Wednesday, August 12, 2015

कन्या की पत्रिका से सप्तम भाव व भावी पति

सप्तम भाव व भावी पति
प्रत्येक कन्या के मन में उसके भावी पति की तस्वीर कुछ इस तरह की होती है कि उसका पति सुंदर, आकर्षक, हृष्ट-पुष्ट, उत्तम चरित्र वाला, पढ़ा-लिखा, डॉक्टर, इंजीनियर या उद्योगपति होगा लेकिन वधू की पत्रिका द्वारा जाना जा सकता है कि उसका वर सपनों का राजा होगा या फिर लड़ाकू, कामुक या शराबी। कन्या की जन्म कुंडली में सप्तम स्थान उसके पति का होता है। यदि पत्रिका सही है तो उसके पति के संबंध में जाना जा सकता है।
यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण सूत्र देकर कुछ भावी पति के बारे में बताया जा रहा है लेकिन इन्हीं सूत्रों को ब्रह्म वाक्य नहीं माना जा सकता क्योंकि पुरुष की यानी वर की जन्म कुंडली को भी महत्व देना चाहिए। जन्म कुंडली का सप्तम भाव भावी पति के बारे में दर्शाता है। वहीं नवांश कुंडली भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है और नवांश प्रत्येक तीन मिनट में बदलती रहती है।
- सप्तम भाव में शुक्र स्वराशि वृषभ का हुआ तो पति अति सुन्दर होगा। सुन्दर से तात्पर्य गोरा नहीं, बल्कि नाक-नक्श उत्तम व चेहरा आकर्षक होगा। वृषभ का शुक्र कामुक भी बनाता है अतः वह कामुक भी होगा।
- सप्तम भाव में तुला का शुक्र हुआ तो वह वर कामुक न होकर सरल स्वभाव वाला सुन्दर आकर्षक व्यक्तित्व का व नपी-तुली बात करने वाला अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करने वाला होगा। कलाकार, संगीतप्रेमी, सौन्दर्य प्रिय, इंजीनियर या डॉक्टर भी हो सकता है।
- सप्तम भाव में कन्या की कुंडली में मीन राशि का शुक्र हुआ तो वह उच्च का होगा अतः उसका भावी जीवनसाथी काफी पैसे वाला होगा तथा भाग्यवान होकर धनी होगा।
- सप्तम भाव में यदि नीच राशि का शुक्र होता है तो उसका भावी पति अर्थहीन व स्त्री के धन का प्रयोग करने वाला होगा।
- सप्तम भाव में सूर्य सिंह दिशा में हो या नवांश में सिंह राशि हो तो वह कामुक होगा एवं दाम्पत्य जीवन सुखद कम ही रहेगा।
- सप्तम भाव में मेष का मंगल हुआ तो उसका पति पुलिस, सैनिक या संगठनकर्ता होगा, उसका स्वभाव उग्र भी हो सकता है एवं कामुक भी रहेगा।
- सप्तम भाव में वृश्चिक राशि का मंगल हुआ तो वह तुनकमिजाज होगा, कुछ व्यसनी भी हो सकता है या लड़ाकू प्रवृत्ति का भी हो सकता है। उसका चरित्र संदेहास्पद भी हो सकता है।
- सप्तम भाव में मंगल उच्च राशि का हुआ तो वह अत्यंत प्रभावशाली, महत्वाकांक्षी, उच्चपदस्थ अधिकारी या डॉक्टर, सेना या पुलिस विभाग में भी हो सकता है।
- सप्तम भाव में कर्क का चंद्रमा हुआ तो वह भावुक, सहनशील, स्नेही स्वभाव वाला, मधुरभाषी, पत्नी से अधिक प्रेम करने वाला, गौरवर्ण का सुन्दर होगा।
- सप्तम भाव में उच्च का चंद्रमा हुआ तो वह अत्यंत सुंदर, अनेक स्त्री मित्रों वाला, सौंदर्यप्रेमी, कामुक भी होगा।
- सप्तम भाव में मकर या कुंभ का शनि हो तो उसका पति उसकी उम्र से अधिक होगा।
- सप्तम भाव में शुक्र-चंद्र की युति हुई तो वह अत्यंत मनोविनोदी, सुंदर और अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करने वाला होगा।
- सप्तम भाव में बुध मिथुन राशि का हुआ तो उसका पति व्यापारिक या बैंककर्मी, लेखक, पत्रकार या विद्वान होगा।
- सप्तम भाव में उच्च का बुध हुआ तो उसका पति सुन्दर होने के साथ-साथ उच्च व्यापारी या बौद्धिक गुणों से भरपूर, उच्च पदस्थ अधिकारी भी हो सकता है।
- सप्तम भाव में धनु राशि का गुरु हुआ तो उसका भावी पति विद्वान, सुन्दर, गोल चेहरे वाला, प्रोफेसर या न्यायविद, अधिवक्ता या राजपत्रित अधिकारी, पत्नी से प्रेम करने वाला सद्चरित्र व ईमानदार होगा।
- सप्तम भाव में बुध-शनि की युति हो और उस पर मंगल की दृष्टि हो एवं उसे कोई भी शुभ ग्रह न देखता हो ना ही शुभ ग्रहों से मध्यस्थ हो तो उसका पति नपुंसक होता है।
- सप्तम भाव में उच्च का राहू या केतु हो तो उसका पति आधुनिक विचारों वाला व दार्शनिक भी हो सकता है।
- सप्तम भाव में चर राशि हो एवं चर ग्रह हो या चर ग्रहों से दृष्टिपात हो तो उसका पति सदैव बाहर रहने वाला होता है।
- सप्तम भाव पर नीच दृष्टि किसी भी ग्रह की पड़ रही हो तो उसका पति मध्यम स्तर वाला होगा।
- सप्तम भाव में सूर्य-चंद्र की युति हो तो उसका पति सदैव भ्रमणशील व परेशान रहकर गृहस्थ जीवन में बाधक होगा।
- सप्तम भाव पर गुरु-चंद्र की युति हो तो उसका पति विद्वान, गुणवान, चरित्रवान, सुन्दर, यशस्वी, मधुरभाषी, ईमानदार, उच्च पदस्थ अधिकारी, डॉक्टर या प्रोफेसर या न्यायाधीश भी हो सकता है।
- सप्तम भाव में मंगल-चंद्र की युति हो तो उसका पति सुंदर या उद्यमी हो सकता है। वहीं स्वभाव में मिला-जुला रुख रहेगा व भावुक भी होगा।
- सप्तम भाव में मंगल-चंद्र-शुक्र की युति वाली कन्या का पति अत्यंत सेक्सी स्वभाव वाला व चरित्र का कमजोर भी हो सकता है। गुरु की दृष्टि पड़ने पर चरित्रहीन नहीं होगा।
- शनि-चंद्र की युति सप्तम भाव में होने से उसका वर इंजीनियर या अस्थिरोग का या दाँतों का डॉक्टर भी हो सकता है।
- गुरु या राहू की युति वाली कन्या का पति गुप्त विधाओं का जानकार लेकिन चिन्ताग्रस्त चरित्र वाला रहेगा।
- यदि कन्या के जन्म लग्न में नीच का गुरु व चंद्रमा हो तो उसका पति गुणी व सुन्दर होगा।
- यदि कन्या की जन्म कुंडली में शनि की उच्च दृष्टि सप्तम भाव पर पड़ रही हो तो उसका पति प्रशासनिक अधिकारी या शासकीय सर्विस में उच्च पदस्थ या लोहे का व्यापारी या ट्रेवल्स एजेंसी का मालिक होगा।
उपरोक्त सूत्र कन्या की पत्रिका से ही संबंधित है अतः वर की जानकरी उक्त सूत्रों से जानी जा सकती है।

Tuesday, August 11, 2015

Monday, August 10, 2015

पूँजीवादी समाज में परिवार का स्वरूप

हम जानते हैं कि जब समाज अपनी प्रारंभिक अवस्था में था तो परिवार की शुरुआती अवधारणाएँ और परिणतियाँ अपने मूल व्यवहार में तमाम आडंबरों से रहित थीं। उनमें खुलापन, आजादी और यायावरी थी। सामंती समाज तक आते-आते परिवार पितृसत्तात्मक हो गया और पुष्ट हो गए सामंती समाज ने ही उस बंद, कट्टर, सुरक्षित, रागात्मक परिवार की नींव डाली जिसकी चिंता आज की जा रही है। जाहिर है कि इस समाज के परिवार में एक पुरुष मुखिया (या सामंत) होता है और उसकी इस अवस्थिति को बनाए रखने में समाज, परंपरा, कानून और धार्मिक व्याख्याएँ शक्ति और सहायता प्रदान करती हैं। इस व्यवस्था में एक दास का होना आवश्यक है तभी परिवार का सामंती रूप पूर्ण हो सकता है। दासता के इस कार्यभार के लिए स्त्री को चुना गया। स्त्री को यह दासता गरिमापूर्ण लगे, इसके प्रति उसके मन में विद्रोह न हो इसलिए ममता, स्नेह, प्रेम, दायित्व, धर्म, कर्तव्य, शील आदि से उसे जोड़ा जाता रहा। लेकिन उसके नियम कभी भी स्त्री के लिए अनुकूल नहीं रहे। उसके लिए तो कैसे भी पति को प्रेम करना कर्तव्य और धर्म के अंतर्गत है। इस परिवार में स्त्री के शोषण के अनेक मान्य, प्रचलित और कठोर रूप रहे हैं।
स्त्री पर शासन आसान रहे, इसलिए ही विवाहों में उम्र और शिक्षा को ले कर एक बेमेल पंरपरा कायम की गई है जिसके तहत स्त्री का आयु में पुरुष से कम और शिक्षा में कमतर होना ही उचित मान लिया गया है। यदि वह आयु और शिक्षा में पुरुष से बड़ी या बराबर हुई तो इस बात के असर ज्यादा हैं कि उसे आसानी से शासित न किया जा सके। यद्यपि घरेलू, सामाजिक, औपचारिक, नैतिक और धार्मिक शिक्षा में इस बात की गारंटी कर दी गई है कि स्त्री समाज की ‘पहली इकाई’ में प्रवेश करते ही किसी पुरुष का स्थायी उपनिवेश हो जाए। इसी तरह के संदर्भों में कहा जाता है कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। इस ‘सामंती परिवार’ में पुरुष का जीवन सर्वाधिक आनंद में गुजरता है। गृहस्थी में उसकी जो मुश्किलें हैं वे एक नागरिक, मनुष्य और मुखिया की मुश्किलें तो हैं, लेकिन गुलाम या शासित की उन मुश्किलों से बिलकुल अलग हैं जो किसी मनुष्य की तमाम संभावना, प्रतिभा, स्वतंत्रता और चेतना को बाधित, कुंठित और प्राय: असंभव कर देती हैं।
इस तरह के परिवार में कुछ अन्य लक्षण सहज ही परिलक्षित होंगे, जो दरअसल सामंती व्यवस्था के सामाजिक-नागरिक लक्षणों से उत्पन्न हैं : जैसे स्त्री संपत्ति की तरह है और उसे अर्जित किया जा सकता है। उसे सुरक्षित करना जरूरी है अन्यथा घुसपैठ संभव है। वह पुरुष की प्रतिष्ठा का प्रश्न भी इसी वजह से है। चूँकि वह चल-संपत्ति है, इसलिए उसे अपने पास बनाए रखने के लिए हिंसा भी जायज है। इस परिवार में हिंसा के तमाम रूपों की उपस्थिति सहज रहती आई है। करुणा, दया, प्रेम, कृतज्ञता, नैतिकता, धार्मिकता और अभिनय का इस्तेमाल भी होता रहा है। हर स्थिति में उसका अधिकार दोयम है, कर्तव्य प्राथमिक और अनिवार्य। पारिवारिक इकाई के इसी स्वरूप को तरह-तरह से विकसित, महिमामंडित और दृढ़ किया गया। अब इसकी रागात्मकता, सहजता, कार्यकुशलता और व्यवस्था खतरे में है।
यहाँ ध्यान देना होगा कि अब हमारा समाज राजनीतिक, औपचारिक शिक्षा, तकनीकी, न्यायिक, संवैधानिक और स्वप्नशीलता के क्षेत्रों में सामंती नहीं रह गया है, भले ही रूढ़ियों, परंपराओं, सामाजिक आचरणों, मान्यताओं, धार्मिक विश्वासों आदि में सामंतीपन का ही बोलबाला है। बल्कि इन्हीं वजहों से अभी तक परिवारों में सामंती परिवेश बना रह सका है। लेकिन धीरे-धीरे पूँजीवाद ने शासन और तंत्र के वर्चस्ववादी इलाकों में अपनी ध्वजा फहराई है। लोकतांत्रिक व्यवस्था उसके लिए सर्वाधिक सहायक हो सकती है। लोकतंत्र की आड़ ही उसे तानाशाह होने की सीधी बदनामी से रोकती है। लेकिन लोकतंत्र की उपस्थिति अपना काम करती है और परिवार में किसी एक की तानाशाही अथवा सामंती प्रवृत्ति के खिलाफ भी वातावरण बनाती है। जाहिर है कि यह पूँजीवादी, उत्तर-आधुनिक समाज भी अपने जैसा ही परिवार बनाएगा। जैसा समाज, वैसा परिवार। क्या हम भूल रहे हैं कि परिवार समाज की पहली इकाई है ! ऐसा हो ही नहीं सकता कि समाज पूँजीवादी होता जाए और परिवार का चरित्र सामंती बना रहे।
पूँजीवादी समाज में अर्थवाद, संबंधों की स्वार्थपरकता, मनुष्य से मनुष्य की हृदयहीनता, हर क्रिया में छिपा निवेश तत्व, प्रदर्शनकारिता, उपयोगितावाद, उपभोक्तावाद, बाजारवाद और आत्मकेंद्रिकता के लक्षण प्रमुख हैं। इन लक्षणों को सब रोज-रोज अनुभव कर ही रहे हैं। इन्हीं विलक्षणताओं के कारण पूँजीवाद में प्रेम, मनुष्यता, रागात्मकता आदि का ही नहीं, बल्कि तज्जन्य संगीत, कला, साहित्यस, अध्यवसाय का लोप होता जाता है। इन्हीं सब बिंदुओं को आप परिवार पर लागू करें तो पाएँगे कि आज के परिवार का संकट यही है। अर्थात वहाँ स्वार्थ, उपयोगितावाद, निवेश मन:स्थिति, आत्मकेंद्रिकता का प्रवेश हो गया है और जीवन की रागात्मकता, हार्दिकता, सामूहिकता, और संगीतात्मतकता गायब है। यह होना ही है। इसे प्रस्तुगत समाज व्यावस्थाम में रोका नहीं जा सकता।
अभी जो ‘पुराने परिवार’ के रूपक हैं और उदाहरणों की तरह टापू की तरह दिखते हैं वे सामंती अवशेष हैं। गाँवों और कस्बों के जीवन में सामंती रीतियाँ जाति, वंश, परिवार परंपरा, धार्मिकता के प्रभाव बाकी हैं, अतएव वहाँ इन परिवारों का ध्वंस अभी उतना नजर नहीं आता, लेकिन ‘पूँजीवादी समाज से उद्भूत और प्रभावित परिवार’ शहरों तथा महानगरों में आसानी से मिल जाएँगे। आगामी कुछ ही समय में ये ‘पूँजीवादी समाज के परिवार’ बड़ी संख्या में तबदील होते जाएँगे। विवाह के लिए औपचारिक संस्कार गौण होते जाएँगे और करार के विधिक, मौखिक या सहमति के अन्य प्रकार स्वीकार्य होंगे। यह पूँजीवाद के चरित्र का ही हिस्सा है। इसी के चलते संभव है कि परिवार ‘आजीवन संस्था’ न रह कर ‘अल्पकालीन या आवश्यकतानुसार अनुबंध’ तक सीमित होती चली जाए।
यहाँ एक बात गौर करने लायक है। पूँजीवादी समाज की निर्मिति से बन रहे इन परिवारों में स्त्री का पारिवारिक शोषण तो रुक जाएगा लेकिन मनुष्य की अस्मिता, गरिमा, स्वतंत्रता और उड़ान से वे काफी हद तक वंचित ही रहेंगी, क्योंकि पूँजीवाद स्त्री को ‘उपयोगी’ और ‘उपभोक्तावादी’ वस्तु में ही न्यून करता है। वह स्वतंत्र तो होगी, लेकिन फिलहाल नियामक या निर्णायक नहीं। उसका ‘स्त्री’ होना उसके लिए नई मुश्किलें और कुछ तात्कालिक आसानियाँ पेश करेगा। पूँजीवादी व्वस्थाएँ और उसके गण उसका तदानुसार उपयोग करेंगे। यह आजादी विडंबनामूलक समस्या है। वह सामंती पिंजरे से निकल कर एक अथाह समुद्र में गिरेगी। यही कारण है कि अधिकांश लोगों को परिवार का सामंती रूप अधिक सुरक्षित और विकल्पहीन लगता है। इन परिवारों के विघटन और विनाश से पुरुषों का डर तो स्वाभाविक है क्योंकि उनका साम्राज्य इससे नष्ट होता है, किंतु स्त्रियों का डर अपने नरक से प्रेम करने और उसके पालन-पोषण के तरीकों में छिपा हुआ है। प्रसन्न इस बात पर तो हुआ ही जा सकता है कि स्त्री सामंती परिवार के कारागार से बाहर निकल पाएगी एवं नितांत नई समस्याओं के बीच स्वतंत्रचेता और स्वावलंबी होने के लिए विवश होगी। बहरहाल, यह संक्रमणकाल है और इसके बाद कुछ राहें निकलेंगी।
यह उम्मीद करना बेमानी और काल्पनिक नहीं है कि पूँजीवादी समाज अंतत: उस मानवीय, समतावादी और सामाजिक न्यायपूर्ण व्यवस्था से प्रतिस्थापित हो सकता है, जिसे ‘साम्यवादी व्यवस्था’ के स्वप्न में देखा जाता है। इस आकांक्षी व्यवस्था में ऐसे परिवार की कल्पना की जा सकती है जो अपने गठन, निर्माण और परिचालन में कहीं अधिक लोकतांत्रिक, समतावादी, रागात्मक और प्रेम भरा होगा, जिसमें स्त्री को मनुष्य का गरिमापूर्ण दर्जा मिलेगा और बच्चों के पालन-पोषण में अत्याचार, क्रूरता और इजारेदारी का हिस्सा खतम हो जाएगा। मार्क्स -एंगेल्स आज से 155 वर्ष पहले लिखे ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ में यदि ‘बुर्जुआ सामंती परिवार’ के संकटों का जिक्र करते हुए उसे खारिज करना चाहते हैं तो वह कोई अराजक प्रस्ताव नहीं है। अब ऐसी परिवार व्यवस्था मुश्किल में आ रही है तो यह सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों का हिस्सा है, भले ही अभी यह हमारी श्रेष्ठ मानवीय आकांक्षाओं के अनुकूल नहीं है मगर यह अपनी प्रकृति में ऐतिहासिक और द्वंद्वात्मक है।

Sunday, August 9, 2015

२ फ़रवरी १८३५ को ब्रिटेन की संसद में मैकाले की भारत के प्रति विचार और योजना मैकाले के शब्दों में


२ फ़रवरी १८३५ को ब्रिटेन की संसद में मैकाले की भारत के प्रति विचार और योजना मैकाले के शब्दों में..

मैं भारत के कोने कोने में घुमा हूँ..मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो ,जो चोर हो, इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है,इतने ऊँचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं,की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे,जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है.
और इसलिए मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ की हम इसकी पुराणी और पुरातन शिक्षा व्यवस्था,उसकी संस्कृति को बदल डालें,क्युकी अगर भारतीय सोचने लग गए की जो भी बिदेशी और अंग्रेजी है वह अच्छा है,और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है ,तो वे अपने आत्मगौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बनजाएंगे जैसा हम चाहते हैं.एक पूर्णरूप से गुलाम भारत
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http://abhindumahasabha.blogspot.in/2011/06/blog-post_2268.html

प्राथमिक शिक्षा का स्तर लगातार गिरते जाना चिंतन का विषय हैं

स्वयंसेवी संगठन प्रथम ने हाल ही में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर जो रिपोर्ट जारी की है उसके अनुसार शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के तीन साल बाद भी प्राथमिक शिक्षा के स्तर में कोई परिवर्तन नजर नहीं आता हैं बल्कि साल दर साल स्थिति और भी बदतर होती जा रही है। रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि ग्र्रामीण विद्यालयों में कक्षा पॉच के विद्यार्थीं न तो गणित का साधारण सा जोड़-घटाना कर सकते हैं और न ही मात्र भाषा में लिख पढ़ पाते हैं। वैसे स्वयंसेवी संगठन प्रथम ने यह रिपोर्ट प्राथमिक विद्यालयों के संदर्भ में जारी की है लेकिन देश के ग्रामीण क्षेत्र के माध्यमिक स्कूलों के छात्रों की स्थिति भिन्न नहीं है। क्योंकि आठवीं कक्षा का विद्यार्थी भी गणित और भाषाई ज्ञान के मामले में पॉचवीं के बच्चों से कुछ अलग नहीं है। स्वयंसेवी संगठन प्रथम की रिपोर्ट के बाद शिक्षा का अधिकार अधिनियम के आलोचक यह कह सकते है कि प्राथमिक विद्यालयों में परीक्षाएॅ न होना इसकी वजह है।क्योंकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुसार किसी विद्यार्थी को अगली कक्षा में प्रोन्नत करने से नहीं रोका जा सकता है। मगर शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू हुए अभी सिर्फ तीन ही वर्ष हुए है और शिक्षा का स्तर कई वर्षों से लगातार गिरता जा रहा है। जहॉ जक परीक्षा की बात है तो प्राथमिक शिक्षा के संदर्भ में सिर्फ परीक्षा को शिक्षा के स्तर की सुधार की कसौटी नहीं माना जा सकता है क्योंकि प्राथमिक शिक्षा बच्चे को सीखने का प्रथम अवसर प्रदान करने वाला एक माधयम है।और इसमें गणित और भाषा का ज्ञान आसानी से कराया जा सकता है।चूॅकि इस उम्र के बच्चे में सीखने और ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है अत: बच्चों की क्षमता या ग्रामीण वातावरण को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।
जहॉ तक फण्ड की बात है तो सन् 2004 में केंद्र सरकार का प्राथमिक शिक्षा पर बजट जहॉ मात्र 5,700 करोड़ रूपये था जो सन् 2012में बढ़कर 49,000 करोड़ रूपये हो गया।जब केंद्र सरकार ने प्राथमिक शिक्षा पर अपना आवंटन लगभग दस गुना बढ़ा दिया तो इसके परिणाम भी बांछित मिलना थे लेकिन हुआ उल्टा ?अब इसमें दोषी कौन? प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी के लिए साल दर साल बजट आवंटन बढ़ाने वाला मानव संसाधान विकास मंत्रालय?या शिक्षा के अधिकार कानून को गढ़ने वाले देशभर के शिक्षाविद ?या फिर प्राथमिक शिक्षा  व्यवस्था की कमान संभालने वाली राज्य सरकारें?निश्चित रूप से इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारें पर ही डाली जानी चाहिए क्योंकि केंद्र सरकार से मिलने वाले भारी बजट का वो सदुपयोग नहीं कर पायीं। आज सारे देश के प्राथमिक विद्यालयों में दस लाख से अधिक शिक्षकों के पद रिक्त है। राज्य सरकारें केंद्र से इस मद का हिस्सा तो पूरा लेती है लेकिन बच्चों को पढ़ाने का काम दैनिक मजदूरी से  भी कम मानदेय पर रखे गए अतिथि शिक्षकों के भरोसे डाल दिया जाता है। प्रदेश सरकारों का सारा ध्यान इस बात पर केंद्रित रहता है कि सस्ते से सस्ते शिक्षक कैसे नियोजित किए जाए लेकिन इसके कारण शिक्षा का स्तर कैसा होगा इसकी चिंता  न तो राजनेता करते है और नहीं अधिकारी? अभी मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के शिक्षकों द्वारा वर्षों से मिल रहे अल्प वेतन से व्यथित होकर चलाए जा रहे आंदोलन की चर्चा सुर्खिंयों में है। अपने वेतन को बढ़ाने की मॉग पर आंदोलनरत शिक्षक सरकार पर आरोप लगाते हैं कि सरकार का धयान सरकारी स्कूलों की बेहतरी में नहीं है। और वो इसे और पंगु बना बनाना चाहती है ताकि ज्यादातर पालक निजी संस्थाओं की चले जाए।आंदोलनकारि शिक्षकों के नेता बतलाते हैं कि प्रदेश सरकार केंद्र से उनके हिस्से का पूरा वेतन लेकर उसे लोकलुभावन योजनाओं में बांटती है ताकि वोटबैंक मजबूत हो जाए।वास्तव में म.प्र. और छत्तीसगढ़ के आंदोलनकारी शिक्षकों के शोषण और केंद्र से प्राप्त राशि के दुरूपयोग की खबरों को मानव संसाधान मंत्रालय को संज्ञान में लेना चाहिए क्योंकि ये मुद्दे शिक्षा के स्तर से जुड़े हुए है।शिक्षा के अधिकार कानून के मुताबिक शिक्षकों के पदों की पूर्ति के लिए निर्धारित समय सीमा 31 मार्च आने में मात्र दो माह शेष है लेकिन अकेले म.प्र. के प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों के लगभग एक लाख पद रिक्त हैं।प्रदेश के हजारों स्कूल अतिथि शिक्षकों के हवाले है। प्रदेश में केंद्र सरकार द्वारा प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी के लिए आवंटित धानराशि का भारी दुरूपयोग के अनेक मामले सामने आ रहें हैं।म.प्र. में शिक्षा विभाग द्वारा करोड़ों की राशि से देवपुत्र नामक अनजानी सी पत्रिका खरीदे जाने की बात भी चर्चा में है। ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूल शिक्षक विहीन तो है ही साथ ही सुविधा विहीन भी है।बैठने के लिए बेंचें नहीं है पीने पानी नहीं हैं और शौचालय तो दूर की बात है।पढ़ाई के मुद्दे पर शिक्षक बतलाते हैं कि उनका अधिकांश समय मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था में गुजरता है, क्योंकि यह संवेदनशील मुद्दा और इसमें ढील मतलब बच्चों की जान पर बाजी। मधयान्ह भोजन की कथा व्यथा ही अलग है यह बहुत ही गंदी परिस्थितियों मे तैयार किया जाता है, इसके लिए न तो व्यवस्थित किचन है और न ही प्रशिक्षित रसोईये और इसमें अक्सर छिपकली और कीड़ें निकलते रहतें हैं जिसकी जिम्मेदारी भी शिक्षकों की रहती है।
वास्तव में प्राथमिक शिक्षा का स्तर लगातार गिरते जाना चिंतन का विषय हैं और इसमें राज्य सरकारों की ढील ज्यादा समझ में आती हैं। अगर राज्य सरकारें स्कूलों में सुयोग्य शिक्षकों की तैनाती करें उन्हें सम्मानजनक वेतन दे,विद्यालयों में मूलभूत सुविधाओं की पूर्ति करें और रोचक पाठयसामग्री को पढ़ाई में शामिल छात्रों के शैक्षणिक स्तर में सुधार अवश्य होगा।शिक्षा का अधिकार अधिनियम तो शैक्षणिक सुधार की गारण्टी है बशर्ते इसके अनुरूप व्यवस्था और क्रियान्वयन होना चाहिए।  (अतुल कुमार श्रीवास्तव)

प्राथमिक शिक्षा की ऐसी हालत क्यों?

शिक्षा का नया सत्र प्रारम्भ हो चुका है। ऐसे में हमारी तैयारी क्या है? क्या हम इस सत्र के लिए तैयार हैं? या हम अब भी वहीं हैं,जहां पिछले वर्ष थे? यह सवाल इसलिए क्योंकि कुछ दिनों पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जारी की गई रपट डायस(शिक्षा हेतु जिला सूचना व्यवस्था) प्राथमिक शिक्षा की कलई खोलती है और उत्तर प्रदेश की सपा सरकार पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है कि आखिर उ.प्र. में प्राथमिक शिक्षा की ऐसी हालत क्यांे? यह रपट बताती है कि प्राथमिक शिक्षा के लिए चलाई जा रही अनेक महात्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद देश में पांचवीं तक के छात्रों की संख्या में पिछले एक साल में ही 23 लाख बच्चों की कमी आई है, जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश की कक्षाओं से 7 लाख बच्चे घट गए हैं। रपट की मानें तो देशभर में पांचवीं और आठवीं में क्रमश:13.24 करोड़ और 6.64 करोड़ यानी कुल 19.88 करोड़ बच्चे प्रारम्भिक शिक्षा हासिल कर रहे हैं। लेकिन इतनी बड़ी तादाद में बच्चों का प्राथमिक स्कूल से कम होना सवाल खड़ा करता है कि आखिर इतनी सुविधाओं के बावजूद ऐसा क्यों? कमी कहां हैं? या फिर यह सभी सुविधाएं हवा-हवाई साबित हो रही हैं?
लड़कियों के लिए शौचालय तक नहीं ?
आंकड़े बताते हैं कि देश के 31 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों में लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की बेबसाइट पर पड़े आकड़ों पर नजर डालंे तो अभी तक केवल 69 फीसदी विद्यालयों में ही शौचालय की व्यवस्था है। ग्रामीण वातावरण को देखते हुए इस समस्या के कारण अभिभावक लड़कियों को स्कूल जाने से रोक देते हैं, जिससे लड़कियों की पढ़ाई बीच में ही रुक जाती है और वे शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। 2013 में यूनीसेफ की टीम ने उ.प्र. के सोनभद्र, चंदोली, भदोही, मिर्जापुर गाजीपुर, मऊ, बांदा सहित कई जिलों का सर्वे किया था। टीम ने इस दौरान पाया कि जहां स्कूल में कुछ स्थान पर शौचालय भी हैं तो वहां साफ-सफाई न के बराबर है,जिसके कारण बीमारी की आशंका से भी लड़कियां शौचालय प्रयोग करने से बचती हैं। ऐसी विषम परिस्थिति में लड़कियों के लिए सामंजस्य बनाना बेहद कठिन होता है।
शिक्षकों की भारी कमी
जब विद्यालयों में शिक्षक ही नहीं होंगे तो बच्चों को पढ़ायेगा कौन और कौन अभिभावक ऐसी स्थिति में अपने बच्चों का यहां दाखिला करवायेगा। गिरते शिक्षा स्तर का प्रमुख कारण शिक्षकों की कमी है। आंकडे़ चौंकाने वाले हैं,क्योंकि देश में कहीं-कहीं तो 200 बच्चों पर 1 शिक्षक ही तैनात है और कहीं-कहीं तो पूरा का पूरा विद्यालय शिक्षामित्र के सहारे ही चलता है। ज्ञात हो कि इस समय देश में 13.62 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं। परन्तु इनमें कुल 41 लाख शिक्षक ही तैनात हैं,जबकि देश में अनुमानित 19.88 करोड़ बच्चे प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे हैं । साथ ही पूरे देश में करीब 1.5 लाख विद्याालयों में 12 लाख से भी ज्यादा पद खाली पड़े हैं। इस कारण करीब 1 करोड़ से ज्यादा बच्चे विद्याालयों से बाहर हैं। प्रतिभाशाली शिक्षकों के अभाव का ही परिणाम है कि उत्तर प्रदेश सहित कई प्रदेशांे के बच्चों के सीखने,पढ़ने व समझने के स्तर में बराबर गिरावट हो रही है। इन विद्यालयों के कक्षा छ: तक के बच्चे ठीक से जोड़-घटाना और गुणा-भाग तक नहीं कर पाते हैं। इन परिस्थितियों में समझा जा सकता है कि प्राथमिक शिक्षा की ढांचागत गुणवत्ता,शिक्षण-प्रशिक्षण तथा शिक्षा की गारन्टी जैसे लक्ष्यांे की वास्तविक दशा का हश्र क्या हो सकता है।
संचार प्रौद्योगिकी की हालत
मानव संसाधन विकास मंत्रालय की बेबसाइट पर इसे लेकर आंकड़े तो ढेर सारे पड़े हैं पर वे हकीकत से कोसों दूर हैं। प्राथमिक विद्यालयों के बच्चे इस क्रान्ति से कितने परिचित हैं इसे लेकर मन डगमगाने लगता है। केन्द्र सरकार द्वारा कुछ शहरी क्षेत्रों के विद्यालयों के लिए कम्प्यूटर आए भी हैं तो वे स्कूल में न होकर ग्राम प्रधान या फिर हेडमास्टर साहब के घर की शोभा बढ़ाते हैं और धोखे से स्कूल में पहुंच भी गए तो भाषा शिक्षक की अनुपलब्धता एवं विजली न आने के कारण धूल ही फांकते रहते हैं ।
मध्याह्न भोजन से चौपट होती पढ़ाई !
सरकार ने यह योजना इसलिए चलाई थी कि गरीब बच्चों को पोषकतत्व युक्त भोजन मिलेगा, जिससे उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास में वृद्धि होगी। पर हकीकत में इस योजना से नुकसान ज्यादा हो रहा है। असल में सरकार बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए प्राथमिक व उच्च प्राथमिक बच्चे के लिए 100 से 150 ग्राम प्रतिदिन मीनू के अनुसार भोजन की व्यवस्था करती है, लेकिन जब पाञ्चजन्य ने इस बारे अध्यापकों से इस योजना पर राय जानी तो उन सभी का मानना है कि यह योजना पूरी तरह से दलाली और भ्रष्टाचारियों के चुंगुल में फंसी है और इससे बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बर्बाद हो रही है। बच्चे पढ़ने के लिए कम सिर्फ भोजन के समय खाने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं। ज्यादातर विद्यालयों में तैनात एक दो अध्यापक पल्स पोलियो, जनगणना, चुनाव जैसे तमाम गैर शैक्षिक कार्यों में लगे रहते हैं और बाकी समय बच्चों के मध्याह्न भोजन में। खाना बनाने के लिए सरकार द्वारा बच्चों के हिसाब से कार्य करने वालों की व्यवस्था की गई है पर हकीकत में इतना सारा काम किसी एक के वश की बात नहीं। लिहाजा बच्चे भी इसमें हाथ बंटाते रहते हैं। असल में यह योजना विद्यालयों में भ्रष्टाचार का एक जरिया है। स्कूलों को मिलने वाला राशन खाद्य निगम या कोटेदार उपलब्ध कराता है। कोटेदार और प्रधानाध्यापक की इसमें सांठगांठ रहती है और पहले तो राशन में ही घोटालेबाजी होती है तथा दूसरी ओर भोजन में अन्य सामान बनाने से लेकर अन्य चीजों का पैसा ग्राम प्रधान के ‘कनवर्जन कास्ट’ के तहत भुगतान होता है,जो स्कूल का प्रधानाध्यापक चेक बनाकर देता है। अब यहां भी ग्राम प्रधान और प्रधानाध्यापक के बीच जमकर बंदरबांट होती है। ऐसे हालात में पढ़ाई कहीं गुम सी होती जा रही है।
पेयजल व बैठने की व्यवस्था तक नहीं
यूनीसेफ की रपट बताती है कि देश के 30 फीसदी से अधिक विद्यालयों में पेयजल की व्यवस्था ही नहीं है। साथ ही 40 से 60 फीसदी विद्यालयों में खेल के मैदान तक नहीं हैं। पिछले दिनों देश की शीर्ष अदालत के सामने केन्द्र में रही कांग्रेस सरकार खुद बता चुकी है कि देश में अब भी लगभग 1800 से अधिक स्कूल टेंट और पेड़ों के नीचे चल रहे हैं। 24 हजार विद्यालयों में पक्के भवन नहीं हैं, जो बच्चे पढ़ने के लिए आते भी हैं वे घर से ‘बोरी या टाट पट्टी’ लेकर आते हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि हमारे देश के प्राथमिक विद्यालयों का स्तर क्या है और ऐसे में किन परिस्थितियों में पढ़ाई होती होगी दिन में तारे देखने जैसा है।
निजी विद्यालयों की ओर बढ़ता मध्यवर्ग
प्राथमिक शिक्षा की गिरती साख का ही परिणाम है कि शिक्षा का निजीकरण हो रहा है। इसका परिणाम है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जो असहाय एवं वंचित-गरीब वर्ग है वह इससे बेदखल होने को मजबूर है। जिनके पास पैसा और सभी प्रकार से समृद्ध हैं वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम और मिशनरी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं पर जिनके पास पैसा नहीं है उनके नौनिहाल पढ़ाई छोड़कर खेत-खलिहान में धान लगाने और पिपरमिंट लगाने में अपने पढ़ाई-लिखाई के दिनों को जाया कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि गरीब-अमीर के शैक्षणिक स्तर में गहरी विषमता उत्पन्न हो रही है। यूनेस्को की जिस रपट में कहा गया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा वयस्क निरक्षर भारत में हैं, वह उस सच की ओर ध्यान दिलाती है, जिस पर राज्य सरकारें परदा डाले रहती हैं। इनकी शिक्षा की उदासीनता और ठोस नीति न होने से यह खाई दिनो-दिन चौड़ी होती जा रही है।
अपने समाज की सच्चाई
प्राथमिक विद्यालयों की शिक्षा की बद से बदतर हालत के लिए कुछ हदतक हमारा समाज भी जिम्मेदार है। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि देश के अधिकतर अभिभावक मौजूदा दौर को देखते हुए अपने बच्चों को तो अंग्रेजी माध्यम या फिर मिशनरी स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं,लेकिन ठीक इसके विपरीत अभिभावक स्वयं प्राथमिक स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं। इसके पीछे कारण है, क्योंकि प्राथमिक स्कूल में पढ़ाई के अलावा और सभी कार्य होते हैं और आप दबाव वाले हैं तो घर बैठ कर सरकारी पैसों पर मौज कर सकते हैं। बच्चों को वे यहां इसलिए नहीं पढ़ाते क्योंकि यहां पढ़ाई न के बराबर होती है। ऐसे में वे अपने बच्चों को जो बनाना चाहते हैं वह इन परिस्थितियों में रहकर बना नहीं सकते। क्योंकि अंगे्रजी एवं मिशनरी स्कल में शिक्षा का जो अत्याधुनिक रूप है उसके सामने गावों की प्राथमिक शिक्षा कहीं भी नहीं टिकती।
गांव-गाव तेजी से फैलती अंग्रेजी व मिशनरी शिक्षा के सामने सरकारी प्राथमिक शिक्षा की हालत देखते ही बनती है। शिक्षा का अधिकार व मध्याह्न भोजन की योजना के बाद भी हम सही ढंग से खड़े नहीं हो पा रहे हैं। यदि हमारी विद्यालयी शिक्षा की यह दशा है तो शिक्षा के समग्र स्तर पर उत्कृष्टता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सरकारी विद्यालयों से मिशनरी व अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में बच्चों का लगातार पलायन देश में बुनियादी सरकारी शिक्षा की दरकती दीवारों का साफ संकेत दे रही है। इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि मध्याह़्न भोजन, वेशभूषा, साइकिल, पुस्तकों के लालच में कुछ प्रवेश तो बढ़ सकते हैं लेकिन हकीकत में प्राथमिक शिक्षा की दशा कुछ और ही है।
जनसरोकार से जुड़े प्राथमिक शिक्षा
प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर पर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद(एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक जे.एस.राजपूत ने पाञ्चजन्य से बात करते हुए कहा कि अनेक योजनाओं के बावजूद प्राथमिक स्कूल के बच्चों का स्तर लगातार घट रहा है। सरकारी आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि समय-समय पर इन विद्यालयों में बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी तो होती है, लेकिन गुणवत्ता क्या है,उसपर चुप्पी साध लेते हैं। शिक्षा का अधिकार कानून को चार साल गुजर जाने के बाद भी वह पूरी तरह से असफल रहा है। शिक्षा में फैलते भ्रष्टाचार की हालत यह है कि हरियाणा और म. प्र. के भूतपूर्व मंत्री जेल में हैं। यह हालत किसी एक प्रदेश की नहीं है,अपितु अधिकतर प्रदेशों में ऐसे लोगों का बोलबाला है। ऐसे में जब बड़े-बड़े लोग भ्रष्टाचार में संलिप्त होंगे तो छोटे अधिकारियों से क्या उम्मीद रखी जाए। मेरा मानना है कि अगर उच्च पद पर आसीन राजनेता एवं शिक्षा विभाग के अधिकारी ईमानदार हैं तो निश्चित रूप से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा और भ्रष्टाचार पर लगाम कसेगी। साथ ही अगर सरकार को प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति सुधारनी है तो वह स्थानीय स्तर पर जनता का सहयोग ले और उन्हें बताए कि स्कूल उनका है और उन्हें ही संभालना है। सरकार द्वारा इन विद्यालयों को पर्याप्त धन मुहैया कराया जाए। प्रतिदिन निरीक्षण की व्यवस्था हो एवं शिक्षा के नाम पर लोकलुभावन योजनाओं के द्वारा छात्रों को बरगलाया न जाए।
पहले सीटैट, अब किनारा
केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट (कैट) ने केन्द्र व दिल्ली सरकार से शिक्षक नियुक्ति में सीटैट की अनिवार्यता में छूट देने का निर्देश दिया है। इस आदेश का मतलब साफ है कि कि अब सीटैट के बगैर भी आप शिक्षक बन सकते हैं । लेकिन सवाल इस बात का है कि अभी कुछ वर्ष पूर्व सरकार ने शिक्षक बनने के लिए इस परीक्षा को आधार बनाया और इसी के चलते देश के राज्यों में अध्यापक पात्रता परीक्षा की शुरुआत हुई। राज्य सरकारें इसी परीक्षा को आधार बनाकर शिक्षकों की नियुक्त कर रहीं हैं। ऐसे में आगे चलकर राज्यों में भी टेट परीक्षा समाप्त करने की मांग उठेगी। ऐसे में इसको उत्तीर्ण करने वाले स्वयं को ठगा महसूस करेंगे और बाकी उम्मीद करेंगे।
(अतुल कुमार श्रीवास्तव)(पांचजन्य)

आजादी के पहले और आजादी के बाद शिक्षा

आजादी के पहले         --------
1. भारत परतंत्र था पर भारतीय मन से परतंत्र नहीं थेउनकी सोच परतंत्र नहीं थी, अपनी आध्यात्मिक और राष्ट्रवाद की परिकल्पनाओं से यहां के लोग ओतप्रोत थे, अंग्रेजी सत्ता को इसका आभास थातभी लार्ड मैकाले ने इस देश की सार्वभौमिकता और यहां के लोगों की मानसिकता को तोड़ने के लिए ऐसी शिक्षा पद्धति निकाली कि यहां के लोग अंदर से टूट जाये और अंग्रेजी मानसिकता को श्रेष्ठ समझअपनी संस्कृति से नफरत करने लगेफिर भी अंग्रेज भारतीयों को मन से गुलाम बनाने में असफल रहे। 

2. पूरा देश चरित्रवान थाखासकर भारतीय राजनीतिज्ञों का जीवन आदर्शों से भरा रहता थालोग उनकी बातों को ध्यान से सुनते और अपनाने की कोशिश करते। 

3. यहां की युवा पीढ़ी भीदेश को नयी दिशा दे रही थीसाथ ही अपने चरित्र पर ध्यान देती थीअपने देश के पूर्वजों के सम्मान पर कोई आंच नहीं आयेइसका ध्यान रहता थाइनके लिए एक ही लक्ष्य था देश के लिए जीना और देश के लिए मरना। स्वामी विवेकानंद, आज़ादभगतसुभाष आदि इसके सर्वश्रेस्थ उदाहरण है। 
 
4. सभी का एक ही लक्ष्य थाकि भारत स्वतंत्र हो।
 
5. भारत अखंड था, आज का पाकिस्तानबांगलादेशचीन द्वारा बलपूर्वक और धूर्ततापूर्ण तरीके से भारत की हड़पी गयी जमीनसभी भारत के नक्शे में नजर आते थेभारत का मानचित्र भव्य दीखा करता था।

6. 
मुसलमानों और अंग्रेजों  द्वारा 700 सालों से भी ज्यादा लूटने के बाबजूद भारत गरीब नहीं थालेकिन हमारे दिलों और दिमाग में बैठा दिया गया की भारत बहुत गरीब है और आज तक यही बात दोहरा दोहरा कर हमें मूर्ख बनाया जा रहा है। गरीबी के नाम पर हमारे ऊपर विदेशी कर्ज थोपने की शुरुआत कर दी गयी। 

7. परतंत्र होने के बावजूददेश की आध्यात्मिक शक्ति का लोहा विदेशी माना करते थेजैसे स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो धर्म सम्मेलन में भारतीय धर्म का पताका फहरायाऔर बताया कि भारत क्या हैं।
8. 
देश का ग्राम और कुटीर उद्योग बहुत ही मजबूत था, अंग्रेजों द्वारा इस उद्योग को सर्वनाश के कगार पर लाने के बावजूद स्वदेशी आंदोलन ने इनको नयी दिशा दी थी।

आजादी के बाद --------------------

 
1. भारत स्वतंत्र हुआपर लार्ड मैकाले की जीत भी हुईकांग्रेस ने सत्ता संभाला और मैकाले की शिक्षा पद्धति को जन जन तक पहुंचाने की कोशिश शुरु हुईदेश में जो काम अंग्रेज नहीं कर सकेवो काम यहां की कांग्रेसी सरकार ने शुरु कियालोग भारत और भारतीय संस्कृति से दूर होते चले गये और भारतीय मन पूरी तरह से परतंत्र हो गया।

2. 
परतंत्र भारत में जहां सभी चरित्रवान थेआजादी के बाद चरित्रवानों का टोटा पड़ गयाआप किसी भी क्षेत्र में जाये चरित्रहीनों की संख्या सर्वाधिक हैंज्यादातर लोग भ्रष्टाचार में डूबे हैंऔर अपने हिस्से का भारत लूट लेना चाहते हैंजो नहीं लूट रहेउन्हें मूर्ख समझा जाता हैं।

3. 
आज की युवा पीढ़ीअब देश और समाज तथा परिवार के लिए भी नहीं सोचतीउसे सिर्फ अपने लिए धन कमाना और ऐश करने से मतलब हैंइनके लिए देश व समाज कोई मायने नहीं रखताइनके लिए तो परिवार भी कोई मायने नहीं रखता, सेल्फमेड जिंदगी जीने में ये ज्यादा आनन्द अनुभव करते हैं।

4. 
आज भारत को कहां ले जाना हैंकोई लक्ष्य ही नहीं हैं, भारत को कैसा और क्या बनाना हैंइस पर किसी का ध्यान नहींसभी नौकरी कर रहे हैं चाहे वो राजा हो या प्रजा। नौकरी करने के क्रम मेंसभी अपने बेटे-बेटियों के लिएमरते दम तक कुछ ऐसा कर देना चाहते हैंताकि सात पुश्त तक गर नौकरी न भी मिले तो ये आराम से जिंदगी गुजार सकें। उसका अनेक उदाहरण हैंसुबह होते हीभारत की अखबारें ऐसी खबरों से पटी होती हैं। आज के नेता तो अपनी पत्नी और बच्चों के सिवा दूसरा कुछ सोचते नहींआज किसी पार्टी में कल किसी और पार्टी मेंसुबह का नाश्ता किसी और पार्टी में दोपहर का भोजन किसी और पार्टी मेंये इनका चरित्र हो गया हैंऐसे में समझा जा सकता हैं कि ये देश के प्रति कितने वफादार हैंअब तो शायद ही कोई ऐसा नेता हैं जो किसी भ्रष्टाचार के दलदल में न फंसा होज्यादातर इस भ्रष्टाचाररुपी गंगोत्री में डूबकी लगा चूके हैं और कुछ लगाने के चक्कर में हैं।

5. 
आज भारत खंडित हैंआजादी के समय ही भारत दो टुकड़ें में बंट गया थाबाद में चीन और पाकिस्तान ने भी भारत के हजारों वर्ग किलोमीटर भूभाग पर कब्जा कर बैठापर किसी की हिम्मत नहीं कि इन हजारों वर्ग किलोमीटर हड़पीगयी जमीन को पुनः भारत में मिला लें।
 
6. बहुत सारे भारतीय अब अमीर बन गये हैंपर भारत के उपर विदेशियों का इतना कर्ज हैं कि भारत सरकार को बजट का बहुतेरे हिस्सा तो ब्याज देने में खत्म हो जाता हैं।
 
7. स्वतंत्र होने के बाद देश का मान हर क्षेत्र में घटा हैंहम विश्व कप फुटबाल में भाग लेने के लायक नहीं हैंहमारे खिलाड़ी किसी भी खेल में गर कुछ जीतते हैं तो ये सरकार की देन नहींबल्कि उनकी अपनी मेहनत का फल होता हैं,जिस बांगलादेश को हमने आजाद करायावो हमारे लिए काल बन गया हैंउसके आतंकवादी पूरे देश में फैलकर भारत के अमन चैन के लिए खतरा बन गये हैंपूर्वोत्तर भारत तो बांगलादेशियों से पट गया हैंऔर ये अब उत्तर की ओर बढ़ते चले जा रहे हैंऔर हमारी सरकार वोट बैंक की खातिरआंख मूंद कर बैठी हैंएक तो अपनी जनसंख्या और उपर से बांगलादेश की जनसंख्या का दबाव पूरे देश के लिए सरदर्द बन गयी हैंपर इस पर भी यहां के नेता राजनीति करने से बाज नहीं आतेजबकि दूसरे देश मेंऐसा हैं ही नहींगर वहां पता लग जाये कि विदेशियों की बड़ी फौज उनके देश में आ गयी हैंतो उसके साथ उनके द्वारा ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जाती हैं कि बाद में उस देश में आने परवहां की जनता दस बार सोचने पर मजबूर हो जाती हैं। 

8. देश का लघु और कुटीर उद्योग पूरी तरह से बर्बाद हो चुका हैंइसके जगह पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना कब्जा जमा लिया हैं और देश की आर्थिक स्थिति पूरी तरह से गिरवी हो गयी हैं।
 
कुछ लोग कहते हैं कि देश आजादी के बाद बहुत तरक्की किया हैंमैं बता दूं कि गर ये देश स्वतंत्र नहीं होताअंग्रेजों के अधीन रहता तब भी तरक्की करताक्योंकि तरक्की किसी समय का मोहताज नहीं होता।
विकास का मतलब होता हैंआंतरिक सोच और सम्मान के साथ बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक भारतीयों को बेहतर जिंदगी प्रदान करनापर ये क्या आजादी के बाद संभव हुआ हैं।