Saturday, March 15, 2014

नाम अक्षर से जानिए किस स्त्री या पुरुष के साथ कैसा रहेगा प्रेम प्रसंग


 सभी 12 राशियों का स्वभाव अलग-अलग होता है और इन राशियों के कारण संबंधित लोगों का स्वभाव और भविष्य बनता है। राशि स्वभाव के आधार पर ही हमारे रिश्ते, मित्रता, प्रेम-प्रसंग निर्भर होते हैं।
यदि आप जानना चाहते हैं कि आपका प्रेम प्रसंग किस स्त्री या पुरुष के साथ कैसा रहेगा तो यहां अपने नाम अक्षर के अनुसार जानिए...
राशि अनुसार नाम अक्षर
आपके नाम का पहला अक्षर किस राशि के अंर्तगत आता है और अन्य राशि के नाम अक्षर...
मेष- चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, आ.
वृष- ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो
मिथुन- का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, ह
कर्क- ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो
सिंह- मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे
कन्या- ढो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो
तुला- रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते
वृश्चिक- तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू
धनु- ये, यो, भा, भी, भू, धा, फा, ढा, भे
मकर- भो, जा, जी, खी, खू, खे, खो, गा, गी
कुंभ- गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा
मीन- दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची
मेष राशि:
जिन लोगों की राशि मेष है, उन लोगों की लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
मेष राशि के लोगों के लिए कुंभ, तुला या मिथुन राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।
वृष, कन्या या मकर राशि के लोगों के साथ मेष राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी।
मेष राशि के लोगों के लिए वृश्चिक, मीन या कर्क राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं।
वृष राशि:
वृष राशि के लोगों के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
यदि किसी व्यक्ति की राशि वृष है और वह कर्क, वृश्चिक या मीन राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी।
जिन लोगों की राशि वृष है, उनके लिए मेष, सिंह या धनु राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं।
वृष राशि के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है।
मिथुन राशि:
मिथुन राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
यदि किसी व्यक्ति की राशि मिथुन है और वह मेष, धनु या सिंह राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी।
जिन लोगों की राशि मिथुन है, उनके लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं।
मिथुन राशि के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है।
कर्क राशि:
जिन लोगों की राशि कर्क है, उन लोगों की लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
कर्क राशि के लोगों के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।
मिथुन, तुला या कुंभ राशि के लोगों के साथ कर्क राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी।
कर्क राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं।
सिंह राशि
सिंह राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
यदि किसी व्यक्ति की राशि सिंह है और वह मिथुन, तुला या कुंभ राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी।
जिन लोगों की राशि सिंह है, उनके लिए वृष, कन्या या मकर राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं।
सिंह राशि के लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है।
कन्या राशि:
जिन लोगों की राशि कन्या है, उन लोगों की लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
कन्या राशि के लोगों के लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।
मेष, सिंह और धनु राशि के लोगों के साथ कन्या राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी।
कर्क राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं।
तुला राशि:
तुला राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
यदि किसी व्यक्ति की राशि तुला है और वह मेष, सिंह या धनु राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी।
जिन लोगों की राशि तुला है, उनके लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं।
तुला राशि के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है।
वृश्चिक राशि
जिन लोगों की राशि वृश्चिक है, उन लोगों की लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
वृश्चिक राशि के लोगों के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।
मिथुन, तुला या कुंभ राशि के लोगों के साथ कन्या राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी।
वृश्चिक राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं।
धनु राशि
धनु राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
यदि किसी व्यक्ति की राशि धनु है और वह मिथुन, तुला या कुंभ राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी।
जिन लोगों की राशि धनु है, उनके लिए वृष, कन्या या मकर राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं।
धनु राशि के लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है।
मकर राशि:
जिन लोगों की राशि मकर है, उन लोगों की लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
मकर राशि के लोगों के लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।
मेष, सिंह या धनु राशि के लोगों के साथ मकर राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी।
मकर राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं।
कुंभ राशि:

कुंभ राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
यदि किसी व्यक्ति की राशि कुंभ है और वह मेष, सिंह या धनु राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी।
जिन लोगों की राशि कुंभ है, उनके लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं।
कुंभ राशि के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है।
मीन राशि:
जिन लोगों की राशि मीन है, उन लोगों की लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
मीन राशि के लोगों के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।
थुन, तुला और कुंभ राशि के लोगों के साथ मीन राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी।
मीन राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं।

Friday, March 14, 2014

निम्न स्थितियों में जातक कि कुंडली में प्रेत बाधा होती है ,

निम्न स्थितियों में जातक कि कुंडली में प्रेत बाधा  होती है ,

१। यदि शनि और राहु लग्न में हो तो जातक तो प्रेत बाधा का भय होता है 
 
२. शनि युक्त चंद्रमा षष्ट भाव में हो और सप्तम भाव में राहु या केतु हो तो प्रेत बाधा, या नज़र दोष  होती है 
 
३। यदि राहु युक्त चंद्रमा लग्न में हो तो और त्रिकोण में शनि मंगल हो तो प्रेत बाधा का भय रहता है 
 
अगर निम्न में से कोई भी दोष कुंडली में हो तो समझिये आपके ऊपर प्रेत बाधा  है या नज़र दोष
 
है या फिर बहुत जल्दी आप तांत्रिक टोटको कि चपेट में आ जाते हो 

पाया जानने की विधि

शनि के राषि परिवर्तन के समय चन्द्रमा किस राषि पर है, उसी से पाये का ज्ञान होता हैं। यानि जिस दिन राषि बदले, उस दिन अपनी राषि से 1,6,11 चन्द्रमा हो तो 'सोने का पाया, 3,7,10 'तांबा का पाया, 2,5,9 'चांदी का पाया तथा 4,8,13वें हो तो 'लोहे के पाया होता है।
'सोने का पाया - परिवार के सदस्यों से लडार्इ,झगडा, आर्थिक हानि, बीमारी आदि। 

'तांबा का पाया - यष, आर्थिक लाभ, व्यापार में उन्नति आदि। 

'चांदी का पाया - शारीरिक स्वास्थ्य, व्यापार में लाभ, आर्थिक सिथति सुदृï, यष आदि। 

'लोहे के पाया - राग, शोक, क्लेष, व्यापार में हानि, आर्थिक सिथति कमजोरी, आदि।

।। पाया जानना ।।

यदि चन्द्रमा लग्न में या लग्न से 6 या 11 हो तो सोने क पाये पर बालक पैदा हुआ है। यदि 2/5/9 हो तो बालक का चादी के पाये पर पैदा जाजें। यदि 3/7/10 हो तो बालक ताबे के पाये पर पैदा हुआ है। यदि 4/8/12 हो तो बालक लोहे के पाये पर पैदा हुआ है।

मंगली दोश का निराकरण

• मंगल (1,4,7,8,12 भावों में मंगल बैठे तो मंगली दोश कहा जाता है।) जिस भाव में बैठा है- यदि उस भाव का स्वामी अपनी उच्च राषि में बैठा हो तो वह मंगल के प्रभाव को कम कर देता है। अत: मंगली दोश स्वत: कट जाता है। • पहले या चौथे भाव का मंगल यदि स्वराषि का हो (मेशवृषिचक में हो) यानी पहले या चौथे भाव में मेश या वृषिचक राषि ही पड़ रही हो तो मंगली दोश कट जाता है। 
• दक्षिण भारतीय दूसरे भाव में मंगल होने को भी मंगली हाने को भी मंगली दोश मानते है। किन्तु दूसरे भाव में मिथुन या कन्या राषि हो तो दूसरे भाव का मंगली दोश कट जाता है। 
• 8वें भाव का मंगल यदि गुरू की राषियों में हो (धनुमीन राषि) तो मंगल 8वें होकर भी मंगली दोश उत्पन्न नही करता है। 
• 7वें घर का मंगल यदि अपनी उच्च या नीच राषियों में हो (मकरकर्क राषि) तो मंगल दोश स्वत: ही कट जाता है। 
• 12वें भाव का मंगल यदि षुक्र की राषियों में हो (वृशतुला राषि) तो भी मंगली दोश स्वत: ही कट जाता है। 
• 7वें भाव में मीन राषि का, 8वें भाव में कुम्भ राषि का, प्रथम भाव में मेंश राषि का, चौथे भाव में वृषिचक राषि का तथा 12वें भाव में धनु भाव मंगल हो तो भी मंगली दोश का निराकरण होता है। 
• म्ांगल सिंह या कुम्भ राषि का हो तो किसी भी भाव में बैठकर मंगली दोश नहीं देता (कुछ विद्वान मेश, वृषिचक व कर्क राषि में मंगल को भी ऐसा गुण कहते है)। 
• राहू षुभ ग्रहों के साथ, षुभ राषियों में, केन्द्रत्रिकोण में बैंठकर मंगल को देखता हो तो भी मंगली दोश कट जाता है। 
• सप्तमेष सबल अवस्था में हो अथवा गुरू 7वें भाव में बैठाा होतो भी मंगली दोश कट जाता है। 
• मंगल यदि षनि या गुरू से दृश्ट हों अथवा मंगल यदि षनि या गुरू के साथ बैठा हो अथवा मंगल चन्द्र व गुरू के साथ बैठा हो तो इन सिथतियों में भी मंगली दोश स्वत: ही कट जाता है। 
• सप्तमेष केन्द्र या त्रिकोण में बैठा हो अथवा गुरू कैन्द्र या त्रिकोण (1,45,7,10,9) में बैठा हो अथवा 1,24,12 भाव में षुक्र बैठा हो तो मंगली दोश स्वत: कट जाता है। पर ध्यान रखना चाहिए कि षुक्र या गुरू अस्त न हो तथा पापमध्यपापकत्र्तरी योंग में 
न हों। अन्यथा वे मंगली दोश का निराकरण कर पाने में समर्थ नहीं होते। दोश के निराकरण के लिए उनका बली होना अनिवार्य है। 
• द्वितिय भाव सप्तम भाव में षुभ ग्रहों की उपसिथति हो और वे बली हों तो भी मंगली दोश कटता है।
• सप्तम भाव में षनि व षुक्र की युति हो अथवा केन्द्र या त्रिकोण में षुक्र स्वराषि या उच्च राषि में हो तो मंगली दोश का निराकरण होता है। (कुछ विद्वान 6,8 भावों में षुक्र के उच्च या स्वग्रही होने पर भी मंगली दोश का निवारण मानते है। परन्तु इससे पुरूश की प
ौरूश क्षमता प्रभावित होती है अत: इसे निरापद नहीं कह सकते है) 
• चन्द्रमा यदि कैन्द्र में अकेला हो किन्तु बली हो तो भी मंगली दोश में न्यूनता ले आता है। 
• वर या वधू की कुंडली में जिस भाव में मंगली हो, उसी भाव में षनि या राहू बैठा हो तो भी मंगली दोश स्वत: कट जाता है। 
• यदि मंगली दोश षुक्र, चन्द्र व लग्न तीनों से कन्फर्म हो रहा हो तभी जातक को मंगली दोश स्वत: कट जाता जाता है।
निश्कर्श :- षेश मामलों में यदि मंगली दोश तीनों प्रकार से कन्फर्म हो रहा हो तभी जातक को मंगली कहा जाता है। ऐसा हो तो मंगली जातक का विवाह मंगली जातक से ही करना चाहिए।
मंगली दोश यदि कट न गया हो (स्वत:) और कन्फर्म हो तो उसके निवारणप्रभाव को कम करने के कुछ उपायों की व्यवस्था भी ज्योतिशषास्त्र करता है। विशय को सम्पूर्णता देने के लिए तथा पाठकों के ज्ञानवर्धन व लाभ के लिए कुछ प्रमुख उपायों को सक्षेंप में यहां कहेंगे।

घर की आर्थिक परेशानिया दूर करने के उपाय

ऐसा माना जाता है कि  यदि घर की आर्थिक परेशानिया है और आप उन्हें दूर करना चाहते है तो इन उपायो करने से घर में सुख शांति बनी रहती है और आप मालामाल हो सकते है, यंहा पर कुछ उपाय दिए जा रहे है जिनको करने से परिवार के हर सदस्य को हर कार्य में सफलता ही सफलता मिलती है - 

मेष: प्रतिदिन घर के दक्षिण भाग में गुड़ की छोटी सी डली छोड़कर प्रस्थान करें। यह कार्य जब भी बाहर निकलें, तब अवश्य करें। इससे कार्य में प्रगति होगी तथा यात्रा में सफलता मिलेगी।
वृष: कच्चे चावल सफेद गाय को खिलाने से धन लाभ होगा। शुक्रवार से रोजाना यह प्रक्रिया आरंभ कर दें। चावल की मात्रा अपनी हथेली के अनुसार रखें।
मिथुन: बुधवार के दिन खड़े मूंग का दान, सुहागन को सुहाग का सामान तथा सफेद गाय को हरी घास खिलाने से कई दोष दूर होंगे। खासकर वायव्य कोण (घर की पश्चिम-उत्तर दिशा) में पैसा रखना आपके लिए शुभ होगा, इससे आप अवश्य लाभान्वित होंगे।
कर्क: घर के पश्चिम में कबूतरों को ज्वार के दाने चुगाना, आपके लिए लाभकारी होगा। नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है तथा परिवार में शांति बनी रहती है।
सिंह: तांबे के लोटे में जल लें, उस जल से अपने घर के पूर्वी भाग गीला करें, उस स्थान पर दूर्वा अर्पित करें। ऐसा करने से शुभ समाचार तथा घर में बुजुर्गों को स्वास्थ्य लाभ होगा।
कन्या: अपने घर की उत्तर दिशा में हरी घास को गायों के लिए छोड़ दें तथा हो सके तो किसी भिक्षुक को खड़ा मूंग व गुड़ का दान करें। यह करने से घर की उत्तर दिशा में लक्ष्मी का वास होगा तथा अपव्यय रुकेगा। साथ ही रुका धन प्राप्त होगा।
तुला: शुक्रवार को प्रात: घर के वायव्य कोण (पश्चिम-उत्तर दिशा) में सफेद कपड़े में चावल बांधकर लटका दें। ऐसा करने से मांगलिक कार्य में गति आएगी तथा वैवाहिक कार्य में सफलता मिलेगी।
वृश्चिक: अपने घर के दक्षिण-पूर्व कोने में जौ लाल कपड़े में बांधकर रखें। ऐसा करने से बुरी शक्तियां घर में प्रवेश नहीं करेगी। बच्चों पर शुभ असर होगा तथा वे स्वस्थ रहेंगे।
धनु: घर का ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) आपकी साधना के लिए श्रेष्ठ है। यहां पर भगवान विष्णु की शत् नामावली या सहस्त्र नामावली का पाठ करें। ऐसा करने से रोग दोष से निवृत्त होकर घर में प्रगति का माहौल बनेगा।
मकर: घर के पश्चिम में हरी या श्याम तुलसी का पौधा लगाएं तथा निरंतर सींचें। ऐसा करने से रुके कार्यों में प्रगति होगी। मांगलिक कार्य के साथ आर्थिक लाभ के योग बनेंगे।
कुंभ: घर की पश्चिम-उत्तर दिशा को स्वच्छ रखें तथा उपयोगी कागजात को ही वहां स्थान दें। यदि स्टोरेज की स्थिति निर्मित होती है तो स्थान परिवर्तन करें एवं मनी प्लांट लगाएं।
मीन: घर की पूर्वोत्तर दिशा में देवताओं को स्थान दें तथा प्रयास करें कि देव घर व किचन साथ न हो या चूल्हे की सीध में देवता का स्थान न हो। परिवर्तन कर ईष्ट को साधें। विशेष तौर पर लक्ष्मीनारायण की उपासना आपको भूमि-भवन का लाभ देगी।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर-कन्या के चुनाव हेतु उनकी कुंडलियों का समग्रता के साथ अध्ययन

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर-कन्या के चुनाव हेतु उनकी कुंडलियों का समग्रता के साथ अध्ययन किया जाता है क्योकि संस्कारों का जीवन में बहुत बड़ा महत्व है।  उनके लग्न, नक्षत्र और अष्टकुट मिलान के द्वारा यह तय किया जाता है कि अमुक कन्या अमुक वर के योग्य है या नहीं। उनके बीच सुखद दाम्पत्य स्थापित होगा या नहीं।
मुहूर्त शास्त्र के अनुसार शुभ समय पर किए गए कार्यों का प्रतिफल शुभ होता है, इसलिए विवाह जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए शुभ मुहूर्त का चयन अनिवार्य है। सामान्यत: मुहूर्त चयन के लिए तिथि, वार, नक्षत्र, करण और योग का अध्ययन किया जाता है परंतु विवाह मुहूर्त के लिए तिथि, वार और नक्षत्रों पर बल दिया जाता है।
इसमें भी नक्षत्र पर विशेष बल दिया जाता है। तिथि, वार पर इसलिए भी अधिक जोर नहीं दिया गया है क्योंकि अशुभ तिथियां किसी खास स्थितियों में काफी शुभ हो जाती हैं। उदाहरण के लिए चतुर्थी तिथि अगर शनिवार को हो तो सिद्ध योग बन जाता है। यद्यपि पृथक रूप से दोनों ही अशुभ तिथि तथा दिन होते हैं लेकिन नक्षत्रों के साथ ऐसी कोई बात नहीं होती।
विवाह के लिए रोहिणी, मृगशिरा, मघा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, स्वाति, हस्त, मूल एवं रेवती नक्षत्र माने जाते हैं। रोहिणी नक्षत्र में विवाह सम्पन्न होने पर दम्पति में आपसी प्रेम बढ़ता है और संतान पक्ष सुदृढ़ होता है। मृगशिरा नक्षत्र संतान की प्रगति का कारक होता है और सुखमय लम्बा दाम्पत्य देता है।
मघा-नक्षत्र सुखी संतान का कारक और हस्त नक्षत्र मान-सम्मान प्राप्त कराने वाला होता है। अनुराधा नक्षत्र पुत्र-पुत्रियां प्रदान कराने वाला होता है। उत्तरा नक्षत्र विवाह के दो-तीन वर्षों के अंदर ही उन्नति देने वाला होता है। स्वाति नक्षत्र विवाह के तुरंत बाद उन्नति कराता है। रेवती नक्षत्र धन-सम्पत्ति और समृद्धि विवाह के चार साल बाद देता है।
मूल, मघा और रेवती नक्षत्र का चयन करते समय उनके चरणों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मूल और मघा के प्रथम और रेवती के चतुर्थ चरण का परित्याग करना चाहिए।
ब्रह्मलीन पं. तृप्तिनारायण झा शास्त्री द्वारा रचित पुस्तक ‘विवाह विमर्श’ के अनुसार उपरोक्त चरण अनिष्टकारी होते हैं। बाकी के सोलह नक्षत्र अश्विनी, भरणी, कृतिका, आद्र्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, तीनों पूर्वा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, श्रवण, घनिष्ठा तथा शतभिषा नक्षत्रों को विवाह के लिए शुभ नहीं माना जाता।
‘ज्योतिष रत्न’ पुस्तक के अनुसार कृतिका, भरणी, आद्र्रा, पुनर्वसु और अश्लेषा नक्षत्रों में विवाह होने पर कन्या छ: वर्षों के अंदर ही विधवा हो जाती है। पुष्य नक्षत्र में विवाहित पुरुष अपनी पत्नी का परित्याग कर दूसरी औरत से शादी रचा लेता है। चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, तीनों पूर्वाषाढ़ नक्षत्र तलाक का कारण बनते हैं।
विशाखा नक्षत्र में विवाहित कन्या अपने पति का परित्याग कर दूसरे पुरुष से पुन: विवाह कर लेती है या गुपचुप संबंध स्थापित करती है। श्रवण, घनिष्ठा तथा अश्विनी नक्षत्र पति-पत्नी में मनमुटाव पैदा कर उनके जीवन को कठिन बना देते हैं। अशुभ नक्षत्रों में हुए विवाह की अधिकतम आयु दस वर्षों की होती है।
नक्षत्रों के अतिरिक्त विवाह मुहूर्तों में लगन का उचित चुनाव भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि तुला और वृश्चिक दिन में मकर और धनु राशि में बधिर संज्ञक, मेष-वृष राशि दिन में तथा कन्या-मिथुन और कर्क राशि अंध संज्ञक होती हैं। कुंभ राशि दिन में और मीन राशि रात्रि में पंगु संज्ञक होती हैं। बधिर संज्ञक राशि में विवाह करने से दरिद्रता, दिन में अगर अंध संज्ञक लगन हो तो वैधव्य, अगर यह लग्र रात्रि में हो तो संतान की मृत्यु आदि का योग बनता है।

ग्रहो के स्वरुप का ज्ञान आजीविका के निर्णय करने के लिए अत्यावश्यक है।

व्यवसायों के प्रकार का निर्णय ग्रहो के स्वरुप, बल आदि पर निर्भर करता है।  जो ग्रह अत्यधिक बलवान होकर, लग्र, लग्रेश आदि आजीविका के परिचायक पक्षो पर प्रभाव डालता है, वह ग्रह आजीविका के स्वरुप अथवा प्रकार प्रकृति का 'धोतक' बतलाने वाला होता है।  अतः ग्रहो के स्वरुप का ज्ञान आजीविका के निर्णय करने के लिए अत्यावश्यक है।  इसी तथ्य को दृष्टि में रखते हुए ग्रहो के स्वरुप का कुछ विवेचन नीचे किया गया है। 
सूर्य - सूर्य जब ग्रहो में ऊँचा मुख्य व राजा है।  इसीलिए जब यह गृह धंधो को दर्शाता है तो वह धंधा ऊँचे दर्जे का विस्तृत क्षेत्र में व्यापक, बहुत प्रदेशो से संबंधित बहुत पूंजी वाला होता है।  सूर्य का राज्य से घनिष्ट सम्बन्ध है, क्योकि सूर्य स्वयं राजा अर्थात राजपुरुष है।  अतः जब सूर्य धंधे का निर्याणक हो तो उस धंधे का सम्बन्ध राज्य से किसी न किसी प्रकार का होता है।  यदि सूर्य बहुत बलवान हो तो राज्यशासन द्वारा धन दे देता है।  मध्यम बली हो तो बड़ा राज्याधिकारी बना देता है और यदि साधारण रूप से बलवान हो तो मनुष्य को साधारण कर्मचारी बना देता है।  यदि सूर्य का लग्न, लग्रेश, राशीश आदि ग्रहो कि अपेक्षा अधिक संबंध हो अर्थात अपनी युति अथवा दृष्टि द्वारा सूर्य इन लग्नादि पर प्रभाव   डाल रहा हो तो सूर्य धंधे की दिशा को बतलाता है।  यदि द्वितीयेश, पंचमेश, नवमेश, दशमेश, एकाददेश  होकर बलवान हो तो मुनष्य को दुसरो पर शासन करने वाले राजा, गवर्नर, मंत्री, अभियंता आदि उच्च पदवी वाला शासक बना देता है। 
                 सूर्य अग्रिरूप है।  जब यह मंगल और केतु के साथ मिलकर कार्य करता है तो अग्रि संबंधित कार्य करवाता है।  यदि धंधा - धोतक ग्रह पर सूर्य नवमेश तथा पंचमेश तथा इन भावो का सम्बन्ध हो तो मनुष्य पिता के साथ मिलकर कारोबार करता है।  उसी पर निर्भर रहता है अथवा पैतृक वंशानुगत धन सम्पदा का लाभ भी बन पाता है। 
                 यदि सूर्य का प्रभाव मिलकर धंधा - धोतक ग्रह ( शनि और राहु ) पर पड़ता है तो वे मनुष्य को डॉक्टर अथवा चिकित्सक, शरीर गुण रचना निर्णायक अथवा वैध बना देते है। 
                 सूर्य एक सात्विक ग्रह है तब यह गुरु, नवमेश आदि धार्मिक ग्रहो के साथ लेकर धंधा धोतक ग्रहो पर प[रभाव करता है तो मनुष्य धर्म से धन कमाता है।  इस संदर्भ में द्वादश स्थान धर्म मंदिर का धोतक है क्योकि द्वादश स्थान नवम से चतुर्थ है अर्थात धर्म (नवम) अथवा देव का घर अथवा जंगलात सम्पदा का कारक भी है।  जब सूर्य चतुर्थेश से संबंध रखता हुआ धंधे का धोतक हो तो लकड़ी से संबंधित कार्य को देता है। 

चन्द्र - ग्रहो में चन्द्र जलीय है। शुक्र भी जलीय ग्रह है।  चतुर्थेश, अष्टमेष तथा द्वादशेश भी जलीय प्रभाव रखते है।  अतः यदि चन्द्र का दूसरे जलीय अंगो का धंधा धोतक पर प्रभाव हो तो मनुष्य जलीय कार्यो द्वारा धनोपार्जन करता है। जैसे जलसेना में कार्य करना, रस - द्रव्य - तरल - पदार्थ, शर्बत बेचना आदि। 
                    चन्द्र का खाने पीने से घनिष्ट सम्बन्ध है , क्योकि चन्द्र लग्न भी है और जलीय गृह भी।  अतः जब चन्द्र का तथा द्वितीयेश ( मुख) का प्रभाव धंधा धोतक गृह पर पड़ता है तो मनुष्य खाने - पीने के कार्य जैसे दूध आदि खाद्ध पदार्थो कि बिक्री का कार्य करता है। 
                     चन्द्र जब धंधे से सम्बन्ध रखता है तो और उस पर राहु का प्रभाव हो तो मनुष्य शराब बेचने का कार्य करता है, क्योकि राहु विष या मलिनता का धोतक है। 
                      चन्द्र एक स्त्री गृह है, जब यह ग्रह दूसरे स्त्री - ग्रहो, शुक्र, बुध, शनि आदि को लेकर धंधे का परिचायक होता है तो मनुष्य को स्त्रियो के साथ मिलकर धंधा करने का अवसर प्राप्त होता है।  जैसा कि फ़िल्म लाइन में अभिनेता होना।  यदि स्त्री - ग्रह नीच स्थिति में हो तथा राहु आदि मलिन प्रभाव में हो तो तथा 'जनता' (चतुर्थ भाव) से सम्बन्ध रखता हो तो व्यभिचार से धन कमाता है। 
                       चन्द्र रानी ग्रह है अतः राज्य से भी इसका घनिष्ट सम्बन्ध है।  अतः जब यह ग्रह - राज्य - धोतक - सूर्य, ब्रहस्पति आदि ग्रहो से मिलकर धंधे का धोतक होता है तो राज्य सम्बन्धी कार्य जैसे शासन, कार्य, राज्य - कर्मचारी कार्य करवाता है। 
                        चन्द्र मन का कारक है।  यदि यह ग्रह, चतुर्थ स्थान तथा चतुर्थ भाव का स्वामी, सभी शनि तथा राहु कि दृष्टि आदि जनित प्रभाव में हो तो मनुष्य का मन मंदगामी, उदासीन, विरक्त हो जाता है जिसके फलस्वरूप वह मनुष्य कोई भी कार्य अथवा धंधा नहीं करता है। 
                         चंद्रमा सुगन्धप्रिय ग्रह है।  अतः यह शुक्र के साथ मिलकर धंधे का धोतक होता है।  सुगन्धित तेलो, अगरबत्ती, इत्र - अर्क तथा सेंटो का काम - धंधा करने वाला होता है। 
                         चन्द्र जब द्वितियाधिपीत होकर धंधे के धोतक होता है और बुध आदि व्यापारी ग्रहो से सम्बंधित करवाता हुआ धंधे को दर्शाता है।  तो चावल आदि जल से उत्पन्न होने वाले अथवा जल से घनिष्ट सम्बन्ध रखने वाले खाध पदार्थो जैसे चावल, गन्ना, पान, दूकान आदि द्वारा धन कमाता है। 
                        चन्द्र जब किसी लग्न का स्वामी होता है तो तथा द्वितियाधिपति गुरु से प्रभावित होकर धंधे का धोतक हो तो मिष्ठान, भोजनालय, होटल, हलवाई, रेस्टोरेंट के काम से धन कमाता है। 

मंगल - मंगल अग्निमय है।  यह गृह जब धंधे का स्वयं स्वामी अथवा केतु, सूर्य आदि अन्य अग्निधोतक ग्रहो के साथ लेकर धंधे का धोतक होता है तो अग्नि सम्बन्धी कार्यो द्वारा धनोपार्जन करवाता है।  जैसे खाद्य सामग्री पकाने तथा लुहार, सुनार, वेल्डिंग आदि कार्य व्यवसाय सूचक।
                      मंगल साहस तथा हिंसाप्रिय है। अतः मिलिट्री अथवा रक्षा विभाग से इसका घनिष्ट सम्बन्ध है।  आरक्षी पुलिस विभाग, सेना - सेनाद्यक्ष - यातायात - सर्जन - डॉक्टर आदि का कारक। 
                      मंगल भूमिपुत्र कहलाता है।  अतः जब यह चतुर्थेश होकर अथवा चतुर्थेश से मिलकर धंधे का धोतक होता है तो भूमि कि आय, किराया, होटल, लीज आदि द्वारा धन कमवाता है।
                     यदि मन पर भी मंगल का अधिक प्रभाव हो तो जैसे लग्न में मंगल कि स्थिति अथवा लग्नेश चतुर्थेश पर मंगल कि दृष्टि हो और साथ ही साथ मंगल कम धंधे का धोतक ग्रह भी बनता हो तो  मनुष्य डकैती आदि क्रूर कार्यो से धन पाता है।  विशेषतया तब जबकि एकादश भाव पर मंगल का प्रभाव हो। 
                   मंगल हेतुप्रिय ग्रह है।  यह मनुष्य में बुद्धि को तथा उहापोह शक्ति को बढ़ाता है।  अतः जब यह ग्रह बुद्धि - स्थान पर स्वामी होकर बलवान तथा धंधे का धोतक होता है तो मनुष्य को शासक अथवा मंत्री बना देता है।  
                   मंगल एक क्षत्रिय ग्रह है।  सूर्य भी क्षत्रिय ग्रह है। जब सूर्य से प्रभावित मंगल धंधे का परिचायक होता है तो मनुष्य को राज्य की रक्षा विभाग में कार्य करवाता है।  विशेषतया जबकि तृतीयेश तथा द्वादशेश भी इस योग में सम्मिलित हो, तो इस योग का विघटन और भी प्रभावी व सार्थक बन पाता है। 
                 मंगल कि चोरी की भी आदत है।  छठे से छठे अर्थात ग्यारहवे भाव का स्वामी हो तो इसमें चोरी का भाव आ जाता है अथवा परिग्रहवादी, संग्रहात्मक, मनोवृत्ति अपहरण का कार्यक बन पाता है। 

बुध - बुध बुद्धि का ग्रह है।  यदि यह ग्रह द्वितीय, पंचम, नवम आदि बुद्धि स्थानो का स्वामी होता हुआ, धंधे का धोतक हो अर्थात लग्न - लग्नेश, चन्द्र - चंद्रेश, सूर्य - सूर्येश आदि राशि को अधिकतम प्रभावित करता हो तो मनुष्य बुद्धिजीवी होता है अर्थात स्कूल मास्टर, प्रोफेसर, अध्यापक आदि होकर धनोपार्जन करता है। 
                बुध व्यापार का ग्रह है। यदि यह ग्रह शनि, शुक्र आदि व्यापार धोतक ग्रहो को साथ लेकर धंधे का धोतक गृह बनाता हो तो मनुष्य व्यापारी होता है अर्थात स्वतंत्र समायोजनाका कारक सूचक। 
                बुध लेखक है, जब जब वह धंधे का धोतक होता है और राज्य धोतक ग्रहो, सूर्य आदि से भी प्रभावित होता है तो मनुष्य राज्य के किसी विभाग में लिखने के कार्य करने वाला जैसे क्लर्क अथवा स्टेनो का कार्य करता है।  यदि बहुत बलवान हो तो लेखा ऑफिसर बना देता है। 
               बुध यदि तृतियाधिपति हो और बलवान होकर धंधे का परिचायक धोतक हो तो मनुष्य अपने लेखो द्वारा आजीविका का उपार्जन करता है, क्योकि बुध लेखक है और तृतीय स्थान भी साथ होने से लिखने ही को दर्शाता है। 
              बुध फलित ज्योतिष का भी कारक है।  जब इसका सम्बन्ध जनता से अर्थात चतुर्थ भाव से तथा नवम भाव एवं द्वादश भाव से होता है।  और द्वितियाधिपति को साथ लेकर यह धंधे का धोतक होता है तो मनुष्य ज्योतिष द्वारा धनोपार्जन करता है।  अथवा इस प्रकार के जातक में भावी सोच - विचार, दूरदर्शिता का गुणत्व बनता है। 
               बुध विनोदप्रिय है अतः जब यह ग्रह अन्य विनोदप्रिय ग्रहो तथा अंगो, जैसे चतुर्थेश, पंचमेश  तथा शुक्र से सम्बन्ध करता हुआ धंधे का धोतक होता है तो विनोद द्वारा अर्थात सिनेमा - मोदसभा आदि आमोद - प्रमोद के स्थानो से आजीविका को प्राप्त करता है। 
               बुध गुमाश्ता, कमीशन एजेंट - ब्रोकरशिप - दलालो का भी करक होता है।  यदि यह चतुर्थेश से सम्बन्ध रखता हो और मंगल से भी प्रभावित हो तो जायदाद भूमि लेन - देन आदि का एजेंट होता है। 

ब्रहस्पति - यह गृह कानून से घनिष्ट सम्बन्ध रखता है।  अतः यदि यह अष्टमेश, एकाददेश तथा बलवान होकर बुध को साथ लेकर धंधे का धोतक हो अर्थात लग्न लग्नेश आदि लग्नो पर अपना प्रभाव डालता हो तो मनुष्य को वकील, इन्कमटेक्स का वकील बनता है।  उपरोक्त गुरु पर यदि मंगल का प्रभाव हो तो फौजदारी का वकील होता है।  अधिक बलवान होने पर यही ब्रहस्पति व्यक्ति को न्यायाधीश बना देता है।  अष्टम तथा एकादश स्थान राज्य की आय सूचक संज्ञा का भी न्यास होता है। 
                  ब्रहस्पति का जब नवमेश, द्वादशेश व पंचमेश से सम्बन्ध होता है और पुनः वह ब्रहस्पति धंधे का परिचायक हो तो मनुष्य धर्मशाला, मंदिर - देवस्थल  आदि द्वारा पुरोहित - पुजारी आदि के रूप में धन प्राप्त करता है। 
                 बुध कि भांति ब्रहस्पति भी भाषण से घनिष्ट सम्बन्ध रखता है।  अतः जब वाणी - धोतक घरो - द्वितीय तथा पंचम का स्वामी होता है तो मनुष्य भाषण द्वारा अपनी आजीविका प्राप्त करता है जैसे कि दलपति, राजनेता, नायक, अधिवक्ता, वकील तथा अध्यपक लोग करते है। 
                ब्रहस्पति धन का कारक है।  जब यह ग्रह द्वितीय तथा एकादश भावो का स्वामी हो और लग्न - लग्नेश आदि लग्नो पर अधिकतम प्रभाव डालने के कारण धंधे का धोतक ग्रह भी हो तो यह गतिशील धन से जैसे सूद - ब्याज से तथा बैंकर कैश सर्टिफिकेट, किराया आदि से या बैंक कि नौकरी से धनोपार्जन करता है। 
              ब्रहस्पति बलवान हो और एकादशाधिपति हो तो ऐसा व्यक्ति बड़े भाई द्वारा अथवा उससे मिलकर धनोपार्जन करता है और उसे बड़े भाई से बहुत सहायता मिलती है। 

शुक्र - गुरु की भांति शुक्र भी कानून से सम्बन्ध रखता है क्योकि यह भी दैत्याचार्य है।  जब गुरु के साथ मिलकर यह ग्रह लग्न, लग्नेश आदि लग्नो पर अपेक्षाकृत अधिकतम प्रभाव डालता है तो व्यक्ति  को कानून से सम्बंधित काम धंधे में लगाता है। 
             शुक्र एक जलीय ग्रह है।  चन्द्र के साथ अथवा जलीय भाव से स्वामियों के साथ मिलकर जब यह ग्रह उपरोक्त रीति से धंधे का धोतक होता है तो मनुष्य कार्यो से धनोपार्जन करता है जैसे - जल सेना में भर्ती होकर अथवा तरल द्रव्य पदार्थ कार्यो द्वारा। 
             शुक्र एक  सौंदर्यप्रिय ग्रह है।  सुंदरता तथा भोग - विलास से सम्बन्ध रखने वाले जितने धंधे होते है, सबका सम्बन्ध शुक्र से है, जैसे मुख तथा शरीर के सौंदर्य का वर्धन करने वाले पदार्थ बढ़िया तेल, इत्र सुगन्धित वस्तुए आदि।  अतः जब शुक्र, बुध आदि व्यापारी ग्रहो को साथ लेकर धंधे का परिचायक होता है, तो व्यक्ति को फैंसी गुड्स के विक्रेता आदि बना देता है तथा भोग - विलास - श्रंगार प्रसाधन वस्तुओ से लाभप्रद बनाता है। 
              शुक्र जब सप्तमाधिपति हो तो रतन प्राप्त होता है, यदि ऐसा शुक्र शुभ, लग्नाधिपति, धनाधिपति अथवा गुरु से प्रभावित होता हुआ धंधे का धोतक हो तो मनुष्य सराफा होता है और रत्नो का व्यापार करता है। 
            शुक्र को गाना बजाना बहुत चाहता है।  जब भाषण भावो तथा वाधकारक बुध से सम्बन्ध होता हुआ शुक्र 'धंधे' का धोतक हो तो व्यक्ति गाने - बजाने के द्वारा आजीविका का उपार्जन करने वाला होता है।  शुक्र 'वाहन' का भी कारक है।  यदि वाहन के स्थान से भी सम्बन्ध रखता हुआ अथवा (चतुर्थेश) से सम्बन्ध रखता हुआ शुक्र (धंधे) का धोतक हो तो मनुष्य विविध भार वाहक अथवा यात्रा सवारी वाहन द्वारा आजीविका मिलती है। 

शनि - शनि पत्थर माना गया है।  यदि इस ग्रह का सप्तम भाव से घनिष्ट सम्बन्ध हो तो यह ग्रह पत्थर का प्रतिनिधि हो जाता है।  यदि ऐसे शनि का प्रभाव लग्न लग्नेश आदि लग्नो पर हो तो मनुष्य सड़क बनवाने तथा पत्थर सप्लाई करने आदि पत्थर के कार्यो द्वारा जीवनयापन करता है। 
               शनि अधोमुखी ग्रह है, अतः पृथ्वी के भीतर रहने वाले पदार्थो लोहा, कोयला, पेट्रोल, भूमि तेल का कारक है।  जब शनि चतुर्थेश होकर धंधे का परिचारक होता है तो इन पदार्थो से धन का लाभ होता है। 
               शनि रोग से सम्बंधित है, अतः डॉक्टर अथवा वेध भी है।  अतः जब भी यह ग्रह सूर्य, राहु आदि अन्य वेध ग्रहो के प्रभाव को लेकर धंधे का धोतक होता है तो मनुष्य चिकित्सक होता है। 
               शनि मृत्यु से घनिष्ट सम्बन्ध रखता है, अतः मृत शरीर से प्राप्त होने वाला चमड़ा शनि द्वारा प्रदिष्ट होता है।  जब शनि अष्टमाधिपति अथवा तृतियाधिपति होता हुआ 'धंधे' का धोतक होता है तो चमड़ा, जूते, प्लास्टिक, रबर, पी. वी. सी. टायर, रेकसीन, फोम आदि द्वारा आजीविका देता है। 
               शनि भूमि क्षेत्र का कारक है, अतः जब चतुर्थेश होकर धंधे का धोतक होता है तो मनुष्य को कृषि द्वारा धन देता है।  साथ ही कृषि पंडित, नेता, नायक, श्रमिक, लीडर - नेता का कारक भी बन पाता है। 
              शनि लोहा है, जब यह तृतीयेश चतुर्थेश हो तो वाहन कि लोहा पटरी होता है। अतः रेलवे का प्रतिनिधि होता है। 
             शनि बलवान हो और विद्या पर्याप्त हो तथा शनि मंगल से प्रभावित हो और ऐसा शनि यदि धंधे का धोतक हो तो यन्त्र आदि का कार्य करने वाला इंजीनियर होता है।  जिसका बिजली से सम्बन्ध होता है। यदि शनि का मंगलसे सम्बन्ध न हो तो, और बुध से हो तो मैकेनिकल इंजीनियर होता है। 
शनि पत्थर है।  यदि सप्तमेश होता हुआ तथा शुक्र से बहुत प्रभावित होता हुआ 'धंधे' का धोतक हो तो मनुष्य पत्थर की मुर्तिया के काम से धनोपार्जन करता है।  साथ ही विविध सम्भागीय ठेकेदारी कार्य का भी कारक सूचक।