Friday, August 26, 2016

राणा की संतानों जागो, जागो वीर शिवा के लालों।
फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥
शत-शत आघातों को सहकर माता घायल आज पड़ी है,
विश्व गुरु, सोने की चिड़िया शत्रु सैन्य से आज घिरी है।
घिरी हुई है जौहर ज्वाला, घिरी हुई है गंगा धारा,
घिरा हुआ है आज हिमालय, और घिरा है मधुबन प्यारा,
देखो ना अंधियारा छाए, जागो ओ सूरज के लालों।
फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥
स्वप्न हमारे बंट सकते हैं, पर ममता कैसे बंट जाए?
एक दीप तो बुझ सकता है, राष्ट्रज्वाल कैसे बुझ पाए??
भ्रमित हमें सब कर सकते हैं, मगर सत्य को कौन मिटाए?
छाती चीरी जा सकती है, प्यार मचलता कौन मिटाए??
माँ का प्यार न कभी भुलाना, जागो ओ भारत के बालों।
फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥
पाश्चात्य की चकाचौंध में चुंधिया गयी तुम्हारी आँखें,
अब तो अपनी आँखे खोलो, बुला रही है माँ की आहें।
बुला रहा है नाद त्राहि का, बुला रही है आहत वसुधा,
बुला रही है भगवत-गीता, और बुलाती प्यासी गंगा।
भारत माँ की प्यास बुझाने, आ जाओ अमृत के प्यालों।
फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥
मन की अपने मानो तो|
अपने को पहचानो तो||
जो दुनिया में आये हो,
विघ्नों से लड़ना होगा|
अगर शिखर को पाना है,
तूफां में अड़ना होगा|
जग से लड़कर क्या होगा,
खुद से ही लड़ना होगा|
मन में अपने ठानो तो|
अपने को पहचानो तो||१||
चाहे हों संघर्ष बड़े,
मन को बांधे खड़े रहो |
राह नहीं तो राह गढ़ो,
लेकिन हरदम लड़े रहो|
जीत अभी मिल जायेगी,
इसी भरोसे अड़े रहो|
मन में अपने ठानो तो|
अपने को पहचानो तो||१||
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जिस पल में हो प्रिय! वास तेरा,
उस पल की आभा क्या कहना।
जिन गीतों में हो नाम तेरा,
उन गीतों का फिर क्या कहना ||
अंतर्मन में हो बसे हुए,
ये भाव नहीं ये तुम ही हो।
ये भाव न मुझसे शब्द हुए,
इन शब्दों में भी तुम ही हो।
जिन बोलों में नाम तेरा,
उन बोलों का फिर क्या कहना ||१||
भेष बदल छुप के आये,
आहट बोली ये तुम ही हो,
खुशियों के मेघ तभी छाये,
आँखें बोलीं ये तुम ही हो।
जिस जीवन में हो प्यार तेरा,
उस जीवन का फिर क्या कहना ||२||
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प्रिय अगर मै रूठ जाऊं,
प्यार से मुझको मनाना |
जो कभी भटकूँ दिशा से,
रास्ता मुझको दिखाना ||
रात कितनी भी बड़ी हो,
चेतना मद्धिम पड़ी हो |
जगमगाते-झिलमिलाते,
नेह के दीपक जलाना ||१||
आज मन के तार बोलें,
ये प्रणय के द्वार खोलें |
हृदय है आवास प्रियतम,
प्रीत से इसको सजाना ||२||
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लक्ष्य प्राप्ति को निकल पड़े तो पथ में कहाँ विराम है ?
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है। ।
बाधाएं भी क्रम से आयें, हमें लक्ष्य से ये भटकायें।
पर सबका हल एक नहीं है, सोचें समझें फिर सुलझाएं
हर बाधा है एक परीक्षा, यह पथ का संग्राम है।
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है। ।
पहली बाधा स्वर्गलोक से, पर यह कभी विरुद्ध नहीं।
गुरुजन सा सम्मान इसे दो, इस बाधा से युद्ध नही।
इनका लो आशीष चलो फिर जहाँ तुम्हारा धाम है।
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है। ।
दूजी है पाताल लोक से, नष्ट इसे कर दो अविलम्ब।
यही रूप है अहंकार का, ईर्ष्या, लिप्सा लालच दम्भ।
दो बाधाएं पार हो चुकीं, पर चलना अविराम है।
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है। ।
अंतिम मृत्युलोक की बाधा, लक्ष्य निकट तब इसने साधा,
इसे करो न पूर्ण नष्ट तुम, केवल इसको मारो आधा।
सद्गुरु मिल जायेंगे तुमको, बस अब नहीं विराम है।
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है। ।
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हे नर तेरा मान कहाँ है?
निजता का सम्मान कहाँ है?
भंगुर जीवन पर इठलाता,
सत का अनुसन्धान कहाँ है??
क्षण भर जीवन क्षणिक बसेरा,
उस पर भी माया का घेरा।
जिसको पीकर मस्त हुआ तू,
रक्त हृदय का है वो तेरा।।
बियावान जंगल ये जग है,
कहीं पुष्प कण्टक ये डग है।
भांति-भांति ज्वालाएं घेरें,
इनसे जूझ, बढ़ाना पग है।।
मानव तन उपहार मिला है,
मोक्ष मार्ग का द्वार खिला है,
अब तो सफल बना ले जीवन,
भटक गया तो किसे गिला है।।
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जिस पल में हो एहसास तेरा,
उस पल की आभा क्या कहना।
जिन गीतों में हो नाम तेरा,
उन गीतों का फिर क्या कहना ||
अंतर्मन में हो बसे हुए,
ये भाव नहीं ये तुम ही हो।
ये भाव न मुझसे शब्द हुए,
इन शब्दों में भी तुम ही हो।
जिन बोलों में हो नाम तेरा,
उन बोलों का फिर क्या कहना ||१||
भेष बदल छुप के आये,
आहट बोली ये तुम ही हो,
खुशियों के मेघ तभी छाये,
आँखें बोलीं ये तुम ही हो।
जिस जीवन में हो प्यार तेरा,
उस जीवन का फिर क्या कहना ||२||
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माँ कहती है तुम हो एक,
फिर क्यों तेरे रूप अनेक?
हम तुमको क्या कहें बताओ |
राम, कृष्ण या अल्ला नेक ||१||
कोई पूरब को मुंह करता,
कोई पश्चिम को ही धरता |
चाहे पूजा या नमाज हो,
ध्यान तुम्हारा ही तो करता ||२||
क्यों हैं तेरे इतने रूप?
दुनिया तो है अँधा कूप |
जात-धर्म की पग-पग हिंसा,
यही जगत का हुआ स्वरुप ||३||
माँ कहती सब तेरी माया,
अलग-अलग रखकर के काया |
जीवन का आदर्श बताया,
मूरख इन्सां समझ न पाया ||४||
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हमें कार्यक्रम में अक्सर मंच  संचालन के समय ऐसी शायरियो की आवश्यकता होती है जो दर्शको से ताली बजाने की अपील करे तो लीजिये आज आपके सामने पेश है मेरी कुछ ऐसी ही शायरिया-

1. कव्वाल की शोभा कव्वालियों से होती है 
    गुलाब की शोभा उसकी लालियो से होती है 
    कलाकार की शोभा कलाकारियो से होती है 
   और दर्शको की शोभा उनकी तालियों से होती है। - विपुल

2. पूजा हो मंदिर में तो थाली भी चाहिए 
    गुलशन है गुल का तो माली भी चाहिए है 
    दिल है दिलवाला तो दिलवाली भी चाहिए
   कार्यक्रम है हमारा तो आपकी ताली भी चाहिए- विपुल

3. बिन बूंदो के बारिश का एहसास कैसे होगा 
   जूनून हो दिल में जिसके वो हताश कैसे होगा 
   कार्यक्रम के इस रंग का मिज़ाज़ कैसा है 
   बिन ताली के हमें यह एहसास कैसे होगा। - विपुल

4. खुशियो पर मौज की रवानी रहेगी 
    जिंदगी में कोई न कोई कहानी रहेगी
 हम युँ कार्यक्रम में चार चाँद लगाते रहेंगे 
   गर आपकी तालियों की मेहरबानी रहेगी। - विपुल
बनों ऐसे महायोद्धा   न जाए वार इक खाली
मुख से बोल प्यारे हो, न हो कोई गलत गाली
आंखे हो जिनसे सबके सद्गुण ही नजर आए
उठे तारीफ हेतु हाथ बजे ताली पे फिर ताली। - विपुल

भक्ति के भाव में रत मन भजन को छू लेता है
प्रेम के वश पतंगा लौ की अगन को छू लेता है
मिले साहस किसी को तारीफ की तालियों से तो
जमी से उठ के पत्थर भी गगन को छू लेता है। - विपुल
कार्यक्रम में खुशियों का महोत्सव हो जाएगा,
समंदर में लहरों का महोत्सव हो जाएगा,
शोभा आपकी और हमारी दो दूनी चार होगी
जब आपकी तालियों का महोत्सव हो जाएगा।

बंधन में है दिल एक बहाली तो बनती है
नीरस से माहौल में एक खुशहाली तो बनती है
यह रंग जो बिखरे है पर्दें पर गर समेटने है तो
जनाब आपकी एक ताली तो बनती है।

दिल से दिल को प्यार भरा पैगाम दिया जाए
होंठों से तारीफ का कोई ईनाम दिया जाएं
आपका और हमार फासला मिट जाएगा पल में
गर तालियों का दिल से सलाम दिया जाए।


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सौंपकर ज्योति प्रण की आओं मिलकर तम हटाए
साथ बैठे साथ गाए साथ मिलकर गम बटांए
समाज के विकास की बस इतनी सी है बात भर
एक कदम आप बढाओं एक कदम हम बढाए।
- कवि राम लखारा 'विपुल'


काल का विकराल पहिया हिम्मत से चलाना होगा
समाज के इस बाग को मेहनत से फलाना होगा
दिन दूनी और रात चैगुनी गति से गर बढ़ना है
मिलकर के हर घर में ज्ञान का दीप जलाना होगा।
- कवि राम लखारा 'विपुल'

मिल जुल कर हम खुशियों का नया जहान बना ले आओं
प्रेम स्नेह और दया भाव से नव खलिहान बना ले आओं
आओं मिलकर गले लगे और शिकवें सारे भूल जाए
भूल पुरानी बातें हम नया हिंदुस्तान बना ले आओं।

हाथों    मेहंदी,  होठो    लाली,  पैरो   पर    महावर   है
बिंदी,  काजल,  आंखे,  जुल्फे  सबके सब हमलावर है
कहने की यह बात नहीं कि समझाना भी मुश्किल कि
ऐसे  दिलकश हमलों  पर तो जान  प्रिये न्यौछावर है।

अस्ताचल के सूर्य से, सब लेते मुंह फेर।
अपनों की या गैर की, परख करे अंधेर।।

वाणी का सब खेल है, अमरित औ विष दोय।
एक गैर अपना करै, दूजे दूरी होय।।
आसपास के लोग मुझसे परेशान बहुत है
कि मेरी रूह में अभी बाकी ईमान बहुत है

काजल तक भी दाग लगा  सका मुझे
मेरी शख्सियत पर वह भी हैरान बहुत है

बैठ जाता हूं हारकर तो रूठ जाती है
मेरी मंजिल अब तलक नादान बहुत है

पत्थर पत्थर रखने से बनती है बड़ी इमारते
मगर झटके में उसे गिराना आसान बहुत है
 
हजारों दुख दिए पर हंस कर गले लगाती है
मां मेरी मुझ पर मेहरबान बहुत है

मेहनतकश मजदूर को सौ बार मरते देखा है
कौन कहता है इस शहर में धनवान बहुत है

 खुदातू मेजबान हैहिसाब करना सबका
इस जमीं पर तेरे घर के मेहमान बहुत है।


सौ सौ झूठी बातों पर भी सच्चाई का दावा है

इस पावन धरती पर फिर मानवता का उद्घोष बजेगा |
दीपक की ज्वाला में प्रतिक्षण अहंकार अज्ञान जलेगा ||
तुम कहते हो तिमिर प्रबल है,
दीप आस में आह विकल है |
मानवता के रक्तित शव पर,
दानवता का खड़ा महल है |
पर पापों के बढ़ने से ही, होता ईश्वर का अवतार |
बिन पापों के कैसे पूजे ईश्वर को सारा संसार |
मोक्ष-दायिनी अमर धरा पर पुनः सत्य का बीज फलेगा |
दीपक की ज्वाला में प्रतिक्षण अहंकार अज्ञान जलेगा ||१||
तुम कहते हो भौतिकता है,
जीवन अविरल दौड़ रहा है |
धन-लिप्सा की आंधी में,
मानव का मन भी डोल रहा है |
कभी तुम्हारे मन ने भी, हो व्यथित, प्रश्न ये उगले हैं ?
जिन्हें समझते मानव हम, वे केवल मानव पुतले हैं |
इक दिन हर मानव के मन में मानवता का बीज फलेगा |
दीपक की ज्वाला में प्रतिक्षण अहंकार अज्ञान जलेगा ||२||
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लेकर चला गया मन मोरा,
जाने तन क्यों छोड़ गया?
एक प्रेम का दीप जलाकर,
जीवन पथ ही मोड़ गया।।
गोरे तन के कोरे मन में,
श्यामल छवि का वास हुआ।
प्रेम-सुधा में बंधी चेतना,
अन्धकार का नाश हुआ।
मलिन ह्रदय का मैल हटाकर,
माया का भ्रम तोड़ गया।।
एक प्रेम का दीप जलाकर,
जीवन पथ ही मोड़ गया।।1।।
मन का मैल हटाकर देखा,
मुझमे-उसमे भेद न था।
मन से हुआ मिलन जब मन का,
अँधियारा भी शेष न था।
मन में अपना रूप बनाकर,
सत्य मार्ग से जोड़ गया।।
एक प्रेम का दीप जलाकर,
जीवन पथ ही मोड़ गया।।2।।
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जरा सा और सोने दो |
अभी तो रात बाकी है ||
हो रही आँखें उनींदी ,
स्वप्न में अब डूब जाऊं |
कुछ घडी भूलूं जगत को,
जब दिवा से उब जाऊं |
जरा स्वप्नों में खोने दो,
अभी तक आस बाकी है |
जरा सा और सोने दो |
अभी तो रात बाकी है ||१||
चल दिए अब तुम कहाँ ?
कुछ प्रहर का संग तो हो |
दो घड़ी को और ठहरो,
शून्यता यह भंग तो हो |
जरा सा और जीने दो,
अभी तक साँस बाकी है |
जरा सा और सोने दो |
अभी तो रात बाकी है ||२||
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रंग-भूमि यह कर्म-भूमि है|
देव-भूमि यह तपस-भूमि है|
अतीव-सुन्दर भरत-भूमि यह,
मातृ-भूमि है, पर्व-भूमि है||१||
जीवन में हैं जितने रंग|
सब मिलते पर्वों के संग|
कहीं हंसी है, कहीं भाव है,
कहीं समर्पण औ सत्संग||२||
कभी पर्व जैसे आराधन,
जन-गण मिलकर गायें वन्दन|
माता और देवता पूजन,
से जग महके जैसे चन्दन||३||
प्रेम ठिठोली की है होली|
दीपोत्सव दीपों के टोली|
रक्षा-बन्धन, विजया-दशमी,
सब में एक प्रेम की बोली||४||
आओ सबको गले लगा लें|
मिल-जुल सारे पर्व मना लें|
अंधियारा मन का मिट जाए,
मन में प्रेम का दिया जला लें||५||
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वेदनाओं के चरम में, जो हृदय से स्वर निकलते,
काव्य बनकर के धरा में, वे अमर होकर विचरते|
है जगत की रीत कासी?
भावना हो रही बासी|
पर हृदय की पीर साँची,
गीत में गुंथ मुस्कुराती|
जब हृदय में वेदना से, शब्द झर-झर के निकलते,
काव्य बनकर के धरा में, वे अमर होकर विचरते||१||
सघन हो कितना अँधेरा,
तिमिर ने भी मार्ग घेरा|
गीत ऐसे पथ दिखाए,
रात्रि में जैसे सवेरा|
छन्द के इन बन्धनों में, चेतना के स्वर मुखरते|
काव्य बनकर के धरा में, वे अमर होकर विचरते||२||
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नारी तेरे कितने रूप,
कितना छाँव कहाँ तक धूप??
नारी तेरे कितने रूप|
कभी रूप माता का लेकर,
तुमने तन में प्राण दिया|
जीवन संभले, जीवन संवरे,
तुमने अमृत पान दिया|
कितने त्यागों, बलिदानों से,
पूरित है तेरा यह रूप?
नारी तेरे कितने रूप||१||
चंदा सी शीतलता तुझमे,
तू ही चंडी रूप है|
तुझमे भार्या, तुझमे पुत्री,
तुझमे मातृ स्वरुप है|
सूर्य प्रभा मण्डल सा चहुँदिशि,
जग में दमके तेरा रूप|
नारी तेरे कितने रूप||२||
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चल रहे जाने कहाँ कब से कभी समझा कोई?
फिर नया आकाश दो, आने को है सपना कोई||
फडफडाते चेतना के पर, इन्हें आकार दो|
काल भी यही रोकना चाहे, उसे दुतकार दो|
आग जो मन में बसी, उसको कलम की धार दो,
स्वप्न जो है बंद आँखों में उसे साकार दो|
जो अचेतन हैं, उन्हें कब तक कहे अपना कोई?
फिर नया आकाश दो, आने को है सपना कोई||१||
कल कभी आये नहीं, चाहे स्वयं को हार दो|
क्षण अभी है आज है, जीवन इसी पर वार दो|
आज अनगढ़ पत्थरों को मूर्ति का उपहार दो|
जो तुम्हारे हैं, उन्हें अब स्वप्न का संसार दो|
लक्ष्य तो संघर्ष से ही जूझकर मिलना कोई|
फिर नया आकाश दो, आने को है सपना कोई||२||
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नयन में यह धार कैसी?
कर्म पथ में हार कैसी?
कंटकों को भी बहा दे,
अश्रु की हो धार ऐसी||
क्या सवेरा, रात क्या है?
नियति का प्रतिघात क्या है?
थक गए जो, रुक गए जो,
लक्ष्य की फिर बात क्या है?
अश्रु या मोती नयन के,
क्यों नियति पर है बहाना?
कल हमीं थे, आज हम है,
जूझना, है आजमाना|
राह को ही वर लिया तो
फिर नियति की मार कैसी?
कंटकों को भी बहा दे,
अश्रु की हो धार ऐसी||
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हे जननी, हे जन्मभूमि, शत-बार तुम्हारा वंदन है|
सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा, तेरा ही अभिनन्दन है||
तेरी नदियों की कल-कल में सामवेद का मृदु स्वर है|
जहाँ ज्ञान की अविरल गंगा, वहीँ मातु तेरा वर है|
दे वरदान यही माँ, तुझ पर इस जीवन का पुष्प चढ़े|
तभी सफल हो मेरा जीवन, यह शरीर तो क्षण-भर है|
मस्तक पर शत बार धरुं मै, यह माटी तो चन्दन है|
सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा, तेरा ही अभिनन्दन है||१||
क्षण-भंगुर यह देह मृत्तिका, क्या इसका अभिमान रहे|
रहे जगत में सदा अमर वे, जो तुझ पर बलिदान रहे|
सिंह-सपूतों की तू जननी, बहे रक्त में क्रांति जहाँ,
प्रेम, अहिंसा, त्याग-तपस्या से शोभित इन्सान रहे|
सदा विचारों की स्वतन्त्रता, जहाँ न कोई बंधन है|
सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा, तेरा ही अभिनन्दन है||
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कैसे सत्य सुनायें साथी, चारों ओर दिखावा है|
सौ सौ झूठी बातों पर भी सच्चाई का दावा है||
दुनिया का विस्तार हुआ है,
धन का तो अम्बार हुआ है|
छोटी छोटी बातों में भी,
अपना ही व्यापार हुआ है|
शिक्षा की तो बात न पूछो,
उसमे बहुत छलावा है||
सौ सौ झूठी बातों पर भी सच्चाई का दावा है||१||
चल रहे हैं, जल रहे है,
किस भंवर में पल रहे है|
लक्ष्य क्या है? भ्रांतियां हैं,
भ्रांतियों में गल रहे है|
अन्तर में पशुता ही देखी,
जीवन एक दिखावा है||
सौ सौ झूठी बातों पर भी सच्चाई का दावा है||२||
बहुत चले हैं अब तक जग में,
मगर नहीं कुछ आस दिखी|
अब तक तो सबकी आँखों में,
भूख दिखी है, प्यास दिखी|
जहाँ प्यार की उम्मीदें थीं,
वहां द्वेष का लावा है||
सौ सौ झूठी बातों पर भी सच्चाई का दावा है||३||

मन में आती है कई बातें ,कई बार कुछ कहने को जो नहीं होता ,हर बार एक डर का पहरा होता है कई बार कोई सर्द सी शिकन दिखती है ,हर बार ..

इक सुबह/मेरे आँगन में आ गया/इक बादल का टुकड़ा/छूने पर वो हाथ से फिसल रहा था/मैंने उसे बिछाना चाहा /ओढ़ना चाहा/पर/ जुगत नहींबैठी/फिरबादल को न जाने क्या सूझी/छा गया मुझ पर/मैं अडोल सी रह गई/और समा गई बादल के टुकड़े मे     और मैं मनविंदर का लिखा संग्रह पढ़ कर "अडोल" सी रह गयी ...मनविंदर भिंभर की लिखी यह पंक्तियाँ उनके संग्रह "अडोल" से है ..निरुपमा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह संग्रह बहुत सुन्दर आवरण में  लिपटा हुआ मेरे हाथ में आया तो कितनी बातें जहन में घूम गयीं | उन से हुई पहली बातचीत और भी बहुत कुछ | मनविंदर को मैं कैसे मिली ..या वो मुझे कैसे मिली ...यह जब याद करूँ तो याद आता है कि आज से तीन साल पहले मेरे पास एक मेल आया जो बहुत अपनेपन से बहुत प्यार से मेरी लिखी गयी कविताओं के बारे में था ..मैंने भी हमेशा की तरह  उस को उसका जवाब दे दिया .और .उसके बाद मेल का सिलसिला बढ़ता गया ..फ़ोन पर बात शुरू हुई ...और फिर उन्होंने "साया मेरे पहले संग्रह" के बारे में अपने अखबार में लिखा ,"मेरे ब्लॉग के बारे में" अपने विचार व्यक्त किये ...मेल से ही हम दोनों ने न जाने कितनी बातें शेयर की ,सपने डिस्कस किये ..पर कभी मुलाकात नहीं हो पायी ..फिर थोडा सा बातचीत में अंतराल आ गया ..पर जुड़े रहे एक दूजे से और यह इतना सहज था की मैं कभी उन्हें "मनविंदर जी" कह ही नहीं पायी ...उनके इस पहले संग्रह" अडोल" पर मैं उतनी ही खुश हूँ .जितनी वो मेरा पहला संग्रह "साया" पढ़ कर खुश हुई थी ...एक कड़ी और जो सामान है हम दोनों में वह है "अमृता प्रीतम" ....दोनों ही हम उसको सामान रूप से पसंद करती है और लिखती है उस पर ....

अडोल संग्रह पढ़ कर मुझे अमृता की ही याद आई ..दिल से लिखी यह नज्में बेहद खूबसूरत हैं सबसे बेहतरीन बात जो वाकई मेरे दिल को बहुत गहरे तक छु गयी ...उन्होंने इसका विमोचन अपनी माँ के हाथो करवाया ...सीधी सादी मनविंदर ने बहुत सरलता से इसका संग्रह को जीवन का प्रथम पाठ पढ़ाने वाली माँ के हाथो में सौंप पर यह कहा 

 लीजिये ......मेरी "अडोल" के चेहरे से घूँघट  उठा दिया मेरी माँ ने ....  "अडोल" मेरी नज्मों का गुलदस्ता

 "बहुत ही अदभुत क्षण रहा होगा न यह मनविंदर ?"...मैं तो जान कर ही भावुक हो गयी |देश के माने हुए अखबार "हिन्दुस्तान" में" प्रमुख संवाददाता "पद की गरिमा बनाए हुए मनविंदर पेशे से पत्रकार हैं और इस खबर की दुनिया में ज़िन्दगी वाकई उनको रोज़ छु कर निकल जाती होगी अपनी घटनाओं से उन्ही की लिखी एक बात भी बहुत बेहतरीन लगी ...."बहुत बार ऐसा हुआ ,जो दिन में देखा ,उसने रात को सोने नहीं दिया |अन्दर से आवाज़ आती ,जी खबर लिख कर आई हो ,वो अधूरी है .सच लिखना अभी बाकी है |खबरों के सफ़र में मुझे ऐसे कई सच मिलते रहे जो खबर नहीं बन सके और वो ही सच नज्म बन गए "........जो इस संग्रह के रूप में हमारे सामने आये ..उनकी लिखी यह नज्म इस सच की गवाह है

 मन में आती है कई बातें ,कई बार
कुछ कहने को जो नहीं होता ,हर बार
एक डर का पहरा होता है कई बार
कोई सर्द सी शिकन दिखती है ,हर बार ..


 एक सच जो खबर में कहीं छिपा हुआ पर लिखने वाले के दिल में आक्रोश पैदा कर देता है ..वह विवशता इन लिखी पंक्तियों में उभर कर आई है |मनविंदर की कवितायें अक्षरों के काफिले के साथ चलती अपनी पहचान छिपाए ख़ामोशी से चलती एक औरत द्वारा अभिव्यक्त के कुछ जिंदा रास्तों की तलाश की कवितायेँ हैं यह कहना है मृणाल पांडे का जिन्होंने इस में प्रकथन लिखा है और साथ ही यह .......की इन कविताओं को तमाम उन लोगों को पढना चाहिए जो सचमुच जानना चाहते हैं की सामजिक मुखोटों के परे ,तमाम वर्जनाओं के बीच जी रही औरत के मन की अँधेरी ,बाहर निकलने की कलपती दुनिया का सच कैसा है ?

 काले घेरों में लिपटी
उसकी बेजान आँखे
पता नहीं
इन आँखों ने कभी
कोई ख्वाब देखा
या नहीं
कोई नहीं जानता
रिश्तों के हाशिये पर खड़ी
वो लड़की
बस चलती रही

............... पढ़ कर बस एक चुप्पी सी लग जाती है
 ..आँखों के काले घेरे पढने वाले के मन को घेरने लगते हैं ..अजनबी नज्म में की यह पंक्तियाँ कुछ और कह जाती है

कह दो इन पगडंडियों से
फिर से बन जाएँ अजनबी
और फिर हम चलें
इन पगडंडियों पर
अपनी अपनी तन्हाइयों के साथ
अपनी अपनी परछाइयों के साथ .........

 

वाकई यह तलब दिल की कैसे इन लफ़्ज़ों में उतर कर आई है ..की पढ़ते ही दिल से एक आह निकल जाती है ..और एक दूसरी नज्म की पंक्ति गीली हैं तो आँखे -हलचल है तो ख्यालों में ...कितने सवाल कितने जवाब एक अजीब सी रहस्य सी हैं मनविंदर की लिखी यह नज्मे जो कभी सूफी रब्बी मसला भी महसूस करवा देतीं है|
सवाल बहुत है
पर दिल डरता है जवाबों से
कहीं जवाब "यह "न हो
कहीं जवाब "वो "न हो
इसी "ये और वो" में तो
ज़िन्दगी बसर हुए जाती है


      उनकी लिखी इन नज्मों को यूँ ही आप सरसरी तौर पर नहीं पढ़ सकते हैं ..उनको समझना है तो उनकी तह तह जाना होगा डूबना होगा उन लिखे लफ़्ज़ों में ...जो अडोल को एक यादगार संग्रह बना गए हैं उन्होंने इस में जो अपनी बात कही है वह भी बहुत ही बेहतरीन है ...की उनका यह नज्म लेखन गुरु ग्रन्थ साहिब जी की वाक् की तरह है वाकई यह बहुत सुन्दर लफ़्ज़ों से सजा है ..मैं तो डूब कर रह गयी इस में ...
मुद्दत बाद
उम्रें ठहर गयीं
उनकी नजरें मिली
एक दूसरे  को
देखा
जैसे तपती धूप में
ठन्डे पानी के घूंट भर लिए हो ...

और यह सच जो उनके लिखे लफ़्ज़ों का सच ब्यान कर गया जो उन्हें अक्षरों की माला के रूप में कोई जोगी दे गया और वह उस नूर को यूँ लफ़्ज़ों में कह गयी
मंत्रों के नूर से उजली हुई
वो माला मेरे सामने थी
मैं अडोल-सी खड़ी रह गई
और सोचने लगी
कैसे लूँ माला को

यह वही अक्षर हैं जो सोच से से भी आगे हैं कभी कलम को  छुते  हैं कभी कागज पर बैठते हैं और कभी गीत बन जाते हैं ..और अंतर्मन  में उतर जाते हैं असल नज्म की लिखी इन पंक्तियों के माध्यम से ..
तेरे कमरे में
सब कुछ बिखरा है
कहानियों के अधूरे ड्राफ्ट
तकिये पर रखी डायरी
डायरी के पन्नो में रखा पेन
हर दिन पन्नो पर धरे जाने वाले
उदास ,हंसाते बिसूरते ,चिढाते
अक्षर ...........

सही में एक लिखने वाले मन का परिचय जो इसी नज्म में लिखी पंक्ति की सोच को और भी मुखरता से कह जाता है" कि कई बार सोचा समेट दूँ तुम्हारा बिखरापन लेकिन तुम तो बेतरतीब हो कैसे जानोगे असल" .........मुझे तो इनके संग्रह में संजोयी हर नज्म ही बहुत बहुत अपने दिल के करीब लगी ..वह सच जो इन अक्षरों में अपनी बात कहता हुआ दिल में बस गया उनकी लिखी इस सहेलियाँ नज्म सा ..
दो सहेलियाँ
एक ही देह में रहती हैं
साथ साथ
दुःख कुरेद्तीं है

गहरे तक यह उतरे अक्षर अन्दर के तूफ़ान को ब्यान कर जाते हैं जो बहुत कहना भी चाहते हैं और बंधे हुए भी हैं ..
एक लड़की
मैं जानती हूँ उसे
बहुत नजदीक से
बातें करती हूँ उस से
वो चाहती है
तितली के रंग ओढना
पेड़ों की छांव में बैठना
फूलों की खुशबु में जीना 
...यह वही एहसास हैं जो मनविंदर के मन के साथ साथ मेरे मन ने भी पढ़ लिए सोयी जागी आँखों से ...और दिल उस शक्ति से फ़रियाद करने लगा ..मुझे बचा लो /रस्मों से /कानूनों से/दावों से /और पहना दो मुझे /अपने रहम की ओढ़नी ....उनके लिखे हो को पढ़ते हुए मेरा दिल तो हर नज्म की पंक्ति यहाँ लिखने का हो उठा है ..हर लिखा हुआ अक्षर एक पुकार है वाकई अंतर्मन की जो चुपचाप बैठ से अपने से ही बात करते हुए पढ़ी जा सकती है
या रब्बा
बादल चीखे या चिल्लाएँ
गरजे या पगलाएं
इधर उधर मंडराएं
पर जब मेरा मौसम आये
मेरे मन की धरती पर
बिन पूछे छा जाएँ

कौन नहीं चाहता यह मौसम ..हर दिल की पुकार छिपी है इन पंक्तियों में ...अपने में सम्पूर्ण यह नज्मे बहुत रहस्यवादी है बहुत गहरी हैं .कोई कमी मुझे इन में दिखी नहीं ..अमृता प्रीतम के साथ जुड़े होने का एक एहसास सा हुआ इनकी लिखी कई नज्मों में ...हर नज्म के बारे में लिखूं तो भी कई बातें अनकही रह जाएँगी ...दिल से लिखे इस संग्रह को अवश्य पढ़े तभी दिल की बात समझ पाएंगे ..फिर भी मैं कुछ और नज्मों का ज़िक्र नहीं करुँगी तो यह समीक्षा कुछ अधूरी सी लगेगी ...अरसे बाद दराज़ खोला /आँखों में वो अक्षर तैर आये जिन पर लकीरें फेरी गयीं थी ...दराज़ नज्म से ..तेरा इश्क बैठा था हर अक्षर की ओट में/डायरी तो हाथ में थी लेकिन /अक्षर बहुत ऊँचे स्थान पर खड़े थे ..डायरी नज्म से ....सूरज को भीतर उतार लूँ /और रौशनी को हो मेरी तलाश /सेक से यह ली गयी पंक्तियाँ रोशन कर देती है पढने वाले को और एक खूबसूरत एहसास में रंग देती है ..मनविंदर की इन नज्मो के कई बिम्ब बहुत ही सुन्दर है नए हैं ..लफ्ज़ पंजाबी रंग लिए हुए हैं जो बहुत ही सहजता से अपनी बात कहते हैं जैसे "बुक्कल "शब्द का बहुत बढ़िया प्रयोग उनकी एक नज्म में लगा मैं तन्हाई और बुक्कल 
देर तक तन्हाई /मेरी बुक्कल में बैठी रहती है ..और ख़ास बात की हर रिश्ते की गहराई को पढने वाला इस संग्रह में पढ़ सकता है ..माँ .पिता और बेटी पर लिखी हर पंक्ति अपनी सी लगती है ..सबका ज़िक्र करना यहाँ बहुत मुश्किल है .....
खुद मनविंदर के शब्दों में अडोल "..उन हादसों और मुलाकातों का जिक्र भर है जो मुझे कभी ख़बरों के सफर में मिले और जुदा हो गए लेकिन उनका असर रह गया  मैंने उन्हें नज्म की शकल देने का एक पर्यास भर किया है
"वो लड़की जो शहर की दीवारों पे लिखती रहती है शहर भर में "

मृगतृष्णा क्या है ?

मृगतृष्णा क्या है ?जल या जल की लहरों की वह मिथ्या प्रतीति जो कभी कभी ऊपर मैदानों में भी कड़ी धूप पड़ने के समय होती है । मृगमरीचिका । गरमी के दिनों जब वायु तहों का धनत्व उष्णता के कारण असमान होता है, तब पृथ्वी के निकट की वायु अधिक उष्ण होकर ऊपर को उठना चाहती है, परंतु ऊपर की तहें उठने नहीं देती, इससे उस वायु की लहरें पृथ्वी के समानांतर बहने लगती है । यही लहरें दूर से देखने में जल को धारा सी दिखाई देती हैं । मृग इससे प्रायः धोखा खाते हैं, इससे इसे मृगतृष्णा, मृगजल आदि कहते हैं ।समान्यता हम यही मृगतृष्णा की परिभाषा समझते हैं जानते हैं। मृगतृष्णा काव्य संग्रह ...संपादक सत्यम शिवम् और उनके लिखे शुरूआती लफ़्ज़ों में मृगतृष्णा एक ऐसा बिम्ब है जो हमें जीवन के आध्यात्मिक वास्तविक स्वरूप की झलक देता है ।रेगिस्तान में इधर उधर भटकते मृग जब प्यास बुझाने के लिए पानी की कामना करते हैं तो कुदरत अपना झूठा स्वांग रच कर पानी की झलक दिखा जाती है ..और प्यास वहीँ रह जाती है ...इसी तरह हमारा जीवन है हम झूठी लालसाओं में घिरे भागते रहते हैं और असली वास्तु से दूर होते जाते हैं ..झूठ को सच मान लेना और वही सच समझना इस "मन की मृगतृष्णा "है ख्वाइशें हैं मन के भीतर रेत में भी एक नदी की
स्वांग के आकाश में याथार्थ की तलाश है
जिस समन्दर के लिए हम दर -ब -दर ताउम्र भटके
पाके उसको भी कैसी यह प्यास है ....
वाकई यह प्यास जो न  चैन से रहने दे वह मृगतृष्णा सी ही प्यास है ....इस में दस कवि तृष्णाएँ कविता कर्म की उस इच्छा को समर्पित  हैं  जो हमेशा अतृप्त रहती हैं और इनको हम जानेंगे इनके इस संग्रह में लिखे के माध्यम से ...हर लिखने वाला कवि या कवियत्री के पास प्रेम विरह ,आस पास घटने वाली हर बात असर डालती है और वही मरीचिका बन कर उनके लफ़्ज़ों में ढल जाती है ...इस में भी लिखने वाली हर रचियता का माध्यम यही विषय रहे हैं ..अधिकतर लिखने वाले ब्लॉग जगत से ही जुड़े हैं ..कुछ पहली बार प्रकाशित हो रहे हैं कुछ की कवितायें पहले भी पब्लिश हो चुकी हैं इस लिए कहीं कहीं यह मरिचिका बहुत चमकीली है और कहीं कहीं धुंधली हो गयी है .पर मरीचिका तो मरीचिका है दिल को पानी तरफ खींचेगी ही ....नीरज विजय की रचना ..
यही तो दर्शाती है
कुछ पाने की चाहत में
करते मन को घायल ये
पर क्या यही असली है कमाई
या ये मृगतृष्णा की है गहराई !!!
इनकी लिखी रचनाएं इनके सपनों को साकार करती हुई कहतीं है हर उम्मीद की किरण होंसलें की  लो जलाती है और इनकी रचनाओं में कुछ बहुत ही बेहतर हैं और कुछ अभी मासूम है जिन्हें पकने में थोडा वक़्त लगेगा ।
अभिषेक सिन्हा की रचनाओं में अभिनय करते मेरे शब्द हैं रचना बहुत ही बढ़िया है ..
ये शब्द एक दर्पण है
जो निज से सबको मिलाता है
उनके अस्तित्व का
ये दर्शन उन्हें कराता है
इनकी बेहतर रचनाओं में तू हमेशा पास रहती है और कांच के टुकड़े हैं
इस संग्रह की एक चमकीली मरीचिका के नाम में अर्चना नायडू का नाम महवपूर्ण है ..इनकी रचना आ अर्जुन ! अब गांडीव उठा ..झंझोर देती है ...निखरता है सोना ,अग्नि में तप कर
रंग लाती है मेहँदी ,पत्थरों में पीस कर
जीवन नाम है युद्ध का ,तू संघर्ष कर ..बहुत जीवन के सही अर्थों को समझाती है ....बरगद की छांव रचना रिश्तों के ताने बने पर बुनी एक सुन्दर रचना है जिस की छांव में माँ है पिता है और वह गांव प्यार का गांव है ।नारी व्यथा को दर्शाती एक सच्चाई रचना  की कुछ पंक्तियाँ
नहीं चाहती थी मैं
दहलीज की लक्ष्मण रेखाएं
वचनों की वर्जनाएं
फिर भी तुमने दी मुझे
सिर्फ सीमाएं ..यह रचना बहुत आएगी पढने वालों को ..साफ़ साफ़ शब्दों में नारी मन की बात इनकी कलम से बहुत सुन्दर ढंग से उतरी है कहीं मौन में ढल कर और कहीं स्वयं सिद्धा बन कर ..
रूह के  रिश्ते भी
जिस्मों से गुजर कर पूरे होते हैं ....यह  कहना है कुदरत प्रेमी डॉ प्रियंका जैन का ..इनकी लिखी रचनाये पढना बहुत ही रोचक लगा ..आज के वक़्त को यह बखूबी ब्यान कर रही है दिवाली की सफाई में बेच दिया इन्होने
थोड़ी सी मासूम हाथापाई
पुराने सिक्के
कुछ जूते के तस्में
कुछ यारों के टशन ..क्यों की मार्केटिंग वाले सब एक्सेप्ट करते हैं इस फेस्टिव सीजन में .....इनकी रचनाओं में शब्द आज की उस भाषा के इस्तेमाल हुए हैं जो हम अधिकतर बोलते हैं सुनते हैं ...जिस से हर रचना बहुत अपनी सी बात कहती लगती है ..इनको रचनाओं के कोई शीर्षक नहीं है ..नम्बर्स है सिर्फ जो और भी अधिक पढने वालों को रोचक लगते  हैं नंबर 13 की रचना पर हम पाते हैं कुछ और नम्बर 
यूँ ही दफअतन
दूसरे पहर उठती कभी
पुरवाई की तपिश से
पाती ढेरों मिस्स्ड कॉल्स
लिपटे थे उन 55 .60 .75 .80 .95 .99 कॉल्स  में
बेशुमार चाहत के नम एहसास ..
रजनी नैय्यर मल्होत्रा का नाम पढने वालों के लिए नया नहीं है ..इनके लिखे से बहुत से लोग परिचित हैं ...इनकी गजलो के अलफ़ाज़ दिल की जमीन से सीधे आपको खुद से रुबरु करवा देते हैं ..और कहते हैं पसंद आये तो दाद दे देना /यही है मेरे अशआर का इनाम
और आज का सच .. किताबों से उठ कर नेट पर आ गया /मीर हो या ग़ालिब का कलाम ...
एक सच और ...
जिनको चाह किये दोस्तों की तरह
वो बदलते रहे मौसमों की तरह

बाकी रचनाओं में इनकी रचना बेटियाँ कहाँ पीछे हैं बेटों से ..यह कहते हुए की जन्म नहीं कर्म भाग्य बनाता है /बेटों का भी और बेटियों का भी ...डॉ रागिनी मिश्र की रचनाओं में तुम प्रथम .आओ खेले भ्रष्ट -भ्रष्ट और हमारा आनलाइन प्रेम ...बहुत ही चमकीली रचनाएं है ....मेरी मृगतृष्णा में आखरी पंक्तियाँ बहुत जोरदार है ..
जीवन के बढ़ते क्रम में
मेरी प्रेमाग्नि भड़कती जाती है
होगी पूर्णाहुति इसमें ,तुम्हारी
या मेरी मृगतृष्णा बन जायेगी ?सवाल वाजिब है ..और बहुत गहरा  भी ..
रोशी अग्रवाल की रचनाएँ लिखी तो अच्छी है ..पर कहीं कही कहीं बहुत सपाट सी हैं .पढने में कुछ अलग हैं और प्रस्तुत करने का ढंग एक कहानी सा लगा ....कविता कम और बाते कहती सी अधिक लगी इन की रचनाएं .
विश्वजीत सपन ..इस संग्रह में बहुत सी विवधिता लिए से बहुत कम शब्दों में बहुत गहरी बातें सुनाते हुए लगे ..इनकी क्षणिकाएँ .हाइकु .मुक्तक बहुत ही बेहतरीन हैं इस संग्रह में ...
तुम तो जालिम हो
सामने आ कर गुजर जाती हो
कभी सोचा है तुमने
उस दिल का क्या होगा
जिसपे चल कर गुजर जाती हो

या यह ..करवट ले /नींदे तोड़ जाती हैं /यादें मुझको ....और एक हाइकु ..बहुत ही बढ़िया बात ...चुभन देता /अत्तित का दामन /छोड़ता नहीं !
सुमन मिश्रा ..की रचनाओं में मरीचिका पर लिखे हाइकु बहुत बढ़िया लगे ..बिलकुल मृगतृष्णा संग्रह को शब्द देते हुए ..
जल तलाश
तलाव कहीं पर हो
जीवन वहीँ !
सही कहा ..यही तो है सच ..इनकी बाकी रचनाएं अच्छी है ..कुछ तो बहुत ही गहरे भाव में उतरी हैं ..कहीं मन पंख सा उडता ,कहीं पत्थर सा भारी है ..में लिखी यह पंक्तियाँ
ये इश्क भी अजब बात है ,जब दूर है तब पास है
रिश्तों की अहमियत ही क्या किस किस को कहे ख़ास है
हेमंत कुमार दुबे की रचनाओं में प्रमुख रचना उनकी मृगतृष्णा ,तुम्हारे ख़त बहुत बेहतरीन लगी ..देश भक्ति पर लिखी इनकी रचनाएं जोश से दिल को भर देती हैं .सामजिक विषयों में नारी और जीवन संगिनी ने भी प्रभवित किया है
हर सुख दुःख की साथी
मेरी अन्तरंग सखी हो तुम
मन प्राण का आधार हो
जीवन संगिनी हो तुम ....सही परिभाषा है हमसफर की ...
जब इतने सारे लिखने वाले एक संग्रह से जुड़ते हैं तो विविधता हर रचना में आ जाती है ..इतने विचार अलग भाव और अलग लिखने के अंदाज़ ..जो कहीं कहीं बहुत बेहतरीन लगते हैं और कहीं कहीं खटक जाते हैं ....एक साथ संग्रह लाने में बहुत से वो लफ्ज़ .वो नाम और वो व्यक्तित्व भी पढने को मिल जाते हैं जो अनजान थे अब तक लेखन की दुनिया से ...यह अच्छा भी है और हिंदी भाषा के लिए बेहतरीन भी ..और मुझे लगता है कि  इस में हर लिखने वाला खुद ही अपने लिखे को आँक सकता है कि  वह कहाँ पर बेहतर है कहाँ कम है ....इन लिखी रचनाओं में आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बिम्ब मौजूद है ...काव्य -कला चूँकि एक कुदरत का वरदान है और कोई नहीं जानता कि कब और किसके अंतर्मन रूपी कलश में "वो "कृपा उड़ेल दे और वो हमें इसी तरह संग्रह में पढने को मिलता रहे इस के लिए सम्पादक को धन्यवाद देना चाहिए जिन्होंने नए लिखने वालों को मन और ह्रदय में विचार ,भाव ,सम्वेंदना और अनुभूति के भाव इस संग्रह में पिरोये हैं  वह जीवन के सच से परिचय करवाते हैं ठीक इसी संग्रह से ली गयी इन्ही पक्तियों सा सच ......

मन दौड़ता जाता है
वासनाओं के संग
गर्म रेतीले संसार में
जल के भ्रम में
जो मिलता नहीं
खो जाता है ....खो के फिर फिर मिलना ही जीवन कहलाता है और
पथिक मन
दूरियाँ तय कर
मरीचिका थी ..!!सुन्दर साज सज्जा से सजी साहित्य प्रेमी संघ के दस रचनाकारों की यह तृष्णा अपने कवर पेज पर दौड़ते हुए मृगों के साथ तलाशती मरीचिका आपके दिल को जरुर मोह लेगी |