Friday, August 26, 2016

हेमलता खोरवाल

Veerbahadur Singhariya to प्रगतिशील रैगर
क्या रैगर समाज जागरूक है ?
राजस्थान के सबसेे बडे कालेज "राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर " जिसे राजनीति की खान भी कहते है जो इस विश्वविद्यालय से जीता है उसे राजनीति में प्रवेश मिला है से रैगर समाज की बेटी सुश्री हेमलता खोरवाल उपाध्यक्ष पद हेतु प्रत्याशी है
वैसे तो मैंने समाज की बडी बडी तोफो को आये दिन व्हाट्सऐप ओर फेसबुक पर रैगर समाज को टिकट देने की मांग करते देखा है
लगातार मांग का नतीजा ये रहा की राजस्थान के सबसे बडे कालेज से रैगर समाज की बेटी को मौका मिला है
आज हमें ये मौका हाथ से नही गुमाना चाहिए
रैगर समाज के सभी जागरूक समाजसेवी बुद्धिजीवियों से निवेदन है की कल 31 -08-2016 को राजस्थान विश्वविद्यालय में बहिन हेमलता खोरवाल को जिताने के लिए तन मन धन से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहयोग व सपोर्ट जरूर करें
अभी नहीं तो कभी नहीं
ये मौका हाथ से निकल गया तो आने वाले समय में राजनैतिक पार्टियां यही कहेगी की हमने आपको मौका दिया आपने जीत कर नही दिखाया
इसलिये ऐसा न हो की आगे आने वाले दिनों में हमें राजनैतिक प्रतिनिधित्व के लिए भिख मांगनी पडे ओर गिडगिडाना पडे
हमारे समाज द्वारा जो लगातार राजनैतिक प्रतिनिधित्व की मुहिम चलाई जा रही है उसकी ये अग्नि परीक्षा है
मेगवाल जाट राजपूत समाजो से सिखों किस तरह वे राजनीती में आगे बढे है उन्होंने कभी ये नही देखा की उनका आदमी कोनसी पार्टी से खडा है बस अर्जुन की भांति उन्होंने सिर्फ ये लक्ष्य रखा की सामने जो खडा है मेरी जाती का गौरव है ओर मुझे मेरे गौरव को बचाना है /उसे जीताना है सामने चाहे कोई भी हो
रियो ओलम्पिक में जब दो बेटी पदक लेकर आयी तो हमने खुब फोटो शेयर किये
क्या हमारी बेटी के लिए हमारे पास समय नहीं ?
हमारा भी लक्ष्य सिर्फ एक ही हेमलता खोरवाल रैगर समाज का गौरव है ओर इस गौरव को जीताना है
जाग सको तो सुबह तक का समय बहुत है ओर कल 31 अगस्त तारीख में आपके चंद घंटे समाज की बेटी के साथ रैगर समाज के सम्मान के लिए बहुत है
यही समझ लो की आप 31 /8/16 को अपनी बेटी हेमलता खोरवाल को परीक्षा दिलाने राजस्थान विश्वविद्यालय जा रहे है
आपकी बेटी कल आपकी राह देख रही है
एक शेयर अपनी समाज की बेटी के लिए
आपके समाज की बेटी आपके सपोर्ट की राह देख रही है
दिनांक 31/08/2016 कल
समय सुबह 8 से दोपहर 1 बजे तक
जागो रैगर जागो अपनी बेटी के सम्मान ओर गौरव के लिए जागो
ओर जो नहीं जाग सके उनके लिए बस इतना ही व्हाटस ऐप ओर फेसबुक पर समाज की एकता ओर जागरूकता के लिए भचेडे खाते रहना

कविता

बलात् कर्म हुआ, 
एक धीर चरित्र नारी से,
जतन सहस्त्र किये उसने ,
पर बच ना सकी अत्याचारी से,
जिस दिन यह काला काम हुआ ,
पुरूष कुल पूरा बदनाम हुआ

जिस पौरूष की महिमा, इतिहास ने गायी थी सदा अमर
उसी पौरूष ने आज समझो, खोदी थी अपनी ही कबर

अब कोई तुम्हारें बाजुओं की, यश गाथा नहीं गा पाएगा 
ऐसी यशगाथा गाने से, सर अतीत का भी झुक जाएगा
जिस नारी रक्षा का जिम्मा, लिया था हमने हाथ में 
उस नारी को बेच दिया हमने, काली अंधेरी रात में

अदालती तौर पर न्याय , मिल गया था उस नारी को
उम्रकैद की सजा भुगतनी थी, अब अत्याचारी को

अपराध बोध से दिल डोला ,
आँखों में आँसू लिये बोला,
“हाय! मैनें कैसा अत्याचार किया ,
कुल को अपने शर्मसार किया,

क्षणिक भावना के प्रवाह में, मैनें बेची अपनी खुद्दारी थी
खुद तो उम्रकैद पायी, उसकी भी अस्मिता उजाड़ी थी

न्याय मिला तो क्या हुआ ,
जीवन उसका तबाह हुआ,
जिस वक्त मदद समाज की उसने ज्यादा चाही थी ,
उसी समाज ने की उसे अब मनाही थी,

उस अत्याचारी पुरूष ने केवल, इक बार उससे बलात् किया
पर विष व्यंग्य के बाणों से, समाज ने सदा बलात् किया

“दोष मेरा कोई बतला दो ,
अपराध मुझे कोई समझा दो,
मैनें तो उसका प्रतिकार किया ,
जब उसने अत्याचार किया,


मैं अबला यथा सामथ्र्य, बचाव अपना कर पायी थी
पर उस भेडि़ये के चंगुल से, बच फिर भी ना पायी थी
बीच सड़क में जब, मैं घायल पड़ी थी लाचार
तब मैनें की थी पथिकों से, एक मदद की पुकार

मैं दर्द से हुँ मर रही ,
विनती सभी से कर रही,
पर वे ना कोई इंसान थे ,
लगते सारे पाषाण थे,

आज पड़ी मैं यहाँ पर, कल कोई होगा तुम्हारा अपना
अब सोच समझ कर करों, तुम मेरे दर्द की कल्पना
आज मुझे बचा लो तुम, इलाज मेरा तुम करवा दो
समय रहते मुझे कोई, अस्पताल तो पहुँचा दो

घंटो पड़ी रही इस आस में ,
आएगा कोई बचाव में,
टूट गया मेरा विश्वास ,
तब मैनंे ली एक अंतिम श्वास,
जो अब तक समाज की बेटी थी ,
वो मृत होकर अब लेटी थी,

मैनें पायी मौत दर्दनाक, नहीं अपने कर्मो से 
जिंदगी की जंग, मैं हारी थी बेशर्मों से
वों अत्याचारी केवल ना, सजा का हकदार था
यह समाज भी मेरी मौत का, बराबर हिस्सेदार था

मैं घायल पड़ी राह में, दी भगवान की मैने दुहाई थी
पर मेरी मदद की उन लोगो ने, जहमत नहीं उठाई थी
दूजे दिन उन्हीं लोगों ने, छिड़का नमक मेरे घावों पर
हाथ में मोमबत्ती लिये, वे निकल पड़े थें उन राहो पर।

----------------------------------------------

नफरतों के कांटे प्रेम से काटते चलो,
छोटी है जिंदगी दिल खोल कर प्यार बाँटते चलों।

आसमान में छाए रहेंगे सदा बादल श्वेत और श्याम,
दुःख के शूलों में से खुशियों के फूल छाँटते चलो।

अपनों से बैर ना रहे कभी जिंदगी में,
दूरियों की खाई को स्नेह से पाटते चलो।

गुरूर से न जीता है किसी ने दुनिया का,े
अपनों को जीता कर खुद को हारते चलों।

पैसे की दौड़ में अक्सर पीछे छूट जाते है अपने,
शोर से भरी दुनिया में अपनों को पुकारते चलो।

हर मोड़ पर दोराहा होता है मन के संसार में,
तम को नकार कर धर्म को स्वीकारते चलो।

बैठ कर रहने से मंजिले चल कर नहीं आएगी,
मेहनत के कर्मों से ख्वाबों को सँवारते चलों।

नफरतों के कांटे प्रेम से काटते चलो,
छोटी है जिंदगी दिल खोल कर प्यार बाँटते चलों।


------------------------------------------

तुमने दिए कांटे उन्हें मैं फूलों का उन्हें ताज पहनाउंगा
उलाहने जो मिले हमे उसी से जीवन साज बनाउंगा

कहते थे लोग कि तुम कल तक भी यह न कर पाओगे
तुम खुद देखों जरा इसी रोज इसे मैं आज कर जाउंगा

जिन जरूरतों कोे दबा कर तुम मालिक बन बैठे हो
उन्हीं जरूरतो को विरूद्ध तुम्हारें मै आवाज बनाउंगा

परों को काटने से कभी हौसलें नहीं झुका करते
गिरते हौसलों को फिर से मैं परवाज़ बनाउंगा

थमा था शोर जिंदगी का जिस राह जिस मोड़ पर
उसी शोर को दबे कदमों का विजयी आगाज बनाउंगा

टूट कर बिखरेगी जो वो माला मोतियों की होगी
बिखर के जो जुड़ेगा खुशियों का ऐसा समाज बनाउंगा

बिजलियां गिराने का हुनर फखत़ आसमां नहीं जानता “राम”
तख्ता पलट कर सके अपनी कलम से ऐसी गाज बरसाउंगा

--------------------------------------------------

१. विरह की इस शाम का एक खुबसूरत सवेरा हु 
प्रेम की इस खान का एक सिरफिरा पहेरा हु 
कलम के इस दीवाने के मुरीद होंगे लाखो मगर 
मै कल भी सिर्फ तेरा था मैं आज भी सिर्फ तेरा हु। 

२. दर्द न दर्द रहे गर हाथ में तेरा हाथ रहे 
   हर दिन सुहाना हो गर वक्त से ऊपर तेरा साथ रहे। 

३. प्रेम के इस समंदर में एक तुम ही मेरी आस हो 
    ज़िन्दगी से हु दूर लेकिन तुम ही दिल के पास हो 
    तेरे हर इम्तिहान को सर आँखों पर रखते है 
    क्योकि तुम ही मेरी श्रद्धा हो तुम ही मेरा विश्वास हो। 

४.  रग रग में है जो बिखरी वो खुशबु तुम्हारी है 
     मैदान इ इश्क़ की बाज़ी इस दिल ने भी हारी है 
     मुझे यु छोड़ जा बेशक भले पर भूल ना पाओगी 
     तेरे हर शिकवे पर भारी ये मोहब्ब्त हमारी है। 

------------------------------------------------------

जनता तुम जूते बरसाओ, मेरा भ्रष्ट नेता आया है........
भ्रष्टो तुम शर्म से मर जाओ, नाक तुमने कटाया है.......

 
ओ काले कोयले की कालिख लगा इस झूठे चेहरे पर,
लाओ एक जूते की माला सजाओ इनके कांधो पर,
सैर इन्हे गधे पर करवाओ, मेरा भ्रष्ट नेता आया है .....

बंधुओ बांध दो हर तरफ अब एक लोहे की चादर ,
बड़ा डरपोक नेता है चला जाये ना घबराकर ,
सैर इन्हे गांव में करवाओ मेरा भ्रष्ट नेता आया है .....

सजायी है जवा दिलो ने अब यह माला जूतो की,
इन्हे मालूम था आएगी एक दिन रूत कपूतो की,
ढिंढोरा गांव में पिटवाओ मेरा भ्रष्ट नेता आया है ........
भ्रष्टो तुम शर्म से मर जाओ, नाक तुमने कटाया है......


----------------------------------------------------------

1. वो यु ही खुद को होशियार समझते है,
इज्जत क्या मिली परवरदिगार समझते है, 
हैसियत उनकी क्या है वे खुद भी जानते है,
हम तो सिर्फ उनको चौकीदार समझते है.


2. यु डराकर कब तक चलोगे जनाब,
हिम्मत तो कभी देगी जवाब,
हम तो कोई दूसरी राह चुन लेंगे,
फिर पूरोगे कैसे तुम अपने ख्वाब.

-------------------------------------------

हे जीव रूप के शिरोमणि,
क्यों मानवता को कुचल रहा ?
क्यों गरल प्रवाह है उगल रहा,
हैं मानवता कर्तव्य तेरा, 
क्यों मानवता को निगल रहा.
हे जीव रूप के शिरोमणि.................

नारी जाति का एहसान रहा है,
माँ भगिनी जीवन संगिनी
तीनो रूपों की महिमा अनगिनी
जब तक इसका मान रहा है
इश्वर भी मेहरबान रहा है,
इनके मान-सम्मान का सदियों के एहसान का 
हैं रक्षा का कर्तव्य तुम्हारा ,
हे जीव रूप के शिरोमणि...................

सब एक शक्ति की संतान है,
वो भेदभाव से अनजान है,
तरुवर फल से सरोवर जल से 
सब की क्षुधा मिटाता है ,
है भिन्न अगर हम यथार्थ में,
तो ये भेदभाव क्यों नहीं जताता है,
सन्देश सभी धर्मो का मानव सब समान है,
हे जीव रूप के शिरोमणि.......................

परोपकार ही जीवन का मुख्य धर्म पालन है,
सर्वश्रेष्ठ था, सर्वश्रेष्ठ है, सर्वश्रेष्ठ तभी रह पायेगा,
जो शिरोमणि परिभाषा को यथार्थ में निभा पायेगा,
सच्चे अर्थो में वो ही आदर्श मानव कहलायेगा,
हे जीव रूप के शिरोमणि..................

-------------------------------------------------------------
सोचता तो होगा ख़ुदा ,मर्द बना कर कितनी गुस्ताखी की है उसने,
………. हर जगह अत्याचार , व्याभिचार का लगा दिया इन्होने बाज़ार!!
कहीं महिलाएं, बच्चियां तो कहीं, मासूम बच्चे हो रहे हैं इनके शिकार,
……………बहुत रोया होगा ,कई रातों न सोया होगा!!
इंसानियत के इन दुश्मनों को बना कर,
…………मर्द के रूप में हैवान दरिदों को धरती पर लाकर !!
काश ख़त्म हो जाये इनका धरती से वज़ूद ,
………. इन्हें कर दिया जाये नेस्तनाबूद,
नामर्दों को मिटा दिया जाये,
……….. फिर से धरा पर शांति, प्रेम, वफ़ा, करुणा बहाल हो जाये !!
*************************************************************************
//1//
कुछ कर गुजरने की गर तमन्ना उठती हो दिल में
भारत मा का नाम सजाओ दुनिया की महफिल में |
//2//
हर तूफान को मोड़ दे जो हिन्दोस्तान से टकराए
चाहे तेरा सीना हो छलनी तिरंगा उंचा ही लहराए |
//3//
बंद करो ये तुम आपस में खेलना अब खून की होली
उस मा को याद करो जिसने खून से चुन्नर भिगोली |
//4//
किसकी राह देख रहा , तुम खुद सिपाही बन जाना
सरहद पर ना सही , सीखो आंधियारो से लढ पाना |
//5//
इतना ही कहेना काफी नही भारत हमारा मान है
अपना फ़र्ज़ निभाओ देश कहे हम उसकी शान है |
//6//
विकसित होता राष्ट्र हमारा , रंग लाती हर कुर्बानी है
फक्र से अपना परिचय देते,हम सारे हिन्दोस्तानी है |
किसकी राह देख रहा , तुम खुद सिपाही बन जाना
सरहद पर ना सही , सीखो आंधियारो से लड़ पाना!
राणा की संतानों जागो, जागो वीर शिवा के लालों।
फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥
शत-शत आघातों को सहकर माता घायल आज पड़ी है,
विश्व गुरु, सोने की चिड़िया शत्रु सैन्य से आज घिरी है।
घिरी हुई है जौहर ज्वाला, घिरी हुई है गंगा धारा,
घिरा हुआ है आज हिमालय, और घिरा है मधुबन प्यारा,
देखो ना अंधियारा छाए, जागो ओ सूरज के लालों।
फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥
स्वप्न हमारे बंट सकते हैं, पर ममता कैसे बंट जाए?
एक दीप तो बुझ सकता है, राष्ट्रज्वाल कैसे बुझ पाए??
भ्रमित हमें सब कर सकते हैं, मगर सत्य को कौन मिटाए?
छाती चीरी जा सकती है, प्यार मचलता कौन मिटाए??
माँ का प्यार न कभी भुलाना, जागो ओ भारत के बालों।
फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥
पाश्चात्य की चकाचौंध में चुंधिया गयी तुम्हारी आँखें,
अब तो अपनी आँखे खोलो, बुला रही है माँ की आहें।
बुला रहा है नाद त्राहि का, बुला रही है आहत वसुधा,
बुला रही है भगवत-गीता, और बुलाती प्यासी गंगा।
भारत माँ की प्यास बुझाने, आ जाओ अमृत के प्यालों।
फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥
मन की अपने मानो तो|
अपने को पहचानो तो||
जो दुनिया में आये हो,
विघ्नों से लड़ना होगा|
अगर शिखर को पाना है,
तूफां में अड़ना होगा|
जग से लड़कर क्या होगा,
खुद से ही लड़ना होगा|
मन में अपने ठानो तो|
अपने को पहचानो तो||१||
चाहे हों संघर्ष बड़े,
मन को बांधे खड़े रहो |
राह नहीं तो राह गढ़ो,
लेकिन हरदम लड़े रहो|
जीत अभी मिल जायेगी,
इसी भरोसे अड़े रहो|
मन में अपने ठानो तो|
अपने को पहचानो तो||१||
-------------------------------------
जिस पल में हो प्रिय! वास तेरा,
उस पल की आभा क्या कहना।
जिन गीतों में हो नाम तेरा,
उन गीतों का फिर क्या कहना ||
अंतर्मन में हो बसे हुए,
ये भाव नहीं ये तुम ही हो।
ये भाव न मुझसे शब्द हुए,
इन शब्दों में भी तुम ही हो।
जिन बोलों में नाम तेरा,
उन बोलों का फिर क्या कहना ||१||
भेष बदल छुप के आये,
आहट बोली ये तुम ही हो,
खुशियों के मेघ तभी छाये,
आँखें बोलीं ये तुम ही हो।
जिस जीवन में हो प्यार तेरा,
उस जीवन का फिर क्या कहना ||२||
-------------------------------------------
प्रिय अगर मै रूठ जाऊं,
प्यार से मुझको मनाना |
जो कभी भटकूँ दिशा से,
रास्ता मुझको दिखाना ||
रात कितनी भी बड़ी हो,
चेतना मद्धिम पड़ी हो |
जगमगाते-झिलमिलाते,
नेह के दीपक जलाना ||१||
आज मन के तार बोलें,
ये प्रणय के द्वार खोलें |
हृदय है आवास प्रियतम,
प्रीत से इसको सजाना ||२||
----------------------------------------------
लक्ष्य प्राप्ति को निकल पड़े तो पथ में कहाँ विराम है ?
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है। ।
बाधाएं भी क्रम से आयें, हमें लक्ष्य से ये भटकायें।
पर सबका हल एक नहीं है, सोचें समझें फिर सुलझाएं
हर बाधा है एक परीक्षा, यह पथ का संग्राम है।
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है। ।
पहली बाधा स्वर्गलोक से, पर यह कभी विरुद्ध नहीं।
गुरुजन सा सम्मान इसे दो, इस बाधा से युद्ध नही।
इनका लो आशीष चलो फिर जहाँ तुम्हारा धाम है।
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है। ।
दूजी है पाताल लोक से, नष्ट इसे कर दो अविलम्ब।
यही रूप है अहंकार का, ईर्ष्या, लिप्सा लालच दम्भ।
दो बाधाएं पार हो चुकीं, पर चलना अविराम है।
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है। ।
अंतिम मृत्युलोक की बाधा, लक्ष्य निकट तब इसने साधा,
इसे करो न पूर्ण नष्ट तुम, केवल इसको मारो आधा।
सद्गुरु मिल जायेंगे तुमको, बस अब नहीं विराम है।
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है। ।
-------------------------------------------------------
हे नर तेरा मान कहाँ है?
निजता का सम्मान कहाँ है?
भंगुर जीवन पर इठलाता,
सत का अनुसन्धान कहाँ है??
क्षण भर जीवन क्षणिक बसेरा,
उस पर भी माया का घेरा।
जिसको पीकर मस्त हुआ तू,
रक्त हृदय का है वो तेरा।।
बियावान जंगल ये जग है,
कहीं पुष्प कण्टक ये डग है।
भांति-भांति ज्वालाएं घेरें,
इनसे जूझ, बढ़ाना पग है।।
मानव तन उपहार मिला है,
मोक्ष मार्ग का द्वार खिला है,
अब तो सफल बना ले जीवन,
भटक गया तो किसे गिला है।।
-----------------------------------------------
जिस पल में हो एहसास तेरा,
उस पल की आभा क्या कहना।
जिन गीतों में हो नाम तेरा,
उन गीतों का फिर क्या कहना ||
अंतर्मन में हो बसे हुए,
ये भाव नहीं ये तुम ही हो।
ये भाव न मुझसे शब्द हुए,
इन शब्दों में भी तुम ही हो।
जिन बोलों में हो नाम तेरा,
उन बोलों का फिर क्या कहना ||१||
भेष बदल छुप के आये,
आहट बोली ये तुम ही हो,
खुशियों के मेघ तभी छाये,
आँखें बोलीं ये तुम ही हो।
जिस जीवन में हो प्यार तेरा,
उस जीवन का फिर क्या कहना ||२||
--------------------------------------------------------
माँ कहती है तुम हो एक,
फिर क्यों तेरे रूप अनेक?
हम तुमको क्या कहें बताओ |
राम, कृष्ण या अल्ला नेक ||१||
कोई पूरब को मुंह करता,
कोई पश्चिम को ही धरता |
चाहे पूजा या नमाज हो,
ध्यान तुम्हारा ही तो करता ||२||
क्यों हैं तेरे इतने रूप?
दुनिया तो है अँधा कूप |
जात-धर्म की पग-पग हिंसा,
यही जगत का हुआ स्वरुप ||३||
माँ कहती सब तेरी माया,
अलग-अलग रखकर के काया |
जीवन का आदर्श बताया,
मूरख इन्सां समझ न पाया ||४||
----------------------------------------------------------------
हमें कार्यक्रम में अक्सर मंच  संचालन के समय ऐसी शायरियो की आवश्यकता होती है जो दर्शको से ताली बजाने की अपील करे तो लीजिये आज आपके सामने पेश है मेरी कुछ ऐसी ही शायरिया-

1. कव्वाल की शोभा कव्वालियों से होती है 
    गुलाब की शोभा उसकी लालियो से होती है 
    कलाकार की शोभा कलाकारियो से होती है 
   और दर्शको की शोभा उनकी तालियों से होती है। - विपुल

2. पूजा हो मंदिर में तो थाली भी चाहिए 
    गुलशन है गुल का तो माली भी चाहिए है 
    दिल है दिलवाला तो दिलवाली भी चाहिए
   कार्यक्रम है हमारा तो आपकी ताली भी चाहिए- विपुल

3. बिन बूंदो के बारिश का एहसास कैसे होगा 
   जूनून हो दिल में जिसके वो हताश कैसे होगा 
   कार्यक्रम के इस रंग का मिज़ाज़ कैसा है 
   बिन ताली के हमें यह एहसास कैसे होगा। - विपुल

4. खुशियो पर मौज की रवानी रहेगी 
    जिंदगी में कोई न कोई कहानी रहेगी
 हम युँ कार्यक्रम में चार चाँद लगाते रहेंगे 
   गर आपकी तालियों की मेहरबानी रहेगी। - विपुल
बनों ऐसे महायोद्धा   न जाए वार इक खाली
मुख से बोल प्यारे हो, न हो कोई गलत गाली
आंखे हो जिनसे सबके सद्गुण ही नजर आए
उठे तारीफ हेतु हाथ बजे ताली पे फिर ताली। - विपुल

भक्ति के भाव में रत मन भजन को छू लेता है
प्रेम के वश पतंगा लौ की अगन को छू लेता है
मिले साहस किसी को तारीफ की तालियों से तो
जमी से उठ के पत्थर भी गगन को छू लेता है। - विपुल
कार्यक्रम में खुशियों का महोत्सव हो जाएगा,
समंदर में लहरों का महोत्सव हो जाएगा,
शोभा आपकी और हमारी दो दूनी चार होगी
जब आपकी तालियों का महोत्सव हो जाएगा।

बंधन में है दिल एक बहाली तो बनती है
नीरस से माहौल में एक खुशहाली तो बनती है
यह रंग जो बिखरे है पर्दें पर गर समेटने है तो
जनाब आपकी एक ताली तो बनती है।

दिल से दिल को प्यार भरा पैगाम दिया जाए
होंठों से तारीफ का कोई ईनाम दिया जाएं
आपका और हमार फासला मिट जाएगा पल में
गर तालियों का दिल से सलाम दिया जाए।


------------------------------------------------
सौंपकर ज्योति प्रण की आओं मिलकर तम हटाए
साथ बैठे साथ गाए साथ मिलकर गम बटांए
समाज के विकास की बस इतनी सी है बात भर
एक कदम आप बढाओं एक कदम हम बढाए।
- कवि राम लखारा 'विपुल'


काल का विकराल पहिया हिम्मत से चलाना होगा
समाज के इस बाग को मेहनत से फलाना होगा
दिन दूनी और रात चैगुनी गति से गर बढ़ना है
मिलकर के हर घर में ज्ञान का दीप जलाना होगा।
- कवि राम लखारा 'विपुल'

मिल जुल कर हम खुशियों का नया जहान बना ले आओं
प्रेम स्नेह और दया भाव से नव खलिहान बना ले आओं
आओं मिलकर गले लगे और शिकवें सारे भूल जाए
भूल पुरानी बातें हम नया हिंदुस्तान बना ले आओं।

हाथों    मेहंदी,  होठो    लाली,  पैरो   पर    महावर   है
बिंदी,  काजल,  आंखे,  जुल्फे  सबके सब हमलावर है
कहने की यह बात नहीं कि समझाना भी मुश्किल कि
ऐसे  दिलकश हमलों  पर तो जान  प्रिये न्यौछावर है।

अस्ताचल के सूर्य से, सब लेते मुंह फेर।
अपनों की या गैर की, परख करे अंधेर।।

वाणी का सब खेल है, अमरित औ विष दोय।
एक गैर अपना करै, दूजे दूरी होय।।
आसपास के लोग मुझसे परेशान बहुत है
कि मेरी रूह में अभी बाकी ईमान बहुत है

काजल तक भी दाग लगा  सका मुझे
मेरी शख्सियत पर वह भी हैरान बहुत है

बैठ जाता हूं हारकर तो रूठ जाती है
मेरी मंजिल अब तलक नादान बहुत है

पत्थर पत्थर रखने से बनती है बड़ी इमारते
मगर झटके में उसे गिराना आसान बहुत है
 
हजारों दुख दिए पर हंस कर गले लगाती है
मां मेरी मुझ पर मेहरबान बहुत है

मेहनतकश मजदूर को सौ बार मरते देखा है
कौन कहता है इस शहर में धनवान बहुत है

 खुदातू मेजबान हैहिसाब करना सबका
इस जमीं पर तेरे घर के मेहमान बहुत है।