Thursday, January 28, 2016

amended Prevention of SC/ST Atrocities Act या POA

Jansatta - Hindi News
मुखपृष्ठनई दिल्लीSC/ST ACT में अब फंसने पर और बढ़ेंगी मुश्क‍िलें, आरोपी को ही साबित करना होगा खुद को बेकसूर
रितिका चोपड़ा
नई दिल्‍ली | January 28, 2016


आने वाले हफ्ते से जातिगत भेदभाव के केस में फंसने वालों की मुश्‍क‍िलें और बढ़ने वाली हैं। संशोधित एसएसटी एक्‍ट (amended Prevention of SC/ST Atrocities Act या POA) के तहत अब दलित और आद‍िवासियों के खिलाफ होने वाले अपराध के मामले में आरोपी को ही साबित करना होगा कि वो दोषी नहीं है। संशोधित एक्‍ट के मुताबिक, कोर्ट यह मानकर चलेगा कि आरोपी अगर पीड़‍ित या उसके घरवालों का परिचि‍त है तो उसे पीड़‍ित की जाति के बारे में जानकारी थी, जबतक कि इसका उलट साबित न हो जाए। इससे पहले तक शिकायतकर्ता पर ही सबूत देने की जिम्‍मेदारी थी।
पिछले शीतकालीन सत्र में संसद ने नया कानून पास किया था, जो मंगलवार से प्रभाव में आएगा। ये कानून ऐसे वक्‍त में प्रभावी होने वाला है, जब हैदराबाद यूनिवर्सिटी के स्‍टूडेंट रोहित वेमुला की आत्‍महत्‍या का मामला पूरे देश में छाया हुआ है।
क्‍या है कानून में:
संशोधित एक्‍ट में 17 नए अपराधों को शामिल किया गया है, जिसके आधार पर छह महीने से लेकर पांच साल तक की कैद हो सकती है। इनमें ‘अनुसूच‍ित जाति के लोगों या आदिवासियों के बीच ऊंचा आदर हासिल करने वाले’ किसी मृत शख्‍स का अनादर भी शामिल है। हालांकि, एक्‍ट में उन मृत आदरप्राप्‍त लोगों के नाम साफ नहीं किए गए हैं, जिनका ‘लिख‍ित या मौख‍िक शब्‍दों से अनादर’ नहीं किया जा सकता।
संशोधित एक्‍ट में जिन अपराधों को शामिल किया गया है, उनमें सिर के बाल छीलना या मूंछ काटना, चप्‍पलों की हार पहनाना, सिंचाई की सुविधा देने से इनकार करना, किसी दलित या आदिवासी को मानव या जानवर का शव ठिकाने लगाने के लिए बाध्‍य करना, जातिगत नामों से गालियां देना, मल ढुलवाना या इसके लिए बाध्‍य करना, सामाजिक या आर्थिक बह‍िष्‍कार, चुनाव लड़ने से एससी या एसटी कैंडिडेट को रोकना, घर या गांव छोडने के लिए बाध्‍य करना, एससी या एसटी महिला के कपड़े उतरवाकर उसके सम्‍मान को ठेस पहुंचाना, महिला को छूना या उसके खिलाफ अपशब्‍दों का इस्‍तेमाल करना आदि प्रमुख हैं।
अफसरों पर भी होगी कार्रवाई:
इस एक्‍ट में यह भी कहा गया है कि अगर कोई गैर दल‍ित या गैर आदिवासी पब्‍ल‍िक सर्वेंट दलितों के खिलाफ होने वाले अपराधों को लेकर अपनी जिम्‍मेदारियों का ठीक ढंग से पालन नहीं करता तो उसे छह महीने से लेकर एक साल तक की जेल हो सकती है। नए कानून के तहत एससी और एसटी के खिलाफ मामलों के लिए अलग से कोर्ट बनाने का भी प्रावधान है। इन अदालतों को मामले पर खुद से संज्ञान लेने की आजादी होगी। चार्जशीट दाखिल करने के दो महीने के अंदर ये कोर्ट सुनवाई पूरी कर लेंगे।

रामदेवरा

रैगर लक्ष्य पंचायत दिल्ली(पंजी०) के प्रधान धर्मपाल बारोलिया और उनके मंत्रीमंडल के सदस्य रघुबीर सिंह गाडेगांवलिया(संरक्षक),धर्मेन्द्र भुराडिया(उप-प्रधान),सिध्दू प्रसाद जाजोरिया(मंत्री), संजय कराडिया (कोषाध्यक्ष), सहयोगी दिनेश कुमार सोनवाल(माईकल), तिलकराज बन्दरवाल, डालचन्द रौछिया, रवि जाजोरिया, जगदीश मुरदारिया,कैलाश फलवाडिया, अश्वनी बारोलिया, अंकुश फलवाडिया, कंवरसैन तोनगरिया, छत्रपाल कुरडिया, पंडित ओम पर्काश बिलूणिया, रोहित बारोलिया,उदयराम उदीणिया,दलीप कुमार फलवाडिया, खुशहाल धनवाडिया,बृज मोहन सिंह गाडेगांवलिया(विक्की),किशनलाल बारोलिया, लक्ष्मण दुडिया इत्यादि ने दिनांक 25-01-2016 को राजस्थान के जैसलमेर से 118 कि. मी. दूर स्थित रामदेवरा मे कलयुग अवतारी हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक लोकदेवता श्री बाबा रामदेवजी महाराज के मन्दिर मे शीश नवाकर आलौकिक बाबा रामदेव जी महारज की समाधि, प्रतिमा व ज्योत के  दर्शन कर रैगर समाज की मंगलकामना के लिये अरदास की, और उसके बाद में सभी सदस्यों ने परचा बावड़ी के दर्शन किये ।

पदों के लालच में सामाजिक नैता

पदों के लालच में सामाजिक नैता
कुशालचन्द्र एडवोकेट, M.A., M.COM., LL.M., D.C.L.L., I.D.C.A., C.A. INTER.. 
सामाजिक विकास व उसके नेतृत्व पर चर्चा करें। तो दिखाई देता है कि जो भी व्यक्ति समाज का नेतृत्व कर रहे है उनमें से अधिकतम 99 प्रतिशत मनोनित नेता बने बैठे है यह वही तथाकथित सामाजिक नेता है जो प्रधान चुनाव के नेतृत्व में साम-दाम-भेद का उपयोग करते हुए चुनाव में सहयोगी रहे। जो किमत इन सहयोगियों ने चुकाई, उसकी वसूली करने का समय चल रहा है। इसी काम कि प्रक्रिया में पदों का मनोनयन चल रहा है पदों की बंदर-बाट में समाज के प्रति उनका समर्पण, त्याग, काम, योग्यता, आधार नहीं है। इनकी चापलूसी आधार है। 
योग्यता का यहा कोई लेना-देना नही हैं। केवल मात्र एक योग्यता है कि आप प्रधान नेतृत्व के प्रति कितने बड़े चापलूस या चमचे हो। जितने बड़े चापलूस या चमचे, उतना बड़ा पद।
ऐसा ही आजाद भारत मे हो रहा है राजनीति मे बाबासाहेब इन्हे एजेण्ट, दलाल, भड़वा, गद्दार, कुत्ता कहते थे।
यह समाज के वास्तविक प्रतिनिधि न होकर प्रधान नेतृत्व के चमचे है। अब आप ही बताये ऐसे चमचे समाज का क्या विकास करेंगे। यह एक ऐसा धोखा है जो पिछले कई दशको से समाज को दिया जा रहा है। 
कही-कही तो विरोधी व्यक्तियों ने भी प्रधान नेतृत्व से समझोता कर लिया, जो उनके विरोधियों की टीम से चुनाव लड़ रहे थे और आज पदों के चक्कर में अपने आत्मसम्मान को एक तरफ रखकर छोटे-छोटे पदों की दौड़ में शामिल हो गये है। 
स्थिति बड़ी अजीबो-गरीब है। प्रश्न उठता है कि क्या समाज विशेष की संस्थाओं के पद हासिल करना इतना महत्वपूर्ण हो गया है। जिसके लिए बड़े पैमाने पर चापलूसी करनी पड़ रही है जैसे कोई पॉवरफुल या राजनैतिक सत्ताधारी पार्टी या सरकारी का पद हो जबकि यहा तो समाज की सेवा करना है । 
वेसे समाज के विकास में योगदान देने के लिए किसी भी स्तर से पद की जरूरत नहीं है। बिना पदों के भी समाज के विकास में भूमिका निभाई जा सकती है और समाज के प्रति सर्मपण त्याग काम की भावना स्वतः ही पदों को सजृत कर देती है। 
क्योंकि समाज का विकास पदों से नहीं बल्कि समाज के लिए रचनात्मक काम करने से होता है। जिसके लिए रचनात्मक सोच व समर्पण त्याग होना जरूरी है। आज समाज का जो भी पिछड़ापन है उसके लिए समाज का बुध्दिजीवी वर्ग जिम्मेवार है और एक बड़ा कारण समाज मे विद्वान लोगों की कमी होना है। 
बुध्दिजीवी व्यक्ति अपनी बुध्दि का उपयोग अपन निजी स्वार्थ के लिए करता है जबकि विद्वान व्यक्ति अपनी बुध्दि का उपयोग जनकल्याण के लिए करता है। 
आज जो भी समाज सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक पिछड़ेपन के शिकार है उसका सबसे बड़ा कारण उसमें विद्वान अर्थात् विचारक व्यक्तियों की कमी है जो समाज को सही दिशा मार्गदर्षन दे सकें और अपने विचारों से सन्तुष्ट कर सकें। 
आज पढ़े लिखे बुध्दिजीवी सामाजिक संस्थाओं का नेतृत्व कर रहे है यह एकेडमिक रूप से तो शिक्षित है लेकिन सामाजिक शिक्षा में अशिक्षित है अर्थातृ यह सामाजिक शिक्षा में अनपढ़ है। 
हमें विकास करना है तो हमे अपने इतिहास से सीखना होगा। बाबासाहेब डा. अम्बेडकर, जैसे महान विद्वान व्यक्ति, 7वीं पास ज्योतिबा फुले तथा अनपढ़ कबीर को अपना गुरू मानते थे क्योंकि ज्योतिबा फुले व कबीर सामाजिक शिक्षा के विद्वान थे क्योंकि सामाजिक शिक्षा से ही समाज का विकास किया जा सकता है और एकेडमिक शिक्षा से केवल पेट भराई या सरकारी नौकरी या जीवनयापन किया जा सकता है। 
इसलिए ऐसे व्यक्ति क्या समाज का विकास करेंगे जिनकी प्राथमिकता संस्थाओ के पद हासील करना हो, ना कि विकास करना।
हमारे आस-पास ऐसें जितने भी एकेडमिक पढ़े लिखे लोग है उन्हें केवल उनकी शिक्षा या उच्च सरकारी पदों को देखकर सामाजिक संस्थाओं की बागडोर नेतृत्व सौंपना, मेरा मानना है कि यह बहुत बड़ी मुर्खता है क्योंकि एकेडमिक शिक्षा सरकारी नौकरी हेतु मापदण्ड हो सकती है लेकिन यह मापदण्ड सामाजिक संस्थाओं के नेतृत्व हेतु उचित नही है। यदि वास्तव में समाज का विकास करना है तो सामाजिक संस्थाओं के नेतृत्व का मापदण्ड उसके द्वारा समाज के लिए किये गये कार्य, समर्पण, त्याग होना चाहिये अन्यथा अपने चापलूसों, चमचों को खुश करो तथा अपना कार्यकाल मौज-मस्ती से पूरा करो। जो मिलता है उसे मिल-बाट कर खाओ।
अभी तक अधिकतर यहीं दिखाई देता आया है। ढ़ेर सारी माला, साफा, स्मृति चिन्ह पहने जाओ, लिए जाओ और समय पूरा होने पर घर जाओ।

Saturday, January 23, 2016

मेट्रो कभी लोगो के लिये सपना हुआ करती थी।

जयपुर मेट्रो : बदलाव अच्छे हैं


कुछ महीनों पहले तक मेट्रो जयपुर का सपना हुआ करती थी। अब भी है। शहरवासियों का इसमें बैठने का इंतजार अभी पूरा नहीं हुआ है। लेकिन शहर के एक बड़े अखबार के लिए अचानक यह दुःस्वप्न बन गई। न जाने कैसे। कोई कह सकता है कि इससे क्या फर्क पड़ता है। फर्क पड़ता है, बल्कि पड़ना शुरू भी हो गया है। फर्क पड़ता है, क्योंकि अखबार ओपिनियन मेकर होते हैं। फर्क पड़ रहा है, क्योंकि न्यायपालिका का समय बर्बाद हो रहा है। फर्क और पड़ेगा, क्योंकि तमाशा अभी जारी है...

जयपुर करवट ले रहा है। कई मायनों में बदल रहा है। बढ़ रहा है। आधुनिकता की ओर, छोटी काशी से मेट्रो नगरी की ओर, पिंक सिटी से स्मार्ट सिटी की ओर। जयपुर मेट्रो हाल का सबसे बड़ा बदलाव है। शहर का एक इलाका है- परकोटा। चारदीवारी में बंद। पुराना जयपुर। ज्यादातर धरोहरें इसी इलाके में हैं। बाजार बरामदों में है। देश-विदेश से सैलानी यहीं आते हैं। अब यहां भूमिगत मेट्रो के लिए सुरंग की खुदाई का काम चल रहा है। कुछ लोग इसका बाहें फैलाकर स्वागत कर रहे हैं और कुछ इसे स्वीकार ही नहीं कर पा रहे। 
मत वैभिन्नय हो सकता है। होना भी चाहिए। लेकिन ठोस आधार के साथ। आधारहीन, रीढ़विहीन विरोध समय और ऊर्जा दोनों की बर्बादी है। और जब ऐसा विरोध कोई अखबार करे तो यह लाखों-करोड़ों लोगों के समय और ऊर्जा की बर्बादी में बदल जाता है। उसके पत्रकारों में कोफ्त पैदा करता है सो अलग। कहते हैं, किसी शहर को फौरी तौर पर जानना हो तो उसके अखबार देख लो। जयपुर में दो ही बड़े अखबार हैं। दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका। कुछ महीने पहले तक दोनों अखबारों के लिए यह सपनों की मेट्रो हुआ करती थी। फिर एकाएक एक अखबार के लिए दुःस्वप्न बन गई। 
फर्ज कीजिए आप शहर में नए हैं। आपको एक अखबार में सुरंग की खुदाई से ट्रैफिक डायवर्जन, विश्व धरोहरों को खतरा, बरामदों के आगे बैरिकेड लगने से व्यापारियों का धंधा चौपट होने जैसे तर्कों के साथ मेट्रो का विरोध दिखाई पड़े तो आप क्या सोचेंगे? या तो हंसेंगे या विचलित होंगे या सब समय पर छोड़ आगे बढ़ जाएंगे या फिर अखबार को सही मानेंगे। मेरा सामना रोजाना शुराआती तीनों तरह के लोगों से होता है। चौथी तरह के लोगों में से एक व्यक्ति का सामना पूरे शहर से हुआ। उसने हाल में सुरंग की खुदाई बंद करने की मांग वाली एक याचिका जनहित के नाम पर राजस्थान हाईकोर्ट में लगा दी। इसमें भी उसी अखबार के उठाए मुद्दे और दावे। कोर्ट ने काम रोकने से मना कर दिया। यह तो गनीमत रही कि जनहित याचिका की गरिमा बनाए रखी और याचिकाकर्ता पर कोर्ट का वक्त बर्बाद करने के लिए जुर्माना नहीं ठोका। 
जाहिर है, ट्रैफिक डायवर्जन और बाजार की बैरिकेडिंग से थोड़ी दिक्कत तो लोगों को हो ही रही है। लेकिन, क्या इसका यह मतलब है कि काम ही रोक दिया जाए? बदलाव की राह पर चलते हुई दिक्कतें जरूर होती हैं, लेकिन परिणामतः वे सारी दिक्कतें हैं तो सुविधा के लिए ही ना? फिर सरकारें क्या इतनी बेवकूफ हैं कि विश्व धरोहरों को खतरे की कीमत पर विकास करें? ऐसी विरासत जिसका राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान है। जहां तक अखबार के इसे मुद्दा बनाने का सवाल है तो अखबार को देखकर तो यही लगता है कि वह व्यापारियों के हितों की लड़ाई लड़ रहा है। उसे बाजारों की बैरिकेडिंग से दीवाली के समय व्यापारियों के घाटे की ज्यादा चिंता है। न तो अभी तक वह इस पूरे में मामले किसी बड़े घोटाले जैसा कोई खुलासा कर पाया, न क्रोनी कैपिटलिज्म जैसी कड़ियां ही जोड़ पाया और न ही इसका ठोस कारण बता पा रहा है कि पुरातत्व विभाग ने जयपुर मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन को खुदाई की अनुमित कैसे दे दी। ये कैसा विरोध है?
दिल्ली के चांदनी चौक में रहने वाले लोगों ने जब पहली बार चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन में प्रवेश किया तो अवाक् रह गए थे। फिर मुंह से निकला भी तो सिर्फ इतना कि इतना सब कब हो गया, पता ही न चला। कभी ट्रैफिक से ठसे पड़े रहने वाले चांदनी चौक में आज कोई भी अपने साधन से जाना बेवकूफी समझता है। दिल्ली और जयपुर दोनों शहरों पर आबादी का दबाव बढ़ रहा है। तब यदि चांदनी चौक में मेट्रो न चली होती तो आज हालात और बदतर होते। परकोटे में ट्रैफिक की पीड़ा जयपुर में रहने वाले लोग झेलते हैं, इसिलए वे यहां मेट्रो की अहमियत भी बखूबी जानते हैं। पांच साल बाद की स्थिति का अंदाजा भी उन्हें खूब है। किसी सरकार ने 10 साल बाद के शहर की स्थिति को भांपते हुए आज ही काम शुरू कर दिया, इससे बेहतर दूरदर्शिता और भला क्या हो सकती है? फिर मेट्रो के चलने से धरोहरों को नुकसान के बजाय फायदा ही होगा, क्योंकि वाहनों के धुएं से होने वाला प्रदूषण कुछ तो कम होगा। हमें समझना होगा कि यह बदलाव शहर की बेहतरी के लिए है, शहरवासियों की सुविधा के लिए है।  
समय के साथ हर शहर बदल रहा है। बदलाव अच्छे हैं। जो समय के साथ कदमताल करने से घबराते हैं, वो रुक जाते हैं। यह तब समझ आता है, जब एक दिन किसी नोकिया की तरह खुद को सबसे पीछे खड़ा पाते हैं। फिर कोई माइक्रोसॉफ्ट की तरह उसके जीर्णोद्धार को आगे आता है। अपना अस्तित्व बचाने को उसे मजबूरन खुद को पराये हाथों में सौंपना पड़ता है। शुक्र है कि जयपुर अभी खुदमुख्तार है। अपनी श्रेणी के शहरों में सबसे आगे है।

ट्रेन और ज़िंदगी

जिस दिन ... हम लिखेंगे ..... इंकलाब ... 
तो समझ जाना ...
वो ..... इंकलाब ही है, 

कोई ... बैनर ... पोस्टर ... जुलुस ... धरना ... प्रदर्शन ...
जैसा ... दिखावा नहीं है, 

इंकलाब होगा ... खून बहेगा ... बहाया जाएगा
हक़ के लिये ... आजादी के लिये
गुलामी की ... जंजीरें ... बेड़ियाँ ... तोड़ी जाएंगी, 

तुम्हें ... साथ आना हो ... तो आ जाना
वर्ना ... हम अकेले ही 
लड़ लेंगे ... जीत लेंगे ... अपनी आजादी ..... ?

बाहर के दरख़्त, इंसान, जानवर अमूमन सभी कुछ पीछे की ओर भाग रहा था। उसका शरीर पटरी पर दौड़ती गाड़ी के साथ तेजी से मंज़िल की ओर बढ़ रहा था, लेकिन पीछे भागते पेड़, खेत-खलिहान, उंचे-नीचे टीले, लाल टीन की झोपड़ियां मानों उसे बीते हुए समय में ले जाने की जी-तोड़ कोशिश में लगे हुए थे।
ट्रेन की खिड़की से एक-एक करके पीछे छूटते स्टेशनों को देखकर वो सोच रहा था कि ज़िंदगी और ट्रेन में कितना कुछ एक जैसा है। ज़िदगी भी एक ट्रेन की तरह है, स्टेशनो की तरह लोग मिलते हैं और कुछ देर का साथ निभाकर आगे बढ़ जाती हैं, लोग पीछे छूट जाते हैं। ज़िंदगी कभी ज़्यादा देर नहीं ठहरती, ज़िंदगी का नाम ही हमेशा आगे बढ़ते रहना होता है, बिल्कुल एक ट्रेन की तरह।
वो ना तो कभी किसी ठहराव पर ज़्यादा देर रूका और ना ही रूकना चाहता था, क्योंकि शायद उसने ट्रेन की तरह हमेशा आगे बढना सीख लिया था। लेकिन इंसान की ज़िंदगी और ट्रेन के सफर में कुछ फर्क भी होता है। इंसान अपनी ज़िंदगी के पहियों को कितनी ही रफ़्तार से भगा ले, लेकिन दिमाग के किसी कोने में सुन्न पड़ी यादें उसकी तेज रफ्तार ज़िंदगी के पहियों को थामने के लिए काफी हैं। मानो ज़िंदगी लोहे के पहियों पर भागती ट्रेन हो और यादें ब्रेक। जो पल भर में ही उसकी रफ़्तार थाम लेती।
उसकी ज़िंदगी के तेज रफ़्तार पहियों को आज अतीत की यादों ने थाम सा लिया था। आंखें मूंदकर उसने जब यादों के झरोखे में झांका तो बरसों से मन के किसी कोने में दबी हुई आवाज़ अचानक तेज हो गई...
"कुछ दिन बाद मुझे भी वहां बुला लेना, तुम मुझसे और इस शहर से अपना साथ तो खत्म कर चले हो, लेकिन पुरानी यादें तुम्हारी ग़ैरमौज़ूदगी में भी मेरे साथ हैं।" कॉफी का प्याला हाथ में पकड़े लड़की ने नज़रे झुकाकर कहा। वो अक्सर यूं ही नज़रे झुकाकर बात करती थी। मानो मुझसे बात करते हुए कुछ गुम हो जाता था और वो उसे तलाशने के लिए नज़रे झुका लेती थी। लड़की की केवल नज़रें झुकी होती, लेकिन उसकी पलकें नहीं झपकती। एकटक बिना पलकें झपके वो काफी के कप में तैरते बुलबुलों की झाग को देखती रहती, बुलबुले...छोटे-छोटे कई बुलबुले..एक दूसरे के साथ चिपके हुए गर्म कॉफी के कप में इधर से उधर तैरते रहते।
एकाएक गर्म कप को थामे उसके हाथों पर लड़के के बर्फ से ठण्डे हाथों का स्पर्श होता तो उसका ध्यान टूटता, या शायद वो ध्यान भंग होने का बहाना करती।
गाड़ी छूटने के वक़्त में अभी लगभग चार घण्टे का समय बाकी था। उसे ये मालूम नहीं था कि दुबारा कब वो इस शहर में आयेगा, ये शायद उन दोनों की आखिरी मुलाकात थी। आज वो दोपहर से ही साथ थे। पिछले कई सालों में उसने शहर के कई हिस्सों को छान डाला था। हनुमान मंदिर के सामने का ये कॉफी होम उसे पसंद था। वो अक्सर एक-दो अख़बार और एक कप कॉफी के साथ वहां घण्टों गुज़ार देता था। अगर कभी जेब में ज़्यादा पैसे हों तो वो कॉफी का दूसरा कप भी ले लेता था। यहां उसे सुकून मिलता था। यहां बैठने पर शहर के दूसरे कॉफी शॉप्स की तरह कोई उठाने या समय ख़त्म होने की याद दिलाने नहीं आता।
अख़बार के पन्नों की ख़बरों को पढ़ते पढ़ते जब वो ऊब जाता तो अपने आस-पास बैठे लोगों चेहरे पढ़ने लगता। लेकिन ये चेहरे भी अख़बार की ख़बरों की तरह ही उसे बासी से लगे। ये बासी शक्लों वाले लोग उसकी ही तरह सुबह ही यहां आकर बैठ जाते और कुछ कप कॉफी की बदौलत पूरी बेंच कब्जाये रहते। यहां आने वाले अधिकतर लोगों में उसने बुजुर्गों को देखा था, जो अक्सर अपने हमउम्र दोस्तों के साथ तब तक गप्पे मारते रहते जब तक वहां का चौकीदार काफी होम बंद होने की सूचना ना दे देता।
शेड पर लटके बल्ब से पीले रंग की रोशनी के कुछ टुकड़े छिटककर लड़की के मुंह पर गिर रहे थे, जिससे वो लड़की के चेहरे पर फैली खामोशी को पढ़ पा रहा था। ऐसी ख़ामोशी जो शायद चीख-चीख कर कह रही थी कि मुझे यहां अकेले मत छोड़ो...तुम जिस अकेलेपन को मेरे साथ छोड़कर जा रहे हो वो मेरी ज़िंदगी के खालीपन को कभी नहीं भर सकता।
अचानक उसे लगा कि उसके चेहरे की खामोशी भी अब चीख-चीख कर थककर शांत हो चुकी है और वहां एक सन्नाटा फैल चुका है। सर्द मौसम के सन्नाटे को अचानक चौकीदार की सीटी की आवाज़ भेदती है...समय खत्म...कॉफी होम बंद करने का वक़्त हो गया।
अभी भी ट्रेन के जाने में एक घण्टे से ज़्यादा समय है। इससे पहले कभी उन्हें एक घण्टा इतना क़ीमती नहीं लगा और जो क़ीमती होता है वो बहुत कम या सीमित होता है। कॉलेज के बाद वो अक्सर दोस्तों के साथ या अकेले इस जगह अपनी शाम गुजारते थे, लेकिन उन दिनों वहां से लौटते हुए कभी इतना दुख नहीं हुआ, जितना कि आज हो रहा था।
क्नाट प्लेस की गोल सड़कों पर चलते-चलते आज उसने लड़की का हाथ अपने हाथों में ले लिया। जाने क्यूं उसने ऐसा किया। आज से पहले उसने सड़क पर चलते हुए कभी खुद आगे बढ़कर लड़की का हाथ नहीं पकड़ा था। वो अक्सर कहा करता था कि सड़क और एकांत में कुछ अंतर होता है और उस अंतर को मिटाने की कोशिश करना नादानी है, लेकिन आज उसने खुद इस अंतर को मिटा दिया था। इस समय वो उसके और अपने बीच किसी भी अंतर को नहीं रहने देना चाहता था। शायद इसीलिए सड़क और एकांत के अंतर की परिभाषा भूल आज उसने समाज की परवाह नहीं की और वो बेफिक्र हो लड़की के साथ क्नाट प्लेस की गोल सड़कों पर चलने लगा।
"यहां से कहां जायेंगे" - लड़की ने पूछा।
"कहीं नहीं...थोड़ी देर यहीं टहलते हैं फिर स्टेशन चलेंगे" - उसने कहा।
स्टेशन शब्द सुनते ही वो पहले से भी ज़्यादा खामोश हो जाती और नज़रें झुका कर उसके साथ चलने लगती। खामोशी की भी अपनी एक भाषा होती है। एकदम संक्षिप्त और स्पष्ट। बिना आवाज़ के भी सब कुछ कह देती है । इस वक़्त हम दोनों की हालत हमारी उन हथेलियों की तरह है जो अभी सबसे नज़दीक है, यह जानते हुए भी कि कुछ ही समय में उन्हें ज़ुदा होना है। इस वक़्त हमारे बीच ना कोई शिकायत है और ना ही कोई सवाल। सिर्फ खामोशी ही हमारे साथ है।
हमें अब चलना चाहिए- उसने कहा।
लड़की ने कुछ नहीं कहा। वो अब भी खामोश रही, जैसे उसने ठान लिया हो कि उसके चले जाने के बाद अब खामोशी ही उसका साथी है।
दोनों पैदल ही स्टेशन की ओर चलने लगे। आउटर सर्किल पर चलते हुए रीगल सिनेमा से कुछ ही दूर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन है। पंद्रह मिनट का स्टेशन का रास्ता लड़की को अपने जीवन का सबसे कठिन समय महसूस हो रहा था। इन पंद्रह मिनटों के बाद वो एक ऐसे इंसान को अपने से दूर कर देगी जिसे वो कभी खोना नहीं चाहती। लेकिन वक़्त कभी नहीं रूकता, परिस्थितियां बदल जाती हैं, वक़्त अपनी चाल से हमेशा चलता रहता है।
गाड़ी छूटने का समय हो गया है। अभी कुछ ही देर पहले तो उसने कहा था कि ट्रेन के जाने में एक घण्टा बाकी है और इतनी जल्दी एक घण्टा ख़त्म हो गया। इस एक घण्टे में वो किस-किस पल को महसूस करती और आने वाले समय के अकेलेपन को दूर करने के लिए कितनी खुशियां बटोरती।
अक्सर झुकी रहने वाली नज़रें इस क्षण उसकी ओर देख रही थी, लेकिन आज वो नम थी। हमेशा खामोश रहने वाले होठों से सिसकियों की आवाज़ को वो महसूस कर रहा था। प्लेटफार्म पर खड़ी लड़की की नज़रें उसे ट्रेन की खिड़की से एकटक देख रही थी। अचानक उसने पलकें बंद कर ली, मानों उसकी आखिरी तस्वीर को वो आंखों में कैद कर लेना चाहती हो। पलक उठाते ही आंखों में कैद आंसू की कुछ बूंदे उसके गालों से लुढ़कते हुए जमीन पर गिरी और सूखी जमीन पर गीलेपन का एक बिंदु सा बना डाला।
और आखिर ट्रेन चल पड़ी...ट्रेन की खिड़की से उसने लोगों की भीड़ में अकेली खड़ी उस लड़की को देखा जिसके आंखो से टपके आंसुओं से जमीं का बिंदु फैलकर अब बड़ा हो गया था।

नई दिल्ली रेनवे स्टेशन पर आपका स्वागत है...लाउडस्पीकर से निकली इस आवाज़ ने उसे अतीत से वर्तमान में पहुंचा दिया। बरसों बाद वो फिर उसी स्टेशन पर है, जहां उसने किसी से वापस लौट आने का वादा किया था। लेकिन आज उसकी मंजिल कुछ और है, वो आज भी यादों के उस शहर का कुछ ही देर का मेहमान है। कुछ ही देर में ट्रेन चल पडेगी और दूसरा स्टेशन आयेगा, कयोंकि ट्रेन कहीं भी ज़्यादा देर नहीं ठहरती, ज़िंदगी की तरह...

Thursday, January 21, 2016

दलित छात्र रोहिथ वेमुला की आत्महत्या पर मीना कंदसामी का लेख.

सांप्रदायिक और ब्राह्मणवादी ताकतों  के खिलाफ आंदोलनरत हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहिथ वेमुला की आत्महत्या पर मीना कंदसामी का लेख. द हिंदू में प्रकाशित मूल अंग्रेजी से अनुवाद: रेयाज उल हक
एक दलित छात्र की खुदकुशी बच निकलने की एक अकेले इंसान की हिम्मत नहीं होती, यह उस समाज को शर्मिंदा करने की कार्रवाई होती है, जो उसके साथ खड़ा न रह सका। रोहित वेमुला की मौत उनके द्वारा जातिवादी, सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ चलाए जा रहे एक संघर्ष के एक ऐसे उदासी भरे अंजाम के रूप में सामने आई है, जिसका पहले से अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था। उन पांच दलित अध्येताओं में से एक रोहित अपने आखिरी पल तक मजबूती से डटे रहे, जिन्हें दक्षिणपंथी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्धी परिषद द्वारा लगाए गए आरोपों पर हैदराबाद विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया था। यहां तक कि मौत की तरफ धकेले जाते हुए भी रोहिथ अपने सबसे जुझारू छात्रों की असुरक्षाओं को हमें दिखाते गए और हमारी शैक्षिक व्यवस्था की असली दशा को भी उजागर किया: दलित छात्रों को निकालने के दशकों पुराने इतिहास वाला एक वाइस चांसलर, दक्षिणपंथी हिंदू ताकतों की तरफ से बदला लेने के लिए केंद्रीय मंत्रियों की भागीदारी, पूरी प्रशासनिक मशीनरी का शासक राजनीतिक दलों की कठपुतली बन जाना और सामाजिक बेपरवाही के त्रासद नतीजे।
इन पांच दलित छात्रों को निकाले जाने से बढ़ कर इसकी कोई कारगर मिसाल नहीं मिल सकती कि जाति व्यवस्था कैसे काम करती है। हालांकि उनके निकाले जाने की वजह से दलित बहुजन छात्र समुदाय के बीच में एकजुटता की भावना मजबूत हुई थी, लेकिन उनको निकाले जाने की कार्रवाई ने खौफनाक बातों की याद दिला दी थी। ठीक मनुस्मृति द्वारा अवर्णों (यानी दलितों) को जातीय दायरों से बाहर रहने के फरमान की तरह ही, इस सजा में ही वे सारे प्रतीक शामिल थे जिनमें जातीय सफाई की अवधारणा छुपी हुई है। शिक्षा अब अनुशासित करने वाला एक उद्यम बन गई है, जो दलित छात्रों के खिलाफ काम कर रही है: वे लगातार रस्टिकेट कर दिए जाने, हमेशा के लिए निकाल दिए जाने, बदनाम हो जाने या पढ़ाई रुक जाने के खौफ में रहते हैं। एक ऐसे समाज में जहां छात्रों ने उच्च शिक्षण संस्थानों में पहुंचने के अपने अधिकार को आरक्षण की नीतियों की सक्षम बनाने वाली, सुरक्षा देने वाली धारणा के तहत यकीनी बनाने के लिए व्यापक संघर्ष किया है, किसी ने भी इस बात पर रोशनी डालने का साहस नहीं किया है कि इनमें से कितने छात्रों को इसकी इजाजत मिलती है कि वे डिग्री हासिल करके इन संस्थानों से लौटें, और कितनों को पढ़ाई बीच में ही छोड़ देनी पड़ती है और इस तरह वे अवसाद के स्थायी शिकार बन जाते हैं और कितने आखिरकार मौत के अंजाम तक पहुंचते हैं।
रोहिथ जैसे छात्र
रोहिथ वेमुला जैसे दलित छात्र एक डॉक्टरल डिग्री के लिए विश्वविद्यालयों में दाखिल हो पाते हैं, यही उनकी समझदारी, जिद्द और जातीय भेदभाव के खिलाफ उनके अथक संघर्ष की निशानी होती है, वह भेदभाव जो पहले दिन से ही उनको तबाह कर देने की कोशिश करता है।
जातीय वर्चस्व से भरी हुई पाठ्य पुस्तकें, अलगाव को और भी मजबूत कर देने वाला कॉलेज कैंपसों का माहौल, अपने प्रभुत्वशाली जातीय रुतबे पर गर्व करनेवाले सहपाठी, उनको एक बदतर भविष्य की तरफ धकेलने वाले शिक्षक जो इस तरह उनके नाकाम रहने की अपनी भविष्यवाणी को सच साबित करते हैं – ये सब दलित छात्रों के लिए पार करने के लिहाज से नामुमकिन चुनौतियां हैं। बौद्धिक श्रेष्ठता के विचार में रंगी हुई जाति पर जब अकादमिक दुनिया के दायरों में पर अमल किया जाता है, तो वह जिंदगियों को खा जाने और जानें लेने वाला एक ज़हर बन जाती है. क्लासरूम जाति के खिलाफ प्रतिरोध और उसके खात्मे की जगहें बनने की बजाए उन लोगों की बेकाबू जातीय ताकत की दावेदारी बन जाते हैं, जो द्विज होने और ज्ञान के संचरण के पवित्र धागों में यकीन करते हैं और जो अपनी पैदाइश से ही यथास्थिति को कायम रखने को मजबूर हैं।
बहिष्कार के डर से अपनी पहचान छुपाए रखनेवाले उत्पीड़ित पृष्ठभूमियों के उन थोड़े से छात्रों की असली पहचान उजागर होने पर सजा दी जाती है – मिथकीय कर्ण की तरह उन्हें जानलेवा नाकामी का अभिशाप दिया जाता है। अपने बूते उभरनेवाले दलित छात्रों को, जिनकी पहचान सबके सामने पहले से ही जाहिर होती है और जो किंवदंतियों के एकलव्य बन जाते हैं, जिंदा छोड़ दिया जाता है लेकिन उन्हें अपनी कला को अमल में लाने में नाकाम बना दिया जाता है। ऐसा अकेले छात्रों के साथ ही नहीं होता  क्योंकि जातीय सत्ता के इन गलियारों में दलित-बहुजन फैकल्टी भी अलग-थलग कर दिए जाने का सामना करते हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी), मद्रास में अपनी मां के संघर्ष को मैंने जितने आदर से देखा है, उतनी ही बेचारगी के साथ मैंने इस औरत को टूटते और बिखरते हुए भी देखा है, जिसे मैं प्यार करती हूं। अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों/अन्य पिछड़ा वर्गों के फैकल्टी मेंबरों का हमारे आईआईटी/भारतीय प्रबंधन संस्थानों और विश्वविद्यालयों में नाम भर का प्रतिनिधित्व इस जातीय भेदभाव को और बढ़ा देता है क्योंकि इससे मिलती जुलती पृष्ठभूमियों से आने वाले छात्रों को एक ऐसा सहायता देने वाला समूह तक नहीं मिलता, जो उनकी मुश्किलों के बारे में सुन सके या उन्हें सलाह दे सके।
ब्राह्मणवादी प्रोफेसरों के एक इंटरव्यू पैनल के सामने, जिनकी अदावत एक फायरिंग दस्तों की याद दिलाती है। एक छात्र कैसे अपने बूते पर टिका रह सकता या सकती है? ये प्रोफेसर, जिन्होंने एक तरफ हो सकता है कि न्यूक्लियर फिजिक्स में महारत हासिल कर ली हो, लेकिन दूसरे तरफ अपने प्यारे जातीय पूर्वाग्रहों को पालते-पोसते रहते हैं। और ये अकादमिक दुनिया में जातीय आतंकवाद की समस्या के सिर्फ एक पहलू का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। जब इसका मेल एबीवीपी जैसे दक्षिणपंथी राजनीतिक छात्र गिरोहों से होता है तो यह एक खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है।
हमारे विश्वविद्यालय आधुनिक कत्लगाह बन गए हैं। सभी दूसरे जंग के मैदानों की तरह, उच्च शिक्षा के संस्थान भी जातीय भेदभाव के साथ साथ दूसरी चीजों में भी महारत हासिल कर रहे हैं। वे छात्राओं और महिला फैकल्टी के यौन उत्पीड़न के लिए बदनाम हो चुके हैं। कहानियां जो दबा दी जाती हैं, कहानियां जिन्हें उन शिकायतकर्ताओं का चरित्र हनन करने के लिए तोड़-मरोड़ दिया जाता है जो विरोध करती हैं, आवाज उठाती हैं और जो अपने साथ धमकी से, मजबूरी से या जबरदस्ती सेक्स करने की किसी भी कोशिश को कारगर नहीं होने देतीं। ठीक जिस तरह से रोहित की खुदकुशी ने चुप्पियों को तोड़ते हुए जाति की हत्यारी पहचान उजागर की है, एक दिन हम उन औरतों की कहानियां भी सुनेंगे, जिन्हें इन एकाकी टापुओं से मौत के समंदर में ले जाया गया।
हमने हैदराबाद विश्वविद्यालय के मामले में जो देखा है वह जातीय श्रेष्ठता और राजनीतिक सहभागिता का खतरनाक मेलजोल है। छात्रों को धमकाने और दबाने में राज्य मशीनरी और खासकर पुलिस बल की भूमिका कैंपसों में दमन के एक पुराने और आजमाए हुए तरीके के रूप में स्थापित हुई है। आईआईटी मद्रास में आंबेडकर पेरियार स्टडी सर्किल की मान्यता खत्म करने के बाद के दिनों में वर्दी वाले मर्द और औरतें कैंपस में हर जगह दिन रात मौजूद रहते थे और इसके दरवाजों की पहरेदारी करते थे। (यह फैसला काफी विरोध के बाद वापस लिया गया था।) अब इसी तरह हैदराबाद कैंपस में हथियारबंद पुलिस की ऐसी ही भारी तैनाती और धारा 144 के तहत कर्फ्यू लगा दिया गया है।
एक वादा जिस पर अमल करना है
रोहित, तुमने कार्ल सेगान की तरह एक विज्ञान लेखक बनने का अपना एक सपना अपने पीछे छोड़ा है और हमें सिर्फ अपने शब्दों के साथ अकेला कर गए हो। अब हमारे हर शब्द में तुम्हारी मौत का वजन है, हर आंसू में तुम्हारा अधूरा सपना है। हम धमाके को तैयार सितारों का वह समूह बन जाएंगे, जिसके बारे में तुमने बात की है, वह समूह जिसकी जबान पर जाति की इस उत्पीड़नकारी व्यवस्था की दास्तान होगी। इस मुल्क के हर विश्वविद्यालय में, हर कॉलेज में, हर स्कूल में, हमारे हर नारे में तुम्हारे संघर्ष का जज्बा भरा होगा। डॉ. आंबेडकर ने जाति को एक ऐसा शैतान बताया है, जो आप जिधर भी रुख करें आपका रास्ता काटेगा और भारतीय शैक्षिक संस्थानों के अग्रहारों के भीतर हमारी शारीरिक मौजूदगी में ही जाति के उन्मूलन के संदेश निहित होने चाहिए। अकादमिक दुनिया पर अपनी दावेदारी ठोकनेवाले एक दलित, एक शूद्र, एक आदिवासी, एक बहुजन, एक महिला से अपना सामना होने पर हरेक घिनौनी जातीय ताकत को घबराने दो, उन्हें इसका अहसास होने दो कि हम यहां पर एक ऐसी व्यवस्था का खात्मा करने आए हैं, जो हमें खत्म करने की पुरजोर कोशिश करती रही है, कि हम यहां पर उन लोगों के लिए बुरे सपनों की वजह बनने आए हैं, जिन्होंने हमसे हमारे सपनों को छीनने की हिम्मत की है। उन्हें इसका अहसास हो जाने दो कि वैदिक दौर, पवित्र ग्रंथों को सुन लेने वाले शूद्र के कानों में पिघला हुआ सीसा डालने का दौर, वंचित किए गए ज्ञान को अपनी जबान पर लाने का साहस करने वालों की जबान काट लेने का दौर बीत चुका है। उन्हें यह समझ लेने दो कि हमने शिक्षित बनने, संघर्ष करने और संगठित होने के लिए इन गढ़ों-मठों पर धावा बोला है; हम यहां मरने के लिए नहीं आए हैं। हम सीखने के लिए आए हैं, लेकिन जाति के शैतानों और उनके कारिंदों को यह बात समझ लेने दो कि हम यहां पर उन्हें एक ऐसा सबक सिखाने भी आए हैं, जिसे वे कभी भुला नहीं पाएंगे।

सूचना का अधिकार अर्थात राईट टू इन्फाॅरमेशन।


सूचना का अधिकार अधिनियम, २००५
सूचना का अधिकार अर्थात राईट टू इन्फाॅरमेशन।
सूचना का अधिकार का तात्पर्य है, सूचना पाने का अधिकार, जो सूचना अधिकार कानून लागू करने वाला राष्ट्र अपने नागरिकों को प्रदान करता है। सूचना अधिकार के द्वारा राष्ट्र अपने नागरिकों को अपनी कार्य और शासन प्रणाली को सार्वजनिक करता है।
लोकतंत्र में देश की जनता अपनी चुनी हुए व्यक्ति को शासन करने का अवसर प्रदान करती है और यह अपेक्षा करती है कि सरकार पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ अपने दायित्वों का पालन करेगी लेकिन कालान्तर में अधिकांश राष्ट्रों ने अपने दायित्वों का गला घोटते हुए पारदर्शिता और ईमानदारी की बोटियाँ नोंचने में कोई कसर नहीं छोड़ी और भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े कीर्तिमान कायम करने को एक भी मौक अपने हाथ से गवाना नहीं भूले। भ्रष्टाचार के इन कीर्तिमानों को स्थापित करने के लिए हर वो कार्य किया जो जनविरोधी और अलोकतांत्रिक हैं।
सरकारे यह भूल जाती है कि जनता ने उन्हें चुना है और जनता ही देश की असली मालिक है एवं सरकार उनकी चुने हुई नौकर। इसलिए मालिक होने के नाते जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है, कि जो सरकार उनकी सेवा है, वह क्या कर रही है ?
प्रत्येक नागरिक सरकार को किसी ने किसी माध्यम से टेक्स देती है। यहां तक एक सुई से लेकर एक माचिस तक का टैक्स अदा करती है। सड़क पर भीख मांगने वाला भिखारी भी जब बाज़ार से कोई सामान खरीदता है, तो बिक्री कर, उत्पाद कर इत्यादि टैक्स अदा करता है।
इसी प्रकार देश का प्रत्येक नागरिक टैक्स अदा करता है और यही टैक्स देश के विकास और व्यवस्था की आधारशिला को निरन्तर स्थिर रखता है इसलिए जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उसके द्वारा दिया गया, पैसा कब, कहाँ, और किस प्रकार खर्च किया जा रहा है ?
इसके लिए यह जरूरी है कि सूचना को जनता के समक्ष रखने एवं जनता को प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया जाए, जो एक कानून द्वारा ही सम्भव है।
अंग्रज़ों ने भारत पर लगभग 250 वर्षो तक शासन किया और इस दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत में शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 बनया, जिसके अन्तर्गत सरकार को यह अधिकर हो गया कि वह किसी भी सूचना को गोपनीय कर सकेगी।
सन् 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ, लेकिन संविधान निर्माताओ ने संविधान में इसका कोई भी वर्णन नहीं किया और न ही अंग्रेज़ो का बनाया हुआ शासकीय गापनीयता अधिनियम 1923 का संशोधन किया, आने वाली सरकारों ने गोपनीयता अधिनियम 1923 की धारा 5 व 6 के प्रावधानों का लाभ उठकार जनता से सूचनाओं को छुपाती रही।
सूचना के अधिकार के प्रति कुछ सजगता वर्ष 1975 के शुरूआत में “उत्तर प्रदेश सरकार बनाम राज नारायण” से हुई। मामले की सुनवाई उच्चतम न्यायालय में हुई, जिसमें न्यायालय ने अपने आदेश में लोक प्राधिकारियों द्वारा सार्वजनिक कार्यो काव्यौरा जनता को प्रदान करने का व्यवस्था किया। इस निर्णय ने नागरिको को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(ए) के तहत अभिव्यक्ति की, स्वतंत्रता का दायरा बढ़ाकर सूचना के अधिकार को शामिल कर दिया।
वर्ष 1982 में द्वितीय प्रेस आयोग ने शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 की विवादस्पद धारा 5 को निरस्त करने की सिफारिश की थी, क्योंकि इसमें कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया था कि ’गुप्त’ क्या है और ’शासकीय गुप्त बात’ क्या है ? इसलिए परिभाषा के अभाव में यह सरकार के निर्णय पर निर्भर था कि कौन सी बात को गोपनीय माना जाए और किस बात को सार्वजनिक किया जाए। बाद के वर्षो में साल 2006 में ’विरप्पा मोइली’ की अध्यक्षता में गठित ’द्वितीय प्रशासनिक आयोग’ ने इस कानून को निरस्त करने का सिफारिश किया।
सूचना के अधिकार की मांग राजस्थान से प्रारम्भ हुई। राज्य में सूचना के अधिकार के लिए 1990 के दशक में जनान्दोलन की शुरूआत हुई, जिसमें मजदूर किसान शक्ति संगठन (एम.के.एस.एस.) द्वारा अरूणा राय की अगुवाई में भ्रष्टाचार के भांडाफोड़ के लिए जनसुनवाई कार्यक्रम के रूप में हुई।
1989 में कांग्रेस की सरकार गिरने के बाद बीपी सिंह की सरकार सत्ता में आई, जिसने सूचना का अधिकार कानून बनाने का वायदा किया। 3 दिसम्बर 1989 को अपने पहले संदेश में तत्कालीन प्रधानमंत्री बीपी सिंह ने संविधान में संशोधन करके सूचना का अधिकार कानून बनाने तथा शासकीय गोपनीयता अधिनियम में संशोधन करने की घोषणा की। किन्तु बीपी ंिसह की सरकार तमाम कोशिसे करने के बावजूद भी इसे लागू नहीं कर सकी और यह सरकार भी ज्यादा दिन तक न टिक सकी।
वर्ष 1997 में केन्द्र सरकार ने एच.डी शौरी की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित करके मई 1997 में सूचना की स्वतंत्रता का प्रारूप प्रस्तुत किया, किन्तु शौरी कमेटी के इस प्रारूप को संयुक्त मोर्चे की दो सरकारों ने दबाए रखा।
वर्ष 2002 में संसद ने ’सूचना की स्वतंत्रता विधेयक(फ्रिडम आॅफ इन्फाॅरमेशनबिल) पारित किया। इसे जनवरी 2003 में राष्ट्रपति की मंजूरी मिली, लेकिन इसकी नियमावली बनाने के नाम पर इसे लागू नहीं किया गया।
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यू.पी.ए.) की सरकार ने 12 मई 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 संसद में पारित किया, जिसे 15 जून 2005 को राष्ट्रपति की अनुमति मिली और अन्ततः 12 अक्टूबर 2005 को यह कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू किया गया। इसी के साथ सूचना की स्वतंत्रता विधेयक 2002 को निरस्त कर दिया गया।
इस कानून के राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने से पूर्व नौ राज्यों ने पहले से लागू कर रखाथा, जिनमें तमिलनाडु और गोवा ने 1997, कर्नाटक ने 2000, दिल्ली 2001, असम, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं महाराष्ट्र ने 2002, तथा जम्मू-कश्मीर ने 2004 में लागू कर चुकेथे।
सूचना का तात्पर्यः-
रिकार्ड, दस्तावेज, ज्ञापन, ईःमेल, विचार, सलाह, प्रेस विज्ञप्तियाँ, परिपत्र, आदेश, लांग पुस्तिका, ठेके सहित कोई भी उपलब्ध सामग्री, निजी निकायो से सम्बन्धित तथा किसी लोक प्राधिकरण द्वारा उस समय के प्रचलित कानून के अन्तर्गत प्राप्त किया जासकता है।
सूचना अधिकार का अर्थः-
इसके अन्तर्गत निम्नलिखित बिन्दु आते है-
1. कार्यो, दस्तावेजों, रिकार्डो का निरीक्षण। 2. दस्तावेज या रिकार्डो की प्रस्तावना। सारांश, नोट्स व प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त करना। 3. सामग्री केप्रमाणित नमूने लेना। 4. प्रिंट आउट, डिस्क, फ्लाॅपी, टेप, वीडियो कैसेटो के रूप में या कोई अन्य इलेक्ट्रानिक रूप में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
सूचना का अधिकार अधिनियम् 2005 के प्रमुख प्रावधानः
5- समस्त सरकारी विभाग, पब्लिक सेक्टर यूनिट, किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता से चल रहीं गैर सरकारी संस्थाएं व शिक्षणसंस्थान आदि विभाग इसमें शामिल हैं। पूर्णतः से निजी संस्थाएं इस कानून के दायरे में नहीं हैं लेकिन यदि किसी कानून के तहत कोई सरकारी विभाग किसी निजी संस्था से कोई जानकारी मांग सकता है तो उस विभाग के माध्यम से वह सूचना मांगी जा सकतीहै।
6- प्रत्येक सरकारी विभाग में एक या एक से अधिक जनसूचना अधिकारी बनाए गए है, जो सूचना के अधिकार के तहत आवेदन स्वीकार करते हैं, मांगी गई सूचनाएं एकत्र करते हैं और उसे आवेदनकर्ता को उपलब्ध कराते हैं।
7- जनसूचना अधिकारी की दायित्व है कि वह 30 दिन अथवा जीवन व स्वतंत्रताके मामले में 48 घण्टे के अन्दर (कुछ मामलों में45 दिन तक) मांगी गई सूचना उपलब्ध कराए।
8- यदि जनसूचना अधिकारी आवेदन लेने से मना करता है, तय समय सीमा में सूचना नहीं उपलब्ध् कराता है अथवा गलत या भ्रामक जानकारी देता है तो देरी के लिए 250 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से 25000 तक का जुर्माना उसके वेतन में से काटा जा सकता है। साथ ही उसे सूचना भी देनी होगी।