Saturday, December 27, 2014

राहु - मंगल का अंगारक योग

अंगारक योग की वैदिक ज्योतिष में प्रचलित
परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में राहु अथवा केतु
का मंगल से किसी भी स्थान पर संबंध स्थापित हो जाए
तो ऐसी कुंडली में अंगारक योग का निर्माण हो जाता है
जिसके कारण जातक का स्वभाव आक्रामक, हिंसक
तथा नकारात्मक हो जाता है तथा इस योग के प्रभाव में आने
वाले जातकों के अपने भाईयों, मित्रों तथा अन्य
रिश्तेदारों के साथ संबंध भी खराब हो जाते हैं। कुछ वैदिक
ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में अंगारक योग बन
जाने पर ऐसा जातक अपराधी बन जाता है तथा उसे अपने
अवैध कार्यों के चलते लंबे समय तक जेल अथवा कारावास में
भी रहना पड़ सकता है।
राहु - मंगल का अंगारक योग=
ज्योतिष में राहु और मंगल मिल कर अंगारक योग बनाते
हैं। लाल किताब में इस योग को पागल हाथी या बिगड़ा शेर
का नाम दिया गया है। अगर यह योग किसी की कुंडली में
होता है तो वो व्यक्ति अपनी मेहनत से नाम और
पैसा कमाता है। ऐसे लोगों के जीवन में कई उतार चढ़ाव आते
हैं।यह योग अच्छा और बुरा दोनों तरह का फल देने वाला है।
ज्योतिष में इस योग को अशुभ माना जाता है।
1- कुंडली के पहले घर में राहु - मंगल अंगारक योग होने से पेट के
रोग और शरीर पर चोट का निशान रहता है।
2- कुंडली के दूसरे भाव में अंगारक योग होने से धन संबंधित
उतार चढ़ाव आते हैं। ऐसे लोग धन के मामलों में जोखिम लेने से
नहीं घबराते हैं।
3- जिन लोगों की कुंडली के तीसरे भाव में ये योग
होता उनको भाइयों और मित्रों से सहयोग मिलता है और
वो लोग मेहनत से पैसा, मान सम्मान कमाते हैं।
4- कुंडली के चौथे भाव में ये योग होने से माता के सुख में
कमी आती है और भूमि संबंधित विवाद चलते
रहते हैं
5- कुंडली के पांचवें भाव में अंगारक योग योग जुए, सट्टे,
लॉटरी और शेयर बाजार में लाभ दिलाता है।
6- जिन लोगों की कुंडली के छठे घर में मंगल-राहु एक साथ होते
हैं ऐसे लोग ऋण लेकर उन्नति करते हैं। अच्छे वकील और
चिकित्सक भी इसी योग के कारण बनते हैं।
7- कुंडली के सातवें भाव में अंगारक योग साझेदारी के काम में
फायदा दिलाता है
8- जिन लोगों की कुंडली के आठवें घर में अंगारक योग बनता है
ऐसे लोगों को वसीयत में सम्पत्ति मिलती है। ऐसे
लोगों को ऐक्सीडेंट का खतरा होता है।
9- कुंडली के नवें घर में ये योग बनता है तो ऐसे लोग कर्मप्रधान
होते है ऐसे लोगों की किस्मत ज्यादातर साथ नहीं देती। ये
लोग कुछ रूढ़ीवादी होते हैं।
10- दसवें भाव में अंगारक योग जिन लोगों की कुंडली में
होता है वो लोग रंक से राजा बन जाते हैं।
11- कुंडली के लाभ भाव यानि ग्यारहवें भाव में अंगारक योग
होने से प्रॉपर्टी से लाभ मिलता है।
12- बारहवें भाव में अंगारक योग होता है उन
लोगों का पैसा विदेश में जमा होता है। ऐसे लोग रिश्वत में
पकड़ा जाते हैं कभी कभी जेल यात्रा के योग भी बनते हैं।

कर्म का खाता

⏳⏳कर्म का खाता⌛⌛
👪संतान के रूप में कौन आती है 🏃
पूर्व जन्म के कर्मों से ही हमें इस जन्म में 👪माता-पिता,& भाई बहिन, पति-पत्नि, प्रेमिका, मित्र-शत्रु, 🙆🙅सगे-सम्बंधी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते है, सब मिलते है। क्यों कि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है, या इनसे कुछ लेना होता है।
👪वेसे ही संतान के रूप में हमारा कोई पूर्वजन्म का 'सम्बन्धी' ही आकर जन्म लेता है।
जिसे शास्त्रों में चार प्रकार का बताया गया है:-
1⃣. ऋणानुबन्ध :- पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से💸 धननष्ट किया हो, तो वो आपके घर में 👪संतान बनकर जन्म लेगा और आपका धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो।
2⃣. शत्रु पुत्र :-👺 पूर्व जन्म का कोई दुश्मन.आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में 👪संतान बनकर आयेगा औए बड़ा होने पर माता-पिता से मारपीट, झगड़ा, या उन्हें सारी जिन्दगी किसी भी प्रकार से सताता ही रहेगा। हमेशा कड़वा बोल कर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रख कर खुश होगा.।
3⃣. उदासीन पुत्र :-🙇 इस प्रकार की👪 'सन्तान', ना तो माता-पिता की सेवा करती है, ओर ना ही.कोई सुख देती है, और उनको उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ देती है। विवाह होने पर यह माता-पिता से अलग हो जाते हैं।
4⃣. सेवक पुत्र :- 👪पूर्व जन्म में यदि आपने किसी की खूब सेवा कि है, तो वह अपनी कि हुई सेवा का ऋण उतारने के लिये, आपकि सेवा करने के लिये पुत्र बन कर आता है। जो बोया है, वही तो काटोगे, अपने माँ-बाप की सेवा ती है, तो ही आपकी 👪औलाद बुढ़ापे में आपकी सेवा करेगी..। वरना कोई पानी पिलाने वाला भी पास ना होगा..? आप यह ना समझे कि यह सब बाते केवल मनुष्य पर ही लागु होती है। इन चार प्रकार में कोई सा भी 💥जीव भी आ सकता है।
जैसे आपने किसी 🐄गाय कि निःस्वार्थ भाव से सेवा कि है तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकती है।
यदि आपने 🐄गाय को स्वार्थ वश पालकर उसके दूध देना बन्द करने के पश्चात उसे घर से निकाल दिया हो तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी। यदि आपने किसी.निरपराध जीव को सताया है तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आयेगा। "इसलिये जीवन में कभी किसी का🙅 बुरा नहीं करें।"
क्योंकि प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करोगे, उसे वह आपको इस जन्म या अगले जन्म में, सौ गुना करके देगी। यदि आपने
किसी को 💶एक रूपया दिया है, तो समझो आपके खाते में 💸सौ रूपये जमा हो गये है। यदि आपने किसी का 💶एक रूपया छीना है, तो समझो आपकी जमा राशि से 💸सौ रूपये निकल
गये। ज़रा सोचो.. 😇आप "कौन सा धन" साथ लेकर आये थे, और कितना साथ ले कर जाओगे..? जो चले गये, वो कितना 💰सोना-चाँदी साथ ले गये..? मरने पर जो सोना-चाँदी, 📦धन-दौलत, बैंक में पड़ा रह गया, समझो.. वो व्यर्थ ही कमाया..?? 👪औलाद अगर अच्छी और लायक है, तो उसके लिये कुछ भी छोड़ कर जाने की जरुरत नहीं, खुद.ही खा-कमा लेगा, और अगर बिगड़ी और 🎭नालायक औलाद है, तो उसके लिए जितना मरज़ी धन छोड़ कर जाओ, वह चंद दिनों में सब बरबाद कर के ही चैन लेगा। मैं, मेरा-तेरा, सारा धन यहीं का यहीं धरा रह जाना है, कुछ भी साथ नहीं जाना है, साथ सिर्फ " नेकियाँ " ही जायl

Friday, December 26, 2014

श्राप दोष

पितृ दोष- यह किसी जातक की जन्मकुण्डली में सूर्य-राहु, सूर्य-शनि दोषों के कारण दोष हो तो इसके लिए नारायण बलि नाग बलि, गया श्राद्ध, अश्विन कृष्ण पक्ष में अपने दिवंगत पितरों का श्राद्ध, पितृ तर्पण, ब्राह्मण भोजन व दानादि करना चाहिए।
2- मातृ दोष- यदि चंद्रमा पंचमेश होकर शनि, राहु, मंगल आदि क्रूर ग्रहों से युक्त या आक्रांत हो और गुरु अकेला पंचम या नवम भाव में हो तो मातृ दोष के कारण संतान सुख में कमी आती है। इस दोष की शांति के लिए गोदान अथवा चांदी के पात्र में गो दुग्ध भरकर दान देना शुभ होता है। इसके अलावा एक लाख गायत्री मंत्र का जप करवाकर हवन, ब्राह्मण भोजन, वस्त्रादि का दान एवं दशमांस का तर्पण करने से दोष शांत होता है। पीपल वृक्ष का 28 हजार परिक्रमा का विधान भी बताया गया है।
3- भातृशाप- तृतीय भावेश मंगल राहु युक्त होकर पंचम भाव में हो और पंचमेश व लग्नेश दोनों अष्टम भाव में हो तो भ्रातृ शाप के कारण कष्ट एवं हानि होती है। इसके उपास स्वरूप श्रीसत्यनारायण व्रत रखकर विधि पूर्वक विष्णु पूजन तथा विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर प्रसाद वितरण करना चाहिए।
4-सर्प शाप- यदि पंचम भाव में राहु हो और उसपर मंगल की दृष्टि हो तो सर्प शाप के कारण संतान की हानि होती है। इसके उपाय स्वरूप नारायण नागबलि विधि पूर्वक करवाना चाहिए तथा ब्राह्मणों को यथा शक्ति भोजन, वस्त्र, गौ, भूमि, चांदी व सुवर्ण आदि का दान करना चाहिए।
5-ब्राह्मण शाप- यदि गुरु की राशि (धनु या मीन) पर राहु हो, पंचम में गुरु, मंगल व शनि हो तथा नवमेश ग्रह अष्टम में हो तो ब्राह्मण शाप से संतान का क्षय होता है। इस शाप की शांति के लिए मंदिर में या सुपात्र ब्राह्मण को श्रीलक्ष्मीनारायण की मूर्तियों का दान तथा यथाशक्ति कन्यादान, बछड़े सहित गोदान, शैय्या दान दक्षिणा सहित करना शुभ होता है।
6- मातुल शाप- पांचवें भाव में मंगल, बुध, गुरु व राहु हों तो मामा के शाप से संतान की हानि होती है। उपाय स्वरूप किसी मंदिर में श्रीविष्णु प्रतिमा की स्थापना, लोक हितार्थ पुल, तालाब, नल या प्याऊ लगवाने से संतति व संपत्ति में वृद्धि होती है।
7- प्रेत शाप- जब किसी जातक की जन्मकुण्डली के पंचम भाव में शनि, रवि हों और सातवें में क्षीण चंद्रमा हो तथा लग्न में राहु व 12वें भाव में गुरु हो तो प्रेत शाप क९ कारण वंश वृद्धि में बाधाएं आती हैं।
विशेष- इसके अतिरिक्त यदि किसी जातक द्वारा अपने दिवंगत पितरों के श्रद्धादि कर्म ठीक से न किए जा सके हों अथवा दिवंगत माता-पिता की उचित सेवा न की जा सकी हो तो भी प्रेत-पिशाचादि के कारण वंश वृद्धि में बाधाएं आती हैं। उपाय स्वरूप भगवान शिव की पूजा करवाकर विधिवत रूद्राभिषेक करवाना चाहिए और ब्राह्मणों को दान देना चाहिए

शरीर के चक्र जगाने की विधि

1. मूलाधार चक्र :

यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच
चार पंखुरियों वाला यह 'आधार चक्र' है। 99.9%
लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे
इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग,
संभोग और निद्रा की प्रधानता है
उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।
मंत्र : लं
चक्र जगाने की विधि : मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक
कि वह इस चक्र में जी रहा है इसीलिए
भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर
लगातार ध्यािन लगाने से यह चक्र जाग्रत होने
लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है यम
और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।
प्रभाव : इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर
वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत
हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता,
निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।
2. स्वाधिष्ठान चक्र-

यह वह चक्र है, जो लिंग मूल से चार अंगुल ऊपर स्थित है
जिसकी छ: पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र
पर ही एकत्रित है तो आपके जीवन में आमोद-प्रमोद,
मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने
की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए
ही आपका जीवन कब व्यतीत
हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ
फिर भी खाली रह जाएंगे।
मंत्र : वं
कैसे जाग्रत करें : जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन
मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन
भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है।
फिल्म सच्ची नहीं होती लेकिन उससे जुड़कर आप
जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने
का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।
प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य,
प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश
होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है
कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त
हो तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।
3. मणिपुर चक्र :

नाभि के मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के
अंतर्गत मणिपुर नामक तीसरा चक्र है, जो दस
कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस
व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे
काम करने की धुन-सी
रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग
दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।
मंत्र : रं
कैसे जाग्रत करें : आपके कार्य को सकारात्मक आयाम
देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।
प्रभाव : इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली,
लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो
जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है।
सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना
जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव
करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं।
आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन
का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।
4. अनाहत चक्र-
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हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल
की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से
सुशोभित चक्र ही अनाहत चक्र है। अगर
आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक
सृजनशील
व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने
की सोचते हैं। आप चित्रकार, कवि, कहानीकार,
इंजीनियर आदि हो सकते हैं।
मंत्र : यं
कैसे जाग्रत करें : हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से
यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर
रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह
अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और सुषुम्ना
इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।
प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा,
कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार
समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से
व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण
होता है।
इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत:
ही प्रकट होने लगता है।व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त,
सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक
रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता हैं।
ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ
के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।
5. विशुद्ध चक्र-
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कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां विशुद्ध चक्र है और
जो सोलह पंखुरियों वाला है। सामान्यतौर पर
यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है
तो आप अति शक्तिशाली होंगे।
मंत्र : हं
कैसे जाग्रत करें : कंठ में संयम करने और ध्यान लगाने से
यह चक्र जाग्रत होने लगता है।
प्रभाव : इसके जाग्रत होने कर सोलह कलाओं और
सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके
जाग्रत
होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है
वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।
6. आज्ञाचक्र :
▶▶▶▶▶▶▶▶▶
भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में
आज्ञा चक्र है। सामान्यतौर पर जिस
व्यक्ति की ऊर्जा यहां
ज्यादा सक्रिय है तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से
संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है
लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। इस
बौद्धिक सिद्धि कहते हैं।
मंत्र : ऊं
कैसे जाग्रत करें : भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए
साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।
प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास
करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी
शक्तियां जाग पड़ती हैं और व्यक्ति एक सिद्धपुरुष बन
जाता है।
7. सहस्रार चक्र :
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सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है
अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम
का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह
आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को
संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब
नहीं रहता है।
कैसे जाग्रत करें :
मूलाधार से होते हुए ही सहस्रार तक
पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह
चक्र जाग्रत
हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर
लेता है।
प्रभाव : शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण
विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही मोक्ष
का द्वार है।

Thursday, December 25, 2014

सूर्य के बारे में बताते हैं कि वो किस भाव में क्या चिन्ता देता है

सूर्य के बारे में बताते हैं कि वो किस भाव में क्या चिन्ता देता है
---. सूर्य पहले भाव में हो तो किसी के द्वारा कपट करने और छल करने की चिन्ता है,किसी ने झूठ कहकर बदनाम किया है. सूर्य के दूसरे भाव में होने से जो कार्य किया जा रहा है उसके अन्दर लगने वाले धनबल, बाहुबल या भाग्यबल की चिन्ता है. तीसरे भाव में किसी के द्वारा किये जाने वाले झगडे की चिन्ता है. चौथे भाव में किसी के प्रति जलन चल रही है. पांचवें भाव में सन्तान या शिक्षा या खेल की हार-जीत की चिन्ता है. छठे भाव में रास्ते में जाते वक्त या आते वक्त कोई काम किया जाना था उसकी चिन्ता है. सातवें भाव में होने पर जीवन साथी या साझेदार के अहम भरे शब्द कहने की चिन्ता है. आठवें भाव में ह्रदय की बीमारी या नौकर के द्वारा काम नहीं करने की चिन्ता है. नवें भाव से विदेश में रहने वाले व्यक्ति की चिन्ता है. दसवें भाव में राज्य या सरकार द्वारा परेशान किये जाने की चिन्ता है. ग्यारहवें भाव में सरकार से या पुत्र या पिता के धन की चिन्ता है. बारहवें भाव में आने जाने वाले रास्ते और शत्रु द्वारा परेशान किये जाने की चिन्ता है. 

Saturday, December 20, 2014

तुला 2015 : जानिए कैसे बीतेगा आपका यह साल

तुला  2015 : जानिए कैसे बीतेगा आपका यह साल
तुला राशि वाले सुन्दर, स्वस्थ व आकर्षक शरीर वाले होते हैं। ये कला के क्षेत्र में उत्तम सफल होते हैं। इकहरे शरीर वाले होते हैं। इनका पारिवारिक जीवन शुक्र की स्थिति पर अधिक निर्भर रहता है। शुक्र स्वराशि या उच्च का हो तो सुखद जीवन कहा जा सकता है। 
जनवरी 
इस माह पारिवारिक सुख अच्छा रहेगा। भूमि-भवन और वाहन खरीदने के योग अच्छे बन रहे हैं। समाज में मान-सम्मान मिलेगा। नौकरी में हैं तो तरक्की मिलने की प्रबल संभावना है। व्यापार में भी नए अवसर मिलेंगे। शत्रु परास्त होंगे, खर्च अधिक और आय थोड़ी कम रहेगी।  
फरवरी  
इस माह भाग्य थोड़ा कमजोर है अतः केवल भाग्य भरोसे कोई काम न करें। आय में थोड़ी कमी रहेगी अतः खर्च पर नियंत्रण रखें। शत्रु हो सकते हैं, पर परास्त भी होंगे। परेशानियों में आपकी आंतरिक क्षमता और दूरदर्शिता काम आएगी। अपने निर्णय से किसी बड़े व्यापारिक कार्य को अंजाम दे सकते हैं।  
मार्च  
यह माह थोड़ा सावधानी रखने वाला है। धन के मामले में सफलता का योग कम है। वैवाहिक जीवन में थोड़ी परेशानी या जीवनसाथी से मतभेद उत्पन्न हो सकता है। संतान से भी कोई कष्ट या उसके कारण थोड़ी मानसिक परेशानी उठानी पड़ सकती है। शरीर में कमर के नीचे थोड़ा कष्ट का योग बन रहा है अतः सावधानी बरतें। 
अप्रैल 
इस माह मन प्रसन्नतादायक रहेगा और सुख-शांति की अनुभूति होगी। जीवनसाथी से संबंध सुधरेंगे। नए प्रेम-प्रसंग बन सकते हैं। कुछ नए संबंध बनने की भी संभावना बन सकती है। जमीन-जायदाद के मामलों में आशातीत सफलता मिलेगी। नवीन वाहन का योग भी बन रहा है, भौतिक सुखों की वृद्धि रहेगी।  
मई  
इस माह आय में वृद्धि होगी। पराक्रम बहुत बढ़ेगा। मान-सम्मान की स्थिति बनेगी। विपरीत लिंगियों के प्रति आकर्षण बहुत अधिक रहेगा। शत्रुओं पर बहुत प्रभाव रहेगा। कर्ज से मुक्ति मिलेगी। कोई सुदूर यात्रा होने की संभावना बन रही है, घर से दूरी बनेगी। भाग्य पक्ष कमजोर रहेगा अतः केवल भाग्य भरोसे कोई काम न करें।  
जून  
इस माह जरा सावधानी बरतें, दुर्घटना का योग बन रहा है। वाहन चलाते समय विशेष सतर्कता बरतें। सरकार से संबंधित कार्यों में बहुत सफलता मिलेगी। मान-सम्मान खूब मिलेगा। किसी कार्य के लिए बहुत सराहना मिल सकती है। पारिवारिक सुख में थोड़ी कमी, जीवनसाथी से वैचारिक मतभेद पनप सकता है।
जुलाई 
इस माह भाग्य साथ देगा, साथ ही पराक्रम भी खूब बढ़ेगा। नए कार्यों का शुभारंभ और उससे लाभ मिलेगा। शत्रु परास्त होंगे और कर्ज से मुक्ति मिलेगी। परिवार में कोई शुभ कार्य होगा। यात्रा आरामदायक और परिणामदायक होगी। नए संबंधों से लाभ मिलेगा। जीवनसाथी के सहयोग से किसी कार्य में सफलता मिलेगी और उनके कारण लाभ होगा।
अगस्त  
यह माह पराक्रम बहुत बढ़ा-चढ़ा रहेगा। सगे-संबंधियों से संबंध अच्छे होंगे। भाई-बहनों और मित्रों का भरपूर साथ मिलेगा। इनसे पहले से चली आ रही कोई नाराजगी खत्म होगी। राजनीतिक क्षेत्र में सफलता का बहुत अच्छा योग है। जो लोग सरकारी क्षेत्रों के लिए कार्य कर रहें हैं उन्हें यह मास बहुत लाभदायक होगा।  
सितंबर 
इस माह शत्रुओं को परास्त करने में सक्षम होंगे। कर्ज और रोग से मुक्ति मिलेगी। भूमि-भवन और वाहन खरीदने का बहुत ही अच्छा योग है। आय में भी अप्रत्याशित वृद्धि होगी। किसी बड़ी प्रतियोगिता-परीक्षा में सफलता का योग बन रहा है अतः पूरे उत्साह से शामिल हों। 
अक्टूबर  
इस माह आय के स्रोत एक से ज्यादा होंगे। कहीं न कहीं से धन आता रहेगा। किसी से विवाद के कारण भी धन प्राप्त होने की संभावना बन रही है। यात्राएं हो सकती हैं जिनका तत्काल कोई परिणाम नहीं निकलेगा। शत्रुओं पर प्रभाव कायम रहेगा। शिक्षा के क्षेत्र में सफलता तथा संतान के किसी कार्य से मन प्रसन्न रहेगा।  
नवंबर  
इस माह निर्णय लेने की क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। वाणी गंभीर और तार्किक क्षमता अच्छी रहेगी। प्रभावशाली लोगों से संबंध बनेगा और उन पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा। धन एक से अधिक स्रोतों से आएगा। व्यापार में सफलता और यदि नौकरी में हैं तो तरक्की का योग बनेगा।  
दिसंबर  
इस माह भौतिक सुखों में खूब वृद्धि होगी। मन और बुद्धि सही दिशा में काम करेगी। वाणी कभी-कभी कठोर होगी जिसके कारण कुछ नुकसान हो सकता है। अतः सलाह है कि थोड़ा शांत रहने का प्रयास करें फिर भी निर्णय सही दिशा में होंगे। आय प्राप्त करने में कठिनाई होगी और खर्च नियंत्रण से बाहर रहेगा।  
तुला राशि वालों के लिए विशेष- 
तुला राशि के जातकों के लिए शनि की साढ़े साती का अंतिम चरण का पहला पक्ष रहेगा अतः कुछ राहत महसूस करेंगे। कर्ज और शत्रुओं से मुक्ति मिलने लगेगी फिर भी आय अभी उस गति से नहीं होगी, जैसी अपेक्षित है। चोट-चपेट की संभावना रहेगी। 
निम्न उपाय भी कर सकते हैं- 
1. रुद्र गायत्री जप 'ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्रः प्रचोदयात' का नियमित जप अत्यंत लाभकारी होगा।

2. धन की समस्या यदि अधिक हो तो शनिवार को सायंकाल सरसों का तेल पहले लगाएं फिर स्नान करें।