Wednesday, May 18, 2016

समाचार संग्रह: खबरें खोज निकालने की समस्या, पर लाएं कहां से?

शैलेश एवं ब्रजमोहन |
रिपोर्टर के लिए जरूरी नहीं है कि वो खबर में हमेशा अपने सूत्र के नाम का खुलासा करे। रिपोर्टर को अपने सूत्र के बारे में दूसरों को कभी जानकारी नही देनी चाहिए। जरूरी हो, तो रिपोर्टर को अपने सूत्र का नाम छिपाना चाहिए। खासकर तब जब नाम सामने आने पर सूत्र की नौकरी या जीवन पर कोई खतरा हो। सूत्र कोई जूनियर अधिकारी है, तो उसका नाम सामने आने पर बड़े अधिकारी उससे नाराज होकर उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं। कोई सूत्र अपराध, आतंकवादी संगठन या माफिया के बारे में कोई जानकारी देता है, तो उसके जीवन पर खतरा हो सकता है। ऐसे में सूत्र के नाम को गोपनीय रखना रिपोर्टर की जिम्‍मेदारी है
जब किसी न्‍यूज ऑर्गेनाइजेशन में कोई विद्यार्थी रिपोर्टर के तौर पर अपना काम शुरू करता है, तो सबसे पहले उसे खबरें खोज निकालने की समस्‍या से ही दो-चार होना पड़ता है। नया रिपोर्टर खबरों को खोज निकालने के लिए उत्‍साहित तो रहता है, लेकिन उसे इस बात की जानकारी नहीं रहती, कि वो खबर लाए कहां से। यानी खबरों के स्रोत का उसे पता नहीं होता।
नए आइडिया खोजने के लिए रिपोर्टर को बच्‍चे की तरह सोचना चाहिए, जिसमें हर छोटी-बड़ी चीज को जानने की इच्‍छा होती है। उसे हर घटना को पत्रकार नहीं, आम आदमी की नजर से देखना चाहिए, तभी वो घटना के तमाम पहलुओं से वाकिफ हो पाएगा और घटनाक्रम में अपने लिए न्‍यूज भी खोज पाएगा।
आइए जानते हैं कि एक रिपोर्टर को खबरें कहां-कहां से मिल सकती हैं और समाचार संग्रह में उसे किन-किन बातों का ध्‍यान रखना चाहिए। रिपोर्टर के पास समाचार संग्रह का मुख्‍यतौर पर दो जरिया (स्रोत) होता है। ये हैं पब्लि‍केशन (प्रकाशन) यानी छपी हुई सामग्री और पर्सन यानी लोग (व्‍यक्ति)। 
पब्लिकेशन के तहत किसी विभाग से जारी बुलेटिन, प्रेस विज्ञप्ति, दर्शकों की चिट्टी, ई-मेल, अखबार, पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेख समाचार संग्रह का जरिया हो सकते हैं। खासकर स्‍थानीय अखबार और पत्र-पत्रिकाओं न्‍यूज के अहम स्रोत हैं। खबरों के मामले में रिपोर्टर की नजर पारखी हो, तो इनमें छपी छोटी खबर भी कई बार स्‍कूप (चौंकाने वाली बड़ी खबर) बन सकती है।
सरकारी-गैरसरकारी संगठनों और दफ्तरों के सूचना विभागों से भी रिपोर्टर को अहम खबरें मिलती रहती है। आमतौर पर इन दफ्तरों से विकास के काम से जुड़ी सूचनाएं, विवादों पर सफाई जैसे मुददों पर प्रेस नोट, विज्ञप्ति जारी होती है, जिन्‍हें न्‍यूज के स्रोत के तौर पर इस्‍तेमाल किया जाता है।
खबरों का एक बड़ा सोर्स प्रेस कॉन्‍फ्रेंस भी है। सरकारी, निजी संस्‍थान हों, राजनीतिक पार्टियां हों या आम नागरिक, किसी मुददे पर अपना पक्ष रखने के लिए कोई प्रेस कॉन्‍फ्रेंस बुला सकता है। प्रेस कॉन्‍फ्रेंस बुलाने वाला, तमाम न्‍यूज एजेंसियों के प्रतिनिधियों को किसी खास जगह पर आमंत्रित करता है और प्रेस प्रतिनिधियों के सामने सं‍बंधित मुददे पर अपना पक्ष, अपनी राय या नीतियों की जानकारी देता है। 
पर्सन (व्‍यक्ति)- न्‍यूज सोर्स में पर्सन का दायरा बहुत बड़ा है। किसी घर में हत्‍या हो जाती है और पड़ोसी इस वारदात की जानकारी रिपोर्टर को देता है तो वो पड़ोसी, रिपोर्टर के लिए खबर का सोर्स है। 
रिपोर्टर जहां रहता है, उसके आसपास का इलाका, वहां के लोग और उनकी गतिविधियां, खबरों का सबसे बड़ा स्रोत होती हैं। इसलिए रिपोर्टर को उस इलाके के चप्‍पे-चप्‍पे की जानकारी होनी चाहिए और तमाम छोटे-बड़े अधिकारियों के नाम-पते भी उसके पास होने चाहिए। शहर की राजनीतिक गतिविधियों पर उसकी नजर होनी चाहिए और उसे पार्टी के दफ्तरों का भी चक्‍कर लगाते रहना चाहिए। रिपोर्टर को शहर की समस्‍याओं, हर छोटी-बड़ी संस्‍थाओं के बारे में भी पता होना चाहिए। स्‍कूल, कॉलेज, ऑफिस, अस्‍पताल, थाना, कोर्ट-कचहरी, स्‍टेशन, बस स्‍टैंड या दूसरी तमाम सार्वजनिक जगहों की जानकारी होनी चाहिए। ये तमाम जगहें, खबरों का स्रोत हो सकती हैं।
दूसरी ओर किसी मंत्रालय का एक कर्मचारी ऐसी बात रिपोर्टर को बताता है, जिससे विभाग के बड़े अफसर या किसी नेता के भ्रष्‍टाचार, गड़बड़ फैसलों का भंडा फूटता हो, तो वो कर्मचारी भी रिपोर्टर का सोर्स (सूत्र) हो सकता है। 
सूत्र (Source)– खबरों के संग्रह में सूत्र भी अ‍हम भूमिका निभाते हैं। अक्‍सर एक वाक्‍य पढ़ने या सुनने को मिलता है-सूत्रों के मुताबिक। मन में जिज्ञासा होती है कि ये सूत्र कौन हैं, जिनकी मदद हर रिपोर्टर लेता है। दरअसल खबरों के संग्रह में सूत्र (सोर्स) रिपोर्टर की अहम मदद करते हैं। रिपोर्टर अपनी ज्‍यादातर खबर इन्‍हीं की मदद से दर्शकों तक पहुंचाता है।
जो भी व्‍यक्ति रिपोर्टर को खबर देता है, वो खबर का सूत्र कहलाता है। जैसे किसी विभाग का बड़ा अधिकारी या प्रवक्‍ता, जब रिपोर्टर को खबर देता है, तो वो खबर का सूत्र होता है। रिपोर्टर अपनी खबर में उस अधिकारी का नाम डालता है, तो खबर की विश्‍वसनीयता बढ़ती है। लेकिन कई बार रिपोर्टर को सूचना ऐसे कर्मचारी या व्‍यक्ति से मिलती है, जो अपना नाम या पहचान जाहिर नहीं करना चाहता। ऐसे में रिपोर्टर को उसका नाम छिपाना पड़ता है और खबर सूत्र या विश्‍वसनीय सूत्र के हवाले से जारी करनी पड़ती है।
आशुतोष के मुताबिक सूत्र माने, वो शख्‍स, जो रिपोर्टर को खबर दे रहा है। ये पुलिस का कोई अधिकारी भी हो सकता है, या फिर कोई मंत्री या किसी संस्‍था से जुड़ा व्‍यक्ति भी। 
प्रबल प्रताप सिंह कहते हैं सूत्र नहीं, मित्र बनाइये। इसका मतलब ये है कि खबर देने वाले को आप पर भरोसा हो और आपका, खबर देने वाले पर भरोसा हो। एक रिपोर्टर जितने ज्‍यादा लोगों के सम्‍पर्क में रहेगा, उसे खबरें उतनी ज्‍यादा मिलेंगी। लेकिन हर किसी पर भरोसा भी नहीं किया जा सकता। किसी की दी हुई खबर का इस्‍तेमाल करने से पहले जरूरी है कि खबर देने वाले को अच्‍छी तरह जांच-परख लिया जाए और उसकी दी हुई सूचना की जांच-पड़ताल भी दूसरे सूत्र से कर ली जाए। 
परवेज अहमद कहते है कि रिपोर्टर के लिए जरूरी है कि वो अपना सूत्र बनाए, लेकिन तथ्‍यों को क्रॉस चेक किया जाना चाहिए। रिपोर्टर को यह भी मान कर चलना चाहिए कि कोई सूत्र खबर दे रहा है तो जरूर उसमें उसका हित या स्‍वार्थ शामिल होगा और रिपोर्टर को हित और स्‍वार्थ में भी फर्क समझना होगा। 
न्‍यूज के सोर्स यानी सम्‍पर्क सूत्र तीन तरह के हो सकते हैं।
News Source
-Fool                                      -Devil                                     -Angel
Fool- यानी मूर्ख- ये ऐसे सम्‍पर्क सूत्र हैं, जिनमें किसी घटना या जानकारी को समझने की क्षमता नहीं होती। ये देखते या जानते कुछ हैं और उसका मतलब कुछ और निकालते हैं। ऐसे लोग नासमझी और आधी-अधूरी जानकारी से रिपोर्टर को मूर्ख बना देते हैं। अच्‍छे रिपोर्टर को ऐसे सोर्स या सम्‍पर्क सूत्र से दूर ही रहना चाहिए।
Devil – या शैतान- ये ऐसे सम्‍पर्क सूत्र या सोर्स हैं, जो जानते और समझते तो सब कुछ हैं, लेकिन अपने किसी खास मकसद से रिपोर्टर को गुमराह करके गलत खबरे प्‍लांट करने की कोशिश करते हैं। अफवाह फैलाने वाले लोग इसी श्रेणी में आते हैं। रिपोर्टर को ऐसे सोर्स से हमेशा सावधान रहना चाहिए। ऐसे सोर्स गलत खबरों के जरिए बवंडर मचा सकते हैं और रिपोर्टर तथा चैनल को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं। याद रखिए कि गुमराह करने वाली खबर से आपकी नौकरी जा सकती है। रिपोर्टर के रूप में आपकी साख हमेशा के लिए खत्‍म हो सकती है और आपको कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। एक खबर की जिम्‍मेदारी हमेशा रिपोर्टर और चैनल की होती है। रिपोर्टर ये कहकर जिम्‍मेदारी से नहीं बच सकता कि सोर्स ने उसे गलत खबर दी है। खबर के लिए सोर्स की कोई जिम्‍मेदारी नहीं होती है। मामला अदालत तक पहुंचता है, तो रिपोर्टर और चैनल की ही जिम्‍मेदारी होती है कि वो खबर को सही साबित करें।
Angel – यानी देवदूत- Angel ही रिपोर्टर के सबसे अच्‍छे और भरोसेमंद सोर्स होते हैं। वो रिपोर्टर को कभी गलत सूचना नहीं देते। उनका मकसद सूचना से कोई फायदा उठाना नहीं होता। ऐसे सोर्स दरअसल जनहित में सूचनाओं को बाहर लाते हैं। 
जब कभी कोई सोर्स आपको खबर दे, तो यह जरूर तय कर लें कि सोर्स Fool, Devil या Angel में कौन है। रिपोर्टर को तीनों तरह के सोर्स से सम्‍पर्क रखना पड़ सकता है, लेकिन उसे भरोसा सिर्फ Angel पर ही करना चाहिए। Fool या Devil की सूचनाओं को भरोसेमंद सोर्स से पूरी तरह पुष्टि कर लेने के बाद ही खबर फाइल करनी चाहिए। 
समाज के हर तबके में रिपोर्टर की पैठ होनी चाहिए। हर पत्रकार के लिए काम का क्षेत्र बंटा होता है और उसे अपने क्षेत्र (BEAT) के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। दूसरे शब्‍दों में रिपोर्टर को उन संस्‍थाओं या विभागों के बारे में छोटी-छोटी बातों की भी जानकारी रखनी चाहिए, जिसकी जिम्‍मेदारी उसे सौंपी गई है। लेकिन इन सबसे ज्‍यादा जरूरी है कि रिपोर्टर वहां सूत्र जरूर खोज ले। यही उसकी सफलता का मूलमंत्र साबित होगा। 
सूत्र रिपोर्टर के लिए खबर हासिल करने का सबसे बड़ा जरिया होता है और जिस रिपोर्टर के सम्‍पर्क जितने मजबूत होंगे, वो रिपोर्टर कामयाबी के पायदान पर उतना ही ऊपर होगा। सूत्र की मदद के बिना अच्‍छी और चौंकाने वाली स्‍टोरी ब्रेक करना किसी रिपोर्टर के लिए मुमकिन नहीं है। क्‍योंकि रिपोर्टर को सूत्र न केवल भ्रष्‍टाचार, अपराध और घोटालों की जानकारी देता है, बल्कि इसकी प्रामाणिकता के लिए सबूत के तौर पर जरूरी कागजात और दूसरी चीजें भी मुहैया कराता है, जिससे खबर की सच्‍चाई पर सवाल न उठे। 
रिपोर्टर को कोशिश करनी चाहिए कि हर फील्‍ड के जानकार लोगों से उसके व्‍यक्तिगत और सामाजिक सम्‍पर्क हों और ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग उसे जानें-पहचाने। रिपोर्टर को ऐसे लोगों से मिलते-जुलते रहना चाहिए और मुलाकात मुमकिन नहीं हो, तो फोन के जरिए ही सम्‍पर्क बनाए रखना चाहिए। 
खास लोगों से सम्‍पर्क रिपोर्टर को उसके प्रोफेशन में फायदा पहुंचाता है। ऐसे लोग भी रिपोर्टर के लिए सूत्र (सोर्स) का काम करते हैं। खास लोगों में राजनीतिक पार्टियों के बड़े नेता, सिलेब्रिटिज, बड़े अधिकारी या मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता, कोई भी हो सकता है। रिपोर्टर को इस बात का ख्‍याल रखना चाहिए कि ऐसे लोगों से ज्‍यादा खबरें नहीं मिलेंगी, लेकिन जब मिलेंगी, तो वो काफी बड़ी खबर होगी। 
रिपोर्टर को हमेशा याद रखना चाहिए कि उसका सूत्र आम व्‍यक्ति भी हो सकता है। आम आदमी भी समाचार संग्रह का बड़ा जरिया होता है। हर जगह कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो किसी घटना या वारदात के बारे में अच्‍छी तरह बता सकते हैं और सही जानकारी दे सकते हैं।
अपराध की खबरें कवर करने वाले रिपोर्टरों के लिए थाने के अधिकारी, यहां तक की सिपाही भी न्‍यूज का अच्‍छा स्रोत बन सकते हैं। लगातार इनसे सम्‍पर्क बनाए रखने से इलाके में होने वाली वारदातों की जानकारी रिपोर्टर को तुरन्‍त मिल जाती है। 
लेकिन ये काम आसान नहीं, क्‍योंकि कोई भी पर्दे के पीछे की बात बताना तो दूर, दोस्‍ती भी उसी से करना चा‍हेगा, जिस पर उसे भरोसा हो। इसके लिए रिपोर्टर को सबसे पहले तो उस विभाग या संस्‍था के चक्‍कर लगाने होंगे और वहां के लोगों से परिचय बढ़ाना होगा। एक बात याद रखनी चाहिए कि किसी भी विभाग का एक छोटा कर्मचारी भी रिपोर्टर को बड़ी खबर दे सकता है, इसलिए सबसे पहला काम ये है कि रिपोर्टर वहां इस बात की तलाश करे कि उसके काम आने वाले कौन-कौन लोग हैं। हर विभाग में ऐसे लोग होते हैं, जिन्‍हें वहां होने वाले हर काम और गतिविधियों की थोड़ी-बहुत जानकारी होती है और ऐसे लोग रिपोर्टर के लिए बड़े काम के हैं। 
रिपोर्टर के लिए जरूरी है कि वो अपने सूत्र के लगातार सम्‍पर्क में रहे। ऐसा होता है कि रिपोर्टर महीनों अपने काम के लोगों से बात नहीं करता और जब खबर की जरूरत पड़ती है, तो उसे फोन करता है। लेकिन तब तक सम्‍बन्‍धों में दूरी पैदा हो जाती है और खबर देने के लिए सूत्र का उत्‍साह भी खत्‍म हो चुका होता है। ये भी हो सकता है, आपसे दूरी बढ़ने के बाद वो किेसी दूसरे रिपोर्टर का ज्‍यादा करीबी बन जाए और पहले आपको खबर नहीं दे। सूत्र से जान-पहचान हो जाने के बाद उससे बार-बार सम्‍पर्क करना चाहिए। हो सकता है कि रिपोर्टर को लम्‍बे समय तक सूत्र से कोई खबर नहीं मिले, लेकिन उसका हालचाल पूछते रहिए। ये पूछते रहें कि संस्‍था या उसके दफ्तर में क्‍या कुछ नया हो रहा है। कई बार तो ऐसी बातचीत के दौरान ही बढि़या खबर निकल आती है।—————————————————————————————————————-
रिपोर्टर के लिए ये समझना जरूरी है कि जो आदमी उसके लिए काम कर रहा है, उसका मकसद क्‍या है? क्‍योंकि मुमकिन है‍ कि जो आदमी रिपोर्टर को खबर मुहैया करा रहा हो, उसका अपना कोई निजी स्‍वार्थ हो और किसी को बदनाम करने के लिए वो रिपोर्टर का इस्‍तेमाल करना चाहता हो। इसलिए किसी को सूत्र बनाने से पहले उसके चाल और चरित्र के बारे में पूरी जानकारी रिपोर्टर को हासिल कर लेनी चाहिए। इससे बाद में धोखा खाने का डर नहीं रहता—————————————————————————————————————————
सूत्र से सम्‍पर्क बनाए रखने का सबसे आसान तरीका है कि रिपोर्टर के पास उसका फोन नम्‍बर जरूर हो और मुलाकात भले ही कम हो, फोन पर उससे बातचीत होती रहे। सूत्र के घर का या निजी नम्‍बर भी रिपोर्टर के पास जरूर होना चाहिए। यहां पर एक बात का उल्‍लेख जरूरी है कि रिपोर्टर को अपने सूत्र के घर के बारे में भी जानकारी रखनी चाहिए। 
कई बार ऐसा होता है कि रिपोर्टर जब अपने सोर्स को फोन करे, तब व्‍यस्‍तता की वजह से वो बात ही न कर पाए। इसलिए इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि सोर्स का फ्री टाइम क्‍या है, कब वो फुरसत में बात कर सकता है। साथ ही रिपोर्टर को अपने सूत्र से लगातार सम्‍पर्क तो बनाए रखना चाहिए, लेकिन उसका इस्‍तेमाल तभी करना चाहिए, जब जरूरत हो। 
ये सही है कि सूत्र से ज्‍यादातर बातचीत फोन पर ही होती है, लेकिन समय-समय पर उससे मिलते रहना भी जरूरी है। कई बार ऐसे लोग सार्वजनिक जगहों पर बात करने से कतराते हैं। ऐसे में घर पर आराम से बातचीत हो सकत है। ऐसी मुलाकात से आत्‍मीयता बढ़ती है और एक-दूसरे पर भरोसा भी।
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रिपोर्टर को इतना सावधान रहना चाहिए कि उससे कोई बड़ी गलती न हो जाए। याद रखें कि आपी खबर देश, समाज या किसी समूह पर बड़ा असर डाल सकती है। दंगे की खबर किसी दूर के इलाके में खलबली मचा सकती है। इसलिए किसी भी सूरत में कोई गलती नहीं होनी चाहिए। 26 नवम्‍बर 2008 को मुम्‍बई में आतंकी हमले के दो दिन बाद कुछ चैनलों ने खबर दिखा दी कि कुछ और आतंकवादी रेलवे स्‍टेशन और कुछ दूसरी जगहों पर गोलियां चलाते हुए घूम रहे हैं। इस खबर से मुम्‍बई और देश के दूसरे हिस्‍से में दोबारा सनसनी फैला दी। बाद में पता चला कि खबर गलत थी
—————————————————————————————————————–सूत्र से बात करते समय रिपोर्टर अपना दिमाग खुला रखे और बातचीत में खबरों की टोह भी लेता रहे। हो सकता है कि बातचीत की एक लाइन से ही बड़ा स्‍कूप मिल जाए और दूसरे दिन रिपोर्टर और उसकी खबर सुर्खियों में हो। लेकिन य तभी सम्‍भव है जब रिपोर्टर अपनी बीट से बखूबी वाकिफ हो।
रिपोर्टर को चाहिए कि वो अपने सूत्र को ये जरूर बता दे कि उसकी दी गई सूचनाओं का वो कैसे इस्‍तेमाल करेगा, ताकि बाद में सूत्र किसी मुश्किल में न फंसे। 
खबर निकालने के लिए अपने सूत्र को पूरा वक्‍त दें। सूत्र से जल्‍दबाजी या दबाव में काम नहीं लेना चाहिए। ऐसा करने से भयंकर भूल हो सकती है और आखिरकार नुकसान रिपोर्टर को ही उठाना पड़ेगा। कई बार तो सूत्र धमाकेदार खबर दे सकता है, लेकिन रिपोर्टर को अन्‍दर की कोई खबर मिले, तो उसे खबर से जुड़ी जानकारी अपने सूत्र को भी बतानी चाहिए। खबर की पुष्टि में ऐसी जानकारी काफी मददगार साबित हो सकती है। 
इस तरह हम कह सकते है कि सूत्र या सोर्स किसी स्‍टोरी को लोगों तक पहुंचाने में रिपोर्टर के लिए सूत्रधार की तरह काम करते हैं। यानी यही वो जरिया हैं, जिसकी पहली सूचना के आधार पर रिपोर्टर किसी खबर की परत दर परत खोलता है और वो खबर ब्रेकिंग या एक्‍सक्‍लूसिव न्‍यूज के तौर पर दर्शकों के सामने होती है। 
सावधानियां
किसी को सूत्र बनाने से पहले कुछ साव‍धानियां जरूरी है। रिपोर्टर को अपने सोर्स के बारे में पूरी जानकारी रखनी चाहिए। मसलन
-उसका नाम क्‍या है?
-कहां का रहने वाला है?
-उसके करीबी लोग कौन हैं?
-पहले उसने कहां-कहां काम किया है।
-जहां वो काम करता है, वहां के ज्‍यादातर लोगों से उसके संबंध कैसे हैं।
-वो किस पद पर काम करता है और विभाग में उसकी कितनी पैठ है।
रिपोर्टर के लिए ये समझना जरूरी है कि जो आदमी उसके लिए काम कर रहा है, उसका मकसद क्‍या है? क्‍योंकि मुमकिन है‍ कि जो आदमी रिपोर्टर को खबर मुहैया करा रहा हो, उसका अपना कोई निजी स्‍वार्थ हो और किसी को बदनाम करने के लिए वो रिपोर्टर का इस्‍तेमाल करना चाहता हो। इसलिए किसी को सूत्र बनाने से पहले उसके चाल और चरित्र के बारे में पूरी जानकारी रिपोर्टर को हासिल कर लेनी चाहिए। इससे बाद में धोखा खाने का डर नहीं रहता। 
रिपोर्टर के लिए जरूरी नहीं है कि वो खबर में हमेशा अपने सूत्र के नाम का खुलासा करे। रिपोर्टर को अपने सूत्र के बारे में दूसरों को कभी जानकारी नही देनी चाहिए। जरूरी हो, तो रिपोर्टर को अपने सूत्र का नाम छिपाना चाहिए। खासकर तब जब नाम सामने आने पर सूत्र की नौकरी या जीवन पर कोई खतरा हो। सूत्र कोई जूनियर अधिकारी है, तो उसका नाम सामने आने पर बड़े अधिकारी उससे नाराज होकर उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं। कोई सूत्र अपराध, आतंकवादी संगठन या माफिया के बारे में कोई जानकारी देता है, तो उसके जीवन पर खतरा हो सकता है। ऐसे में सूत्र के नाम को गोपनीय रखना रिपोर्टर की जिम्‍मेदारी है। 
लेकिन रिपोर्टर से उसके वरिष्‍ठ सहयोगी, सूत्र का नाम और उसके सम्‍पर्क का पता पूछ सकते हैं, ताकि वो खुद भी खबर की सत्‍यता की जांच कर सकें। रिपोर्टर अपने वरिष्‍ठ सहयोगी से सूत्र का नाम नहीं छिपा सकता, लेकिन रिपोर्टर अपने वरिष्‍ठ सहयोगी से सूत्र का नाम गोपनीय रखने का आग्रह कर सकता है।
खबर को लेकर कानूनी विवाद की स्थिति में अदालत भी रिपोर्टर से सूत्र का नाम पूछ सकती है। अदालत को सूत्र का नाम नहीं बताने पर रिपोर्टर को सजा भी हो सकती है। इसलिए बेहतर है कि रिपोर्टर अपने गोपनीय सूत्र से सूचना इकट्ठा करे, लेकिन मुमकिन हो, तो आधिकारिक सूत्रों से भी उसकी जांच-पड़ताल कर ले और उस पर ऑफिशियल वर्जन लेने के बाद ही रिपोर्ट फाइल करे। ऐसा करने पर आधिकारिक सूत्र सामने आ जाते हैं और रिपोर्टर को अपनी असली गोपनीय सूत्र को सामने लाने की जरूरत कभी नहीं पड़ती। 
रिपोर्टर को इतना सावधान रहना चाहिए कि उससे कोई बड़ी गलती न हो जाए। याद रखें कि आपी खबर देश, समाज या किसी समूह पर बड़ा असर डाल सकती है। दंगे की खबर किसी दूर के इलाके में खलबली मचा सकती है। इसलिए किसी भी सूरत में कोई गलती नहीं होनी चाहिए। 26 नवम्‍बर 2008 को मुम्‍बई में आतंकी हमले के दो दिन बाद कुछ चैनलों ने खबर दिखा दी कि कुछ और आतंकवादी रेलवे स्‍टेशन और कुछ दूसरी जगहों पर गोलियां चलाते हुए घूम रहे हैं। इस खबर से मुम्‍बई और देश के दूसरे हिस्‍से में दोबारा सनसनी फैला दी। बाद में पता चला कि खबर गलत थी। एक रेलवे स्‍टेशन पर एक मेटल डिटेक्‍टर गिर पड़ा, जिसकी धमाकेदार आवाज से स्‍टेशन पर भगदड़ मच गई। पुलिस और जांच एजेंसियों को बुला लिया गया और छानबीन के बाद पुलिस ने खबर का खंडन कर दिया। इस खबर ने रिपोर्टर और चैनल दोनों को मुश्किल में डाल दिया। काश, रिपोर्टर ने Fool और Devil की बातों में नहीं आकर Angel से सम्‍पर्क किया होता, तो रिपोर्टर और चैनल के सामने इस तरह की मुसीबत खड़ी नहीं होती।
इसलिए जब भी कोई सूचना मिले, तो सबसे पहले अपने विश्‍वसनीय सोर्स (Angel) से सम्‍पर्क करके सौ फीसदी तय कर लें, कि खबर पूरी तरह पक्‍की है। उसमें गलती की कोई गुंजाइश नहीं है।
 शैलेश: बनारस हिन्दून विश्व विद्यालय में पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान दैनिक जागरण के लिए रिपोर्टिंग। अमृत प्रभात (लखनऊदिल्लीज) में करीब 14 साल तक काम। रविवार पत्रिका में प्रधान संवाददाता के तौर पर दो साल रिपोर्टिंग। 1994 से इेक्ट्रॉवनिक मिडिया में। टीवीआई (बी आई टीवी) आजतक में विशेष संवाददाता। जी न्यूसज में एडिटर और डिस्क वरी चैनल मेंक्रिएटिव कंसलटेंट। आजतक न्यूलज चैनल में एक्जिक्यूतटिव एडिटर रहे । प्रिंट और इलेक्ट्रिॉनिक मीडिया में 35 साल का अनुभव।
डॉ. ब्रजमोहन: नवभारत टाइम्स से पत्रकारिता की शुरूआत। दिल्ली में दैनिक जागरण से जुड़े। 1995 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में। टीवीआई (बीआई टीवी)सहारा न्यूतजआजतकस्टार न्यूज, IBN7 जैसे टीवी न्यूर चैनलों और ए.एन.आईआकृतिकबीर कम्युनिकेशन  जैसे प्रोडक्शचन हाउस में काम करने का अनुभव। IBN7 न्यूकज चैनल में एसोसिएट एक्जिक्यूंटिव प्रोड्यूसर रहे । प्रिंट और इलेक्ट्रॉंनिक मीडिया में 19 साल का अनुभव।

खबर लिखने का तरीका

टीवी न्यूज के पर्दे पर दिखाई पड़ती है, इसे पर्दे तक पहुंचाने के लिए एक कैमरे की जरूरत पड़ती है, एडिटिंग मशीनों का सहारा लेना पड़ता है और उपग्रह प्रणाली की जटिल तकनीक का इस्तेमाल करके ये खबर सीधे आपके टीवी तक पहुंचती है। खबर के इस तकनीकी सफर में भी क्या कलम का कोई इस्तेमाल है! जवाब हां भी है और नहीं भी है, आज लगभग हर न्यूज चैनल में खबरे कंप्यूटर्स पर ही लिखी जाती है यानि जो काम पहले कलम से होता था, आज वही काम कंप्यूटर पर होता है। इसका मतलब ये है कि भले आप जेब में कलम न रखें पर लिखने की शैली को एक धारदार हथियार की तरह सदा तराशते रहें।
न्यूज में काम करना है तो खबर लिखना आना चाहिए। खबर लिखना उसी अंदाज में होता है जिस अंदाज में कोई बढ़ई एक कुर्सी या एक मेज तैयार करता है। उसे मालुम होता है कि उसे कैसे बनाना है पर फिर भी वो एक डिजाइन बनाता है और उस डिजाइन के हिसाब से क्रम दर क्रम लकडिय़ों को जोड़ता जाता है। इस जोडज़ाड़ के लिए उसके पास अपने औजार होते है, खबर भी बिल्कुल इसी अंदाज में लिखी जाती है। खबर लिखने के भी डिजाइन होते है, खबर लिखने के भी तरीके होते हैं और खबर लिखने के लिए कुछ तकनीकी बिंदु भी होते हैं, आप चाहे तो इन तकनीकी बिंदुओं को बढ़ई के औजार समझ लें, बस इन्हें उठाइए और खबर लिख डालिए, और हां, खबर लिखने के ये औजार आपके दिमाग में रहते हैं, आप चाहे तो किसी को भी ये सब सिखा सकते है।
चलिए समझते है खबर लिखने के तकनीकी तरीके-
वाक्य और पैराग्राफ की समझ
1. हिंदी और अंग्रेजी दोनों में ही कर्ता और क्रिया का इस्तेमाल होता है, अंग्रेजी में हम इन्हें सब्जेक्ट और वर्ष कह देते हैं। जब आप किसी न्यूज स्टोरी को लिखने बैठें तो वाक्य कुछ इस तरह से बनाएं कि कर्ता और क्रिया वाक्य के शुरू में ही आ जाएं और कहं जाने वाले बाकी शब्द उस वाक्य में बाद में आएं। डरिए मत, अगर आपका वाक्य बहुत ज्यादा लंबा भी हो तो भी कर्ता और क्रिया के शुरू में आ जाने से वाक्य ज्यादा स्पष्ट होगा और ज्यादा दमदार भी।
एक उदाहरण देख लीजिए:
उच्चतम न्यायालय ने आदेश किया है कि दिल्ली में दस साल से ज्यादा पुराने वाहनों को प्रतिबंधित कर दिया जाए।
इसे दूसरे तरीके से लिखें तो कुछ यूं होगा:
उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली में दस साल से ज्यादा पुराने वाहनों को प्रतिबंधित करने का आदेश दिया है।
ध्यान से पढि़ए, आप पाएंगे कि पहले वाले उदाहरण में स्पष्टता और दम दूसरे वाले से ज्यादा है, बात ये है कि ये वाक्य सिर्फ लिखा या पढ़ा जाना नहीं है, इसे बोला जाना है, बोलकर देखिए, आप खुद समझ जाएंगे कि कर्ता और क्रिया के इधर रखने या उधर रखने से क्या फर्क पड़ता है।
क्रिया का वर्ष का इस्तेमाल सोच विचार कर करें। जब आप लिख रहे हो कि ‘इमारत ढह गई’ तो आप ये भी तो लिख सकते थे कि ‘इमारत नष्ट हो गई’- ढहना और नष्ट होना दोनों ही वर्ष या क्रिया है पर नष्ट होना ज्यादा दमदार क्रिया है, सबक ये है कि जरा दमदार क्रिया का इस्तेमाल करें। विशेषण लगाने की कोई जरूरत नहीं हैं। विशेषण वाक्य की संरचना में कोई खास भूमिका नहीं निभाते- कम से कम न्यूज राइटिंग ये। सोच कर देखिए- आप लिखें कि ‘इमारत पूर्णत: नष्ट हो गई’ या फिर ये लिखें कि ‘इमारत पूरी तरह से नष्ट हो गई’- तो ऐसा लिखकर आप क्या कर रहे होते हैं? शब्दों का बेवजह और बेजगह इस्तेमाल-‘इमारत नष्ट हो गई’ लिखना पर्याप्त था, उसमें पूर्णत: पूरी तरह से या संपूर्ण रूप से जोडऩा गैरजरूरी है, जो इमारत नष्ट हुई है वो पूरी तरह से नष्ट हुई है ये स्पष्ट है, हां अगर सिर्फ कुछ मंजिलों को नुकसान पहुंचा हो तो लिखना भी जरूरी होगा।
3. आप वाक्य लिखें या वाक्यों को तोडक़र कोई पैराग्राफ पूरा करें, ये ध्यान रखें कि दमदार शब्द शुरूआत में रखे जाएं।
हर नियम के अपवाद हो सकते हैं, कई बार नियमों को तोडऩा जरूरी भी हो जाता है पर इसका मतलब ये भी नहीं कि नियम बनाएं ही न जाएं- वाक्य संरचना के ऊपर लिखें नियमों को समझ लीजिए और जब लिखों का हाथ साफ हो जाए तब नए प्रयोग भी करिए-कई नई बातें आप खुद खोज लेंगें।
चलिए अब भाषा की बात करते हैं:
भाषा:
1. पहली सीधी सी बात ये है कि एक ही शब्द या एक जैसे शब्दों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल न करें। एक ही वाक्य या पैराग्राफ में आप बार-बार आदेश दिया है, आदेश के अुनसार, आदेश ये कहा गया है जैसा लिखेंगे तो कैसा लगेगा ये आप समझ सकते हैं।
2. शब्दों से खेलना सीखिए…ये जरा सी मुश्किल बात जरूर है पर मुमकिन है, आप सिर्फ लेखक बनकर न्यूज स्टोरी नहीं लिखते है आप पत्रकार भी होते हैं, इसलिए पत्रकार की नजर से शब्दों को देंखे- कई बार शब्द ही आपको स्टोरी लिखने का नया अंदाज दे देंगे।
3. इधर-उधर की अधूरी बातें लिखने के बजाए ठोस और सटीक बातें लिखिए। जहां किसी व्यक्ति विशेष की खबर हो तो खबर में उसका नाम भी हो, सिकी प्रोडक्ट की बात करें तो जरा उसका ब्रांड नेम भी बता दीजिए-दर्शकों को अधूरी सूचना न दें।
4. जरूरत से ज्यादा नाटकीयता खबर को खराब कर सकती है, खबर की सच्चाई को खबर की नाटकीयता में गुमा मत दीजिए।
5. जब कभी बड़ी जटिल खबर हो तो उसे बेहद सीधे और सरल ढंग से कहिए। ध्यान रखिए, आप खबर आम लोगों के लिए लिख रहे हैं, खबर लिखने का उद्देश्य आपकी विद्वता का प्रदर्शन नहीं है। सीधे सच्चे ढंग से बात को समझाइए।
6. खबर को अगर आम लोगों के बीच की आम भावनाओं में डालकर आप लिख सकें तो आपकी खबर का असर बढ़ जाएगा। देखिए खबरों में भी कहानियां ही होती हैं- घर वापसी की खबर, जीत की खबर, हार की खबर, मुश्किलों की खबर- ये सब खबरें कहीं न कहीं भावनाएं रखती हैं- इन भावनाओं को पकडक़र न्यूज लिखना एक कला है पर अगर आपने ये सीख लिया तो आप एक शानदार पत्रकार तो रहेंगे ही, एक शानदार लेखक भी कहलाएंगे।
लिखने के कुछ विंदु
1. आपकी खबर लोगों क समझ में आ जाए इसलिए उसमें जरूरत से ज्यादा चीजें न ठूसिएं। जरा ये पढि़ए-
उच्चतम न्यायालय ने विवेक शर्मा नाम के डॉक्टर द्वारा दाखिल पी.आई.एल. को आधार बनाकर केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के परिवहन मंत्रालय को परसों चार बजे एक नोटिस भेजकर जस्टिस पीसी शर्मा की अदालत में इसका लिखित जवाब देने को कहा है कि क्यों न दिल्ली की सडक़ों पर चल रहे दस साल से पुराने वाहनों को प्रतिबंधित कर दिया जाए।
ऊऊऊऊफा!!!
समझे आप… ऐसा कभी न लिखे। छोटे-छोटे वाक्यों में लिख दीजिए, दर्शकों को समझ में भी आएगा और वो उस खबर को आत्मसात भी कर पाएंगे।
2. आपकी न्यूज स्टोरी भाषाई रूप में बिल्कुल संतुलित रहे इसके लिए कभी छोटे वाक्य लिखिए, कभी बड़े वाक्य- ये तालमेल आपकी स्टोरी को एक रिद्म देगा जो खबर बोले जाते वक्त अच्छा लगेगा।
3. आप जो खबर देने जा रहे हैं या लिखने जा रहे हैं वो एक घटना है जो कहीं हुई है, आपके पास उसके दृश्य भी हैं। कई बार यूं भी कर सकते हैं कि दृश्यों को ध्यान में रखकर एक खाका सा खींचे-एक मित्रण सा करें- और उसके बाद शुरू करें उस खबर का अंवेषण और विश्लेषण। ये एक तरह की मिक्स मसाला टाइप की राइटिंग है जिसमें कुछ तो अप लिखते हैं और कुछ दृश्य बोलते हैं, एक जटिल सी बात है पर जब आप करने लगेंगे तो आपको बेहद सरल लगेगी ये बात।
4. कोशिश कीजिए कि जब किसी चीज या व्यक्ति की कोई खासियत बताई जा रही हो तो वो उस व्यक्ति या चीज के खुद के एक्‍सन से जाहिर हो जाए, आप अपनी तरफ से शब्द न ठूंसे। उदाहरण के लिए ये लिखने की जरूरत नहीं है कि ‘उत्साही खिलाड़ी ने कहा’, आपकी खबर में दृश्य भी होंगे, उस खिलाड़ी का उत्साह उन दृश्यों में दिखाए, ज्यादा अच्छा लगेगा।
5. अपनी खबर लिखने के बाद खुद बोलकर देखिए, जब बोलिए तो सुनने पर ध्यान लगाइए, आपको अपनी आवाज में खबर कैसी लग रही है! …सुनते वक्त एक दर्शक की तरह सुनिए-आपकी ये आवाज ही आपकी खबर को दर्शकों तक ले जाएगी-आपके शब्द, वाक्य और उनका गठजोड़ आपकी आवाज पर फबना चाहिए वर्ना?…वर्ना वो किसी काम का नहीं।
खबर का ढांचा बनाना
1. टीवी न्यूज में खबर लिखने को स्टोरी लिखना कहा जाता है, स्टोरी का मतलब है कहानी। जैसा मैने पहले भी बताया है कि हर खबर एक कहानी होती है और इस कहानी को लिाते वक्त एक्‍शन, ड्रामा, नाटकीयता, क्रमिका, संघर्ष, वादविवाद और संवादों को उनकी पूरी जगह दें। सीधे-सीधे कहूं तो यूं समझिए कि स्टोरी को जरा रसीले ढंग से लिखिए।
2. खबर को रोचक बनाने की कोशिश करें। कुछ और चीजों का इस्तेमाल करिए जैसे कि स्पेशल इफेक्टस। जो सूचना या जानकारी आप खबर में बोलकर भी दे सकते है, कभी-कभी उसे ग्रॉफिक्स या एनीमेशन का सहारा लेकर अपनी स्टोरी में रखिए-आपकी बात आसानी से समझी जा सकेगी और दर्शको को अच्छा लगेगा।
3. आप कुछ विजुअल्स (दृश्य) को या ग्राफिक्स को एक से ज्यादा बार भी दिखा सकते है बशर्ते वो आपकी स्टोरी में कहे जा रहे मुद्दों को जोड़ते हों। मान लीजिए सडक़ पर जा रहे एक वाहन पर आतंकवादियों ने हमला किया था और आपने इसे एनीमेशन के जरिए दिखाया तो पहले आप इसे दिखाकर बताते है कि ऐसे घटना घटित हुई। फिर आप कहते हैं कि सडक़ पर जा रहे मुसाफिरों ने बताया है कि घटना ऐसे घटित नहीं हुई। अब आप उसी एनीमेशन को फिर से दिखाकर मुसाफिरों की बताई बातों को उसमें इंगित करते है, ये जरूरी था और इस हालत में ये रोचक भी लगेगा।
4. जब आपको अपनी खबर में किसी भी चीज पर ये तय करना हो कि उसे कितनी बार रखा जाए तो एक फार्मूला समझ लीजिए… तीन की संख्या सबसे बेहतर हैं। संख्या कम में आती है और चार की संख्या ज्यादा में- तो हर चीज में तीन एक पसंदीदा गिनती रखिए, तीन बाइट्स, तीन शाट्स, तीन शब्द, हर जगह तीन सही रहेगा।
5. खबर के आखिर में दमदार विजुअल्स रखिए…अब दो तरीके हो सकते हैं…या तो बेहद दमदार शब्दों और वाक्यों का आखिर में इस्तेमाल करिए और अपना नाम बोलकर खबर खत्म कीजिए या फिर आखिर ये ऐसे विजुअल्स रखिए कि आपके बोलने की जरूरत ही न रहे… सिर्फ अपना नाम बोलकर साइन आफ कीजिए… और काम खत्म।
काम खत्म?
इसलिए कि अगला काम करना होगा॥
टीवी रिपोर्ट तैयार करने के लिए जरूरी चीजें
1. दूसरों से राय मशवरा कीजिए
किसी भी खबर के बारे मे जो विचार आपके दिल दिमाग में चल रहा है, उस पर औरों के भी विचार सुनिए। राय मशविरा कीजिए और सुनी गई बातों को बड़े ध्यान से इस्तेमाल कीजिए। इससे आपकी खबर या आपकी रिपोर्ट में विविधता आएगी और कई निए आयाम भी जुड़ेगे।
2. अपनी रिपोर्ट में घिसे-पिटे लोगों के बजाए नयों का इंटरव्यू कीजिए
नई चीजें हमेशा ताजगी लाती हैं और ये बात आपकी रिपोर्ट पर भी लागू होती है। कुछ चंद लोगों को ही बार-बार इंटरव्यू न कीजिए, नए लोग ढूंढिए और उन्हें अपनी रिपोर्ट में इस्तेमाल कीजिए। ध्यान रखिए, बार-बार वही चेहरे देखते रहेने से दर्शक बोर हो जाते हैं और आप अगर ये चाहते हैं कि दर्शक बोर न होकर आपकी रिपोर्ट को ध्यान से देखें तो कृपया दर्शकों की सहनशक्ति से न खेलें, उन्हें नई-नई चीजे दें। अगर आप ऐसों का इंटरव्यू कर सके जिन्हें सालों या महीनों में कभी-कभार ही टीवी पर देखा जाता हो तो ये और भी बेहतर रहेगा।
3. किसी एक ही बात पर भरोसा न कीजिए
जब आप किसी मुद्दे पर रिपोर्ट तैयार कर रहे होते हैं तो आप देखते है कि कुछ लोग एक बात कह रहे हैं, कुछ लोग दूसरी बात कह रहे हैं और चंद लोग तो तीसरी ही बात कह रहे है। आप के लिए ये हर बात सच है और हर बात झूठ भी है, आप अलग-अलग नजरियों को अलग-अलग जताई जाने वाली सच्चाई बताकर रिपोर्ट में रखिए… किसी एक नजरिए की पूरा सच या पूरा झूठ कहकर उसी के पीछे न पड़ जाइए। आप कही बीच में ही रहिए, न ज्यादा इधर न ज्यादा उधर।
4. अपने मतलब के सवाल पूछना भी सीखिए
जब आप अपनी रिपोर्ट के लिए किसी का इंटरव्यू करते हैं तो ज्यादातर सवाल मुद्दे पर ही होते हैं और होने भी चाहिए। आपकों चंद सवसन ऐसे भी कर लेने चाहिए जो आपकी रिपोर्ट को आग्र ले जाने में मददगार होंगे, जैसे कि-
• इसके अलावा भी कुछ ऐसा है जो मुझे अपनी रिपोर्ट में दिखाना चाहिए?
• किसी और से भी बात कर सकते हैं?
• आपके हिसाब से अब आगे का करना चाहिए?
• इस बारे में रिकार्ड्स या तस्वीरे वगैरह मिलेगी?
ध्यान रहे आप ये सवाल अंत में करते हैं, तो जो भी जवाब आपको मिलेंगे वो आपको एक अंदाजा दे देंगे कि रिपोर्ट पूरी करने के लिए अभी और क्या-क्या करना चाहिए।
5. रिपोर्ट के हिसाब से फैसले कीजिए
तकनीकी या किन्ही और वजहों से ये फैसले मत कीजिए कि कहां जाना है या किसका इंटरव्यू करना है। आपकी रिपोर्ट आपको खुद ये अंदाजा दे देगी कि अब आगे क्या करना है।
6. अपनी रिपोर्ट के पीछे पड़े रहिए
एक बार आप एक रिपोर्ट के पीछे पड़ जाए तो उसे एक ही बार में करके छोड़ न दें, उसे बार-बार अलग-अलग एंगल से करिए। आपका मकसद उस मुद्दे को हर दर्शक तक पहुंचाना है और लोग पूरे हफ्ते पूरे दिन बैठकर खबरे नहीं देखते, आपकी रिर्पोट बार-बार आएगी तभी वो ज्यादा देखी जा सकती है।
7. फॉलोअप कीजिए
जब आप एक स्टोरी को कई एंगल से कर चुके हो उसके बाद भी आने वाले दिनों हफ्तों और महीनों में इस बात की जानकारी रखिए कि उस मामले में अब क्या हो रहा है। दर्शकों को इस तरह की जानकारी रखना पसंद आता हैं। कई बार तो ये भी होता है कि जब आप एक ही स्टोरी कर करके ऊब जाते है तब कहीं जाकर लोग उस खबर की तरफ ध्यान दे पाते हैं, इसमें आपका दोष नहीं होता…पर इसमे किसी का भी दोष नहीं होता…हर खबर का अपना असर होता है।
8. मौज मस्ती करते हुए वापस लौटिए
जब रिपोर्ट पूरी हो जाए और घर वापसी हो तो तनाव दिमाग से निकाल दीजिए और मौज मस्ती करते हुए लौटिए। इससे आपकों ताजगी तो मिलेगी ही, क्या पता कुछ नया फिर सोचने को मिल जाए…
9. शुक्रिया कहना सीखिए
हालांकि टीवी न्यूज की दुनिया में आपकों खाली वक्त कम ही मिलेगा पर फिर भी प्रयार कीजिए कि जब रिपोर्ट पूरी हो जाए तो पत्र लिखकर या फोन करके अपने सूत्रों का, न्यूज डायरेक्टर का, प्रोड्यूसर का और हर संबंधित व्यक्ति का शुक्रिया आदा करें। याद रखिए आपकों बार-बार हर किसी की जरूरत पडऩे वाली है।
रिपोर्टिंग की बारीकियां
1. इंटरव्यू लेने के तौर-तरीके
टीवी न्यूज की दुनिया में आप लंबे-चौड़े इंटरव्यू के बजाए उस इंटरव्यू के छोटे-छोटे अंश ही ज्यादा इस्तेमाल किए जाते है- इन अंशो को न्यूज बाइट्स या साउंड बाइट्स कहा जाता है। हिंदी में इन्हें कोई नाम देना जबरदस्ती होगी क्योंकि आप जहां भी काम करेंगे सब इन्हे बाइट्स कहकर ही पुकारेंगे। जब आप किसी व्यक्ति की बाइट लेने जाएं तो आपको कुछ धन में रखना चाहिए
2. पहले से सोचकर जाइए
आप जिस व्यक्ति का इंटरव्यू करने जा रहे होते हैं, आमतौर पर वो कोई व्यस्त व्यक्ति ही होता है-इसलिए कैमरा आन होने के बाद खड़े होकर ये मत सोचिए कि क्या पूछना है, इसकी तैयारी पहले से करके जाइए। जो बातें आपको पहले पता है उन्हें पूछकर वक्त बरबाद न कीजिए।
3. मुद्दे की पूरी जानकारी रखिए
जिस मुद्दे पर आपको सवाल जवाब करने हैं उस मुद्दे पर आपको सारा आगा-पीछा पता होना चाहिए। याद रखिए आप कभी भी अकस्मात किसी स्टोरी के लिए भेज जा सकते है, आप ये नहीं कह सकते कि मुझे इसकी जानकारी नहीं हैं, अच्छा रिपोर्टर बनना है तो हर खबर पर पैनी नजर रखिए…हो सकता है कि जो खबर आज कोई और रिपोर्टर पेश कर रहा है, वही कल अचानक आपको पेश करने को कह दी जाए।
4. घूमिए फिरिए
अगर आप किसी एक ही शहर में रहकर रिपोर्टिंग कर रहे हैं तो भी आस-पास घूमने जाते रहिए। ये जरूरी नहीं कि हर जगह आपको आपकी स्टोरी के लिए साउंड बाइट ही मिले, आपको आपका आपका ज्ञान भी बढ़ाना है- ये सब आपके बेहद काम आता है।
5. संतुलित और समझदार बनिए
आपसे कई बार कई लोग कहेंगे कि ‘बी प्रोफेशनल’ इसका मतलब ये होगा कि काम को पूरी ईमानदारी से काम की तरह करो और साथ में संतुलित और समझदारी भरा बर्ताव रखों। ये काम आपका रोजगार है, आपकी नौकरी है और उसे असी ईमानदारी से निभाईंए। आप जब साउंड बाइट ले रहे हो तो आप आप नहीं एक ईमानदार रिपोर्टर लगने चाहिए। इधर-उधर की बाते बिलकुल न कीजिए, खासकर तब जब आपने ये काम नया नया शुरू किया हो।
6. संक्षेप में बातें कीजिए
बातें करते-करते मुद्दे से बहकिए मत। आप जिनका इंटरव्यू लेने गए होते हैं वे व्यस्त लोग हैं, आप उनके समय का ध्यान रखें। ये अच्छा नहीं लगेगा कि वे आपको इंटरव्यू खत्म करने को कहें, आप खुद ही तय समय में सब काम निपटा लें।
7. संवेदनशील स्टोरीज को कवर करते वक्त की सावधानियां
धर्म हमारे देश में बड़ी ही संवेदनशील चीज होता है और धार्मिक अलपसंख्यको और धर्मिक मुद्दो से जुड़ी खबरे भी उतनी ही नाजुक होती हैं। इसी तरह से महिलाओं और न्यायालयों से जुड़े मुद्दे भी अक्सर बड़े नाजुक होते हैं और उन्हे खबरों में ढालने वक्त बड़ी सावधानी बरतनी होती है। संवेदनशील खबरों को हैंडल करते वक्त नीचे लिखी बातों की गांठ बांध लें।
क्या-क्या करना चाहिए
• पहले ये तय कीजिए कि आपकी स्टोरी का मकसद क्या है, आपको दिखाना क्या है।
• जो चीज आपको अपनी स्टोरी में दिखानी है उसे दिखाकर ही रहिए।
• स्टोरी करते वक्त कई बार आपको रोका-टोका गया होगा या आपने और तरह की दिक्कतों का सामना किया होगा। इन सब बातों को भी आप अपनी स्टोरी में डाल दे।
• स्टोरी से संबंधित बारीक बातों को भी आप अपनी स्टोरी में जगह दें, इससे आपकी स्टोरी ज्यादा धारदार और मुकम्मल होगी।
• संवेदनशील स्टोरी पर अक्सर आपको आलोचनाओं का सामना करना पड़ेगा, अगर ये आलोचनाएं समझदारी भरी हैं तो इनकी तरफ पूरा ध्यान दें।
• सी स्टोरी करते वक्त कभी कोई खतरनाक स्थिति पैदा हो जाए तो उस स्थिति को सामान्य बनाने के पूरे जतन कीजिए। कोशिश कीजिए कि हालात नियंत्रण से बाहर न होने पाएं।
• संवेदनशील मुद्दों पर भी अलग-अलग दृष्टिकोण वाले लोगों से बातचीत कीजिए।
• अपनी स्टोरी की सच्चाई को पूरी ताकत से सामने रखिए मगर बेवजह अपनी हर बात सही ठहराने के लिए कतर्क मत कीजिए।
• आपकी स्टोरी संतुलित और सही रहे इसके लिए अपने संपर्क सूत्रों से तालमेल बनाए रखिए।
क्या-क्या नहीं करना चाहिए ?
• धोखेबाजी करके स्टोरी करने की कोशिश मत कीजिए। लोगों को साफ-साफ बता दीजिए कि आप क्या करना चाहते हैं।
• किसी समुदाय या वर्ग विशेष का अपमान हर्गिज मत कीजिए।
• अपनी पहचान छुपाकर या गलत बताकर जासूसी ढंग का इस्तेमाल मत कीजिए।
• किसी वर्ग विशेष के लोगों से उन्हीं के बीच बैठकर बातें करते वक्त उन पर चढ़ाई करने का प्रयास मत कीजिए।
• मुद्दे पर विरोधी रुख रखने वालो से बेवजह बहस मत कीजिए। याद रखिए यही लोग आपकी स्टोरी का आधार हैं, इनसे बहस करके आप अपनी स्टोरी को बरबाद ही करेंगे।
• उन लोगों के खिलाफ भी आप उल्टी-सीधी टिप्पणी न करें जिन्होंने आपसे बुरा सुलूक किया हो। कहने का मतलब ये है कि अपने गुस्से को अपनी स्टोरी में जगह न बनान दें।
• पत्रकारिता के सिद्धातों से समझौत न करें। कई बार पत्रकारिता के सिद्धातों से समझौता करके आप चीजे आसान और बेहतर पाएंगे पर मेरी सलाह है कि आप ऐसा न करें।
• दबाव में आकर किसी अच्छे स्टोरी आइडिया को हर्गिज न छोड़े।
स्टोरी बड़े ध्यान से लिखें
1. गागर में सागर न भरें :- उतना ही लिखें जितना जरूरी है। तमाम ऐसी बातें होगी जो आपकरी स्टोरी से जुड़ी होगी पर अगर सब की सब बातें आपने एक ही स्टोरी में घुसेड़ दी तो बाद में आप क्या करेंगे? जुड़े हुए मुद्दों पर बाद में फॉलोअप स्टोरी कीजिए या उन्हें अपने चैनल की इंटरनेट साइट पर लगा दीजिए। प्रयास कीजिए कि एक स्टोरी में एक ही मुद्दे पर बात की जाए और स्टोरी का हर वाक्य किसी बात को बेहद सरल ढंग से प्रकट करता हो।
2. कहिए कहानी चरित्रों की जबानी :- बिलकुल किसी फिल्मी कहानी की तरह आपकी स्टोरी लोग इसलिए नही याद रखेंगे कि आपने उसमे कितनी जानकारी दी है बल्कि इसलिए याद रखेंगे कि उस स्टोरी ने उनके दिल को छुआ हो। ध्यान रखिए कि हर स्टोरी कुछ लोगों से जुड़ा मुद्दा होता है और इन लोगों के नाम और चेहरे भी होते हैं- आप अपनी स्टोरी को इन चरित्रों की कहानी बनाकर पेश कीजिए तो ये सीधे दिलो तक असर करेगी।
3. लोगों को रखे आगे :- आप कुछ लोगों की स्टोरी कर रहे होते हैं पर आप इस स्टोरी का पात्र न बनें। अपनी स्टोरी में लोगों को आगे रखें और आप पीछे रहें। लोगों की भावनाएं, दुख-दर्द और गुस्सा उन्हें अपनी बोली में कहने दें। लोगों की कही बातें उनही ‘साउंड बाइट्स’ के जरिए कहे और जो तथ्य व तकनीकी जानकारियां हैं, उन्हें आप अपनी कमेंट्री के जरिए पेश करें।
4. सीधा लिखें :- न कि टेढ़ा-मेढ़ा। नाक को एक ही तरफ से सीधा पकडऩा स्टोरी लिखते वक्त एक अच्छा आदर्श होगा। मान लीजिए आप लिखते हैं-दो सौ किलो विस्फोटक पदार्थ सीबीआई अधिकारियों द्वारा बरामद किया गया- अरे भाई, इसे सीधा-सीधा यूं लिखो- सीबीआई अधिकारियों ने दो सौ किलो विस्फोटक पदार्थ बरामद किया। अंग्रेजी जानने वाले एक्टिव वायस और पैसिव वायस के फर्क को समझ सकते हैं। एक्टिव वायस में यानि सीधे लिखने में आपका वाक्य ज्यादा दमदार बनेगा।
5. लंबे-चौड़़े विशेषणों से परहेज :- वर्ना आप किसी मुश्किल में भी पड़ सकते हैं। किसी लंबी कूद वाले खिलाड़ी की छलांग पर अगर आप लिखते हैं, अविश्वसनीय हैरतंगेज कारनामा तो इसकी क्या जरूरत है? सीधे-सीधे लिखिए न-एक अच्छी छलांग। कभी-कभी आदतन आप नकारात्मक विशेषण भी लगा जाएंगे और कोई जिद्दी व्यक्ति आपको अदालत में खींच लाएगा। ऐसे लेखन से आप बचें।
6. वक्त लगाकर स्टोरी करें :- और आपकी ये मेहनत आपकी स्टोरी में झलकनी चाहिए। याद रखिए कि आपकी स्टोरी का अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग शूट की गई जगहें और लोग आपकी स्टोरी को जानदार बनाएंगे। दशर्कों को लगना चाहिए कि मेहनत से की गई स्टोरी है।
7. स्टोरी को फ्लो :- एक अंदाज होना चाहिए दर्शको को समझने का। स्टोरी का इंट्रो या एंकर पीस जो कि एंकर या न्यूज रीडर पढ़ता है वो एक प्रश्न पैदा करता है, आपकी स्टोरी को उस प्रश्न का जवाब होना चाहिए और आपकी स्टोरी की आखिरी पंक्तियां, जिन्हे टैक्स कहा जाता है, दर्शकों के लिए एक हुक होना चाहिए कि अब आग क्या होने वाला है। आप टीवी सीरियल तो देखते ही होंगे, वहां से सीखिए। सीरियल के दौरान आने वाले बे्रक बम्पर्स और फ्रीज प्वाइंट दर्शको को रोके रखते हैं- कुछ ऐसा ही काम आपकी स्टोरी को भी करना होता है।
स्टोरी को सूचनाप्रद बनाने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल
मैं आपको पहले अध्याय में ही बता चुका हूं कि आज मीडिया सभी प्रकार के माध्यमों का एक मिला जुला सा स्वरूप बन चुका है। टीवी न्यूज तैयार करने में कितनी ही बार इंटरनेट एक बड़ी मदद होता है। एक उदाहरण देता हूं-
जिन दिनों में जी न्यूज में काम कर रहा था उन्ही दिनों एक इतवार सुबह सवेरे लगभग ग्यारह बजगर तीस मिनट पर एक न्यूज मीटिंग शुरू हुई। मैं अपने रिर्पोटरों और न्यूज प्रौड्यूसर से न्यूज का और असरदार बताने के तरीको पर चर्चा कर रहा था। मिटिंग शुरू हो चुकी थी कि अचानक किसी ने आकर खबर दी कि एक हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो गया है। हमने मीटिंग रोक दी और सारे लोग इस खबर की खबर निकालने में जुट गए। मेरे दिमाग में सिर्फ ये बात थी कि मुझे इंटरनेट पर जाकर दुर्घटना की ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल करनी है और अपनी टीम को बताना है कि इस जानकारी को खबर दर खबर स्टोरीज में कैसे ढाला जाए। मकसद एक था कि खबर को संक्षिप्त मगर असरदार बताया जाए।
अब आइए इस खबर के बनाने के ढंग को समझते हैं-
1. पहली बात- हमें क्या-क्या पता चल चुका है।
न्यूज मीटिंग खत्म करने के फौरन बाद विमान दुर्घटना के बारे में हमें ये बाते पता थी-
• ये कि सवेरे ग्यारह बजकर पच्चीस मिनट पर एक विमान ने दिल्ली के इंदिरा गांधी अंर्तराष्‍ट्रीय हवाइअड्डे पर उतरने का प्रयास किया।
• ये कि हवाई जहाज विमान पट्टी पर नहीं उतर पाया। (हमें ये पता नहीं था कि ऐसा क्यों हुआ?)
• ये कि ठीक ग्यारह बजकर बयालीस मिनट पर पायलट ने ये सूचना दी कि उसके जहाज का इंजन ठीक से काम नहीं कर रहा है।
• ये कि एयर ट्रेफिक कंट्रोल के अधिकारियों ने जहाज को उतरवाने की कोशिशें की पर पायलट घने कोहरे के कारण साफ-साफ देख नहीं पा रहा था।
• ये कि पायलट ने कंट्रोल टावर से अपनी अंतिम बातचीत में बताया कि उसके जहाज के दोनों इंजन फेल हो चुके हैं।
• ये कि एक सौ सत्तर यात्रियों और आठ विमानकर्मियों वाला ये विमान इसके बाद अचानक राडार स्क्रीन से गायब हो गया। गायब होते वक्त जहाज हवाई अड्डं से नौ मील की दूरी पर था।
2. दूसरी बात- हमें क्या-क्या पता करना है!
• ये किस तरह का जहाज था?
• ये जहाज कहां से आ रहा था और कहां जा रहा था?
• ये जहाज किस विमान सेवा का जहाज था?
• क्या जहाज जमीन पर गिरकर तहस-नहस हो चुका था या इस बात की कोई संभावना थी कि जहाज जमीन पर सुरक्षित उतर पाया होगा?
कई बार इस तरह के सवालों के जवाब ढूंढ पाने में काफी वक्त लग जाता है। दुर्घटना का दिन यानि इतवार (छुट्टी का दिन) था। हालांकि दिल्ली हवाई अड्डा काफी व्यस्‍त हवाई अड्डा है मगर दुर्घटना की खबर आने के काफी देर बाद तक न तो हवाई अड्डे की तरफ से कोई सूचना केंद्र बनाया गया था और न ही सूचनाएं दी जा रहीं थी। अब दो ही रास्ते थे- या तो हम घंटों इंतजार करते या फिर इंटरनेट पर जाकर सूचनाएं ढूंढते। हमने दूसरा रास्ता अपनाया और दुर्घटना के डेढ़ घंटे के अंदर ही दुर्घटना से संबंधित तमाम जानकारियां इंटरनेट से प्राप्त कर ली।
3. क्या ये एक व्यवसायिक जहाज था?
हमने इंटरनेट की कई साइट्स पर जाकर अलग-अलग विमान सेवाओं के टाइम टेबल जांचे। किसी भी एयरलाइंस या विमान सेवा का कोई जहाज दुर्घटना के वक्त दिल्ली हवाई अड्डे के पास नहीं होता था, तो फिर ये किसका जहाज था? हमें अब और संभावनाओं पर विचार करना पड़ा। हमें ये बात पता थी कि ये किसी विमानासेवा का जहाज नहीं था। जी न्यूज के एक रिर्पोटर ने इस बीच हवाई अड्डे के टिकट काउंटर से बात करके ये बात वहां से भी पता कर ली कि उस वक्त किसी विमान का आना अपेक्षित नहीं था, मतलब ये कि हम सही नतीजे पर ये कि दुर्घटनाग्रस्त जहाज किसी व्यवसायिक विमानसेवा का जहाज नहीं था। तो फिर ये रहस्यमयी जहाज कौन सा जहाज था?
ये हमें पता करना था।
4. खोजबीन शुरू हुई
हमने उन सरकारी विभागों से बात करनी चाही जो इस तरह की विमान दुर्घटनाओं की जांच करती हैं। एयरपोर्ट अथारिटी ऑफ इंडिया की मदद से हमें आखिरकार उस विमान सेवा का पता चल गया जिसका कि ये विमान था। ये इतवार का दिन था और इस विमानसेवा के बंद दफ्तर से हमें पहले से फोन पर रिकार्ड किया ये संदेश सुनाई पड़ा कि सब कुछ सामान्य है। जाहिर है कि ये संदेश पहले का रिकार्ड किया संदेश था। बड़ी मुश्किलों के बाद हम विमानसेवा के एक ड्यूटी आफिसर से बात कर सके पर उस बेचारे के पास दुर्घटना की कोई खबर नहीं थी। हम फिर वहीं खड़े थे, अब क्या करें?
हमने हवाई जहाजों और विमान सेवाओं से संबंधित हुई और इंटरनेट साइट्स तलाशी। इंटरनेट ही हमारा एकमात्र सहारा था और इंटरनेट ने हमें निराश नहीं किया।
5. सूत्र जुडऩे लगे
पायलट की आखिरी बातचीत के आधार पर हमें ये पता था कि दुर्घटना के वक्त जहाज हवाई अड्डं से नौ मील की दूरी पर था। इस आधार पर ग्राफिक्स विभाग को एक नक्‍शा तैयार करने को कहा गया जिसमें हवाई अड्डे चारों ओर मील का इलाका रेखांकित किया जाना था।
अब ग्राफिक्स से तैयार नक्‍शा हमारे पास था जिसमें हम दुर्घटनास्थल को दिखा सकते थे। जैसे ही हमे विमान के मलबे के स्थल का पता चला हमारे लिए विमान का मॅाडल जानना आसान हो गया। अब हमारे पास दुर्घटनास्थल का नक्शा था और विमान का माडल नंबर। इंटरनेट पर जाने मात्र से अब हमे ढेरों जानकारियां मिलने वाली थी।
6. इंटरनेट जिंदाबाद
विमान टूट-फूट कर मलवा बन चुका था और दुर्घटनास्थल तक जाने में समय लगने वाला था। हमे उससे पहले ही जहाज का रूप रंग दिखाना था। विमान दुर्घटना की खबरों में पहली चीज हमेशा यही होती है कि उस विमान की तस्वीर हासिल की जाए, ये तस्वीर कहां मिलेगी?
इंटरनेट को इस्तेमाल करने वाला हर व्यक्ति गुगल सर्च इंजन के इस्तेमाल को समझता है। जी न्यूज टीम ने गुगल सर्च इंजन पर जाकर दुर्घटनाग्रस्त विमान का माडल नंबर टाइप किया- बोइंग 767 से संबंधित तमाम सूचनाएं सामने थी। एक क्लिक और करना पड़ा और बाइंग 767 की छ: रंगीन तस्वीरें हमारे सामने स्क्रीन पर थीं जहाज के अंदर और बाहर की ये तस्वीरे उस दुर्घटनाग्रस्त जहाज की भले नहीं थी पर ये उसी श्रेणी के दूसरे जहाज की जरूर थी। अब हम दुर्घटनाग्रस्त जहाज का पूरा अंदाजा लगा सकते थे। ये जहाज तीन सौ अठारह यात्रियों को ले जा सकता था। सब सूत्र जुड़ रहे थे। हमने इस विमान की और तस्वीरे अलग-अलग साइट्स से हासिल की और उन्हें एक दूसरे से मिलाकर जांचा परखा- हम सही रास्ते पर थे। ये वोइंग 767 ही था।
हमने लैंडिग्ज डाट काम नाम की एक दूसरी वेबसाइट को भी खोला और वहां से हमे ये जानकारी मिली कि इस तरह के लगभग तीन सौ विमान इस वक्त कार्यरत थे और इनमें से ज्यादातर का इस्तेमाल चार्टड या व्यवसायिक उड़ानेां के लिए होता था। इंटरनेट साइट से हमे ये भी पता चला कि इन विमानों में सुरक्षा के अच्छे प्रबंध थे और कहीं कोई खास कमी नहीं थी। इस साइट ने हमे ये बताया कि इस तरह के विमानों की दुर्घटना दर काफी कम थी पर हमने इस बात की और तहकीकात की। हमने एविएशन सेफ्टी नेटवर्क डाट काम नाम की साइट पर जाकर बोइंग 767 की पुरानी दुर्घटनाओं के रिकार्ड जांचे। पुरानी दुर्घटनाओं में कोई एक ऐसी कमी नहीं थी जिसके आधार पर हम ये कह सकते कि इस तरह के विमानों में एक खास तरह की गड़बड़ी से ही ज्यादातर दुर्घटनाएं हो रही है। पूरे रिकार्ड में इंजन फेल होने की तो एक भी घटना नहीं थी जबकि दिल्ली दुर्घटना का कारण इंजन फेल होता था।
पुलिस और फायर ब्रिगेड़ के दल दुर्घटना स्थल पर दोपहरण बारह बजकर तीस मिनट पर पहुंचे, अब हमारे लिए विश्वसनीय सूचनाएं पा पाना ज्यादा आसान था।
जी न्यूज की टीम विमान दुर्घटना की कड़ी दर कड़ी जोडक़र खबरे बना रही थी। अब एक न्यूज प्रोड्यूसर ने इंटरनेट से प्राप्त बोइंग 767 की छ: तस्वीरों को जी न्यूज के कंप्यूटरों में ट्रांसफर कर लिया और किसी भी पल ये तस्वीरें सीधे न्यूज में दिखाई जा सकती थी। (ये काम करने का एक तकनीकी तरीका है जो आप न्यूज चैनल में जाने के बाद आसानी से सीख सकते हैं।)
अब हम तैयार थे। राडार स्क्रीन से गायब होने के एक घंटे के अंदर जी न्यूज के पास तमाम उपयोगी जानकारियां आ चुकी थी।
अब हम जानते थे कि-
• ये जहाज कहां से आया और कहा जा रहा था।
• इस जहाज में कितने यात्री सवार थे।
• ये जहाज किस विमान सेवा का था और उस विमान सेवा का इतिहास क्या था।
• ये जहाज कितना पुराना था।
• ये जहाज किस मॉडल का जहाज था और उस तरह के मॉडल की क्या खासियतें और क्या कमियां थी।
• ये जहाज सामान्यत: किस काम के लिए प्रयोग होता है।
• इस मॉडल के कितने जहाज इस वक्त् दुनियाभर में उड़ रहे थे।
जी न्यूज ने जहाज के अंदर और बाहर की तस्वीरें भी दिखाई।
जी न्यूज की ये स्टोरी बिना इंटरनेट की मदद के संभव ही नहीं थी। जी न्यूज ने अपनी जुटाई तमाम जानकारी अपने चैनल की वेबसाइट पर भी डाल दी और तमाम लोगों ने चैनल की वेबसाइट पर जाकर जरूरी जानकारियां हासिल की।
दुर्घटना के अगले दिन यानि सोमवार की सुबह जी न्यूज टीम ने दुर्घटना के दूसरे पक्षों पर नजर डालना शुरू किया। सबसे पहले हमने दुर्घटना में मारे गए यात्रियों और चालक दल के सदस्यों के नाम पता करने की कोशिशे की शुरू की। दूसरी बात हमने ये की कि उस विमान और उससे जुड़ी विमानसेवा का और ज्यादा कच्चा चिट्ठा जानने की कोशिश की, एक बार फिर इंटरनेट हमारी मदद के लिए मौजूद था।
विमानदुर्घटना के उदाहरण से हमने ये समझा कि इंटरनेट का इस्तेमाल खबरों में कैसे करे पर खबर बनाने के लिए और भी बातें ध्यान से रखनी पड़ती हैं-चलिए वापस आते हैं उन बातों की तरफ।
एक रिपोर्टर को और क्या-क्या करना चाहिए?
7. इंटरव्यू के लिए अच्छे विशेषज्ञ ढूंढिए
आपको ये मालूम होना चाहिए कि आप अपनी स्टोरी के लिए विशेषज्ञ किस तरह तलाशें।
कुछ तरीके:
अ. हर विषय पर तमाम बुद्धिजीवी और विचारवान लोग होते हैं। आप ऐसे लोगों में से अपनी स्टोरी के लिए विशेषज्ञ का चयन करें।
ब. जिस विषय पर आप स्टोरी कर रहे हैं उस विषय पर लिखी गई किताबों के लेखकों को भी आप विशेषज्ञ के तौर पर ले सकते हैं।
स. विषय से संबंधित सरकारी अधिकारी से बात कीजिए।
सरकारी अधिकारियों का नाम पता आप नीचे लिखे सूत्रों से प्राप्त कर सकते हैं-
(i) हूं एंड व्हेयर : भारत सरकार (एक तरह की सरकारी डायरेक्ट्री)
(ii) टेलीफोन डायरेक्ट्रियां
(iii) राज्य सरकारों के विभाग व अधिकारियों की सूचियां
अपनी सुविधा के लिए इस तरह की डायरेक्ट्रियां पहले से अपने पास रखें।
द. जिस विषय पर आपकी स्टोरी है उस विषय पर निकलने वाले किसी अखबार या पत्रिका के संपादक से पता कीजिए कि इस विषय पर कौन-कौन लोग लिखते हैं, उनका इंटरव्यू कीजिए।
1. जो लोग आपकी स्टोरी में दिखाई जाने वाली घटना के चश्मदीद गवाह होने का दावा कर रहे हैं, उनकी अच्छी तरह से जांच पड़ताल कर लीजिए। ये बात पक्की कर लीजि कि क्या वाकई उनकी गवाही सही है।
2. जिस सूचना पर आपकों पूरा विश्वास न हो, उसकी किसी और सूत्र से भी तसदीक कीजिए।
3. स्टोरी में आने वाले नामों को अच्छे तरीके से जांच लीजिए। नामों में कोई उलटफेर या भ्रम नहीं होना चाहिए। जरूरत हो तो सभी नामों को अंग्रेजी के कैपिटल लेटरस में लिखकर रख लीजिए। सुविधा रहेगी।
4. जब आप अपनी स्टोरी लिख रहे हों तो ध्यान रखें कि नाम सही लिखे गए हों और शब्द व वाक्य रचना सही हो।
5. ध्यान रखिए कि एडिटिंग के दौरान आप जो साउंड बाइट अपनी स्टोरी में लगा रहे हैं वो साउंड बाइट उस व्यक्ति की बात की सही अर्थों में पेश करती हो।
ध. स्टोरी करने के लिए खुफिया कैमरे का इस्तेमाल कब करें?
खुफिया कैमरों का इस्तेमाल भारत में टीवी न्यूज की दुनिया में एक नई चीज है। खुफिया कैमरे का इस्तेमाल अच्छे और बुरे दोनों कामों के लिए किया जा सकता है इसलिए एक रिर्पोटर को इस कैमरे का इस्तेमाल विशेष परिस्थितियों में ही करना चाहिए।
मेरी सलाह है कि अगर आपके सामने नीचे लिखी सारी की सारी परिस्थितियां मौजूद हो तो ही आप खुफिया कैमरे का इस्तेमाल करें-
• जब प्राप्त की जाने वाली खबर अत्यधिक महत्व की हो। इस खबर से आम जनता का बचाव होता है। उदाहरण के लिए किसी संवेदनशील विभाग में ऐसी गड़बड़ी जो सीधे आम जनता के हितों को प्रभावित करे।
• जब वो खबर प्राप्त करने के बाकी सभी तरीके नाकाम हो चुके हों और कोई रास्ता न बचा हो।
• जब खुफिया कैमरे का इस्तेमाल करने वाला रिर्पोटर ये बात खुलकर बताने को तैयार हो कि उसने इस कैमरे का इस्तेमाल क्यों किया और किस तरह से गतिविधि को अंजाम दिया गया।
• जब संबंधित रिर्पोटर और उसका न्यूज चैनल खुफिया कैमरे से कवर की जाने वाले स्टोरी को लेकर पूरी तरह से ईमानदार और समर्पित हों। जब न्यूज चैनल इस स्टोरी को उसके तमाम आयामों में पेश करने में आने वाले खर्च को सहन करने को तैयार हो।
• जब इस खबर को खुफिया कैमरे की मदद से पेश करने से आम जनता का इतना लाभ हो कि हम खुफिया कैमरे के इस्तेमाल के दौरान की गई थोड़ी बहुत बेईमानी को भी नजरअंदाज कर सकें।
• जब खुफिया कैमरे का इस्तेमाल करने वाले रिर्पोटर और उसकी पूरी टीम के बीच खुफिया कैमरे के इस्तेमाल को लेकर इसके नैतिक और कानूनी पक्षों पर पूरा विचार विमर्श हो चुका हो और सब कुछ पहले से स्पष्ट हो।
किन परिस्थितियों में खुफिया कैमरे का इस्तेमाल जायज नहीं?
• सिर्फ वाहवाही बटोरने के लिए।
• सिर्फ दूसरे रिर्पोटर्स को मात देकर अपना नाम चमकाने के लिए।
• सिर्फ काहीलियत के कारण कि आपको ज्यादा बढ़त और ज्यादा मेहनत के बिना ही स्टोरी मिल जाए।
• सिर्फ इसलिए कि दूसरों ने भी ऐसा किया तो आप भी वैसा ही करेंगे।
• सिर्फ इसलिए कि जिनकी पोल आप अपनी स्टोरी में खोलना चाहते हैं वे खुद चोर बेईमान हैं।
तो ये थे रिर्पोटिंग के तमाम आयाम और उनसे जुड़े सवाल। अब तक आप रिर्पोटिंग करने के तौर-तरीके सीख चुके होंगे पर अभी एक और महत्वपूर्ण काम बाकी है, स्टोरी को कागज पे उतारना और उसे एक कागजी ढांचे में बदलना। स्टोरी लिखना एक कला है जिसे विस्तार से समझना बेहद जरूरी है।