Tuesday, March 3, 2015

त्रिफला लेने के नियम

त्रिफला लेने के नियम--
त्रिफला के सेवन से अपने शरीर का कायाकल्प कर जीवन भर स्वस्थ रहा जा सकता है | आयुर्वेद की महान देन त्रिफला से हमारे देश का आम व्यक्ति परिचित है व सभी ने कभी न कभी कब्ज दूर करने के लिए इसका सेवन भी जरुर किया होगा | पर बहुत कम लोग जानते है इस त्रिफला चूर्ण जिसे आयुर्वेद रसायन भी मानता है से अपने कमजोर शरीर का कायाकल्प किया जा सकता है | बस जरुरत है तो इसके नियमित सेवन करने की | क्योंकि त्रिफला का वर्षों तक नियमित सेवन ही आपके शरीर का कायाकल्प कर सकता है |
सेवन विधि - सुबह हाथ मुंह धोने व कुल्ला आदि करने के बाद खाली पेट ताजे पानी के साथ इसका सेवन करें तथा सेवन के बाद एक घंटे तक पानी के अलावा कुछ ना लें | इस नियम का कठोरता से पालन करें |
यह तो हुई साधारण विधि पर आप कायाकल्प के लिए नियमित इसका इस्तेमाल कर रहे है तो इसे विभिन्न ऋतुओं के अनुसार इसके साथ गुड़, सैंधा नमक आदि विभिन्न वस्तुएं मिलाकर ले | हमारे यहाँ वर्ष भर में छ: ऋतुएँ होती है और प्रत्येक ऋतू में दो दो मास |
१- ग्रीष्म ऋतू - १४ मई से १३ जुलाई तक त्रिफला को गुड़ १/४ भाग मिलाकर सेवन करें |
२- वर्षा ऋतू - १४ जुलाई से १३ सितम्बर तक इस त्रिदोषनाशक चूर्ण के साथ सैंधा नमक १/४ भाग मिलाकर सेवन करें |
३- शरद ऋतू - १४ सितम्बर से १३ नवम्बर तक त्रिफला के साथ देशी खांड १/४ भाग मिलाकर सेवन करें |
४- हेमंत ऋतू - १४ नवम्बर से १३ जनवरी के बीच त्रिफला के साथ सौंठ का चूर्ण १/४ भाग मिलाकर सेवन करें |
५- शिशिर ऋतू - १४ जनवरी से १३ मार्च के बीच पीपल छोटी का चूर्ण १/४ भाग मिलाकर सेवन करें |
६- बसंत ऋतू - १४ मार्च से १३ मई के दौरान इस के साथ शहद मिलाकर सेवन करें | शहद उतना मिलाएं जितना मिलाने से अवलेह बन जाये |
इस तरह इसका सेवन करने से एक वर्ष के भीतर शरीर की सुस्ती दूर होगी , दो वर्ष सेवन से सभी रोगों का नाश होगा , तीसरे वर्ष तक सेवन से नेत्रों की ज्योति बढ़ेगी , चार वर्ष तक सेवन से चेहरे का सोंदर्य निखरेगा , पांच वर्ष तक सेवन के बाद बुद्धि का अभूतपूर्व विकास होगा ,छ: वर्ष सेवन के बाद बल बढेगा , सातवें वर्ष में सफ़ेद बाल काले होने शुरू हो जायेंगे और आठ वर्ष सेवन के बाद शरीर युवाशक्ति सा परिपूर्ण लगेगा |
दो तोला हरड बड़ी मंगावे |तासू दुगुन बहेड़ा लावे ||
और चतुर्गुण मेरे मीता |ले आंवला परम पुनीता ||
कूट छान या विधि खाय|ताके रोग सर्व कट जाय ||
त्रिफला का अनुपात होना चाहिए :- 1:2:3=1(हरद )+2(बहेड़ा )+3(आंवला )
त्रिफला लेने का सही नियम -
*सुबह अगर हम त्रिफला लेते हैं तो उसको हम "पोषक " कहते हैं |क्योंकि सुबह त्रिफला लेने से त्रिफला शरीर को पोषण देता है जैसे शरीर में vitamine ,iron,calcium,micronutrients की कमी को पूरा करता है एक स्वस्थ व्यक्ति को सुबह त्रिफला खाना चाहिए |
*सुबह जो त्रिफला खाएं हमेशा गुड के साथ खाएं |
*रात में जब त्रिफला लेते हैं उसे "रेचक " कहते है क्योंकि रात में त्रिफला लेने से पेट की सफाई (कब्ज इत्यादि )का निवारण होता है |
*रात में त्रिफला हमेशा गर्म दूध के साथ लेना चाहिए |
नेत्र-प्रक्षलन : एक चम्मच त्रिफला चूर्ण रात को एक कटोरी पानी में भिगोकर रखें। सुबह कपड़े से छानकर उस पानी से आंखें धो लें। यह प्रयोग आंखों के लिए अत्यंत हितकर है। इससे आंखें स्वच्छ व दृष्टि सूक्ष्म होती है। आंखों की जलन, लालिमा आदि तकलीफें दूर होती हैं।
- कुल्ला करना : त्रिफला रात को पानी में भिगोकर रखें। सुबह मंजन करने के बाद यह पानी मुंह में भरकर रखें। थोड़ी देर बाद निकाल दें। इससे दांत व मसूड़े वृद्धावस्था तक मजबूत रहते हैं। इससे अरुचि, मुख की दुर्गंध व मुंह के छाले नष्ट होते हैं।
- त्रिफला के गुनगुने काढ़े में शहद मिलाकर पीने से मोटापा कम होता है। त्रिफला के काढ़े से घाव धोने से एलोपैथिक- एंटिसेप्टिक की आवश्यकता नहीं रहती। घाव जल्दी भर जाता है।
- गाय का घी व शहद के मिश्रण (घी अधिक व शहद कम) के साथ त्रिफला चूर्ण का सेवन आंखों के लिए वरदान स्वरूप है।
- संयमित आहार-विहार के साथ इसका नियमित प्रयोग करने से मोतियाबिंद, कांचबिंदु-दृष्टिदोष आदि नेत्र रोग होने की संभावना नहीं होती।
- मूत्र संबंधी सभी विकारों व मधुमेह में यह फायदेमंद है। रात को गुनगुने पानी के साथ त्रिफला लेने से कब्ज नहीं रहती है।
- मात्रा : 2 से 4 ग्राम चूर्ण दोपहर को भोजन के बाद अथवा रात को गुनगुने पानी के साथ लें।
- त्रिफला का सेवन रेडियोधर्मिता से भी बचाव करता है। प्रयोगों में देखा गया है कि त्रिफला की खुराकों से गामा किरणों के रेडिएशन के प्रभाव से होने वाली अस्वस्थता के लक्षण भी नहीं पाए जाते हैं। इसीलिए त्रिफला चूर्ण आयुर्वेद का अनमोल उपहार कहा जाता है।
सावधानी : दुर्बल, कृश व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्री को एवं नए बुखार में त्रिफला का सेवन नहीं करना चाहिए।

राहु से ग्रस्त व्यक्ति के लक्षण

पेट के रोग दिमागी रोग पागलपन खाजखुजली भूत चुडैल का शरीर में प्रवेश बिना बात के ही झूमना, नशे की आदत लगना, गलत स्त्रियों या पुरुषों के साथ सम्बन्ध बनाकर विभिन्न प्रकार के रोग लगा लेना, शराब और शबाब के चक्कर में अपने को बरबाद कर लेना,लगातार टीवी और मनोरंजन के साधनों में अपना मन लगाकर बैठना, होरर शो देखने की आदत होना, भूत प्रेत और रूहानी ताकतों के लिये जादू या शमशानी काम करना, नेट पर बैठ कर बेकार की स्त्रियों और पुरुषों के साथ चैटिंग करना और दिमाग खराब करते रहना, कृत्रिम साधनो से अपने शरीर के सूर्य यानी वीर्य को झाडते रहना, शरीर के अन्दर अति कामुकता के चलते लगातार यौन सम्बन्धों को बनाते रहना और बाद में वीर्य के समाप्त होने पर या स्त्रियों में रज के खत्म होने पर टीबी तपेदिक फ़ेफ़डों की बीमारियां लगाकर जीवन को खत्म करने के उपाय करना, शरीर की नशें काटकर उनसे खून निकाल कर अपने खून रूपी मंगल को समाप्त कर जीवन को समाप्त करना, ड्र्ग लेने की आदत डाल लेना, नींद नही आना, शरीर में चींटियों के रेंगने का अहसास होना,गाली देने की आदत पड जाना,सडक पर गाडी आदि चलाते वक्त अपना पौरुष दिखाना या कलाबाजी दिखाने के चक्कर में शरीर को तोड लेना, बाजी नामक रोग लगा लेना, जैसे गाडीबाजी, आदि, इन रोगों के अन्य रोग भी राहु के है, जैसे कि किसी दूसरे के मामले में अपने को दाखिल करने के बाद दो लोगों को आपस में लडाकर दूर बैठ कर तमाशा देखना, लोगों को क्लिप बनाकर लूटने की क्रिया करना और इन कामों के द्वारा जनता का जीवन बिना किसी हथियार के बरबाद करना भी है। अगर उपरोक्त प्रकार के भाव मिलते है, तो समझना चाहिये कि किसी न किसी प्रकार से राहु का प्रकोप शरीर पर है, या तो गोचर से राहु अपनी शक्ति देकर मनुष्य जीवन को जानवर की गति प्रदान कर रहा है, अथवा राहु की दशा चल रही है, और पुराने पूर्वजों की गल्तियों के कारण जातक को इस प्रकार से उनके पाप भुगतने के लिये राहु प्रयोग कर रहा है।

उपाय : अगर किसी को राहू की दशा में या कोई इस ग्रह से संबंधित पीडा हो तो ऐसे व्यक्ति को अपने उपर से सलेटी रंग का कंबल उतार कर मकर संक्रांति पर किसी भी ऐसे व्यक्ति को उडाकर आये जो ठिठुरन में सोसोया हुआ हो ऐसा गुप्त रूप से करे।वर्ष में एक ही बार ऐसा होता है।

चंद्र राहु की युती चंद्र ग्रहण

चंद्र राहु की युती चंद्र ग्रहण कहलाती है...इस युती का फल प्रायः खराब ही रहता है ..और ईस युती को कुछ ज्योतीष प्रेत बाधा योग भी कहते है ..यह युती योग १ ' ७ '८ वे भाव मै पूर्ण दोष कारी है ..और इस युती के कारण जातक आत्महत्या भी करता है ..और वो भी फासी लगाकर करता जब इस युती का संबंध लग्न या लगनेश से हौ...और कही बुध ग्रह भी खराबी मे हो तब ऐसा जातक पागल भी होता है ...और कही चंद्र राहु व शनी यह तीनो ग्रह ७ भाव मे हो साथ ही सप्तमैश निच या शत्रुगत हो तब ऐसे जातक की पत्नी आत्महत्या करती है ..
अपनी कुण्डली के अनुसार पुष्य नक्षत्र में और पुर्णिमा को उपाय करे।

राहुदेव छाया ग्रह

राहुदेव छाया ग्रह हैं, उनका भौतिक स्वरूप नहीं है, अपितु वे एक गणितीय बिन्दु हैं। पृथ्वी और चन्द्रमा के ये कटान बिन्दु
पीछे की ओर खिसकते रहते हैं जिसे राहु और केतु का संचार (गति) कहा जाता है। यह अपने परिक्रमा पथ पर 18 वर्ष में एक चक्कर पूर्ण कर लेते हैं। वैदिक ज्योतिष में वराह मिहिर तक के काल में 7 ग्रहों को ही मान्यता प्राप्त थी परन्तु वराह
मिहिर के बाद के ज्योतिर्विद महर्षियों ने राहु-केतु के मानव पर होने वाले प्रभावों को समझा और इन्हेंग्रह मण्डल में सदस्य के रूप में रख दिया। इस प्रकार नवग्रह की ज्योतिष परम्परा चल प़डी। राहु और केतु नामक ये गणितीय बिन्दु सदैव परस्पर 180 अंश की दूरी पर रहते हैं।
हम राहु के मनुष्य के वैवाहिक और दाम्पत्य जीवन पर प़डने वाले प्रभावों पर प्रकाश डालेंगे। राहु को शनि के समान क्रूर और पापी माना जाता है इसलिए कहा गया है कि राहु की क्रूर नक्षत्रों में स्थिति बहुत घातक होती है। ऎसी स्थिति तृतीय भाव में होने पर भाई, चतुर्थ भाव में होने पर माता, पंचम भाव में होने पर संतान, सप्तम भाव में होने पर पत्नी और दशम भाव में
पिता के लिए घातक होती है। राहु की सप्तम भाव में उपस्थिति दाम्पत्य जीवन (वैवाहिक स्थिति) के लिए अशुभकारी हो सकती है जिनमें निम्न स्थितियां बन सकती हैं:-
(1) अविवाहित रहना।
(2) जीवनसाथी की अकाल मृत्यु हो जाना।
(3) जीवनसाथी का रोग ग्रस्त रहना।
(4) जीवनसाथी का अनैतिक चरित्र होना।
(5) संतानहीन होना।
(6) जीवनसाथी का अतिक्रोधी, झग़डालू या बेपरवाह होना।
ये सभी स्थितियां व्यक्ति के वैवाहिक जीवन को दुखमय और असहनीय बना देती हैं। सप्तम भाव में
राहु की अशुभ स्थिति को विभिन्न ज्योतिष विद्वानों में इस प्रकार उल्लिखित किया है:-
मंत्रेश्वर:
मनुष्य çस्त्रयों की कुसंगति में प़डकर निर्धन हो जाता है, विधुर हो जाता है, स्वच्छन्द
प्रकृति का हो जाता है, बुद्धिहीन होता है।
महर्षि वसिष्ठ: पत्नी या पति हन्ता हो जाता है।
यवनाचार्य: अग्नि के समान जलता रहता है, अशांत रहता है, जीवनसाथी को मार डालता है।
ढुंढिराज: जीवनसाथी का विरोध करता है, उसे परेशान करता है, जीवनसाथी विकल या अपंग होता है। झग़डालू, क्रोधी कलहकारी होता है।
महर्षि गर्गाचार्य: उसकी पत्नी या पति बंध्या होते हैं अर्थात् उनमें संतान उत्पन्न करने की क्षमता नहीं रहती।
वैद्यनाथ: जीवनसाथी घमंडी, क्रोधी, परस्त्रीगामी, रोगी होता है। संतान हीनता रहती है।
जातक पारिजात: जीवनसाथी घमंडी, व्यभिचारी, चरित्रहीन, कर्कश होता है। इन ज्योतिष ग्रंथों मे राहु
की सप्तम भाव में अशुभ स्थिति को मनुष्य के वैवाहिक जीवन के लिए प्रतिकूल और घातक बताई गई है।
इसका यह आशय हुआ कि यदि व्यक्ति की जन्म कुंडली में राहु अशुभ राशि, भाव, युति या नक्षत्र में
स्थित हों तो उस व्यक्ति का दाम्पत्य जीवन कठोर एवं अशांत हो जाता है। दाम्पत्य जीवन के अशांत एवं
कलहकारी होने पर जीवन नरक तुल्य हो जाता है। स्त्री और पुरूष इस गृहस्थ संसार की ग़ाडी के दो पहिये
होते हैं, इनमें से एक पहिया यदि टूट जाए, या टेढ़ा-मेढ़ा चलने लगे तो गृहस्थ की ग़ाडी लचर-पचर
हो जाती है, चरमराकर चलती है, कभी-कभी स्थायी रूप से रूक जाती है। राहु की सप्तम भाव
की स्थिति सम्पूर्ण जीवन को अशांत और प्रतिकूल बनाने के लिए पर्याप्त होती है इसलिए जब
कुंडली मिलान किया जाता है तो राहु की स्थिति अनदेखी नहीं करनी चाहिए। गृहस्थ
जीवन मे कई बार पाया जाता है कि मांगलिक दोष से भी राहु देव की सप्तम भाव में स्थिति अधिक घातक
हो जाती है और व्यक्ति आजीवन दाम्पत्य संबंधों के ठीक होने या सुखी दाम्पत्य जीवन की कामना में
बिता देता है।
राहु की सप्तम भाव में स्थिति को व्यक्ति की कुंडली में लग्न से सप्तम भाव और चन्द्रमा से सप्तम भाव, दोनों ही प्रसंग में
देखनी चाहिए क्योंकि चंद्रमा को ज्योतिष मे मन का कारक माना जाता है, साथ ही चंद्रमा स्त्री ग्रह भी हैं। अत: मन और स्त्रीतत्व दोनों का राहु की परिधि या युति मे आ जाना, दाम्पत्य जीवन का दूषित हो जाना होगा। हमें ज्ञात है राहुदेव ज्योतिष मे भ्रम और विष एवं विषैले पदार्थो का प्रतिनिधित्व करते हैं। मधुर, सरस, कोमल, भावना प्रवण, विश्वासप्रिय, दाम्पत्य जीवन में जब राहुदेव के भ्रम, अविश्वास और विषाक्तता का समावेश हो जाता है तो ऎसा दाम्पत्य जीवन अवश्य ही अशांत, दुखमय, अव्यवस्थित और अविश्वसनीय हो जाता है।
विवाह या वैवाहिक जीवन के नैसर्गिक कारक सप्तमेश, बृहस्पति, शुक्र और चंद्रमा का राहु से पीç़डत
होना दाम्पत्य जीवन के दूषित हो जाने का लक्षण होता है। चंद्रमा और शुक्र की राशियों में सप्तम भाव
में राहु की स्थिति का गंभीरतापूर्वक विश्लेषण करना चाहिए क्योंकि इन राशियों मे राहुदेव की स्थिति दाम्पत्य जीवन के लिए भयावह बन जाती है।
प्राय: देखने में आता है कि मेष और वृष राशि में स्थित चंद्रमा से सप्तम भाव में स्थित राहु दाम्पत्य जीवन के
लिए इतने घातक नहीं होते, व्यक्ति का वैवाहिक जीवन चल जाता है परन्तु मिथुन राशि में स्थित चंद्र से
सप्तम के राहु विवाह विच्छेद या परित्याग करा देते हैं। ऎसे ही कर्क, कन्या, तुला, मकर, कुंभ और मीन में
राशि में स्थित चंद्र से सप्तम भाव मे स्थित राहु के कारण संतानहीनता, संतान विलगाव, संतान
को अरिष्ट योग या बंध्या होने जैसे परिणाम देते हैं। कर्क राशि में शनि के नक्षत्र पुष्य में स्थित राहु वैधव्य
योग का कारण बन जाते हैं। वृश्चिक और कुंभ राशि में स्थित राहु विवाह में विलम्ब करा देते हैं।
ऎसा भी पाया गया है कि धनु राशि में मूल नक्षत्र में स्थित राहु से जीवनसाथी की मृत्यु हो जाती है।
सामान्यत: कर्क, तुला और धनु राशियों मे अन्य अशुभ प्रभावों के होने पर राहु की स्थिति व्यक्ति को चरित्रहीन एवं अनैतिक
संबंधों की ओर ले जाती है और वैवाहिक जीवन अविश्वसनीय एवं अशांत बन जाता है। इसी प्रकार मंगल, शनि के दुष्प्रभाव में राहु के होने या आश्लेषा, मघा अथवा मूल नक्षत्र में राहु की स्थिति भी वैवाहिक जीवन के लिए शुभ नहीं मानी जाती।
इन सभी बातों के होते हुए भी ऎसा नहीं है कि राहुदेव की सप्तम भाव में स्थिति सदैव घातक और अनिष्ट
ही होती है। कवि व ज्योतिषी कालिदास ने अपने ज्योतिष ग्रंथ उत्तरकालामृत में वर्णित किया है कि यदि राहु स्वराशि,
उच्चाराशि अथवा अपनी मूल त्रिकोण राशि में स्थित होते हैं तो वे सम्पूर्ण जगत का अतुल बल प्राप्त
कर लेते हैं और व्यक्ति को अपना अधिकाधिक शुभत्व प्रदान करने से कभी नहीं हिचकते। अन्य कारणों से
वैवाहिक जीवन में आने वाले क्लेशों, मनमुटावों और अविश्वासों का हरण कर दाम्पत्य जीवन को सुखमय
बना देते हैं। ऎसा भी होता है कि व्यक्ति का जीवनसाथी अकाल मृत्यु को प्राप्त
हो जाए तो राहुदेव की शुभ एवं अनुकूल स्थिति उसे दूसरा जीवनसाथी उपलब्ध कराकर उसके गृहस्थ जीवन
और दाम्पत्य जीवन को पुन: पटरी पर ला दे। वह पुन: सुख एवं शांत जीवन जीने लगता है। अपनी मूल
त्रिकोण, उच्चा या स्वराशि में राहुदेव को अतुल बल प्राप्त होना बताया गया है, अतुल बल से तात्पर्य है
कि किसी भी परिस्थिति में परिस्थिति को अनुकूल बना देना और अनुकूल परिणामों की स्थिति उत्पन्न करना।
उपर्युक्त संक्षिप्त विश्लेषण से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दाम्पत्य जीवन में राहुदेव की भूमिका महत्वपूर्ण
होती है। इसका निरूपण करना आवश्यक होता है।

Monday, March 2, 2015

चर लग्न 1 ,4 ,7 ,10 हो तो एकादश भाव एवं भावेश बाधक होता है

सु प्रभात मित्रो क्या आप जानते है ,चर लग्न 1 ,4 ,7 ,10 हो तो एकादश भाव एवं भावेश बाधक होता है ,स्थिर लग्न 2 ,5 ,8 ,11 में नवम भाव एवं नवम भावेश ,एवं द्विस्वभाव 3 ,6 ,9 ,12 के लिए सप्तम भाव एवं भावेश बाधक होता है ,एक बात और इन बाधक भावो में स्थित गृह भी बाधक होते है ,बाधक स्थान या बाधक गृह स्वग्रही एवं उच्च का होकर भी फल नहीं करते ,इन बाधक ग्रहो की अन्तर्दशा में ये अनिष्ठ फल देते है ,ये बाधक गृह त्रिकोण ,केंद्र में होकर और भी अशुभ हो जाते है ,परन्तु त्रिक भाव में रहने से बाधकता से मुक्त हो जाते है एवं विपरीत राज योग बनाते है।

शनि देव कब अच्छे और कब बुरे हो जाते हैं।

शनि देव कब अच्छे और कब बुरे हो जाते हैं।
जब शनि देव के साथ सूर्य का सम्बन्ध बन जाये तो शनि का फल अच्छा नहीं । शनि जब अपनी नीच राशि मेष में हो तब भी शनि के फल मन्दे हो जाते हैं। और जब शनि किसी की कुंडली में लग्न में हों और 7 और 10 घर में कोई ग्रह हो तो भी शनि बुरे फल के हो जाते हैं।
साथ ही शनि देव का सम्बन्ध मकान से भी है। जब शनि देव 1,3,4,5,6,8,10,11 घर में बैठे हों तो व्यकित को मकान 48 साल की उम्र से पहले नहीं बनाना चाहिए।11 वें घर में शनि हो तो 55 साल की उम्र से पहले ना बनाये।
9 वें घर में शनि हों तो 2 से ज्यादा मकान न बनाएं। साथ ही इये भी ध्यान रखें की पत्नी गर्भ बती न हो।
शनि देव जिसकी कुंडली में अच्छे ना हों उसको साढेसाती में बहुत परेशानी होती है।उस समय बो राजा को भी रेहड़ी चलाने के लिए मजबूर कर देते हैं।ऐसा व्यकित जब तक झुकना ना सीख़ जाये तब तक शनि उसको परेशान करते हैं फिर बाद में उसे दुबारा ऊंचाइयों पर ले जाते हैं। और उसका जो भी साढेसाती समय में बर्बाद होता है। उससे भी ज्यादा उसे बापिस देते हैं।
हकीकत में शनि एसे मास्टर हैं । जो अपने विध्यार्थी को मार मार् के पीट पीट के लोहे से सोना बनाते हैं।
जब शनि देव अच्छे हों तो व्यकित को बैठ के खाने पीने के सुख।नौकर चाकर के सुख अच्छे रहते हैं ।ऐसे व्यकित को नौकर अच्छे और वफादार मिलते हैं। चाचा के सुख मिलते हैं चाचा से लाभ भी मिलता है।और चाचा भी पूर्ण ऐश्वर्या के साथ जीवन गुजारते अच्छा और सुंदर मकान के सुख।मशीनरी से सम्बंधित काम काज फॅक्टरी अदि के काम करबाते हैं। कम मेहनत में पूरा लाभ मिलता है। ऐसे व्यकित के लिए दुसरे लोग कमाते हैं नौकर चाकर आदि।
लेकिन जब शनि देव मन्दे नीच के हों और बुराई पर आ जाएँ तो मेहनत का फल नहीं मिलता बड़ी ही मुश्किल से गुजारे लायक पैसा मिलता है।
मकान तक बिकबा देते हैं। नौकर चाकर धोखा देते हैं।लूट के खा जाते हैं।
घर के बुजरगों और माँ के जोड़ों में दर्द परेशानी देते हैं।इसा व्यकित खुद डब्बल माइंड और कन्फ्यूजन में रहता है। मकान और अन्य प्रॉपर्टी बिकती हैं। घर में क्लेश का माहौल बना रहता है। वाहन सुख नस्ट हो जाता है। अकस्मात अनजानी घटनाएं होती हैं। घर की समृद्धि नस्ट हो जाती है। परिवार और रिस्तेदारो की सहायता नहीं मिलती बल्कि दुश्मन बन जाते हैं। इस जातक खुद को ज्यादा समझदार समझता है। और नुक्शान उठाता है। एक खास बात और होती है ऐसे समय में की सब से बिगड़ जाती है भाई बहन रिस्तेदार पर पत्नी से अच्छे सम्बन्ध बने रहते हैं।
यहां में एक बात और बता दूं की शनि देव व्यकित का घमण्ड तोड़ने का काम करते हैं। मौत नहीं देते।

आपके ग्रह नीच मन्दे या शत्रु ग्रहो के साथ बैठे हो तो निम्नलिखित उपाय करने से फायदा

१. सूर्य का अच्छा प्रभाव - समाज मे मान-सम्मान, नौकरी व काम-काज की जगह स्थिरता पिता को कोई तकलीफ नहीं होती धैर्यवान, काम-काज मे अच्छा, सरकार मे अच्छा दखल होता है। सरकार की ओर से कोई नोटिस या सम्मन आदि नहीं आते। सरकारी अफ़्फ्सरो का सहयोग मिलता है।
अगर आपके साथ एसा है तो सूर्य अच्छा फल नहीं दे पा रहे हैं तो उपाय करे पिता की सेवा करे उन्हे सम्मान दें। उनके पांव-हाथ लगाकर आशीर्वाद ले, सूर्य को जल दे, विष्णु पूजा करे सरकार के खिलाफ कोई कार्य न करें, मीठा खा कर काम पर जाए गेंहु, बाजरा या जल प्रवाह करें।
२. चन्द्रमा का अच्छा प्रभाव - मां का जीवन सुखों से परिपूर्ण व ऐश्वर्यशाली रहेगा उनके जीवन मे कोई बड़ी परेशानी नहीं आएगी। मां, दादी, नानी व मोशियो को भी भरपूर सुख, अच्छे चन्द्रमा वाला व्यक्ति इन सबका लाडला होता है व इनके द्वारा ऐसे व्यक्ति को धन-सम्पत्ति प्राप्त होती है। घर व मन मे पूरी शांति और बर्कत रहती है रूपया पैसा और प्रोपटी भी खुब रहती है । सभी एक-दूसरे को प्यार और सम्मान से देखते हैं। अगर आपके साथ ऐसा नहीं हो रहा है तो निम्नलिखित उपाय कार्स मां, दादी का कहना माने, सेवा करे, पांव-हांथ लगाए, बुजुर्ग और विधवा औरतो की मदद करे उनके भी पांव हाथ लगाये घर आए को हो सके तो पानी की जगह दूध पिलाए नर्म व्यवहार रखे, सात्विक जीवन जिए चांदी का चौकोर टुकड़ा गले मे डाले ज्यादा से ज्यादा चांदी धारण करे गंगा जल भरपूर मात्रा मे घर मे रखे, मन्दिर मे दूध और चावल देते रहे चावल को घर में स्टोक करें
३. मंगल- मंगल का शुभ प्रभाव भाएयो और दोस्तो का भरपूर प्यार व आदर मिलता है। भाई व मित्र मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। व ऐसे व्यक्ति की हर मुसीबत मे साथ देते हैं। ऐसे व्यक्ति की कार्य क्षमता बहुत अच्छी होती है। हर काम को आसानी से धैर्य के साथ पूरा करता है। घर मे मंगल कार्य (पार्टी फंक्षन, पूजा-पाठ आदि) होते रहते हैं। शादी व्याह सही उम्र मे होते हैं। कम उम्र मे तरक्की होनी शुरू हो जाती है २८ साल से करोबार या नौकरी मे उचाई आनी शुरू हो जाती है और ३३ साल की उम्र तक अच्छी उचाई मिल जाती है। अगर आपके साथ एसा नहीं हो रहा है तो मंगल को ठीक करने के लिए सरल व आसान उपाय करे भाई और मित्रो से प्रेम करे, उन्हे सम्मान दे, उनके साथ मीठा भोजन ग्रहण करे उन्हे पार्टी दे, उनकी ग़लतीओ को क्षमा करते रहे, हनुमान उपासना करे, मंगलवार को मीठा प्रसाद बांटे, शहद, सौंफ, छुहारे घर पर न रखे ४३ दिन गुड़ की मीठी तन्दूर की ८ रोटी रोज कुत्ते और कोआ को डाले बड के पेड़ पर कच्ची लस्सी (दूध, पानी, चीनी) चढ़ाकर गीली मिट्टी का टीका लगाए दक्षिण मुखी मकान मे न रहे
४. बुध - बुध नहीं तो कुछ नहीं, कारण हमारे शरीर के नसो और बुद्धि, विवेक का मालिक बुध है इनके अच्छे फल इस प्रकार हैं। बुआ बहन बेटी का जीवन सुखमय रहता है व आपस मे भरपूर प्रेम बना रहता है। व्यापार की अच्छी बुद्धि होती है। कम मेहनत मे ज्यादा कमाई करवाते हैं ऐसे व्यक्ति को नसो मे किसी प्रकार का रोग नहीं होता, तर्क शक्ति अच्छी रहती है पढ़ाई लिखाई भी अच्छी रहती है। अगर आपके साथ ऐसा नहीं हो रहा है तो बहुत ही सरल से कुछ उपाय करके बुध का अच्छा प्रभाव लिया जा सकता है।
बुध के सामान तुलसी, रबड़ का पेड़, मनी प्लाट, केले का पेड़ इसके अलावा चौड़े पत्ते के पेड़ घर से दूर करे हरे कपड़े व अन्य सामान से दूरी रखे शंख, कौड़ी, सीप, गाने-बजाने के सामान (ढ़ोलक, सितार, गिटार) आदि घर पर न रखे भगवान की मुर्तियां न रखें तस्वीरों की पुजा करें ।
कोई भी पक्षी न पाले खास तौर से कबूतर, तोता। बकरी भी न पाले
बकरी का मांस, अण्डा से भी परहेज करे, मंूग की दाल से भी बचाव करे, साबुत मुंग घर पर न लाए, बल्कि फिटकरी के पानी मे साबुत मुंग भिगोकर रात को सिरहाने रख कर सोये और सुबह पक्षियो को डाले, दुर्गा पूजा करे, बहन-बेटी को सम्मान करे, वे जब भी घर आए उन्हे कुछ न कुछ देकर विदा करें।
छोटी-छोटी कननयाओ का पूजन करे, बकरी का दान करे
५. वृहस्पति - देवताओ के गुरू वृहस्पति उच्च हों तो सुख-वैभव, ऐश्वर्य, सम्पन्नता देते हैं। बcचो को दादा का भरपूर साथ व प्यार मिलता है। रूपये-पैसे की कोई कमी नहीं रहती। परिवार के लोग समझदार व बडो का सम्मान करने वाले होते हैं। एसे परिवार में रीति-रिवाज पूरी लगन से निभाऐ जाते हैं। घर का माहौल ऐश्वर्यपूर्ण के साथ आध्यात्मिक, पूजा-पाठ वाला भी होता है बच्चो की पढाई लिखाई बिगर रूकावट के पुरी हो जाती है।
लेकिन अगर आपके साथ एसा नहीं हो रहा है तो कुछ साधारण से उपाय करे चने की दाल मंदिर मे रखें, कुल पुरोहित को न बदले ! बदल चुके हैं तो क्षमा प्रार्थना करले साधू संन्यासीओ का सम्मान करे, दान-पुन्य करते रहे, केसर का टीका लगवाए, पीपल की सेवा करे, जल चड़ाए, बुजुर्गों के पांव-हांथ लगाकर आशीर्वाद लें। गले मे सोना पहनें पूर्वाजो के श्राद्ध कर्म आदि पूरी निष्ठा से करे
६. शुक्र - माता लक्ष्मी का स्वरूप शुक्र अगर शुक्र अच्छे होंगे तो बुद्धि (बुध) भी अच्छी होगी। अच्छा व सुन्दर जीवन साथी शरीर मे भरपूर जोश, विस्तर का भरपूर आनन्द, चाव, उमंग पूरे, घूमने-फिरने का शौकीन, हर प्रकार का लक्जरी सामान घर मे पति-पत्नि का मधुर सम्बन्ध साफ-सुथरा घर और हर प्रकार का शौक मौज का सामान घर मे!
अगर नहीं है तो मात्र कुछ सरल से उपाय करके शुक्र के अच्छे फल लिए जा सकते हैं। सुबह सही समय पर विस्तर छोड़े, नहा धो कर साफ कपड़े, प्रेस किए पहनें, डिओ, परफ्यूम का इस्तेमाल करे, पत्नि का आदर मान करे, उसे खुश रखे, उसे सौन्दर्य प्र्वावधान उपहार स्वरूप दे, लक्ष्मी पूजन करे, काले और नीले रंग के कपड़े और अन्य सामान से दूरी रखे, उच्च चरित्र का पालन करे, गाय की सेवा करे हरी चरी और ज्वार गाय को खिलाए!
७. शनि - अगर शनि अच्छे हों तो धरती पर ही स्वर्ग की अनुभूति होती है, स्वस्थ्य शरीर, शनि के अच्छे होने से शुक्र अच्छे यानी जीवन साथी का अच्छा सुख, शौक-मौज के पूरे सुख। अपने लिए दूसरे काम करते हैं। मतलब नौकर-चाकर और नौकर-चाकर भी ईमानदार मिलते हैं। मालिक के प्रति पूर्ण समर्पित होकर सेवा करते हैं, मकान भी एक से ज्यादा बनते हैं, जीवन साथी पूरी सर्पोट करता है। साथ ही पूरे परिवार मे किसी को कोई बड़ी मुसीबत नहीं होती, कम मेहनत मे ही पूरा लाभ मिलता है। अगर आपकी कुंडली मे शनि मंदे, नीच होंगे तो ऐसा नहीं होगा, उस समय उपाय करे साल की उम्र से पहले मकान न बनाए और न ही तोड़-फोड़ करे चाचा की सेवा करे उन्हे मान-सम्मान दे उनके पांव पर हाथ लगाकर आशीर्वाद ले! साल में ४-५ बार शनि के सामान (चमड़े की जूती, लोहे का तवा चिमटा आदि) सादु महात्मा को दान करे! मज़दूरो से बुरा व्यवहार न करे उनकी मदद करे! ईमानदारी का जीवन जिए! आचरण को ठीक रखे कोआ को खाना डाले तेल का छाया पात्र दान करे पत्थर वाला कोयला मन्दिर या गुरूद्वारे के भण्डारे मे दान करें।
८. राहु - अच्छे तो हर कार्य आसानी से पूरे हो जाते हैं जीवन मे कोई बड़ी अड़चन नहीं आती, हाजिर जवाब, अच्छा सलाहकार बनाते हैं। सभी मुसीबतांे का हल आसानी से निकालने वाला, सभी प्रकार के पूरे सुख, अच्छा औहदा, सरकार मे भी अच्छी दखल, पूरा मान-सम्मान अच्छी प्रतिष्ठा।
अच्छा सूर्य से जो गुण किसी व्यक्ति को मिलते हैं उससे भी ज्यादा गुण अच्छा राहु देता है। अगर आपको राहु ग्रह का अच्छा प्रभाव नहीं मिल रहा है तो निम्नलिखित उपाय करके फायदा उठाया जा सकता है।
किसी भी प्रकार का कबाड़ (बन्द घड़ियां, खोटे सिक्के, बिजली का खराब सामान आदि) घर पर न रखे, छत को साफ रखे, सीडीओ पर कोई सामान न रखे! उन्हे रोज साफ करे, ससुराल से बना कर रखे, उनका आदर-मान करे काले नीले कपड़े व अन्य सामान, नील, तेजाब, बारिश की भीगी लकड़ी, जंग लगा लोहा आदि सामान से दूर रहे! छत को हमेशा साफ रखे!
बजन के बराबर कच्चा कोयला जल प्रवाह करें। जौ दूध मे धो कर जल प्रवाह करे सूर्य की पूजा करे, गेहूं का स्टॉक घर पर करे!
९. केतु- दुनिया जहान मे बच्चो तो सभी जिवो के सुन्दर होते हैं पर कुत्ते और गधे के बच्चे ज्यादा सुन्दर होते हैं जो कि पूर्ण केतु होते हैं।
केतु किसी की कुंडली मे शुभ हो तो निम्नलिखित लक्षण होंगे आपकी कीर्ति चारो तरफ होगी। बेटे व बहनोई का भरपूर सुख मिलेगा बेटे आज्ञाकारी होते हैं सेवा भी करते हैं। घर पर धर्मपत्नी भी अच्छी प्रकार से रहती है। जीवन भर उचाई मिलती रहती है जो टारगेट लोग सोंच भी नहीं सकते जिसके केतु अच्छे हों तो उसके टारगेट तक जरूर पहुंचाते हैं। एसा व्यक्ति अगर राजनैतिक चुनाव लड़े तो निर्वाचित होता है। जो झण्डा एम.एल.ए., एम.पी. या मंत्रियांे की गाड़ियांे और कोठियांे पर लहराता है वह केतु देवकी मेहरबानी के बिना नहीं हो सकता।
औलाद का पूर्ण प्रेम सम्मान व अएशोआरम जीवन व्यतीत होता है जिन्दगी मंे कोई बड़ी परेशानी नहीं आती। अपने जीवन मे ही अपनी सन्तान को उचाई पर पहुंचते हुए देखते हैं।