते हैं. वहीं धार्मिक बच्चे देवी देवताओं भूत प्रेत से जुड़े सवाल पूछते हैं वे हवाई जहाज कैसे उड़ता है ये नहीं पूछते, वे पूछते हैं कि कैसा मन्त्र पढने से कोई देवता हवा उड़ता है या कैसी प्रार्थना करने से भगवान प्रसन्न होकर पहाड़ उखाड़ने की ताकत दे देता है?
अब आप तय कीजिये आपके बच्चों के मुंह से आपको कैसे प्रश्न सुनने हैं?
इस पर विचार कीजिये ... ये आपके बच्चों और उनके भविष्य से जुडा सबसे महत्वपूर्ण मामला है. जिन लोगों को इन दंगों से फायदा होता है वे इन बातों का विरोध करेंगे. लेकिन गरीब दलित और महिलाओं की चिंता करने वालों को इसे बहुत गंभीरता से लेना चाहिए इस पर अपने परिवारों मुहल्लों गावों में गहराई से विचार करना चाहिए. " अब इन बातों का मतलब क्या है? सीधा मतलब यही निकलता है कि जो वर्ग चलताऊ किस्म के धार्मिक आयोजनों में सबसे ज्यादा भागीदारी करता है उसी के बच्चे दंगों में सबसे ज्यादा मारे जाते हैं, उन्हीं का रोजगार और भविष्य खराब होता है. इन्हीं बच्चों की भीड़ को आपस में झंडों और धर्म के नाम पर लड़ाया जाता है. आपका बच्चा अगर किसी तरह के भगवान् देवी देवता या शास्त्र का बिना शर्त समर्थन करता है या उसके बारे में उत्तेजित होकर घूमता फिरता है तो तय मानिए कि उसने न सिर्फ अपनी बुद्धि पर ताला लगा लिया है बल्कि वह जल्दी ही किसी राजनीतिक या धार्मिक दंगों का चारा बनेगा.
हमें ये समझना चाहिए कि गरीब हिन्दुओं, मुसलमानों सहित सबसे अधिक दलितों को धर्म और अध्यात्म सिखाने का भयानक प्रयास क्यों हो रहा है. हर गली मोहल्ले में पोंगा पंडित मुल्ला और तकरीर-बाज उतर गये हैं. अगर इन्हें अकेला छोड़ दें, अपने बच्चों और औरतों को इन शातिर अपराधियों के चंगुल से बचा लें तो आप अपने परिवार सहित इस देश की सबसे बड़ी सेवा कर सकते हैं. इसके लिए किसी क्रान्ति की या झंडा लहराने की जरूरत नहीं है."

Wednesday, October 21, 2015

मुद्दा दरअसल गाय है ही नहीं।।

मुद्दा दरअसल गाय है ही नहीं।।
[ ] मुद्दा दरअसल गाय है ही नहीं।।
[ ] असल मुद्दा ये है कि कैसे गाय के नाम पर हिन्दुओं की भावनाओं को जगाकर मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाकर दलितों और पिछड़ों की राजनीति को पीटा जाऐ।
[ ] अभी ब्राहमणों को मुसलमान राजनीति से कोई खतरा नहीं है। न ही कोई मुसलमान नेता भाजपा या आरएसएस को देश में कोई गंभीर राजनीतिक चुनौती देने जा रहा है
[ ] दरअसल इस देश में ब्राहमणों को सबसे अधिक खतरा दलित और पिछड़ों की राजनीति से है।
[ ] अभी तक दलितों और पिछड़ों ने ही मुसलमानों की मदद से यूपी,बिहार,तमिलनाडु,आन्ध्र प्रदेश हरियाणा जैसे राज्यों में अपनी राजनीतिक सूझबूझ और अम्बेडकर और लोहिया के विचारों की बदौलत ब्राहमणों को सत्ता से बाहर खदेड़ दिया।। तो असल खतरा इन्हें दलितों और पिछड़ो की राजनीति से है....मुसलमान राजनीति से नहीं,...इसलिए भाजपा और आरएसएस के ब्राहमण सारे देश में मुसलमानों का डर दिखाकर दलितो और पिछड़ों को हिंदू बनाने पर तुले हैं।
 [ ] अब यदि इस देश का दलित और पिछड़ा ब्राह्मणों के भड़काने पर मुसलमानों से नफरत करने लगा तो देश में ब्राहमणों की सत्ता बनी रहेगी। और धीरे धीरे देश से दलितों और पिछड़ों की राजनीति का अंत हो जाएगा।। और फिर देश में ब्राहमण सत्ता एक बार फिर बिना किसी बाधा के शासन करेगी। मनुस्मृति का राज आ जाएगा।
[ ] दलितों पिछड़ों का आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा। वर्ण व्यवस्था की स्थापना की जाऐगी।
[ ] एक बार फिर जातियों को उनके काम बांट दिए जाएंगे।
[ ] जिसमें अहीर गडरिया जाट गूजर पाल सब लोग दूध का धंधा करेंगे।
[ ] लोध पटेल सिर्फ खेती करेगें।
[ ] कुशवाहा सिर्फ सब्जी सब्जी उगाएगा।।
[ ] नाई सिर्फ बाल काटेगा।।
[ ] कुम्हार सिर्फ मिट्टी के बर्तन बनाएगा।
[ ] चौरसिया सिर्फ पान बेचेगा।।
[ ] लोहार सिर्फ लोहे की सामग्री बनाएगा।।
[ ] चर्मकार सिर्फ चमड़ा का काम करेगा।
[ ] धोबी सिर्फ कपड़ा धोएगा।।
[ ] यानि जो काम जिस जाति को पहले बांट दिया था वही काम अब वो जाति करेगी।
[ ] दलितों पिछड़ों को पढ़ने का अधिकार नही दिया जाएगा। जो भी दलित पिछड़ा पढ़ाई करने की कोशिश करेगा सीशा पिघलाकर उसके आंख और कान में डाला जाएगा। शंबूक की हत्याऐं होंगी। एकलब्य के अंगूठों को जबरन काटा जाएगा।

[ ] दरअसल...ब्राहमणों की असली लड़ाई तो दलितों और पिछड़ों से ....मुसलमान तो महज इस लड़ाई में उनके मोहरें हैं...जिन्हें मारकर या मरवाकर वो असल में दलितों और पिछड़ों की राजनीति की हत्या करना चाहते हैं।।

Tuesday, October 20, 2015

सब प्रभु की कृपा है "।

ईस्वरवादी कहते हैं कि दुनियां ईश्वर ने बनाई ,परन्तु यदि यह ईश्वर रचित होती तो यह बनाये जाने के समय बहुत बढ़िया हालत मैं होती ,
जैसे फैक्ट्री से निकलते वक्त कार होती है ,
परतुं दुनियां का इतहास तो उलटी कहानी कहता है -
धरती 4.6 अरब वर्ष पहले बनगयी थी , परन्तु 1.6 अरब वर्ष तक
कुछ भी पैदा नहीं हुआ । उसके वाद यानी आज से अरब वर्ष पहले जाकर प्राथमिक जीव बना और बीस करोड़ पहले तक धरती डायनासोर जैसे महाकाय प्राणियों से भरी रही सत्तर अस्सी लाख पूर्व जाकर आदिमानव सा पैदा हुआ
जो पशु की तरह जीता था । पशुयों को मार कर कच्चा मांस
खाता था नंगा रहता था और उसे किसी ईश्वर- उष्वर का कोई
कभी ख्याल तक नहीं आया । क्या यह इश्वर की बनाई
स्रष्टि है ? ? उसके हाथों बनी स्रष्टि ऐसी खटारा क्यों ??
क्या फैक्ट्री से निकली कार ऐसी होती है ??
सोचो विचारो कोई शक्ति है जैसे भ्रम भ्रान्ति से निकलो -
इतना जरुर हैं जिन्होंने इसको जाना उन्होंने इसको कभीं नहीं माना ।
अतः सत्य पथ " बुद्ध पथ " पर वढ़ो
शुरू शुरू में जब मानव ने इर्द गिर्द की घटनाओं को जानने की चेष्टा की तब वैज्ञानिक ज्ञान लगभग न के बराबर ही था। बस इतना ही पता था कि हिंसक जानवरों से बचना है, यदि कोई फल, कंद मूल मिले तो खा लेना है तथा आवश्यक्ता या परिस्थितियों अनुसार किसी जानवर को मार कर खाना है। इतना भी पता चल चुका था कि जंगल की आग में जल कर मरे जानवर का माँस स्वादिष्ट होता है। काफी समय पश्चात पता चला कि दो पत्थरों की रगड़ से आग निकलती है।यह सारा कुछ जानने पर भी प्राकृति का ज्ञान लगभग शून्य था। जब सुर्य उदय होने पर दिन का उजाला होता तो वह समझता कि कोई ऊपर आकाश में है जो दिन के समय प्रकाश करता है, बारिश आने पर भी मानव यही सोचता कि कोई ऊपर से पानी गिरा रहा है। रात को तारे तथा चंद्रमा भी आकाश में ही दिखाई देते, आँधी तुफ़ान, आसमानी बिजली सब ऊपर से ही आते। इन सभी घटनाओं ने मानव की सोच बना दी कि कोई ऊपर आकाश में बैठा है, वही सब कुछ करता है, बड़े बड़े काम करता है, इसलिए शक्तिशाली भी है। तब मस्तिष्क में किसी अज्ञात शक्ति या परमात्मा जैसा विचार आया और तभी से जिस घटना या कार्य का न पता चले कि कैसे हुआ क्यों हुआ तो कहना शुरू किया कि," ऊपर वाला जाने" या "नीली छतरी वाला जाने"। फिर सोच आगे बढ़ी ( विकसित नहीं ) कि इतने सारे कार्य अकेला प्रमात्मा कैसे करता होगा, साथ में सहायक तो होंगे ही, शायद इससे देवी देवताओं का संकल्प बना। वैसे परमात्मा या सभी देवताओं का संकल्प मानव रूप में ही हुआ। यदि इसी प्रकार गधे सोचते तो उनके देवताओं के चित्र गधों जैसे होते। हर समय हर समाज में कुछ ऐसे भी शैतान होते हैं जो दूसरों की कमाई पर ऐश करते हैं या करने की चेष्टा में रहते है। ऐसे लोगों ने प्रमात्मा के विचार को अपने लाभ के लिए विकसित किया। प्रमात्मा के साथ ही आत्मा की रचना कर डाली और कहा कि प्राणी चाहे शरीर त्याग दे, आत्मा नहीं मरती, जलती या कटती। यह आत्मा एक शरीर छोड़ते ही दूसरे जन्म लेने वाले शरीर में प्रविष्ट हो जाती है। लुटेरों ने इसी आत्मा के एक शरीर छोड़ने तथा दूसरे शरीर में प्रविष्ट होने को पिछला जन्म, अगला जन्म कहा। बात यहाँ भी ख़त्म नहीं हुई। अगला जन्म कैसा होगा, इसके लिए थयूरी बना डाली कि पिछले जन्म में पुन्य दान आदि करने से अगला जन्म सुधर जाता है, क़िस्मत अच्छी होती है। अब अगला जन्म सुधारने के लिए हराम की कमाई खाने के उद्देश्य से दान लेने वाले अच्छी आत्मा वाले या महात्मा बन गए। इन महात्माओं का चोरों लुटेरों तथा अन्य अपराध करके शाही जीवन व्यतीत करने वालों से गठजोड़ हो गया जिन का काम " महात्माओ" के गुण गान करना था तथा बदले में यह महात्मा कहे जाने वाले महां ठग प्राणी, चोर उच्चकों अपराधियों की अच्छी ज़िंदगी के वास्तविक कारण यानि उनके कुकृत्यों पर परदा डालने के लिए प्रचार करते कि अच्छी ज़िंदगी भोगने वालों ने पिछले जन्म में बड़े पुन्य दान किए। जब श्रम जीवी आवाज़ उठाते कि हम सारा दिन परीश्रम करते हैं , शाम को हड्डियाँ दुखती हैं फिर भी हमारा परिवार भूखा सोता है और दूसरे लोग बिना कोई काम किए हर प्रकार की सुख सुविधा ले रहे हैं, ऐसा क्यों? तो "महात्मा" जी अपनी चतुराई का उपयोग करते हुए यहीं बताते कि भाई यह सब कुछ पिछले जन्मों के कर्मों का ही फल है, पिछले जन्म में तो कुछ नेक कर्म किए नहीं, इस जन्म में ही कर लो, नहीं तो नर्क आप के लिए पक्का है। बेचारे भोले भाले श्रमजीवी जो पहले ही भूख काट रहे होते थोड़ी और भूख काट कर अपनी कमाई हराम की खाने वालों के हवाले दान के रूप में दे देते।
दुखी हो कर जब श्रमिक पूछते कि कहाँ है, कैसा है परमात्मा जिस के पास हमारे अगले पिछले जन्म के कर्मों का लेखा जोखा है? इसका उपाए भी ठगों, महात्माओं तथा निठ्ठलों ने ढूँढ निकाला। प्रमात्मा की परिभाषा ही ऐसी रच डाली कि कहीं कुछ हाथ पल्ले न पड़े। कह दिया," प्रमात्मा सूक्ष्म अति सूक्ष्म है जो कि कण कण में समाया है, स्थूल अति स्थूल है जिस में सारी सृष्टि समाई है।" अब ढूँढते रहो इसे। साथ ही यह भी कह दिया कि बड़े बड़े ऋषि मुनी भी इसे पा नहीं सके।** कुछ हो तो उसे कोई पाए**। ध्यान दीजिए, आप के इलाक़े में भी कुछ ऐसे लोग मिल ही जाएँ गे जिन्होंने नाजायज़ क़ब्ज़े किए होंगे, ब्लैक की होगी या नशे बेचे होंगे , भ्रष्टाचार किया होगा या उन के पूर्वजों ने देश से गद्दारियां की होंगी तथा अमीर होने पर कहते होंगे कि," सब प्रभु की कृपा है "।
प्राकृति के जानने के लिए केवल विज्ञान ही हमारे लिए आँखों का काम कर सकती है। विज्ञान के बिना तो मानों मानव अंधा है। जैसे कुछ अंधे जब किसी महावत की सहायता से हाथी के शरीर के बारे जानना चाहते है तो जिस ने पूँछ को पकड़ा वह कहे गा हाथी साँप जैसा होता है, जिस ने पेट को छूआ उस अनुसार हाथी ड्रम जैसा होता है और जिस ने टाँग को छूआ वह कहे गा कि हाथी खम्बे (पोल ) जैसा होता है। इसी प्रकार वैज्ञानिक दृष्टि की कमी के कारण परमात्मा को प्राकृति या सृष्टि का रचयिता मानने वालों ने जन्म, मरण, दिन, रात, बारिश, सूखा, बाढ़, तुफ़ान, आसमानी बिजली आदि अनेक घटनाओं की व्याख्या अलग अलग ढंग से कर डाली तथा अलग अलग व्याख्याओं के आधार पर अलग अलग धर्म बन गए । इतना ही नही, जिन जिन रेगिस्तानी या पथरीले क्षेत्रों में पानी या लक्कड़ की कमी थी वहाँ मृत्क शरीर को जलाने या जल प्रवाह करने की बजाए दफ़नाना शुरू कर दिया तथा जहाँ उपजाऊ जगह पर लक्कड़ की कमी नहीं थी वहाँ जलाना या दाह संस्कार शुरू हो गया। बाद में यही परम्परा स्थानीय धर्मों के अंग बन गईं। जलवायु तथा ज़रूरतों के हिसाब से पहरावा बन गया तथा खान पान बन गया जो कि बाद में धर्म के साथ जुड़ गए।
अब प्रमात्मा तथा धर्मों के संकल्पों के भयंकर परिणाम निकल रहे हैं। धार्मिक कट्टरता तथा राजनीति मिल कर साम्प्रदायिक दंगे करवा रहे हैं। राजनीति कार्यों पर आधारित न हो कर साम्प्रदायता के आधार पर हो रही है। साम्र्पदायकता के आधार पर देशों के बँटवारे तथा मार काट हो रही है। लोकतंत्र साम्प्रदायकतंत्र या लठतंत्र में परिवर्तित हो गया है। परन्तु प्रसंन्नता की बात या काले बादलों में सफ़ेद रेखा की बात यह है कि ज्ञान विज्ञान के कारण लोग कुछ कुछ जागृत हो रहे हैं। विकसित देशों में धारमिक लोगों में कमी आ रही है।अब अनेक लोग भारत जैसे अविकसित देशों में भी हैं जो कि जनगणना में अपना धर्म नहीं लिखवाना चाहते। कई पश्चिमी देशों में स्कूलों में प्रार्थना बंद हो चुकी है।काफी लोग ऐसे भी हैं जो न्यायालय में किसी धार्मिक पुस्तक पर हाथ रख कर शपथ लेने की अपेक्षा संविधान की शपथ लेते हैं। (** वैसे शपथ लेने का भी अर्थ भी यही समझा जाता है कि कोई अज्ञात शक्ति है जो झूठी शपथ लेने पर दण्ड देगी**)। पुराने संस्कार तो धीरे धीरे ही जाएँ गे। परन्तु काल्पनिक प्रमात्मा का अंत निकट भविष्य में ही है। सभी धर्म के नाम पर कमाई तथा लूट करने वालों या राजनीति करने वालों द्वारा काल्पनिक प्रमात्मा की आयु लम्बीं करने के भरसक प्रयत्नों के बावजूद इस का अंत निकट ही है

प्रभु