Friday, June 10, 2016

समाज-2

शीश नवाऊँ, माँ माँगू ,स्वप्न करो साकार ,पाऊँ तुम्हारा प्यार मैं मैया ,पाऊँ तुम्हारा  प्यार
दुखियों के दुःख-दर्द बटाऊँ ,अपनों से अपनापन पाऊँ , भेंट तुम्हे इस कमलपुष्प से ,गुंथे हुए सब हार.
पाऊँ तुम्हारा प्यार मैं मैया ,पाऊँ तुम्हारा  प्यार. 


अभियान के उद्देश्य

  * समाज के चारित्रिक मानसिक ,बौद्धिक विकास कार्य करना तदानुरूप आदर्श समाज के निर्माण हेतु मानव सेवा के लिए कार्य करना .
 प्रेम बंधुता एवं भाईचारा की भावना जागृत करना .
  * समाज के शिक्षा एवं आदर्श विवाह हेतु प्रयास करना .
*  समाज के कम आयु की बिधवा एवं परित्यक्ता युवतियों को पुनः विवाह के लिए प्रोत्साहित  करना.
*  समाज को एकता के सुत्र में पिरोने और गौरवशाली इतिहास से सीख लेते हुए प्रगति के पथ पर अग्रसर होने का संकल्प  लेना .
*   गौरवमयी इतिहास और संस्कारों को याद रखने के लिए प्रेरित करना.
*  आज के बच्चों में पाश्चात्य संस्कृति भरने के बजाय उनमे विरासत में मिली सामाजिक एकता को बरकरार रखने का जज्बा भरना
 .


आदर्श समाज
समाज व्यक्ति गढ़ने की टकसाल है.
 समाज की टकसाल से प्रतिभावान पैदा होते हैं. ये प्रतिभावान प्रदीप्त दीपक के सामान होते हैं
 तथा जहाँ भी होते हैं ,प्रकाश बिखेरते हैं. सामाजिक संरचना के आधार पर व्यक्तित्व का
 निर्माण होता है और श्रेष्ठ व्यक्ति समाज को उन्नत एवं समृद्ध बनाते है .सामाजिक 

मुल्य एवं आदर्श इन्हीं व्यक्तित्वसंपन्न महान व्यक्तियों के माध्यम से सुरक्षित रहते हैं.

 वर्त्तमान समाज रूग्ण एवं जर्जर हो चुका है. 
 आज विडम्बना ही है कि जिस व्यवस्था से समाज को बल मिलता था ,जिसके आलोक से समाज आलोकित
 होता था आज वही समाज खँडहर में तबदील हो गया है.   आज समाज अनेक वर्गों में विभाजित हो गया है.
 विभाजन की यह दरार इतनी चौड़ी होती जा रही है ,जिसमे जन एवं समाज धँसते चले जा रहे हैं. 
 मुल्यनीतिआदर्श एवं परम्पराएं बीते दिनों की बातें बन गई है. 

इसके लिए समाज एवं व्यक्ति दोनों ही बराबर के भागीदार है.
संवेदनशीलता ही इस विभाजन को रोक सकती है.
आज हमारे समाज की सबसे ज्वलंत समस्याएं है तलाक, 
बुजुर्गो का उपेक्षा , अपनों से दूरियां , युवा पीढ़ी का गुमराह होना. 
                                                              प्रेम सबकुछ सहलेता है पर उपेक्षा नहीं सह सकता.                                                                          
आज के इस बदलाव के बयार को समय रहते रोका नहीं गया तो यह आंधी बन कर के पुरे गाँव (समाज ) को जला देगी 
." घर को लगा दी आग घर के चिराग ने " यह कहकर दूसरों के ऊपर तरस खाने की जगह समाज के
 लोगों को आगे बढ़कर इस धर्मयुद्ध में भागीदारी करना पड़ेगा अन्यथा आने वाला समय हमें माफ नहीं करेगा .
फैलने से पहले ही चिनगारी को बुझा देना उचित है .

वस्तुतः पुरानी और नई पीढ़ियों का संघर्ष नूतन और पुरातन का संघर्ष है,जो थोड़ी बहुत मात्रा में सदैव रहता है,
किन्तु वर्तमान युग में अचानक भारी परिवर्तन हो जाने के कारण टकराव की परिस्थितियाँ अधिक स्पष्ट 
और प्रभावशाली  बन गई है ,जिसमें संघर्ष को और अधिक बल मिला है .युवा जीने की क्षमता तो
 रखता है,लेकिन अनुभव नहीं रखताबुजुर्ग अनुभव रखता है ,लेकिन जीने  की क्षमता खो 
गई होती है ,ऊर्जा खो गई होती है .जरुरत है कि दोनों मिल जाएँ .जंगल में आग
 लगी है ,अगर अंधे और लंगड़े नहीं मिले तो खतरा भारी है .


न भौतिकवादी अकेला बच सकता है ,न अध्यात्मवादी अकेला बच सकता है.अतः समन्वय में ही सारी मनुष्यता का बचाव है॰विजय बहुर्मुखी होता है , पराजय अंतर्मुखी . अतः हमें सशर्त आत्म -मंथन की जरूरत है.

साथियो!  हमारे समाज में आर्थिक सम्पन्नता बढ़ी है लेकिन नैतिक पतन भी हुआ है . 
आर्थिक सम्पन्नता की हमें भारी कीमत चुकानी पड़ी है, संस्कार रूपी अनमोल विरासत को खोकर .
समाज एवं व्यक्ति दोनों का चिंतन और चरित्र एक हो.
धन का मान घटाया जाय और मनुष्य का मूल्यांकन उसके उच्च-चरित्र
 त्याग ,बलिदान के आधार पर किया जाये . 

धन के कारण सम्मान मिलने से लोग अधिक अमीर बनने और किसी भी उपाय से पैसा कमाने को प्रेरित होते हैं .
केवल सत्त्प्रवृत्तियॉं सराही जायेंउन्हीं की चर्चा की जाये और उन्हीं को ही सम्मानित किया जाय .
समाज में नए मूल्यों की स्थापना विचारवान एवं संवेदनशील व्यक्ति ही कर सकते है,
जिससे समाज पुनः जीवित  विकसित हो सकता है.
आज ऐसे व्यक्तियो का आवाहन किया जा रहा है ,जो समाज को नई दिशा दे सकें.
सामाजिक परम्पराओं एवं मान्यताओं को औचित्यपूर्ण ढंग से पुनर्जीवित करने में अपनी 

अकिंचन ही सही ,किन्तु सार्थक भूमिका निभा सके.
सामाजिक मुल्यों की स्थापना के लिए समर्थ मार्गदर्शकों की भी जरुरत है ,जो अपनी प्रतिभा 
एवं क्षमता से अपरिमित असंख्य इंसानों को झकझोर कर जगा सकें.
                                                तभी तमाम समस्याओं से घिरा जर्जर समाज फिर से पुनर्जीवित हो सकेगा.                                                                                                                                स्वस्थ और मधुर जीवन का पहला और आखिरी मंत्र हैसकारात्मक सोच.
यह एक ऐसा मंत्र है जिससे न केवल व्यक्ति की ,वरन समग्र समाज की समस्याओं को सुलझाया जा सकता है.
समाज सेवा एक व्रत है ,संकल्प है तपस्या है यह एक कठिन कार्य है 
विरले ही इस राह के राही बनते हैं क्योंकि बड़ी जोखिम भरी यात्रा होती है उस सेवा ब्रती की .
लोग व्यंगवाणो से छलनी कर डालते हैं उसकी छाती को.
मुट्ठी भर संकल्पवान लोग ,जिनकी अपनी लक्ष्य में दृढ आस्था है ,इतिहास की धारा को बदल सकते है.
स्वस्थ भविष्य एक स्वस्थ समाज से बनता है और एक स्वस्थ समाज एक स्वस्थ
 इच्छा-शक्ति सेजिसमे हम सब को भागीदार होना ही होगा हमे बढना ही होगा एक दुसरे का हाथ 
पकड़ केबिना किसी भेदभाव केएक सुनहरे भविष्य की ओर .
कोई भी मानव चार आयामों में रहकर पूरा हो सकता है और वे हैं- स्वयं के साथपरिवार के साथ

समाज के साथसंपूर्ण प्रकृति के साथ .समाज और संपूर्ण प्रकृति के आयाम में पहुंच कर काम कर रहे लोग 
अक्सर स्वयं के और अपने परिवार के आयाम में कमजोर पाए जाते हैं।
स्वयं और परिवार के प्रति लापरवाही एक तरफ शरीर के लिए घातक होती है तो दूसरी तरफ

तमाम उपलब्धियों के बाद भी वे स्वयं को अकेले खड़ा पाते हैं जो अंततः असंतुष्टि का कारण बनता है। 
इसीलिए बहुत से समाजसेवी घातक बीमारियों सेकम उम्र मेंअसमय ही मृत्यु के शिकार पाए जाते हैं।
आज हम निर्माण और ध्वंश के बीच खड़े है .यह आप पर निर्भर है क़ि आप अपने जीवन 

की घड़ियों का सृजन करते हैं या ध्वंस करते है .उम्मीद अभी भी कायम है .उम्मीद बहुत खूबसूरत चीज है ,
इसके दामन को कभी नहीं छोड़ना चाहिए.
 स्वामी विवेकानंद ने कहा था ,"किसी के जिंदगी से सबकुछ चला जाने के बाद भी उम्मीद रह जाती है और 

यही उम्मीद आगे जाकर उसे खोया हुवा सबकुछ वापिस भी दिला सकती है .”

“उठो, जागो ,स्वयं जागकर औरों को जगाओ .अपने जन्म को सार्थक बनाओ 
तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष की प्राप्ति न हो जाये  "



आदर्श परिवार
साथियो!   आदर्श समाज कि संरचना का प्रमुख संसाधन है एक आदर्श परिवार परिवार निर्माण -एक जीवन साधना है .
परिवार निर्माण से ही व्यक्ति और समाज का निर्माण सम्भव है . सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार होता है .
 सदभाव कि स्थिति में संयुक्त परिवार का लाभ है और दुर्भाव पनपने कि स्थिति में उसका बिखर जाना ही श्रेयस्कर है .
शारीर की भूख रोटी ,कपड़ा,और मकान,अन्न ,जल,एवं हवा तक ही सिमित है ,पर आत्मा की भूख स्नेह ,सम्मान,और

 सहयोग की परिस्थितियाँ मिलने पर ही बुझती है 
अगली पीढ़ी को यदि  सदगुणी ,सुसंस्कारी बना दिया गया हैतो निश्चिंत रहना चाहिए कि वे हर परिस्थिति में सुखी रह सकेंगे .
छोटे बच्चों को कर्त्तव्य और दायित्यों कि भाषा समझाने से पहले तो यह आवश्यक है कि बड़े लोग स्वयं 

कर्तव्यपरायण तथा परिवार के प्रति उत्तरदायी  बनें .
पारिवारिक सदस्यों में जब तक समर्पण ,त्याग,उत्सर्ग का भाव बना रहता है,

तब तक उसकी सुदृढ़ एकता पर आँच नहीं आने पाती .गृहस्थाश्रम समाज को सुनागरिक देने की खान है.
परिवार को संपन्न ही नहीं सुसंस्कृत भी बनाएँ
धन निर्वाह की एक सर्वविदित आवश्यकता है ,पर वह उतनी बड़ी नहीं है ,जिसके उन्माद में प्रगति

 की अन्यान्य आवश्यकताओं को पूरी तरह भुला दिया जाए .
समग्र विकास ही वास्तविक विकास माना जाता है 

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माता और पिता इन दो स्तंभों पर भारतीय संस्कृति मजबूती से स्थिर है. माता-पिता भारतीय संस्कृति के दो ध्रुव हैं. 
माता-पिता की छाया में ही जीवन सँवरता है. माता-पिताजो निःस्वार्थ भावना की मूर्ति हैंवे संतान को

ममतात्यागपरोपकारस्नेहजीवन जीने की कला सिखाते हैं.

माँ
घेर लेने को मुझे जब भी बलाएँ आ गयीं ,ढाल बनकर सामने माँ की दुआएँ आ गयींऊपर जिसका अंत नहीं उसे आसमां कहते हैं ,इस जहाँ में जिसका अंत नहीं उसे माँ कहते हैं
माँ यह शब्द ही जीवन को तारने में समर्थ है . माँ घर की मांगल्य  होती है. 
माँ के रूप उसके स्वरूप को देवत्व प्राप्त है, कहा भी गया है कि भगवान सभी जगह नहीं पहुँच सकता सीलिए उसने माँ को बनाया.  
हर एक प्राणी कि प्रथम गुरु माँ होती है. 
‘‘जब तुम बोल भी नहीं पाते थे तो मैं तुम्हारी हर बात को समझ लेती थी और अब
 जब तुम बोल लेते हो तो कहते हो कि माँ तुम कुछ समझती ही नहीं."
किसी भी माँ के द्वारा कहे ये शब्द वाकई कितने सार्थकता सिद्ध करते दिखते हैं. 
माँ शब्द ही इस जगत का सबसे सुंदर शब्द है. इसमें क्या नहीं है? वात्सल्य, माया, अपनापन, स्नेह, आकाश के समान विशाल मन, सागर समान अंतःकरण, इन सबका संगम ही है माँ. न जाने कितने कवियों, साहित्यकारों ने माँ के लिए न जाने कितना लिखा होगा. लेकिन माँ के मन की विशालता, अंतःकरण की करुणा मापना आसान नहीं है.
“ तीनों जग का मालिक माँ के बिना भिखारी “
बाप
माँ घर की मांगल्य  होती है तो बाप घर का आस्तित्व होता है .
इस घर के आस्तित्व को सचमुच हमने कभी समझने की कोशिश किया क्या 

संत महात्माओं ने भी माँ के ही गुणगान ज्यादा गाये हैं बाप के बारे में कोई नहीं बोलता ,कोई नहीं लिखता. कहीं .थोडा -बहुत किसी ने रेखांकित किया भी है तो गर्म मिजाज ,निष्ठुर ,व्यसनी,निर्दयी ही बताया है.
समाज में एक-दो प्रतिशत हो सकते है,लेकिन अच्छे बापों का क्या ? माँ के पास आसुओं का धार (पाट)  होता है तो बाप के पास संयम का घाट होता है.माँ रो कर ख़ाली हो जाती है लेकिन सांत्वना बाप को ही देना पड़ता है .
ज्योति की अपेक्षा दीपक ज्यादा गर्म होता है लेकिन श्रेय हमेशा ज्योति को ही मिलता रहता है .


रोज के भोजन की व्यवस्था करनेवाली माँ हमें याद रहती है लेकिन उस भोजन के लिए जद्दोजहद करने 
वाले बाप को हम कितनी आसानी से भूल जाते है.माँ खुलकर सबके सामने रो लेती है, समस्याओं को झेलते हुए मन ही मन सिसकने वाला बाप होता है.माँ रो लेती है बाप को रोना नहीं आता ,स्वयं का बाप मरने के बाद भी उसको रोने नहीं आता क्योंकि छोटे भाइयों को सम्भालने की जिम्मेदारी रहती है.माँ के जाने पर भी वो रो नहीं सकता क्योंकि बहनों का आधार उसे
 बनना रहता है.पत्नी बीच में ही छोड़ गई तो भी बच्चों के लिए अश्रु-धाराओं को रोकना पड़ता है.
देवकी यशोदा का गुणगान अवश्य करें लेकिन तुरंत जन्मे बच्चे को सिरपर रख कर जाने वाले 

वासुदेव को भी नहीं भूलना चाहिए. राम ये शिष्टता के पुल अवश्य होगे लेकिन पुत्र वियोग
में तड़प-तड़प कर मृत्यु को वरण किया वो पिता दशरथ थे.
छोटी छोटी मुसीबतों के लिए माँ चलती है ,मुसीबतों का पहाड़ टूटने पर बाप ही याद आता है.पटता है किसी भी मांगलिक कार्य के लिए घर के सारे सदस्य जाते है लेकिन मौत के प्रसंग में बाप को ही जाना 
पड़ता है.कोई भी बाप अपने धनवान बेटी के पास ज्यादा नहीं जाता लेकिन गरीब बेटी के घर खड़े-खड़े ही सही लेकिन चक्कर मारने वाला बाप ही होता है. जवान लड़का या लड़की घर में देर से आने पर जागने वाला बाप ही होता है .बच्चों क़ी नोकरी के लिए साहब के सामने गिड़गिड़ाने वाला बाप ही होता है.
लड़कियों कि शादी के लिए दर-दर चप्पल घिसता है वो बाप ही होता है. पिता के चप्पलों में ठुकी 

हुई कील देखने पर उनका महत्व समझ में आता है. फटी हुई गंजी,उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी उनकी 
कसदारी को बताता है. 
घर के लिए स्वयं कि व्यथा को प्राथमिकता  देने वाला बाप सचमुच में महान होता है .
बाप का महत्व उन बच्चों को समझता है जिसके सर से बचपन में ही बाप का  साया हट जाती है ,

और छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए उसे तरसना पड़ता है .                          
                                                                                                         
          
समाज में नारी शक्ति का  योगदान

भारतीय समाज में नारी शक्ति का स्थान सृष्टि के आरम्भ से ही सर्वोच्च रहा है।  सेवा, सहनशीलता, ममता, प्रेम,
त्याग ये उसके आभूषण हैं. वह परिवर्तन को बखूबी जानती है, परिवर्तन को सहजता से स्वीकार भी करती है
और स्वयं को परिवर्तन के ढांचे में ढालकर अपनी सहनशीलता तथा मन की उदारता का परिचय देते हुए
 नए परिवार में पदार्पण करते हुए उस परिवार की सेवा नि:स्वार्थ भाव से करती है और
 उस घर परिवार को स्वर्ग बना देती है।
कल तक घर की चार दीवारी में रहने वाली नारी अब घर के बाहर कदम रखकर समाज की
उन्नति में अपना योगदान दे रही है।   आज हर महिला समाज की संस्था या संगठन से जुडी है
 तथा संस्था के उद्देश्यपूर्ति के लिए सक्रियता से अपना दायित्व निभा रही है । फलस्वरूप संगठन
 मजबूत होता है। समाज का विकास होता है।  काम के प्रति गंभीरता और समर्पण ये नारी के गुण विशेष है।
नारी मे सृजन की शक्ति है,सहनशीलता व धीरज का बल है, त्याग करने का अदम्य साहस है व क्षमा करने का बड़प्पन है. 
अतः वह आशक्त, कमजोर व बेचारी कभी भी नहीं हो सकती. समाज व परिवार उसकी शक्ति के मोल को समझे ,
उसकी ऊर्जा का सही उपयोग करें व उसकी अभिव्यक्ति का आदर करें.
 काम छोटा हो चाहे बडा उसे प्रमाणिकता से निभाना वे अपना धर्म समझती है  और उसे नि:स्वार्थ  भाव से निर्वाह करती है।
  कल आने वाली पीढी बनाने का महत्वपूर्ण दायित्व महिलाएं निभा रही है ।
किसी भी समाज का भविष्य उसकी नई पीढ़ी पर निर्भर करता है। जिस युग की नई पीढ़ी जितनी अधिक शालीन ,
सूसन्स्कृत  और शिक्षित होती है , उसके विकास की संभावनायेँ उतनी ही प्रबल रहती हैं.
उसके आधार पर यह स्पष्ट होता है कि आज सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम है बच्चों
 का संस्कार –निर्माण . . ऐसे में हर समझदार माता - पिता का यह दायित्व है कि वे
अपने बच्चों की परवरिश में संस्कार – निर्माण की बात को न भूलें .
महिलाओं में अद्भुत ताकत छिपी हुई है, उसे जगाना होगा, अपना घर द्वार
संभालते हुये इस शक्ति को समाजसेवा के कार्यों में लगाना होगा। 




 समाज में बुजुर्गों का तिरस्कार  

पेड़ोंपत्थरों से लेकर जानवरों तक को पूजने वाला भारत अपने बुजुर्गों का ही ख्याल नहीं रख पा रहा है 
कभी मां बाप को भगवान मानने वाले भारत के बेटे अब उन्हें बोझ मानने लगे हैं .
बुजुर्ग अपने ही घर के भीतर असुरक्षित हैं. "अगर मां-बाप बच्चों को बोझ लगने लगे है
तो इसके लिए कुछ हद तक मां-बाप खुद भी जिम्मेदार हैंक्योंकि उन्हीं की परवरिश में बच्चा
परंपराओं से जुड़ता या दूर होता है."बच्चों में शुरू से ही संस्कार के बीज बोने पडेंगे.
हमारी नई पीढ़ी को बचपन से ही बुजुर्गो के प्रति संवेदनशील बनाए जाने की जरूरत है
.बुजुर्गो का सम्मान करने और सेवा करने की हमारी समाज की एक  समृद्ध परंपरा  रही है ! 
पर अब समय  बदल रहा है !अब   बुजुगों की दुर्दशा हो रही है !जिस  देश मे श्रवण कुमार अपने
अंधे माँ बाप को कावड़ मे बिठाकर तीर्थयात्रा करवाते थे उसी भारत की संसद को माता पिता
की देखभाल करने के लिए कानून बनाना पड़ रहा है हम लोग ये क्यों नहीं सोचते की हम भी
एक दिन उम्र के उस पड़ाव पर पहुँचेंगे जहाँ पर आज  हमारे माता पिता  खड़े  है !
बुजुर्ग सामाजिक आपत्ति नहीं बल्कि वे समाज के अनमोल धरोहर हैं। भारतीय सनातन धर्म के,
सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था के नींव हैं । आज इस भागदौड की दुनिया में घर के पति-पत्नी
दोनों नौकरी करते हैंतब बुजुर्ग घर में रहने से बच्चों की देखभाल करते हैं। बुजुर्ग बच्चों में
अच्छे संस्कार एवं संस्कृति भरते हैं। आज की आधुनिकता और बाजारवाद के दौर में
बुजुर्गों के प्रति सबमे अलगाव की भावना पैदा हुई है। 
  आज हम  अपने माता-पिता को वृध्दाश्रम की राह दिखा रहे हैंकल हमारी  संतान भी ठीक ऐसा
ही करेगीसंभव है इससे भी आगे बढ़कर कुछ करे। इसलिए हमें  आज संभलना है।
यदि हम  आज को संभाल लेते हैंतो कल अपने  आप ही संभल जाएगा । घर में एक बुजुर्ग की उपस्थिति
का आशय है कई मान्यताओं और परंपराओं का जीवित 
रहना।



बुढ़ापा एक जैविक परिवर्तन है , जिसे रोका नहीं जा सकता . हर उम्र की तरह ही यह भी अपनी खूबियों और खामियों के साथ आता है. 
बचपन और जवानी के मुक़ाबले उम्र का यह अकेला पड़ाव है, जो जीवन भर साथ निभाता है.जरूरत दरअसल उस सोंच से मुक्ति पाने की है,जो बुढ़ापे को सूर्यास्त मान लेती है. भारत में ही नहीं पूरी दुनियाँ में यह भी माना जाता है कि अर्थपूर्ण जीवन तो 50 वर्ष कि उम्र के बाद ही शुरू होता है. इसके पहले तो इंसान खुद और अपने परिवार को बनाने में लगा रहता है. बुढ़ापा यानि एक ऐसी उम्र ,जिसके पास हमें और हमारी नई पीढ़ियों को देने के लिए जरूरी मूल्य
 पूरी समझदारी और पवित्रता के साथ होते है.


युवा पीढ़ी का समाज मे योगदान 

किसी भी समाज की सामाजिक  आर्थिक बदलाव में युवाओं की प्रमुख भूमिका होती है .
आत्मकेंद्रित मान लिए जानेवाले युवा अपने समाज को लेकर भी चिंतित हैयुवाओं में
वैचारिक दृष्टि से एक  बड़े बदलाव की जरूरत है. इतिहास गवाह है सदैव युवा वर्ग
ने मानवीय मूल्यों को अपनाया है। अन्याय शोषण और उत्पीडऩ के खण्डहरों पर युवा
 हाथों से ही आजादी का गौरव मिला है  युवा वर्ग अपने जातीय संगठन में अनेक
प्रकार से योगदान कर सकता है ।उसे अपने जाति समाज संगठन का आदर 
करना चाहिए और अपने जीवन में उसे झलकाना भी चाहिए ।
 अपने जातीय संगठन में एकता की भावना से ओतप्रोत हो कार्यक्रमों में भाग लेना चाहिए ।
 युवा समाज चाहे तो अपने मेघात्यागपरोपकार के बल पर अपने समाज को उन्नति के शिखर पर ले जा सकता है और वही युवा समाज भटक जाये तो देश को गर्त में भी धकेल सकता है I
  जिस दिन से युवा पीढ़ी के बारे में संगठन व समाज का चिन्तन बढ़ेगा  उसी  दिन से  सामाजिक संगठन का भविष्य सुरक्षित एवं सुनहरा होने लगेगा. आज का युग चुनौतियों का युग हैइसमें सिर्फ संगठन का ही दायित्व नहीं बल्कि संस्कृति को जीवित रखने के लिये दायित्व बुजुर्गो के साथ युवा वर्ग का भी बनता है । सभी  को अपने-अपने कर्तब्यों  से परिचित रह कर  पालन करना चाहिए 



                    

Thursday, June 9, 2016

समाज क्या है -1

सामाजिक सम्मेलनों की सार्थकता :


समाज की बात करते है तो, संगठन का भी प्रश्न सामने नजर आता है, कि समाज को कैसे संगठित किया जाये । समाज को संगठित करने मे सम्मेलन, बैठको, विचार मंथन शिविरों आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है ।
भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश मे अपने हकों के लिए किसी समाज विशेष या वर्ग द्वारा आंदोलन का रास्ता अपनाना तथा सामाजिक सम्मेलनों द्वारा सरकार से अपने हकों की मांग करना, एक महत्वपूर्ण हथियार के रूप मे उपयोग किया जाता है, और यह जायज भी है ।
सामाजिक सम्मेलन एक तरफ जहा, समाज में अपने अधिकारों के प्रति जागृति पैदा करते हैं, वही दूसरी तरफ, इस तरह के आयोजन को गम्भीरता पूर्वक या पूर्ण मजबूती के साथ नही किया जाता है तो, यह समाज व संगठन की पोल भी खोल देते हैं । जो समाज के लिए बहुत घातक हो सकता है, क्‍योंकि इससे देश मे कार्यरत राजनैतिक पार्टियों को सीधा संदेश जाता है कि, कोनसा समाज अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है, और कौन निन्‍द्रा में है । उसी के अनुरूप सरकार अपनी नितियों बनाती है और क्रियान्वित करती है ।
जिसका जीता जागता उदाहरण- गुर्जर आरक्षण, जिस पर प्रत्येक सरकार चाहे कांग्रेस या बी.जे.पी. सभी गुर्जरों के सामने नतमस्तक है । लोकतन्त्र मे जन-बल ही सबसे बड़ा बल है, जिसके सामने सरकार को झुकना ही होगा, इसमे देर-सवेर हो सकती है, लेकिन यह सौ फिसदी सच है, जरूरत है तो, निरन्तर प्रयास की ।
अब प्रश्न उठता है कि ऐसे सम्मेलन आयोजन की जिम्मेदारी किसकी है, इस तरह के आयोजन मूलत समाज के जनाधार वाले नेता जैसे- वर्तमान या पूर्व सांसद, विधायक, मेयर या ऐसे नेता जिनका समाज सेवा का लम्बा इतिहास रहा है, जिसकी सेवा को समाज सम्मान की नजर से देखता आ रहा है या समाज की राष्ट्रीय, राज्यस्तरीय, जिलास्तरीय संस्थाओं द्वारा अपने क्षेत्राधिकार मे सम्मेलनों का आयोजन किया जाना चाहिये ।
किसी भी सम्मेलन की सफलता, उसके आयोजकों पर ही निर्भर करती है । क्‍योंकि समाज मे लोग वही है, केवल लीडर बदलते रहते हैं । नेतृत्व ही समाज को सफल बनाता है और वही उसकी असफलता का कारण बनता है । इतिहास इस बात का गवाह है ।
यह वही भारत है, जो 400 वर्ष अंग्रेजों तथा 600 वर्षों तक मुगलों का गुलाम रहा है । इसी गुलाम भारत में सुभाषचन्द्र बोस, मोहनदास करमचंद गांधी, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर जैसे महान कान्तिवीरों ने देश की जनता को मजबूत नेतृत्व दिया । जिसके कारण देश आजाद हुआ ।
बात नेतृत्व की करे तो वह हिटलर ही था, जिसकी एक आवाज पर जर्मनी अपना सब कुछ दॉव पर लगाने के लिए तैयार रहता था । ठीक उसी प्रकार सामाजिक सम्मेलनों की सफलता उसके नेतृत्व पर निर्भर करती है । सम्मेलन जब जिला स्तर का हो तो उसका नेतृत्व जिलास्तर के मजबूत जनाधार वाले नेता के नियन्त्रण मे होना चाहिये और जब प्रदेशस्तर का हो तो, उसका नेतृत्व प्रदेश स्तर के मजबूत जनाधार वाले व्यक्तियों के पास होना चाहिये ।
ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन की अगुवाई राष्ट्रीय नेताओं तथा समाज के सबसे मजबूत समाजसेवी, अग्रणी नेताओं द्वारा कि जानी चाहिये क्‍योंकि यह एक सामान्य सी बात है कि, कोई भी व्यक्ति, किसी भी समारोह मे जाने के, निमन्त्रण से पहले, निमन्त्रण कार्ड को देखता है कि, कौन-कौन-सा फलाना-फलाना व्यक्ति आमन्त्रित कर रहा है । यह बात बहुत छोटी सी है लेकिन, समारोह व सम्मेलनों की सफलता मे इसका महत्वपूर्ण योगदान होता है, इसलिए आयोजक व निवेदक, शीर्ष मजबूत जनाधार वाले नेता होने चाहिये ।
वास्तविक वस्तुस्थिति की बात करे तो, यह देखने व सुनने मे आता है कि सामाजिक सम्मेलनों मे आमतोर पर राष्ट्रीय व प्रदेश स्तर के राजनैतिक नेताओं को अतिथि व मुख्य अतिथि के तोर पर आमन्त्रित किया जाता है । जिसका मूल उद्देश्य अपने समाज की राजनैतिक व संख्यात्मक ताकत को प्रदर्शित करना होता है । हालांकि यहा तरीका बहुत सही व कारगर भी रहा है ।
इस तरह के सम्मेलन समाज के शीर्ष व लोकप्रिय नेतृत्व की दशा मे ही सफल हुए है क्‍योंकि समाज मे, लोगों की भीड़, उनका संख्यात्मक बल, अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, आमतोर पर राजनैतिक पार्टिया अपने वोट बैंक (संख्यात्मक बल) के पीछे घूमती है, उन्हे किसी समाज से कोई लेना-देना नही होता है । उनका मूल लक्ष्य अपने वोट बैंक मे बढोतरी करना तथा उसे बनाये रखना । ऐसी स्थिति मे जब सामाजिक सम्मेलनों मे राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय राजनेता अतिथि के तोर पर पधारते है तो उनका मूल उद्देश्य अधिकतम लोगों की सभा को सम्बोधित करना तथा अपने वोट बैंक को बनाये रखना होता है ।
ऐसी स्थिति मे सामाजिक सम्मेलन मे, यदि समाज का बहुसंख्यक तबका शामिल नही होता है तो, वह समाज के लिए घातक है और साथ ही समाज का राजनैतिक जनाधार भी खतरे मे पड़ जाता है, जिसके दूरगामी परिणाम होते है, जो हमारी भावी पीढ़ी के लिए भी बहुत खतरनाक साबित हो सकता है । ऐसे सम्मेलन समाज को संगठित करते हैं, वही दूसरी तरह उनके आपसी टुकड़ो को भी उजागर करते हैं ।
इसलिए इस तरह के सम्मेलनों का आयोजन बड़े सावधानी पूर्ण तरिके से व सम्पूर्ण समाज को विश्वास मे लेकर तथा सर्वमान्य नेतृत्व के सानिध्य मे आयोजित किया जाना चाहिये । जिसमे समाज को दिशा देने वाले, त्यागवान धर्मगुरूओं को भी शामिल किया जाना चाहिये क्‍योंकि इस तरह के सफल आयोजन समाज के इतिहास का हिस्सा बनते हैं । जो भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्त्रोत बने रहते हैं, वही असफल आयोजन समाज को हतोसाहित करते है और समाज की राजनैतिक पहचान के लिए खतरा भी बन सकते है क्‍योंकि लोकतान्त्रिक देश मे जनबल ही सर्वेसर्वा होता है ।
यह बहुत महत्वपूर्ण है कि, सामाजिक सम्मेलनों का आयोजन समाज हीत में, समाज को संगठीत करने के लिये किया जाना चाहिये, यदि ऐसे आयोजन का उद्देश्य, कुछ चुंनिदा लोगों को राजनैतिक फायदा पहुचाने के लिए किया गया है, तो फिर इसकी सफलता की उम्मीद करना बेमानी है, क्‍योंकि समाज के लोग इस बात को अच्छी तरह जानते है कि, कौन क्या रहा है, और क्यो कर रहा है, किसे धोखा दे रहा है । क्या समाज के हित मे कर रहा है या अपने नीजी स्वार्थ पूर्ति हेतू कर रहा है, क्‍योंकि किसी भी नेता का वजूद उसके समाज से है । समाज का वजूद नेता से नही, समाज, नेता बनाता है और मिटाता भी है ।

इसलिए ऐसे सम्मेलनों से स्वार्थपूर्ति वाले तत्वों को सावधानी पूर्वक चिन्हित कर, किनारे लगाने की आवश्यकता है, ताकि वे समाज का अपने नीजी स्वार्थ पूर्ति हेतु सौदा न कर सके


समाज के प्रति हमारा दायित्व और जवाबदेहीता :



चलिए आज हम बात करते है, अपने सामाजिक दायित्व की । यह ठीक वैसा ही प्रश्न है, जैसा कि, एक संतान का अपने माता-पिता के प्रति क्या दायित्व और जवाबदेहीता होना चाहिये ।
वैसे आम तोर पर हमेशा बात लेने की आती है, जैसे- मुझे क्या मिलेगा, मुझे क्या दिया, मेरा क्या फायदा होगा, मेरा क्या मतलब है, मुझे क्या लेना-देना है । व्यक्ति अपने माता-पिता से भी, यह उम्मीद करता है, और अपने देश से भी, साथ ही उम्मीद करता है कि मुझे मेरे समाज से क्या मिलेगा और क्या मिलने की उम्मीद है । इसी गणित मे लगा रहता है, या कहे की, हमेशा उसकी स्थिति भिखारी की तरह ही बनी रहती है ।
उक्त पहलू पर व्यक्ति, अपने दिन के 24 घंटे, 365 दिन, साथ ही सम्भव हो तो, प्रत्येक सैकण्ड, कुछ पाने की जुगाड़ मे लगा रहता है । कितनी विचित्र स्थिति है कि, भगवान ने जिस इन्सान को इतना बुद्विमान बनाया कि, वो चन्द्रमा पर चला गया, लेकिन उसके बाद भी, उसकी मानसिक दशा बदली नही है । क्या हम इन्हें इन्सान कहे, तो यह 100 फिसदी तो सच नही हो सकता । इस दुनिया मे यदि श्रेष्ठतम कोई है तो वह इन्सान । दुनिया का श्रेष्ठतम इन्सान भी भिखारी बन जाता है तो, उसमे पशु के लक्षण आने स्वाभाविक है ।
तो फिर हमे क्या करना चाहिये, हमे यह कभी नही भूलना चाहिये कि, व्यक्ति के अधिकार, दायित्व और जवाबदेहीता साथ-साथ चलते हैं । यदि वो अधिकारों को धारण करता है तो उसे दायित्वों का भी निर्वाह करना ही होगा । इसके लिए परिस्थितियों को जिम्मेदार नही ठहराया जा सकता । यह ध्यान रहे कि, जब व्यक्ति का जन्म समाज में होता है तो, समाज में जन्म के साथ ही, उसको कुछ अधिकार प्राप्त हो जाते हैं और साथ उसका समाज के प्रति दायित्व भी उत्पन्न होता है ।
आज समाज के सामाजिक परिवेश की बात करे तो, इतिहास गवाह है कि, समाज को दिशा देना, उसका मार्गदर्शन करना, समाज के बुद्विमान लोगों का दायित्व है । वे अपने दायित्व से पीछे नही हट सकते, क्योंकि आज भारत आजाद है तो, यह आजादी किसी गरीब या धनवान लोगों की देन नही है । यह बुद्विमान देशभक्त लोगों की मेहनत बलिदान का ही परिणाम है । आज जो भी परिवार, समाज विकसित व साधन सम्पन्न हुये है, वे सभी समाज के बुद्विजीवी लोगों के त्याग व मेहनत के कारण है । अब प्रश्न उठता है कि, जो परिवार व समाज पिछड़े है उसके पीछे मूल कारण क्या है, इसका भी सीधा सा उत्तर है कि, इसके पीछे भी एहसान फरामोश बुद्विमान लोग है, जिन्होंने समाज से लिया तो सब कुछ, लेकिन जब देने की बारी आई तो अपनी अक्कल का उपयोग करते हुए, किनारा कर दिया और अगुंठा बता दिया ।

आज भी यही हो रहा है । आज यदि कुछ अच्छे लोगों को छोड़ दे तो लगभग सभी सरकारी कर्मचारी इसमें शामिल नजर आते हैं, क्योंकि आज देखा जाऐ तो, दलित आदिवासियों का विकास सरकारी नोकरी के बलबूते ही हुआ है, क्योंकि इन्होंने आरक्षण के अधिकार से नोकरी ले ली, लेकिन इसके बदले समाज के प्रति दायित्व नही निभाने के कारण, आज समाज भी पिछड़ा है और वह स्‍वयं भी व्यक्गित रूप से कमजोर है । कारण है कि, मेरा क्या लेना-देना, मेरा क्या फायदा, ऐसे प्रश्न उसके अन्दर उत्पन्न होने लग जाते है और उसके आस-पास ऐसी ही राय देने वाले लोग, जो उसे कमजोर बनाते हैं । फिर याद आती है बाबा साहेब की, जो इतनी विषम परिस्थितियों मे ऐसा काम करके चले गये, जिसकी हम कल्पना भी नही कर सकते । फिर कही हिम्मत बढती है कि, हम तो आज उनसे कही गुना अधिक अच्छी स्थिति मे है । यही सोचकर यह सच्ची बात, बयान कर रहे हैं ।
तो फिर हम क्या करे, हमे अपने अन्दर त्याग की भावना पैदा करनी होगी तथा इस बात पर विचार करना होगा कि इस समाज मे पैदा होकर, हमने समाज को क्या दिया, समाज ने हमे गाड़ी, बंगला, राज-पाट, एश-आराम, धन-दौलत, सुख सभी दिया, इसके बदले मे हमने क्या दिया । यह कोई उधार नही है, यह तो ऋण है, समाज का हमारे ऊपर, जिसे हमे हर हालत में उतारना है । यदि हम, इस ऋण को नही चुकाते हैं तो, हमारा जीवन तो पशु समान ही रह जायेगा ।
मेरा उन सभी लोगों को सन्देश है कि, जो अपनी उम्र के अन्तिम पड़ाव में हैं, यह मंथन करे कि, उन्होंने इस समाज मे पैदा होकर, समाज को क्या दिया है । आप ने, अपने जीवन में लाखों करोड़ो रूपये कमाऐ हैं, जिसमे कुछ ईमानदारी से और कुछ बेईमानी से । इसमे कुछ हिस्सा यदि हमने समाज कल्याण मे दान कर दिया तो, आपकी भावी पीढ़ी पर कोई फर्क नही पड़ने वाला है ।
उदाहरण के लिये यदि अपनी आय का कुछ हिस्सा दान कर दिया है, तो भी बेटा, बाप को बाप ही कहेगा और उसका परिणाम यह होगा की, आपका समाज के प्रति दायित्व भी पूर्ण होगा और आपको समाज सम्मान भी देगा, नतीजा आपकी संतान भी आपका अधिक सम्मान करेगी, जो आपकी भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्त्रोत रहेगा और समाज का विकास भी होगा । जो कही न कही आपके परिवार का ही हिस्सा है । आपको इसे जिम्मेदारी के तोर पर मानना होगा और आपकी यह जिम्मेदारी मे भी आता है । आप इस जवाबदेहीता से किनारा नही कर सकते । इस किनारे के कारण ही, आज तक, समाज पिछड़ा, गरीब, साधन विहीन बना हुआ है ।
अधिकतर देखने मे आता है कि, दूसरे लोग तो समाज के लिए कुछ करते नही, तो मैं क्यू करू, तो बहुत साफ है कि, वे अपने आप को इन्सान तो कहते हैं, लेकिन ऐसा कुछ करते नही । मेरा मानना है कि, हमे इन्सान बनने का प्रयास करना चाहिए क्‍योंकि, इन्सान ही दूसरे के लिये कुछ कर सकता है, पशु नही ।
अन्त मे एक छोटी सी बात, महान सिकन्दर यूनान से युö जीतते-जीतते भारत आ गया, सम्राट बन गया, लेकिन मरने से पहले, उसने अपने लोगों से कहा कि, मेरे दोनों हाथ कब्र से बाहर रख देना, क्‍योंकि दुनिया मे देखने वालों को पता चले कि, मैं दुनिया मे खाली हाथ आया था, खाली हाथ जा रहा हूँ, साथ कुछ नही ले जा रहा हूँ ।

कुछ बुरा लगे, लेकिन यह सच है । कहते है कि, सच हमेशा कड़वा होता है और मैं भी यही कह रहा हूँ । मैने अनुसरण किया है, आप भी करे, बहुत खुशी मिलेगी । हमे अपने जीवन मे, अपना त्याग तो, निर्धारित करना ही होगा । अक्सर सुनने मे आता है कि फलाना-फलाना व्यक्ति दुनिया छोड़ गये, पहले तो मुझे बहुत दुख होता था, लेकिन अब सोचता हूँ कि, वो जिंदा थे, तब समाज के लिए क्या फायदा था, जो मरने पर नुकसान हो गया । लोग कहते है कि, अच्छा व्यक्ति था, मे कहता हूँ कि, कैसे, मुझे समझाये । केवल अपनी पत्नि, बेटा-बेटी के लिए अच्छे होंगे, हमारा क्या लेना-देना । इसलिए हमे निजी स्‍वार्थों की परिधी से बाहर निकलकर, कुछ त्याग करने की आवश्यकता है, जल्दी करे, समय जा रहा है, कुछ करना है तो, कर दे, अन्यथा पछतावे के अलावा और कुछ नही मिलेगा ।


हम और हमारा समाज :



समाज शब्‍द सभ्‍य मानव जगतका सूक्ष्‍म स्‍वरूप एवं सार है । सभ्‍य का प्रथम अक्षर मानव का प्रथम अक्षर माजगत का प्रथम अक्षर इन तीनों प्रथम अक्षरों के सम्मिश्रण से समाज शब्‍द की उत्‍पत्ति हुई, जो सभ्‍य मानव जगत का प्रतिनिधित्‍व एवं प्रतीकात्‍मक शब्‍द है । यह समाज की परिभाषा है । बन्‍धु ही समाज का सच्‍चा निर्माता, सतम्‍भ एवं अभिन्‍न अंग है । बन्‍धु, समाज का सूक्ष्‍म स्‍वरूप और समाज, बन्‍धु का विशाल स्‍वरूप है । अत: बन्‍धु और समाज एक-दूसरे के पूरक तथा विशेष महात्‍वाकांक्षी है ।
समाज अच्छा हो तो चरित्र अच्छा होता है ! हमें सामाजिक होना चाहिए ! समाज ने हमे बहुत कुछ दिया ! ऐसी बहुत सी बाते बातें हम प्रायः सुनते ही रहते हैं । हम ऐसा क्यों नहीं सुनते हैं की हमने समाज को कुछ दिया या हमने दूषित समाज को अच्छा किया ? इसका कहीं न कहीं कारण यह है की हम समाज की परिभाषा ही नहीं जानते, हमें अछे और बुरे समाज का ज्ञान ही नहीं है । हम यह जानते हैं की समाज कुछ होता है लेकिन हम यह नहीं जानते की यह हमारे जीवन, हमारे चरित्र और फिर हमारे देश पर कैसे और क्या प्रभाव डालता है । वैसे तो हमने और आपने बहुत सी परिभाषाएं पढ़ी होंगी जैसे – “Society is the manner or condition in which the member of community live together for their mutual benifit” पर क्या हम किसी भी परिभाषा पर मनन करते हैं ? और अगर करते हैं तो क्या हम उसे अपने जीवन में उतारते हैं ? हम अक्सर इसे दूसरों पर थोप देते हैं, और कहते हैं कि क्या ये सिर्फ मेरी जिम्मेदारी है ? या मैं अकेले क्या कर लूँगा, और या मैं ही अकेले क्यों करूँ ? जबकि एक अकेले भी बहुत कुछ कर सकता है । दलाई लामा जी के शब्दों में — “I truly believe that individuals can make a difference in society. Since periods of changes such as the present one come so rarely in human history, it is up to each of us make the best use of our time to help create a happier world” हम अपने अनुआइयों को कहेते हैं कि अछे समाज में रहें और और बुरे समाज से दूर रहें, पर अच्छा समाज और बुरा क्या होता है ये बताना भी तो हमारा कर्त्तव्य होता है ।
हम सब पहले एक मनुष्य हैं फिर बाद मे और कुछ, हमे अपने समाज के अन्य लोगों के लिए भी कुछ सोचे, उनके लिए कुछ अवश्य करें, नही तो हम मनुष्य कहलाने के हक दार नही है । एक समाज का निर्माण मनुष्यों से होता है । अगर मनुष्यों का चरित्र, व्यवहार, रहन-सहन का स्तर ऊंचा होगा तो हम उस समाज को एक अच्छा और सशक्त समाज कह सकते हैं । प्रत्येक समाज का एक अपना परिचय अवश्य होता है । जैसा समाज होगा उसका वैसा ही उसका परिचय होने के साथ-साथ उस समाज के व्यक्ति का व्यवहार करने का तरिका होगा । यह एक अलग बात है कि हर समाज मे कुछ अच्छे और कुछ बुरे लोग होते हैं । यह तो हमारे ऊपर निभर करता है कि हम उनमे से क्या है और अपने लिए वैसा ही परिवेश और लोग को अपने लिए चुनते हैं ।
कितने मतलबी है न हम इंसान ? किसी की परेशानी किसी के दुःख से हमे क्या लेना देना । हमको मतलब है तो सिर्फ अपने आप से और कभी-कभी अपने परिवार से भीपर आज हम अवश्य यह नहीं कह सकते की हमको अपने परिवार की भी उतनी ही चिंता है जितनी अपनी । क्यों ? क्यूंकि हम खुद ही नहीं जानते हम क्या कर रहे हैं क्यों कर रहे हैं किसके लिए कर रहे हैं जिस समाज में हम रह रहे है उस समाज में और भी लोग है जो अलग-अलग स्थिति में रह रहे है । पर हम यकीनन यह कह सकते हैं कि भाई जो हम कर रहे हैं अपने लिए कर रहे हैं और इन लोगों का कहना तो यह है पहले हम अपने लिए तो कर ले, अपने परिवार के लिए तो कर ले फिर दूसरे के लिए सोच लेंगे । यह कह कर सब कन्नी काट जाते है चलों पीछा छुटा, पता नहीं लोगों को हमसे क्या परेशानी है । लगता है सब हमसे जलते है, हमारा सुकून लोगों को गवारा नहीं लगता ।
जिस स्थान पर जल रहता है, हंस वही रहते हैं । हंस उस स्थान को तुरंत ही छोड़ देते हैं जहां पानी नहीं होता है। हमें हंसों के समान स्वभाव वाला नहीं होना चाहिए ।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि हमें कभी भी अपने मित्रों और रिश्तेदारों का साथ नहीं छोडऩा चाहिए । जिस प्रकार हंस सूखे तालाब को तुरंत छोड़ देते हैं, इंसान का स्वभाव वैसा नहीं होना चाहिए । यदि तालाब में पानी न हो तो हंस उस स्थान को भी तुरंत छोड़ देते हैं जहां वे वर्षों से रह रहे हैं । बारिश से तालाब में जल भरने के बाद हंस वापस उस स्थान पर आ जाते हैं, हमें इस प्रकार का स्वभाव नहीं रखना चाहिए । हमें मित्रों और रिश्तेदारों का सुख-दुख, हर परिस्थिति में साथ देना चाहिए । एक बार जिससे संबंध बनाए उससे हमेशा निभाना चाहिए । हंस के समान स्वार्थी स्वभाव नहीं होना चाहिए ।
आज जिस तरह से हमारे समाज में बदलाव हो रहे हैं ऐसे हालात में अच्छे और बुरे में पहचान करना बहुत ही कठिन कार्य हो गया है हमारे इस आधुनिक समाज में पढ़ाई-लिखाई को बहुत महत्व दिया जा रहा है मगर पढ़े-लिखे लोग ही अच्छे लोग हों यह जरूरी नहीं है । बहुत अफसोस की बात है कि हमें जो पढ़ाया जा रहा है वह व्यावहारिक नहीं है और यह किताबी पढ़ाई हमें आदमी से मशीन बना रही है व हमें एक दूसरे के सुख-दुख से दूर करती जा रही है । हम सभ्य और विकसित होने का दावा तो करते हैं मगर किसी के दुख या परेशानी में शामिल होने के लिये हमारे पास समय नहीं है । हमारे समाज में आज सीधे-सादे और अच्छे लोगों की कोई इज्जत नही होती है और उन्हें परेशान किया जाता है जबकि भ्रष्ट और दुराचारी लोगों का सम्मान किया जाता है । आज के इस आधुनिक समाज में सादगी और सदाचारी की जगह बनावटी और भ्रष्टाचारी लोगों का का राज है जो जनता के सामने तो सदाचार और नैतिकता की बातें करते हैं मगर पीठ पीछे दुराचार और अनैतिक बातों में लगे रहते हैं । हम आज जिस आधुनिक समाज में रह रहे हैं वह हमें अपने अधिकारों के बारे में तो हमें बताता है मगर हमें अपने कर्तव्यों के बारे में जागरूक नहीं करता जैसे कि हमारे पूर्वजों ने जो पेड़ लगाये थे उन पेड़ों से हमें शुद्ध और ताजी हवा मिलती है मीठे फल मिलते हैं और ठंडी छांव मिलती है । हम लोग अपने पूर्वजों के लगाये हुये पेड़ तो अपनी जरूरतों के लिये काट देते हैं मगर अपनी आने वाली पीढ़ी के लिये पेड़ नहीं लगाते जिसकी वजह से आने वाली पीढि़यों को शुद्ध और ताजी हवा मीठे फल और ठंडी छांव कैसे मिल पायेगी इसके बारे में हम नहीं सोचते । आज हमें जरूरत है ऐसी पढ़ाई की जो हमें अपने अधिकारों के बारे में तो पढ़ाये ही और साथ ही हमे अपने कर्तव्यों के बारे में जागरूक भी बनाये जिससे हम पढ़ें-लिखें और साथ में एक अच्छे इंसान भी बन सकें ।
यह हमारा समाज है कि जो हमारे लिए आगे बढने के लिए उत्प्रेरक का काम करता है । अगर समाज का डर न हो तो इंसान इंसान नहीं रह सकता । हम तो खुद कैसे भी अपना जीवन बिता लेंगे । फिर जिंदगी के दरिया में कहीं न कहीं किनारे पर लग कर अपना जीवन व्यतीत कर ही लेंगे । अब क्योंकि हम इस समाज के महत्वपूर्ण अंश है, इसलिए हम हर पल समाज के आगोश में रहते है । समाज की बंदिशों का डर रहता है कि हम किसी भी काम को करने से पहले बहुत बार सोचने को मजबूर हो जाते है । अगर हमारी वजह से कोई गलत काम हो गया, तो कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहेगे, फिर हमारे माता-पिता व हमारा परिवार समाज से कट भी सकता है और यही छोटी-छोटी बातें हमको कुछ सकारात्मक व सार्थक करने के लिए प्रेरित करती है । निम्न व मध्यम वर्गीय परिवारों की तरक्की के रास्ते समाज ही दिखाता है । जबकि उच्च वर्गीय परिवारों को समाज की कोई परवाह नहीं होती है, उनको लगता है कि वह समाज से ऊपर है । यह अलग बात है कि अपवाद हर जगह पर हो सकते हैं । बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक के लंबे सफर में सबसे बेशकीमती युवावस्था का समय हमारी जिंदगी का महत्वपूर्ण पड़ाव होता है, और इसी पडाव पर हमको बचपन की सुनहरों यादों के साथ सपनों को साकार करने प्रयास करना चाहिए, ताकि हम वृद्धावस्था में अपने समाज में गर्व से कह सके कि देखो और समझो हमने जिंदगी के दरिया में मजबूत व दृढ इच्छा-शक्ति के बल पर तैर कर अपने लिए वह मुकाम हासिल किए है, जो कामयाबी के शिखर बन गए । अगर हमने युवावस्था में समाज की परवाह नहीं की, तो ऐसा हो सकता है कि वृद्धावस्था में समाज हमारा साथ छोड दे और हम अकेले रह जाए, जिंदगी के आखिरी मोड पर । इसलिए जरूरी हो जाता है कि हमको अपना कल को संवारने के लिए आज समाज को सम्मान देकर और उससे प्रेरणा लेते हुए आगे बढने की कोशिश की जाए ।
हमारा समाज तो हम सब के लिए एक अच्‍छी और साफ़-सुथरी जिन्दगी जीने का मुख्य आधार है, अगर हम समाज को दरकिनार करेंगे तो हमारा जीवन एक नरक की तरह बन जाता है, निजी जीवन जीने के लिए आज कल पैसा ही सब कुछ है, पर समाज में भी रहना जरुरी है, जीवन में आदमी महान कब होता है जब इज्जत-मान-मर्यादा हर आदमी का अपना परिवार होता है, इसके लिए समाज बहुत जरुरी है, अपने कल संवारने के लिए आज समाज को सम्मान देकर और उससे प्रेरणा लेते हुए आगे बढने की कोशिश की जाए ।
हमें अपने समाज से बुराई को हटाना होगा । जब तक हम समाज में व्याप्त बुराई को हटाने में कोई सहयोग नहीं करते हैं तब तक हम उन्‍नति नही कर सकते । कितने लोग सोचते व कहते हैं कि एक हमारे चाहने से क्या होगा ………. पूरा दुनियाँ ऐसी हैं तो क्या एक सिर्फ हमारे सुधरने से दुनियाँ सुधर जायेगी ………… इस तरह से लोग कई बात कहते हैं । पर हमें सोचना व समझना चाहिए कि हम और आप जैसे व्यक्तियों से ही यह समाज बना है । तब फिर हमारे व आपके सुधरने से यह समाज क्यों न सुधरेगा ? याद रखें हमारे-आपके सहयोग से ही इस समाज की उन्नति संभव है । और हमारे-आपके सहयोग से ही समाज से रूढीवादी कुरीतियां समाप्त हो सकती है । अन्यथा समाज की रूढीवादी कुरीतियां हमें ही कुचल देगी । समाज सुधार सुशिक्षितों का अनिवार्य धर्म-कत्र्तव्य है । अतः हम सभी से यह आह्वान करना चाहते है कि अपने में सुधार लाते हुए समाज को सुधारने में अपना योगदान दें । यही हमारी नववर्ष की खुशी होगी । हम बदलेंगे युग बदलेगा । हम सुधरेंगे युग सुधरेगा ॥

समाज के समन्दर की मैं एक बूँद हूँ, और मेरा प्रयास वैचारिक परमाणुओं को संग्रहित कर सागर की निर्मलता को बनाए रखना ।

समाज को ठगने वाले नेता :


एक बार फिर वह मौसम आ गया है । मैं बात सर्दी के मौसम की नही, चुनावी मौसम की कर रहा हूँ । राजस्थान सरकार भी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अपनी नीतियॉ जनता के लिए बना रही है । बेरोजगारो को नोकरी दी जा रही है, नोकरी वाले को पदोन्नती, सरकार कि लाखों नोकरीयॉ अदालतों, लालफिताशाही के चक्कर मे अटकी पड़ी है । पदोन्नति किसी को मिल गई है, किसी की रोक दी गई है, किसी की होने वाली है । लग ऐसा रहा है कि, सरकार भी दिवाली मना रही है, ऐसा दिखाया जा रहा है, लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि हजारों अध्यापक 55 प्रतिशत टेट के अंक और अन्य कानूनी पचड़े मे फंसे पड़े है । सरकारी कर्मचारियों को भी दिया, कम जा रहा है और दिखाया, ज्यादा जा रहा है, यह तो बात थी सरकार की ।
अब बात करते हैं अपने मूल बिन्दु की, जिस पर हम आपको कुछ वास्तविक जानकारी देने चाहेगे और उन लोगों को आयना बताना चाहेगे, जो समाज को ठगने के प्रयास मे नेता बने बैठे है, और कुछ नेता बनने के प्रयास मे है ।
वास्तविकता पर नजर डाले तो सामाजिक संस्थाऐं, समाज के विकास की घूरी होती है, जब ये धूरी काम करना बन्द कर देती है तो, ऐसी स्थिति मे फिर उत्पति होती है, कुछ नये समाजसेवी लोगों की, जो वास्तव मे समाज की सेवा करना चाहते है । और कुछ ऐसे लोगों जो इस बात के इन्तजार मे बैठे है, कि ये सामाजिक संस्थाऐ कब निष्क्रिय हो और तब हम नयी संस्थाऐ बनाये ।
ऐसी स्थिति मे विरोधी गुट के नेत्तृव को खड़ा करने के लिए, वर्तमान संस्थाओं से असन्तुष्ट, अपने आपको समाजसेवी कहने वाले लोग भी शामिल हो जाते है । यह वे लोग है जो वर्तमान संस्थाओं के गलत निर्णय के कारण यदा कदा संस्थाओं के प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर के पदों पर रह चुके है । जिन्हे जनाधार नही होने के कारण हटा दिया गया है । किसी भी व्यक्ति की प्रदेश स्तर की नियुक्ति के लिए जरूरी है कि, उसका अपने जिले मे जनाधार हो । जो जिले का अध्यक्ष नही रहा है, उसे प्रदेशाध्यक्ष कैसे बनाया जा सकता है । यदि बना भी दिया जाये तो भी, उसकी हैसियत का आंकलन किया जाना चाहिये, कि उसने अपने समाज के लिए, क्या त्याग किया है ? उसकी व्यक्तिगत हैसियत क्या है ?, इसका समाज मे कोई अर्थ नही है । यदि कोई सरकारी कर्मचारी है तो, उसके द्वारा 58 या 60 वर्ष की उम्र मे समाजसेवा की बात करना बेमानी है, क्योकि उन्हे यह तो बताना ही पड़ेगा की पिछले 58 वर्षो से, वे कहा थे, जो आज सामाजिक संस्थाओं के पदों के लिए लालायत हो रहे है । वे लोग जो 58 वर्ष की उम्र मे समाज मे अपनी भूमिका तलासते है तो, उन्हे यह भूमिका केवल सरकार की नोकरी के चलते नही दी जा सकती, जबकि सरकार उसे अपने मकहमे से बाहर निकालने की तैयारी कर रही है, ओर वह सामाजिक संस्थाओं पर अपना बोझ मुफ्त मे डालना चाहते है जबकि उसके पास न तो जनाधार है, ना ही दानदाता का आधार है, ना ही त्याग, जबकि यह समाजसेवा की मूल कसोटी है । यही बात चाहे युवा मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष हो या अन्य कोई, उन पर भी लागू होती है । किसी भी ऐसे व्यक्ति कि नियुक्ती, बिना आंकलन किये, संस्थाओं के लिए बहुत घातक है, और इससे केवल विरोधी तैयार होते है, इससे ज्यादा कुछ नही ।
ऐसे लोग, जो वास्तव मे समाज की सेवा करना चाहते है, को समाज मे तथाकथित राजनेता बने लोग, अपनी हवा हवाई बातों से जैसे विधायक, सांसद, जिला प्रमुख, मैयर, चेयरमेन, जैसे पदों का हवाला देकर, ऐसे सच्चे समाजसेवी लोगों को हाईजेक कर देते है । उन्हे खुद भी पता नही लगता की, वे किस बहाव के साथ बह रहे है, उन्हे इसका अन्देशा भी नही रहता है ।
वर्तमान मे जैसे-जैसे चुनावी समय नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे समाज के राजनेता बनने के लिए भी, लोग बिल से बाहर आ रहे है । वे लोग अपना वास्तविक जनाधार तो बना नही पायें क्‍योंकि वे कभी समाजसेवी रहे ही नही, तो जनाधार कहा से आऐगा । स्थिति ऐसी है कि चुनाव आते ही, वे समाज को इकट्ठा करने कि बात कर रहे है । इसमे वे लोग भी शामिल है, जिसका पिछले कई सालों से समाजसेवा से कोई लेना-देना नही रहा । केवल अपने आपको नेता, विधायक बनाने के चक्कर मे समाज के कुछ अच्छी छवी के कार्यकर्ताओं को शामिल कर, उनकी छवी को अपने हितों के लिए उपयोग करने मे जुट गये है, और समाज मे एक नयी चेतना जागृत करने का प्रयास कर रहे है । अभी तक उन्हें ये पुछने वाला कोई नही मिला, कि पिछले इतने वर्षों से आप कहा थे । आपका जन्म अचानक राजनैतिक चुनाव मे कैसे हो गया और समाज की याद कैसे आ रही है, क्योकि बिना समाज के इनका कोई वजूद नही है । यह सभी लोग अच्छी तरह समझते है और अब यह ‘‘बरसाती समाजसेवी’’ समाज को बिना कुछ दिये, बिना त्याग के ही समाज के वोट बैंक का उपयोग, अपने स्वार्थ के लिए करना चाहते है और अपने आपको उनका नेता बनाना चाहते है । जो वोट बैंक के सोदे से ज्यादा कुछ नही । ऐसे लोगों की समाज और राजनैतिक पार्टियो मे क्या हैसियत होगी, आप और हम अच्छी तरह जानते है । ऐसे लोगो समाज को अपने फायदे के लिये, ठगने के प्रयास मे लगे हुए है । जो एक धोके से ज्यादा कुछ नही है ।
समाज को भी ऐसे लोगो का समर्थन नही करना चाहिये, जो अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए समाज के सम्मेलन, एकजुटता, विकास की बात करते है । उन्हे यह पूछना चाहिये कि इतने दिन कहा थे, यह समाज और इनकी संस्थाऐ तो यही थी । इसमे कुछ अच्छी छवि वाले समाजसेवी भी ठगे जा रहे है । उन्हे भी इसका अहसास नही हो रहा है । ऐसे लोग, जो समाज के विकास की बात करते है, उनके पिछले इतिहास और कारनामों पर नजर डाले तो पता चलता है कि, उनमे व्यावहारिकता का गुण भी नही है । उनमे यदि विशेष गुण मौजूद है तो वह है कि, अपने ही लोगो के साथ धोखा करना, ठगना, उनको ठाल बनाकर, अपने नीजी स्वार्थपूर्ति के लिए उपयोग केसे किया जाए ।
तो फिर प्रश्न उठता है कि हमे और हमारी संस्थाओं को क्या करना चाहिये, हमे हमारे बीच मे ही वर्षों से कार्यरत सामाजिक कार्यकताओ को राजनीति के मेदान मे आगे लाया जाना चाहिये । चाहे वो हमारा निजी विरोधी ही क्यों न हो । हमारा निजी विरोध किसी से हो सकता है, लेकिन समाजसेवा करने वाले का समाज विरोधी नही होता है । जिससे समाज को सच्चे समाजसेवी नेता मिलेगे, जो प्रत्येक उतार-चढाव पर समाज के साथ खड़े रहते है । जिसका उदाहरण हमारे सामने है गुर्जर आरक्षण जिसमे क्या विधायक, पूर्व विधायक, मन्त्री हो या सन्त्री, सभी मूसतेदी के साथ समाज की सेवा मे खड़े है, अपने-अपने मोर्चे पर । हमे ऐसे लोगो को राजनीति मे आगे लाना होगा । तभी हमारे अधिकार सुरक्षित रहेगे और हमारा विकास भी मजबूती के साथ होगा । जहॉ तक, अच्छे भाषण देने की बात है, तो इसके लिए बहुत साफ है कि, भाषणों से पेट नही भरता है । ऐसे भाषण जो केवल सुनने मे अच्छे लगते हो , जिस पर केवल तालीयॉ बजायी जा सकती, यह कोई सिनेमा हॉल नही है, ना ही हम दर्शक है । ऐसे लोगो को स्‍वयं अपने त्याग को पहले निर्धारित चाहिये, उन्हे अपने अन्दर झांकना चाहिये कि, जो वे बोल रहे है, क्या वे स्‍वयं उन पर चलते है । यदि हॉ तो चलकर उदाहरण प्रस्तुत करे । यदि नही तो, अपने भाषणों को अपने पास रखे, हमारी भावी पीढ़ी मे यह दुष्प्रभाव पैदा ना करे, कुछ करके दिखाये । हमे यह नही भूलना चाहिये कि, हमने समाज को क्या दिया है, ताकि हम इस समाज मे पैदा होने के ऋण के कुछ हिस्से को चुका सके, अन्यथा ऐसा ना हो कि, हम कर्जदार ही मर जाये । जो किसी श्राप से कम नही है ।

उन सभी लोगो को मेरा सन्देश है कि, जो अपनी उम्र के अन्तिम पड़ाव मे है, यह मंथन करे कि, उन्होने इस समाज मे पैदा होकर समाज को क्या दिया है ? अपने दुनिया छोड़ने से पहले से कुछ ऐसा कर जाये, जिसे आपकी आने वाली पीढ़ी, सलाम कर सके । क्‍योंकि जो आप और हम नही कर पाये, उसकी उम्मीद आने वाली पीढ़ी से करना मूर्खता है ।