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Thursday, March 30, 2017

राजनीती और मीडिया

विधानसभा चुनाव में जो होना था, सो हो चुका। अब तो सबका ध्यान लोकसभा चुनाव की तरफ है। जहां भाजपा अपनी सफलता से उत्साहित है। वहीं उसके चुनाव प्रबंधक श्री प्रमोद महाजन, श्री अरुण जेटली व श्री सुधांशु मित्तल सरीखे लोग अभी से तलवार की धार पैनी करने में जुट गए हैं। श्री जेटली का श्री अजित जोगी पर ताजा वार इसका एक नमूना है। अब भाजपा और भी आक्रामक होकर चलेगी। सब मानते हैं कि श्रीमती सोनिया गांधी ही उनका मुख्य निशाना होंगी। उनका विदेशी मूल, उनकी हिंदी भाषा पर सीमित पकड़ और राजनैतिक अनुभव की कमी जैसे विषय भाजपा ने अभी से उठाने शुरू कर दिए हैं। भाजपा इस मुद्दे को उछालने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी, यह तय है।
इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में भाजपा ने अच्छी पैंठ बना ली है। एक - दो टीवी चैनल को छोड़कर लगभग सभी चैनलों पर भाजपा की खासी पकड़ है। हिटलर और स्टाॅलिन सिखा गए हैं कि प्रोपेगेण्डा करने के क्या-क्या तरीके होते हैं। यह जरूरी नहीं कि इन चैनलों पर भाजपा का सीधा प्रचार हो, बल्कि उन मुद्दों को उठाकर, जिनसे भाजपा की छवि बनती हो या उन मुद्दों को उठाकर जिनसे इंका की छवि गिरती हो, कोई भी टीवी चैनल बड़ी आसानी से प्रोपेगेण्डा कर सकता है। उदाहरण के तौर पर एक चैनल यह कह सकता है कि भ्रष्टाचार के कांडों में फंसी जयललिता ने कहाऔर दूसरा चैनल यह कह सकता है कि तमिलनाडु की राजनीति में सबसे ताकतवर नेता जयललिता ने कहा।दोनों बातें सच हैं, लेकिन कहने के अंदाज से संदेश अलग-अलग जाते हैं और यही तरीका आज इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में अपनाया जाता है। वाजपेयी जी को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाला मसीहा भी बताया जा सकता है और उनके बारे में यह प्रश्न भी खड़ा किया जा सकता है कि इतने लंबे समय तक विपक्ष में रहने के बावजूद वह कभी किसी भ्रष्ट नेता को पकड़वा क्यूं नहीं पाए या बोफोर्स अथवा चारा घोटाला जैसे मामलों पर बरसों शोर मचाने वाले वाजपेयी जैन हवाला कांड उजागर होने पर खामोश क्यों हो गए? यह तो एक उदाहरण है। ऐसे तमाम उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनसे यह सिद्ध किया जा सकता है कि टीवी रिपोर्ट्स के चयन, उनके प्रस्तुतिकरण में चालाकी से खेल खेलकर किस तरह जनता को गुमराह किया जा सकता है। ये बात दूसरी है कि इन टीवी चैनलों का असर शहरी जनता पर ही ज्यादा पड़ता है। देहात की जनता बुनियादी सवालों से जूझती है।
जहां वाजपेयी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि तमाम झंझावात झेलकर भी वह एकजुट बनी रही, वहीं यह बात भी महत्वपूर्ण है कि राजग सरकार के कार्यकाल में भारत के देहातों में बेरोजगारी बेइंतहा बढ़ी है। सत्ता में पांच साल पूरे कर चुकी सरकार देहातों में रोजगार पैदा करने में पूरी तरह नाकाम रही है। इससे ग्रामीण युवाओं में भारी निराशा है। इसी तरह भ्रष्टाचार के सवाल पर बार-बार अपने पाक-साफ होने की दुहाई देने वाली राजग सरकार कई बार घोटालों में फंसती रही। इसके कार्यकाल में शिखर से लेकर देहात के स्तर तक कहीं भी भ्रष्टाचार में रत्ती भर भी कमी नहीं आई। हिंदू धर्म की रक्षक होने का दावा करके राजनीति में अपना कद बढ़ाने वाली भाजपा ने राम जन्मभूमि, समान नागरिक संहिता और धारा 370 को समाप्त करने के शाश्वत एजेंडे को बार-बार पीछे धकेला है और कई बार तो उससे अपनी दूरी स्वीकारने में संकोच भी नहीं किया है। इसलिए लोग यह सवाल जरूर पूछेंगे कि आखिर भाजपा की विचारधारा है क्या? आज जिस विकास के मुद्दे को लेकर भाजपा उछल रही है, वह विकास का मुद्दा क्या हमेशा ही उसका मुद्दा बना रहेगा? या अपनी नैया डूबती देख वो फिर रामनाम का सहारा लेगी? एक वर्ष पहले गुजरात के स्वाभिमान को जगाने की बात कहने वाले नरेन्द्र मोदी जिस कामयाबी से जीतकर आए, उससे भाजपा ने अपने उन आलोचकों का मुंह बंद कर दिया जो उसके धार्मिक मुद्दों का मखौल बनाते थे। पर प्रश्न है कि क्या श्री मोदी एक वर्ष में गुजरात की जनता को फिर से आर्थिक विकास की पटरी पर ला पाए हैं? अगर नहीं तो फिर क्या केवल भावनाओं की रोटी खिलाकर देहातों की गरीबी और बेरोजगारी को दूर किया जाएगा? ऐसे तमाम सवालों के जवाब देने के लिए भाजपा को तैयार रहना होगा।
पर भाजपाइयों को इन सवालों से ज्यादा चिंता नहीं है। वे लोकसभा के चुनावों को जीता हुआ मानकर चल रहे हैं। उनका मानना है कि श्रीमती सोनिया गांधी को उनके दल के ही बहुत से नेता प्रधानमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहते। पार्टी के कड़े अनुशासन के चलते वे ऐसा कह पाने में संकोच भले ही कर रहे हों, पर उनकी नीयत साफ नहीं है। और यही कारण है कि जिस तत्परता और आक्रामक शैली से श्री प्रमोद महाजन और श्री अरुण जेटली सरीखे लोग भाजपा को जिताने के लिए तत्पर हैं, वैसा एक भी नेता इंका के खेमे में दिखाई नहीं देता। भाजपाई मानते हैं कि इंका के अस्तबल में बूढ़े, थके हुए और आरामतलब घोड़े बंधे हैं। जिनकी फितरत में सत्ता का सुख भोगना तो है, पर मैदान ए जंग में लड़ना नहीं। नई पीढ़ी के नाम पर जब ये बूढ़े घोड़े अपने बेटों को आगे करते हैं तो उससे इंका के कैडर में कोई नए रक्त का संचार नहीं होता, बल्कि इसके विपरीत बचे खुचे कार्यकर्ताओं में निराशा ही फैलती है क्योंकि उन्हें अपना भविष्य अंधकार में दिखता है। इसीलिए वे सुश्री मायावती, श्रीमुलायम सिंह जैसे क्षेत्रीय नेताओं के खेमों की तरफ दौड़ रहे हैं। भाजपाई यह भी मानते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह इंका के पास कोई भी जमीनी संगठन नहीं है और उसके नेताओं में न तो यह क्षमता बची है और न ही उत्साह कि वे अपने दल का जमीनी संगठन पुनस्र्थापित करें। ऐसे में भाजपा को अपना प्रतिद्वंद्वी काफी कमजोर विकेट पर खड़ा दिखाई देता है।
राजग के सहयोगी दल विधानसभा चुनावों में भाजपा की आशातीत सफलता के बाद अब उसका साथ नहीं छोड़ेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं। राजग के सभी घटक लोकसभा का चुनाव एकजुट होकर ही लड़ेंगे, ऐसा न मानने का कोई कारण नहीं है। उधर, इंका अन्य दलों के साथ साझी चुनावी रणनीति बनाने के बारे में अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इस अनिश्चितता के कारण ही उसे छत्तीसगढ़ में मुंह की खानी पड़ी और भविष्य में भी यह अनिश्चितता उसके लिए नुकसानदेह सिद्ध हो सकती है। इसके साथ ही इंका में सबसे बड़ी कमी इस वक्त अनुभवी नेताओं की है। राजनीति की कुटिल चालें और चुनाव जीतने की रणनीति बनाने वाले लोग इंका में या तो बचे नहीं हैं या उनकी सुनी नहीं जाती। इसलिए इंका को आत्मविश्लेषण करने की जरूरत है। क्रिकेट के खेल की तरह चुनाव आखिरी मिनट तक अनिश्चितता की स्थिति में रहता है। अभी काफी लंबा समय बाकी है। दोनों ही दलों के कुछ गुण भी हैं और दोष भी। जहां भाजपा अपने आत्मविश्वास, संगठन, कुशल रणनीति के बल पर जीतने का सपना देख रही है, वहीं इंका को भाजपा के सत्ता में होने का फायदा मिल सकता है और वह सरकार की जमीनी हकीकत को उछालकर आम जनता से जुड़ सकती है बशर्ते उसमें ऐसा करने की इच्छा हो। इच्छा ही नहीं, सफलता के लिए जूझने का माद्दा और आक्रामक तेवर भी होने चाहिए। अभी इतना समय है कि कांग्रेस पूरे देश में उन लोगों को ढूंढकर इकट्ठा करे जिनकी विश्वसनीयता है। जो जमीन से जुड़े हैं। जिनमें नेतृत्व करने की क्षमता है। जिन्होंने समाज के लिए कुछ किया है और जो भाजपा की विचारधारा से इत्तफाक नहीं रखते। ऐसे लोगों की काफी संख्या हर शहर में है। इनमें युवा भी बड़ी तादाद में हैं। ऐसे युवाओं को संगठन में लेकर इंका अपना संगठन भी मजबूत कर सकती है और जनाधार भी। पर इस प्रयास में सबसे ज्यादा मुश्किल इंका को बाहर से नहीं बल्कि भीतर से आएगी। उसके अपने ही लोग इस नई व्यवस्था को चलने नहीं देंगे। क्योंकि इससे उनको अपने अस्तित्व पर खतरा नजर आएगा। पर यह किए बिना इंका की नैया पार लगना मुश्किल है।

आने वाले महीने इस महासंग्राम की तैयारी में देश की जनता को बहुत से राजनैतिक करतब दिखाएंगे। ऐसे में टीवी चैनलों के लिए मसाले की कमी नहीं रहेगी। ऐसे में इस देश के मतदाताओं को बहुत संजीदगी से अपने हित और अहित का ध्यान करते हुए फैसला लेना होगा।

पुलिस और विज्ञानं का जीवन से सीधा रिश्ता है

5 साल की गुड़िया के साथ दरिन्दों ने पाश्विकता से भी ज्यादा बड़ा जघन्य अपराध किया पर दिल्ली पुलिस के सहायक आयुक्त ने 2 हजार रुपये देकर गुड़िया के माँ-बाप को टरकाने की कोशिश की । जब जनआक्रोश सड़कों पर उतर आया तो प्रदर्शनकारी महिला को थप्पड़ मारने से भी गुरेज नहीं किया। इतनी संवेदनशून्य क्यों हो गयी है हमारी पुलिस ? जब जनता के रक्षक ऐसा अमानवीय व्यवहार करें तो जनता किसकी शरण मे जायें ?
आज देश बलत्कार के सवाल पर उत्तेजित है। चैनलों और अखबारों मे इस मुद्दों पर गर्मजोशी मे बहसें चल रही हैं । पर यह सवाल कोई नहीं पूछ रहा कि बलात्कारी कौन हैं ? क्या ये सामान्य अपराधी हैं जो किसी आर्थिक लाभ की लालसा में कानून तोड़ रहे हैं या इनकी मानसिक स्थिति बिगड़ी हुई है। अपराध शास्त्र के अनुसार ये लोग मनोयौनिक अपराधी की श्रेणी में आते हैं। जिनकों ठीक करने  के लिए दो व्यवस्थायें हैं। पहली जब इन्हें अपराध करने के बाद जेल में सुधारा जाय और दूसरी इन्हें अपराध करने से पहले सुधारा जाय। आजादी के बाद हमने व्यवस्था बनाई थी कि हम अपराधी का उपचार करेगें। लेकिन गत 65 वर्षों में हम इसका भी कोई इतंजाम नही कर पाये। तमाम समितियों और आयोगों की सिफारिशें थी कि जेलों में दण्डशास्त्री हुआ करेगें। लेकिन आज तक इनकी नियुक्ति नहीं की गई। इनका काम भी जेलो मे रहने वाले पुलिसनुमा कर्मचारी ही कर रहे हैं । जब गिरफ्तार होकर जेल मे कैद होने वाले अपराधियों के उपचार की यह दशा है तो जेल के बाहर समाज मे रहने वाले ऐसे अपराधियों के सुधार का तो खुदा ही मालिक है। 1977 में जेलों से सजा पूरी करके छूटे लोगों का अध्ययन करने पर चैंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं। जेलों मे रखकर अपराधियों के सुधार के जो दावे तब तक किये जा रहे थे, वे खोखलें सिद्ध हुए। इस स्थिति में आज तक कोई बदलाव नही आया है। ऐसा क्यों हुआ ? इसका एक ही जवाब मिलता है कि हमारे पास अपराधियों के उपचार (सुधार) में सक्षम व अनुभवी विशेषज्ञों का नितांत अभाव है। फिर कैसे घटेगी बलात्कार की घटनायें।
जब-जब देश में कानून व्यवस्था की हालत बिगड़ती हैं। तब-तब पुलिसवालें जनता के हमले का शिकार बनते हैं। सब ओर से एक ही मांग उठती है कि पुलिस नाकारा है, पर यह कोई नहीं पूछता कि राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों का क्या हुआ ? क्यों हम आज भी आपिनवेशिक पुलिस व्यवस्था को ढ़़ो रहे हैं ? 30 वर्ष पहले इस आयोग की एक अहम सिफारिश थी कि पुलिस के प्रशिक्षण को प्रोफेशनल बनाया जाये। उन्हें अपराध शास्त्र जैसे विषय प्रोफेशनलों से सिखाये जायें। जबकि आज पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों में जो लोग नवनियुक्त पुलिस अफसरों को ट्रेनिंग देते हैं, उन्हें खुद ही अपराध शास्त्र की जानकारी नहीं होती। अपराध के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष को जाने बिना हम समाधान नहीं दे सकते। इसलिए पुलिस प्रशिक्षण के संस्थानों मे जाने वाले नौजवान अधिकारी अपने प्रशिक्षण मे रुचि नहीं लेते। भारतीय पुलिस सेवा का प्रोबेशनर तो आई. पी. एस. मे पास होते ही अपने को कानूनविद् मानने लगते हैं । उसकी इन पाठयक्रमों में कोई जिज्ञासा नहीं होती। हो भी कैसे जब उसे प्रशिक्षण देने वाले खुद ही अपराध शास्त्र के विभिन्न पहलूओं को नहीं जानते तो वे अपने प्रशिक्षणार्थियों को क्या सिखायेंगे ?
देश में अपराध शास्त्र के विशेषज्ञ थोक में नहीं मिलते। जो हैं उनकी कद्र नहीं की जाती। इंड़ियन इस्टीटयूट ऑफ क्रिमिनोलोजी एण्ड फोरेन्सिक साइंसिज दिल्ली में ऐसे विशेषज्ञों को एक व्याख्यान का मात्र एक हजार रुपया भुगतान किया जाता है। जबकि कार्पोरेट जगत में ऐसे विशेषज्ञों को लाखों रुपये का भुगतान मिलता है जो उनके अधिकारियों को ट्रेनिंग देते हैं। सी. बी. आई. ऐकेडमी का भी रिकार्ड भी कोई बहुत बेहतर नहीं है। जबकि अपराध शास्त्र एक इतना गंभीर विषय है कि अगर उसे ठीक से पढ़ाया जाये तो पुलिसकर्मी व अधिकारी अपना काम काफी संजीदगी से कर सकते हैं। वे एक ही अपराध के करने वालों की भिन्न-भिन्न मानसिकता की बारीकी तक समझ सकते हैं। वे अपराध से़ पीड़ित लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करने को स्वतः पे्ररित हो सकते हैं। वे अपराधों की रोकथाम में प्रभावी हो सकते हैं । पर दुर्भाग्य से केन्द्र और राज्य सरकारों के गृह मंत्रायालयों ने इस तरफ आज तक ध्यान नहीं दिया। पुलिसकर्मियों के प्रशिक्षण के कार्यक्रम तो देश मे बहुत चलाये जाते हैं, बड़े अधिकारियों को लगातार विदेश भी सीखने के लिए भेजा जाता है, पर उनसे पुलिस वालों की मनोदशा व गुणवत्ता में कोई फर्क नहीं पड़ता।
विज्ञान का जीवन से सीधा नाता है। यह जीवन को बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है। भारत में वैज्ञानिक समझ की हजारों वर्ष पुरानी परपंरा है। जिसे नरअंदाज करने के कारण हम बार-बार धोखा खा रहे हैं और पश्चिम की आयातित वैज्ञानिक सोच पर निर्भर रहकर अपना नुकसान कर रहे हैं। आज शहरी विकास हो, औद्योगिक विकास हो,बांधों का निर्माण हो या न्यूक्लियर रिएक्टर की स्थापना हो, बिना इस बात का ध्यान दिए की जा रही है कि उस क्षेत्र में भूकंप आने की संभावना कितनी प्रबल है घ् ऐसा नहीं है कि भूकंप आने की संभावना का पता न लगाया जा सके। देश में ही ऐसे वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने अपने अध्ययन के आधार पर भारत सरकार को एक दशक पहले ही इस समझ के बारे में प्रस्ताव दिया था। पर उनकी उपेक्षा कर दी गयी। नतीजा आज बार-बार भूकंपों में तबाही मच रही है। पर उससे बचने के ठोस और सार्थक उपायों पर आज भी सरकार की नजर नहीं है।
श्री सूर्यप्रकाश कूपर एक ऐसे ही वैज्ञानिक हैं, जिनकी खोज न केवल चैंकाने वाली होती है, बल्कि प्रकृति के रहस्यों को समझकर जीवन से जोड़ने वाली भी। पर सरकारी तंत्र का हिस्सा न बनने के कारण उनके सार्थक शोधपत्रों को भी वांछित तरजीह नहीं दी जाती। भूकंप के मामले में श्री कपूर का कहना है कि जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया ने जो सीजमिक जोन मैप ऑफ इण्डियापिछले 15 सालों से जारी किया हुआ है और वही भूचाल के विषय में प्रमाणिक आधार माना जाता है, भारी दोषों से भरा है। उदाहरण के तौर पर इस नक्शे में भूचाल की संभावना वाले जो क्षेत्र इंगित किये गये हैं, वे कश्मीर, पंजाब और हिमाचल, उत्तर-पूर्वी राज्यों और उत्तरी गुजरात तक सीमित है। जबकि हमने इन क्षेत्रों के बाहर भी लाटूर, किल्लारी, कोइना, जबलपुर व भ्रदाचलम आदि में भूचालों की भयावहता को झेला है। सरकार की इस नासमझी का कारण यही नक्शा है, जो किसी ठोस सिद्धांत पर आधारित नहीं है। बल्कि तुक्के के आधार पर इसमें निष्कर्ष निकाले गये हैं। दूसरी तरफ भूचाल की सही संभावना जानने का एक ज्यादा प्रमाणिक मापदण्ड है। जिसका आधार है ग्लोबल हीट फ्लो वैल्यू। इस आधार पर जो नक्शा तैयार किया जाता है, वह भी ज्योलिजकल सर्वे ऑफ इण्डिया के द्वारा ही तैयार होता है। फिर भी इस जानकारी को भूचाल की प्रकृति समझने में प्रयोग नहीं किया जा रहा। जबकि इसकी भारी सार्थकता है।
ग्लोबल हीट फ्लो वैल्यूका आधार वह नई वैज्ञानिक खोज है, जिसमें दुनिया के वैज्ञानिकों ने यह माना है कि पृथ्वी के केन्द्र (नाभि) में आठ किमी व्यास का एक न्यूक्लियर फिशन रिएक्टरलगातार चल रहा है। जिसमें से लगातार भारी मात्रा में गर्मी पृथ्वी की सतह पर आती है और वायुमण्डल में निकल जाती है। पृथ्वी सूर्य से जितनी गर्मी लेती है, उससे ज्यादा गर्मी वापस आकाश में फैंकती है। जहाँ इस ऊर्जा की तीव्रता अधिक है, वहाँ ही ज्वालामुखी फटते हैं। जिनकी संख्या दुनिया में 550 से ऊपर है। इनमें वो ज्वालामुखी शामिल नहीं है जो शांत हैं। इसके अलावा लगभग एक लाख गरम पानी के चश्मे भी इसी ऊर्जा के कारण पृथ्वी की सतह पर जगह-जगह सक्रिय हैं, जिनसे गरम पानी के अलावा गर्मी और भाप वायुमण्डल में जाती है। इस ग्लोबल हीट फ्लो वैल्यू मैप (नक्शे)को अगर ध्यान से देखा जाये और पिछले तीन हजार साल के बड़े भूकंपों के भारत के इतिहास पर नजर डाली जाये तो यह साफ हो जायेगा कि जहाँ-जहाँ हीट फ्लो वैल्यू’ 70 मिली वॉट प्रति वर्गमीटर से ज्यादा है, वहीं-वहीं भारी भूकंप आते रहे हैं। कितनी सीधी सी बात है कि जब हमारे पास हीट फ्लो का प्रमाणिक नक्शा मौजूद है, वह भी सरकार की एजेंसी द्वारा तैयार किया गया, फिर हम क्यों उन इलाकों में शहरी विकास, औद्योगिक विकास, बड़े बांध व नाभिकीय रिएक्टरों का निर्माण करते हैं? क्या हमारी सरकार को अपने देश के लोगों की जान और माल की चिंता नहीं? सामान्य जानकारी है कि भूचाल तब आते हैं जब पृथ्वी के अन्दर की यह गर्मी जमा होकर तीव्रता के साथ पृथ्वी की सतह को फाड़ती हुई बाहर निकलती है, ठीक उसी तरह जैसे प्रेशर कुकर में अगर सेफ्टी वॉल्व से भाप न निकाली जाये तो कुकर फट जाता है।

स्वतंत्र आविष्कारक श्री कपूर का कहना है कि अगर गरम पानी के इन चश्मों या कुण्डों पर एक उपकरण, जिसे वाईनरी साइकिल पावर प्लाण्टकहते हैं, लगा दिये जायें, तो यह संयत्र उस गरमी की ही बिजली बना देगा। उससे दो लाभ होंगे, एक तो यह ऊर्जा विनाशकारी होने की वजाय दस हजार छः सौ मेगावाट तक बिजली का उत्पादन कर देगी और दूसरा इसकी जमावट पृथ्वी के भीतर कभी उस सीमा तक नहीं हो पायेगी कि वह भूकंप का कारण बने। सोचने वाली बात यह है कि इतनी सरल सी जानकारी देश के कर्णधारों को रास नहीं आती। वे पश्चिमी देशों की तरफ समाधान की तलाश में भागते हैं और अपनी मेधा को सामने नहीं आने देते। ऐसा नहीं है कि श्री कपूर की बात को हल्के तरीके से लिया जाये। स्वंय तत्कालीन विज्ञान एवं तकनीकि मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने सुनामी के बाद श्री कपूर के संभाषण सिस्मोलॉजी डिवीजनकी कॉन्फ्रेंस में करवाया था। यानि देश के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिकों ने इनकी बात को सुना और सराहा, फिर क्यों उस पर अमल नहीं किया जाता?

भ्रष्टाचार

कर्नाटक विधानसभा के चुनाव परिणामों के विश्लेषण खूब आ चुके। हम उनकी चर्चा नहीं करेंगे। पर यह तो सोचना पड़ेगा कि संसद और सड़कों पर विपक्ष गत् दो वर्षो से यूपीए सरकार के स्तीफे की माँग करता रहा है। ज्यादातर टीवी चैनल भी केन्द्र सरकार के खिलाफ र्मोचा खोले हुए हैं ।
मध्यम वर्गीय लोगों के बीच मौजूदा सरकार की छवि लगातार गिर रही है या गिरायी जा रही है। फिर क्यों कर्नाटक की जनता ने सोनिया गांधी की पार्टी के सिर पर ताज रख दिया ? क्या इसलिए कि कर्नाटक की जनता के लिए भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं था या फिर उन्हें भाजपा का भ्रष्टाचार यूपीए से ज्यादा लगा। पहली बात सही नहीं हो सकती। दूसरी बात अगर सही है तो भाजपा किस नैतिक आधार पर केन्द्र मे भ्रष्टाचार के विरुद्ध दिन- रात तूफान मचाती आ रही है ? इसका अर्थ यह भी नहीं हुआ कि कर्नाटक की जनता कांग्रेस के भ्रष्टाचार को अनदेखा करने को तैयार है। तो फिर कर्नाटक का संदेश क्या है ?
बात सुनने मे कड़वी लगेगी। नैतिकता का झंडा उठाने वाले इस पर भृकुटि टेढी करेंगे। पर अब तो यह ही लगता है कि हम शोर चाहे कितना ही मचा लें, पर  भ्रष्टाचार से हमें कोई परहेज नहीं है। सदाचारी वो नहीं है जिसे मौका ही नहीं मिला। सदाचारी तो वो होता है, जो मौका मिलने पर भी ड़गमगाता नहीं। हम अपने इर्द -गिर्द देखें तो पायेंगे कि ऐसे सदाचारी आज उगंलियों  पर गिने जा सकते हैं। वरना जिसे, जहाँ, जब मौका मिलता है, बिना मेहनत के फायदा उठाने से चूकता नहीं। इसीलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध शोर हम चाहे जितना मचा लें, पर चुनाव मे वोट देने की प्राथमिकताएं अलग रहती हैं। इसलिए मायावती हारती हैं तो मुलायम सिंह यादव जीत जाते हैं। वे हारते हैं, तों बहन जी जीत जाती हैं। करुणानिधि हारते हैं तो जयललिता जीत जाती हैं और जब जयललिता हारती हैं तो करुणानिधि जीत जाते हैं। प्रकाश सिंह बादल हारते हैं तो कैप्टन अमरेन्द्र सिंह जीत जाते हैं, और उनके हारने पर बादल की जीत होती है। हर विपक्षी दल सत्ता पक्ष पर भारी भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाता है। ये नूरा कुश्ती यूँ ही चलती रहती है और टिप्पणीकार, स्तम्भकार और टीवी एंकर उत्तेजना में भरकर ऐसा माहौल बनाते हैं मानो आज जैसा भ्रष्टाचार पहले कभी नहीं हुआ या भविष्य में नहीं होगा। वे आरोपित मंत्रियों, अफसरों का स्तीफा मांगने मे हफ्तों और महीनों गुजार देते हैं। अगर उनकी माँग पर स्तीफे ले भी लिए जाये तो क्या गांरटी है कि उसके बाद देश मे घोटाला नहीं होगा ? मर्ज गहरा है और ऊपरी मरहम से दूर नहीं होगा। इसलिए अब ज्यादा समय और उर्जा घोटालों के उजागर होने पर खर्च करने की बजाय इसके समाधान पर लगाना चाहिए। जब किसी भी टीवी शो पर मैं ये मुद्दा उठाता हूँ तो एंकर बातचीत को मौजूदा घोटाले की ओर वापस ले आते हैं। पर आप भी जानते हैं कि ऐसे सभी हंगामे कुछ दिन तूफान मचाकर शांत हो जाते हैं। कुछ भी नही बदलता।

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हमें  अपनी समझ गहरी बनाने की जरूरत है। जैसे हर रोग के लिए उसका विशेषज्ञ ढूँढा जाता है वैसे ही भ्रष्टाचार से निपटने की समझ रखने वालों को आज तक विश्वास मे नहीं लिया गया। नतीजतन इस भीषण रोग को रोकने के लिए जो भी प्रयास किए जाते हैं, वे सब नाकाम रहते हैं। इसलिए नई सोच की जरूरत है ।
वैसे जहां भी हम रहते हों, अपने-अपने दायरे मे आने वाले लोगो से एक सर्वेक्षण करें और पूछे कि वे विकास चाहते हैं या भ्रष्टाचार मुक्त समाज ? उनसे पूछा जाये कि वे ईमानदार और पुराने ख्यालों का नेता पंसद करते हैं या उसे जो उनके काम करवा दे, चाहे भ्रष्टाचार कितना भी कर ले। जवाब चैंकाने वाले मिलेंगे। दरअसल पूरी तरह भ्रष्टाचार मुक्त कोई समाज या देश आज तक नहीं हुआ। तानाशाही हो या लोकतंत्र, पूजीवादी व्यवस्था हो या साम्यवादी, सरकारी खजाना हमेशा लुटता रहा है। कड़े कानून भी हर नागरिक को ईमानदार बनने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। फिर भी ये सारे प्रयास इसलिए किये जाते हैं कि जनता के मन मे शासन व पुलिस का और दण्ड मिलने का भय बना रहे। ऐसे में अगर हम लगातार सत्ता केन्द्रों पर हमले करके उसे नाकारा और भ्रष्ट सिद्ध करें तो समाज से भ्रष्टाचार तो दूर नहीं होगा, शासन का भय समाप्त हो जायेगा। जिससे समाज में अराजकता फैल सकती है। जो देश की सुरक्षा को खतरा पैदा कर सकती है।

इसलिए जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार के सवाल पर व्यक्तियों को निशाना न बनाकर भ्रष्टाचार विहीन समाज की स्थापना का प्रयास करना चाहिए। जो भी चर्चा हो वह समाधान मूलक होनी चाहिए। जिससे समाज मे हताशा भी कम फैले और आशा के साथ भ्रष्टाचार के जंगल से निकलने के रास्ते खोजे जायें अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो देश की जनता को राहत मिलेगी वरना केवल अशांति और चिंता का वातावरण तैयार होगा जो देश के विकास मे बाधक होगा।
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अमृतसर में अन्ना हजारे ने जनता से पूछा है कि वह बताये कि भ्रष्टाचार से लडाई कैसे लडी जाए ? यह तो ऐसी बात हुई कि भगवान श्री कृष्ण कुरूक्षेत्र के मैदान में अर्जुन से कहे कि तुम मुझे गीता का उपदेश दो। जनता तो बेचारी भ्रष्टाचार की शिकार है। उसे तो खुद समाधान की तलाश है। अगर उसके पास समाधान होता तो देश मे अन्ना हजारे मशहूर कैसे होते ? दरअसल समाधान अन्ना हजारे के पास भी नही है और उनका मकसद समाधान ढूँढना भी नही है। मकसद है समाज मे असन्तोष पैदा करना और दुनिया को यह बताना कि भारत मे प्रजातंत्र विफल हो गया है। वैसे भ्रष्टाचार के विरोध मे उठने वाली जो भी मुहिम प्रचार के साथ उठायी जाती है और जिसका मकसद सत्तारूढ दल को ही निशाना बनाना होता है। उस मुहिम का एक ही लक्ष्य होता है जो सत्ता मे है उन्हे हटाओं और हमे सत्ता सौंपो या हमारे चेलों को सत्ता सौंपो। यह बात दूसरी है ऐसी मुहिम चलाने के बाद जो दल सत्ता मे आता है वो भी भ्रष्टाचार दूर नही कर पाता। वायदे केवल कोरे वायदे बनकर रह जाते हैं। भ्रष्टाचार कभी खत्म नही होता। उसकी मात्रा घटती बढ़ती रहती है।
दरअसल भ्रष्टाचार के विरूद्ध हर मुहिम के असफल होने के कई कारण होते है। जिनमे से सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि भ्रष्टाचार के कारणों की ही सही समझ अभी तक विकसित नही हुई है। हम ढोल की पोल बजा रहे है। जिसे आम जनता भ्रष्टाचार मानती है, वो तो बहुत सतही नमूना है। असली भ्रष्टाचार तो सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग कर जाते है या उद्योगपति करते है और बाकी देश को पता ही नही चलता। पर भीड़ की उत्तेजना को बढ़ाकर डेमोगोगसमाज मे प्रायः अशान्ति पैदा करते हैं। भ्रष्टाचार की मुहिम लेकर चलने वाले अन्ना हजारे खुद यह दावा नही कर सकते जो लोग उन्हे बार-बार मैदान मे खींचकर लाते है उनके दामन भ्रष्टाचार के रंग मे नही रंगे है। पूरी तरह भ्रष्टाचार विहीन समाज कभी कोई हुआ ही नही। उसके स्वरूप अलग अलग हो सकते है। इसलिए भ्रष्टाचार से लडाई के तरीके भी अलग-अलग होंगे। पर जब तक भ्रष्टाचार के कारणों की सही समझ न हो, जब तक इस लड़ाई के लड़ने वाले के दिल राग-द्धेष से मुक्त न हों, जब तक इस लडाई का मकसद किसी एक दल को फायदा पहुचाना और दूसरे को नुकसान पहुंचाना न हो तब तो भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम जोर पकड़ती रहती है। जैसा इण्डिया अगेस्ट करप्शन के साथ हुआ। पर जैसे ही इस मुहिम का नेतृत्व करने वाले के चरित्र का दोहरापन उजागर होता है वैसे ही ऐसी मुहिम ठंडी पड़ जाती है।
कहने को तो हर आदमी भ्रष्टाचार विहीन व्यवस्था चाहता है। पर तकलीफ उठाकर भ्रष्टाचार से लड़ने वाले बिरले ही हाते है। पर वे इसलिए विफल हो जाते है क्योंकि उन्हे समाज के किसी भी ताकतवर वर्ग का समर्थन नही मिलता। ऐसे योद्धा जान हथेली पर लेकर लड़ते है और गुमनामी के अधेरे मे खो जाते हैं और दूसरी तरफ भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के हीरो असलियत में अनेकों समझौते किये हुए पाये जाते हैं। इसलिए वे मशहूर तो हो जाते हैं सफल नहीं।  अभी तो यह भी तय नही कि भ्रष्टाचार समाज शास्त्र का विषय है, अपराध शास्त्र का, मनोविज्ञान का या दर्शन शास्त्र का। जब रोग का स्वरूप ही नही पता तो उसका निदान देने वाला डॉक्टर कहां से आयेगा। नतीजा यह है कि  2500 साल पहले यूनान के शहरों में भ्रष्टाचार के विरूद जनता की जो राय होती थी वह आज भी वैसे की वैसी है। फिर भी न कुछ बदला न कुछ खत्म हुआ। दुनिया अपनी चाल से चल रही है।

इसका अर्थ यह नही कि भ्रष्टाचार से लड़ा न जाए। पर जब भ्रष्टाचार का कारण आर्थिक विकास का मॉडल हो, धर्माचार्यो का आचरण हो, समाज का वर्ग विभाजन हो, प्राकृतिक संसाधनों की लूट हो, इन संसाधनों पर आाम आदमी के नैसर्गिक अधिकारों की उपेक्षा हो तो आप किससे कैसे और कहां तक लड़ेंगे ? जब हम पड़ोसी के घर भगतसिंह पैदा होने की कामना करेंगे, तो बदलाव कैसे आयेगा ? इसलिए जब-जब भ्रष्टाचार के विरूद्ध आवाज उठती है, तो हम जैसे लोगो को, जो तकलीफ उठाकर ऐसी लम्बी लडाई लड़ चुके है, ऐसी आवाज उठाने वालों के मकसद को लेकार तमाम संशय होते हैं। जिनका समाधान न तो अन्ना के पास हैं और न उस जनता के पास जिससे वे समाधान पूछ रहे हैं।

Monday, September 26, 2016

भ्रष्टाचार भारत में एक सांस्कृतिक मसला है.

भ्रष्टाचार भारत में एक सांस्कृतिक मसला है. भारतीयों को इसमें कुछ भी अजीब नहीं लगता. वे भ्रष्टों को सुधारने की कोशिश नहीं करते, उन्हें सहन करते रहते हैं. भारतीय भ्रष्ट क्यों है, इसे समझने के लिए आइए उनके आचरणों और प्रवृतियों पर एक नजर डालें. पहली बात, भारत में धर्म सौदेबाजी का स्वरूप लिए हुए. भारतीय अपने देवी-देवताओं को तरह का चढ़ावा चढ़ाते हैं और बदले में उनसे खास तरह का इनाम चाहते हैं. ऐसा व्यवहार बताता है कि नाकाबिल लोग अपने लिए पक्षपात की कामना कर रहे है. मंदिर से बाहर दुनिया में ऐसी सौदेबाजी को ''रिश्वत'' कहते हैं.

अमीर भारतीय मंदिरों में कैश नहीं देता, वह सोने का मुकुट या ऐसे ही आभूषण वगैरह देता है. उसके उपहार गरीबों का पेट नहीं भर सकते, वे तो देवता के लिए ही होते हैं. उसे लगता है कि अगर यह किसी जरूरतमंद व्यक्ति को मिल गया तो बेकार चला जाएगा. जून 2009 में कर्नाटक के एक मंत्री जी जर्नादन रेड्डी ने तिरूपति मंदिर में 45 करोड़ रूपए मूल्य का सोने और हीरे से बना मुकुट दान किया. भारत के मंदिरों में इतना धन इकट्ठा होता है कि व समझ ही नहीं पाते, इसका क्या करें. मंदिरों के तहखानों में अरबों की संपत्ति पड़ी-पड़ी जंग खा रही है. यूरोपीय भारत आए तो उन्होंने स्कूल बनवाए , लेकिन भारतीय यूरोप-अमेरिका जाते हैं तो वे मंदिर बनवाते है.

भारतीयों को लगता है कि जब भगवान भी कुछ भला करने के लिए चढ़ावा स्वीकार करते है तो हमारे ऐसा करने में क्या हर्ज है. यही वजह है कि भारतीय इतनी आसानी से भ्रष्टाचार में शामिल हो जाते हैं. भारतीय संस्कृति ऐसे आचरण के लिए गुंजाइश बनाती है. इसमें नैतिक तौर पर कलंक जैसी कोई बात नहीं होती. पूर्णतया भ्रष्ट जयललिता इसलिए सत्ता में वापस लौट आती है. पश्चिम में आप इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते. 

भ्रष्टाचार को लेकर भारत की नैतिक अस्पष्टता इसके इतिहास में भी झलकती है. इसका इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा है जिनमें शहरो और राज्यों के पहरेदारों ने पैसे खाकर हमलावरों के लिए गेट खोल दिए और सेनापतियों ने रिश्वत लेकर समर्पण कर दिया. भारतीयों के भ्रष्ट चरित्र की वजह से इस महादेश में युद्ध काफी कम में हुए.

प्राचीन यूनान और आधुनिक यूरोप के मुकाबले भारतीयों ने काफी कम लड़ाइयां लड़ी है. नादिरशाह को तुर्की में भीषण लड़ाई लड़नी पड़ी. मगर भारत में लड़ने की जरूरत ही नहीं पड़ी. सेनाओं को विदा करने के लिए यहां रिश्वत ही काफी थी. पैसे खर्च करने को तैयार कोई भी हमलावर भारत के राजाओं को सत्ता से बेदखल कर सकता था, भले उनके पास दसियों हजार की फौज क्यों न हो. पलासी की लड़ाई में भी भारतीयों की तरफ से कोई प्रतिरोध नहीं हुआ. क्लाइव ने मीर जाफर की मुट्ठी गर्म कर दी और पूरा बंगाल 3000 लोगों के सामने बिछ गया.

सवाल उठता है कि भारत में ऐसी सौदेबाजी की संस्कृति क्यों है, जबकि अन्य सभ्य देशों में यह नहीं है? भारतीयों का इस मान्यता में यकीन नहीं है कि अगर सभी लोग नैतिक आचरण करें तो सबकी उन्नति होगी. उनकी जाति व्यवस्था उन्हें एक-दूसरे से अलग करती है. वे नहीं मानते कि सभी मनुष्य समान है. इसकी परिणति उनके विभाजन और अन्य धर्मो की ओर पलायन में हुई. कई हिंदुओं ने सिख, जैन, बौद्ध आदि के रूप में अपने अलग धर्म बना लिए और बहुत सारे ईसाइयत तथा इस्लाम की ओर चले गए. इस सबका नतीजा यह हुआ कि भारतीयों का एक-दूसरे पर विश्वास नहीं रहा. भारतीय तो यहां कोई रहा ही नहीं. हिंदू , मुस्लिम, ईसाई जितने चाहो ढूंढ लो. भारतीय भूल गए कि 1400 साल पहले वे सब एक ही पंथ के थे. यह विभाजन एक बीमार संस्कृति के रूप में सामने आया. असमानता ने भ्रष्ट समाज को जन्म दिया. नतीजा यह है कि भारत में हर कोई हर किसी के खिलाफ है, सिवाय भगवान के और भी रिश्वतखोर है.

Tuesday, September 6, 2016

यूवा शक्ति देश और समाज की रीढ़ होती है. युवा देश और समाज को नए शिखर पर ले जाते हैं

सौरभ मालवीय
यूवा शक्ति देश और समाज की रीढ़ होती है. युवा देश और समाज को नए शिखर पर ले जाते हैं. युवा देश का वर्तमान हैं, तो भूतकाल और भविष्य के सेतु भी हैं. युवा देश और समाज के जीवन मूल्यों के प्रतीक हैं.  युवा गहन ऊर्जा और उच्च महत्वकांक्षाओं से भरे हुए होते हैं. उनकी आंखों में भविष्य के इंद्रधनुषी स्वप्न होते हैं. समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र के निर्माण में सर्वाधिक योगदान युवाओं का ही होता है. देश के स्वतंत्रता आंदोलन में युवाओं ने अपनी शक्ति का परिचय दिया था. 

भारत एक विकासशील और बड़ी जनसंख्या वाला देश है. यहां आधी जनसंख्या युवाओं की है. देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या की आयु 35 वर्ष से कम है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है. यहां के लगभग 60 करोड़ लोग 25 से 30 वर्ष के हैं. यह स्थिति वर्ष 2045 तक बनी रहेगी. विश्व की लगभग आधी जनसंख्या 25 वर्ष से कम आयु की है. अपनी बड़ी युवा जनसंख्या के साथ भारत अर्थव्यवस्था नई ऊंचाई पर जा सकता है. परंतु इस ओर भी ध्यान देना होगा कि आज देश की बड़ी जनसंख्या बेरोजगारी से जूझ रही है. भारतीय संख्यिकी विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ रही है. देश में बेरोजगारों की संख्या 11.3 करोड़ से अधिक है. 15 से 60 वर्ष आयु के 74.8 करोड़ लोग बेरोजगार हैं, जो काम करने वाले लोगों की संख्या का  15 प्रतिशत है. जनगणना में बेरोजगारों को श्रेणीबद्ध करके गृहणियों, छात्रों और अन्य में शामिल किया गया है. यह अब तक बेरोजगारों की सबसे बड़ी संख्या है. वर्ष 2001 की जनगणना में जहां 23 प्रतिशत लोग बेरोजगार थे, वहीं 2011 की जनगणना में इनकी संख्या बढ़कर 28 प्रतिशत हो गई. बेरोजगार युवा हताश हो जाते हैं. ऐसी स्थिति में युवा शक्ति का अनुचित उपयोग किया जा सकता है. हताश युवा अपराध के मार्ग पर चल पड़ते हैं. वे नशाख़ोरी के शिकार हो जाते हैं और फिर अपनी नशे की लत को पूरा करने के लिए अपराध भी कर बैठते हैं. इस तरह वे अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं. देश में हो रही 70 प्रतिशत आपराधिक गतिविधियों में युवाओं की संलिप्तता रहती है.

देखने में आ रहा है कि युवाओं में नकारात्मकता जन्म ले रही है.  उनमें धैर्य की कमी है. वे हर वस्तु अति शीघ्र प्राप्त कर लेना चाहते हैं. वे आगे बढ़ने के लिए कठिन परिश्रम की बजाय शॊर्टकट्स खोजते हैं. भोग विलास और आधुनिकता की चकाचौंध उन्हें प्रभावित करती है. उच्च पद, धन-दौलत और ऐश्वर्य का जीवन उनका आदर्श बन गए हैं. अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करने में जब वे असफल हो जाते हैं, तो उनमें चिड़चिड़ापन आ जाता है. कई बार वे मानसिक तनाव का भी शिकार हो जाते हैं. युवाओं की इस नकारत्मकता को सकारत्मकता में परिवर्तित करना होगा.

यदि युवाओं को कोई उपयुक्त कार्य नहीं दिया गया, तब मानव संसाधनों का भारी राष्ट्रीय क्षय होगा. उन्हें किसी सकारात्मक कार्य में भागीदार बनाया जाना चाहिए. यदि इस मानव शक्ति की क्रियाशीलता को देश की विकास परियोजनाओं में प्रयुक्त किया जाए, तो यह अद्भुत कार्य कर सकती है. जब भी किसी चुनौती का सामना करने के लिए देश के युवाओं को पुकारा गया, तो वे पीछे नहीं रहे. प्राकृतिक आपदाओं के समय युवा आगे बढ़कर अपना योगदान देते हैं, चाहे भूकंप हो या बाढ़. युवाओं ने सदैव पीड़ितों की सहायता में दिन-रात परिश्रम किया.

युवाओं के उचित मार्गदर्शन के लिए अति आवश्यक है कि उनकी क्षमता का सदुपयोग किया जाए.  उनकी सेवाओं को प्रौढ़ शिक्षा तथा अन्य सराकारी योजनाओं के तहत चलाए जा रहे अभियानों में प्रयुक्त किया जा सकता है. वे सरकार द्वारा सुनिश्चित लक्ष्यों की प्राप्ति के दायित्व को वहन कर सकते हैं. तस्करी, काला बाजारी, जमाखोरी जैसे अपराधों पर अंकुश लगाने में उनकी सेवाएं ली जा सकती हैं. युवाओं को राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगाया जाए. राष्ट्र निर्माण का कार्य सरल नहीं है. यह दुष्कर कार्य है. इसे एक साथ और एक ही समय में पूर्ण नहीं किया जा सकता. यह चरणबद्ध कार्य है. इसे चरणों में विभाजित किया जा सकता है. युवा इस श्रेष्ठ कार्य में अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार भाग ले सकते हैं. ऐसी असंख्य योजनाएं, परियोजनां और कार्यक्रम हैं, जिनमें युवाओं की सहभागिता सुनिश्चत की जा सकती है. युवा समाज में समाजिक, आर्थिक और नवनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. वे समाज में प्रचलित कुप्रथाओं और अंधविश्वास को समाप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं. देश में दहेज प्रथा के कारण न जाने कितनी ही महिलाओं पर अत्याचार किए जाते हैं, यहां तक कि उनकी हत्या तक कर दी जाती है. महिलाओं के प्रति यौन हिंसा से तो देश त्रस्त है. नब्बे साल की वॄद्धाओं से लेकर कुछ दिन की मासूम बच्चियों तक से दुष्कर्म कर उनकी हत्या कर दी जाती है. डायन प्रथा के नाम पर महिलाओं की हत्याएं होती रहती हैं. अंधविश्वास में जकड़े लोग नरबलि तक दे डालते हैं. समाज में छुआछूत, ऊंच-नीच और जात-पांत की खाई भी बहुत गहरी है. दलितों विशेषकर महिलाओं के साथ अमानवीयता व्यवहार की घटनाएं भी आए दिन देखने और सुनने को मिलती रहती हैं, जो सभ्य समाज के माथे पर कलंक समान हैं. आतंकवाद के प्रति भी युवाओं में जागृति पैदा करने की आवश्यकता है. भविष्य में देश की लगातार बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने के लिए अधिक खाद्यान्न की आवश्यकता होगी. कृषि में उत्पादन के स्तर को उन्नत करने से संबंधित योजनाओं में युवाओं को लगाया जा सकता है. इससे जहां युवाओं को रोजगार मिलेगा, वहीं देश और समाज हित में उनका योगदान रहेगा.

केवल राष्ट्रीय युवा दिवस मनाकर स्वामी विवेकानन्द जी के स्वप्न को साकार नहीं किया किया जा सकता और न ही युवाओं के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह किया जा सकता है. उल्लेखनीय है कि विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार वर्ष 1985 को अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया गया.  पहली बार वर्ष 2000 में अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन आरंभ किया गया था. संयुक्त राष्ट्र ने 17 दिसंबर 1999 को प्रत्येक वर्ष 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी. अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का अर्थ है कि सरकार युवा के मुद्दों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे. भारत में इसका प्रारंभ वर्ष 1985 से हुआ, जब सरकार ने स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस पर अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की. युवा दिवस के रूप में स्वामी विवेकानन्द का जन्मदिवस चुनने के बारे में सरकार का विचार था कि स्वामी विवेकानन्द का दर्शन एवं उनका जीवन भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है. इस दिन देश भर के विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में कई प्रकार के कार्यक्रम होते हैं, रैलियां निकाली जाती हैं, विभिन्न प्रकार की स्पर्धाएं आयोजित की जाती है, व्याख्यान होते हैं तथा विवेकानन्द साहित्य की प्रदर्शनियां लगाई जाती हैं.
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं का आह्वान करते हुए कठोपनिषद का एक मंत्र कहा था-
 'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।'
अर्थात उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक कि अपने लक्ष्य तक न पहुंच जाओ.'

निसंदेह, युवा देश के विकास का एक महत्वपूर्ण अंग है. युवाओं को देश के विकास के लिए अपना सक्रिय योगदान प्रदान करना चाहिए. समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में युवाओं को सम्मिलित करना अति महत्वपूर्ण है तथा इसे यथाशीघ्र एवं व्यापक स्तर पर किया जाना चाहिए. इससे एक ओर तो वे अपनी सेवाएं देश को दे पाएंगे, दूसरी ओर इससे उनका अपना भी उत्थान होगा.

Friday, August 26, 2016

कविता

बलात् कर्म हुआ, 
एक धीर चरित्र नारी से,
जतन सहस्त्र किये उसने ,
पर बच ना सकी अत्याचारी से,
जिस दिन यह काला काम हुआ ,
पुरूष कुल पूरा बदनाम हुआ

जिस पौरूष की महिमा, इतिहास ने गायी थी सदा अमर
उसी पौरूष ने आज समझो, खोदी थी अपनी ही कबर

अब कोई तुम्हारें बाजुओं की, यश गाथा नहीं गा पाएगा 
ऐसी यशगाथा गाने से, सर अतीत का भी झुक जाएगा
जिस नारी रक्षा का जिम्मा, लिया था हमने हाथ में 
उस नारी को बेच दिया हमने, काली अंधेरी रात में

अदालती तौर पर न्याय , मिल गया था उस नारी को
उम्रकैद की सजा भुगतनी थी, अब अत्याचारी को

अपराध बोध से दिल डोला ,
आँखों में आँसू लिये बोला,
“हाय! मैनें कैसा अत्याचार किया ,
कुल को अपने शर्मसार किया,

क्षणिक भावना के प्रवाह में, मैनें बेची अपनी खुद्दारी थी
खुद तो उम्रकैद पायी, उसकी भी अस्मिता उजाड़ी थी

न्याय मिला तो क्या हुआ ,
जीवन उसका तबाह हुआ,
जिस वक्त मदद समाज की उसने ज्यादा चाही थी ,
उसी समाज ने की उसे अब मनाही थी,

उस अत्याचारी पुरूष ने केवल, इक बार उससे बलात् किया
पर विष व्यंग्य के बाणों से, समाज ने सदा बलात् किया

“दोष मेरा कोई बतला दो ,
अपराध मुझे कोई समझा दो,
मैनें तो उसका प्रतिकार किया ,
जब उसने अत्याचार किया,


मैं अबला यथा सामथ्र्य, बचाव अपना कर पायी थी
पर उस भेडि़ये के चंगुल से, बच फिर भी ना पायी थी
बीच सड़क में जब, मैं घायल पड़ी थी लाचार
तब मैनें की थी पथिकों से, एक मदद की पुकार

मैं दर्द से हुँ मर रही ,
विनती सभी से कर रही,
पर वे ना कोई इंसान थे ,
लगते सारे पाषाण थे,

आज पड़ी मैं यहाँ पर, कल कोई होगा तुम्हारा अपना
अब सोच समझ कर करों, तुम मेरे दर्द की कल्पना
आज मुझे बचा लो तुम, इलाज मेरा तुम करवा दो
समय रहते मुझे कोई, अस्पताल तो पहुँचा दो

घंटो पड़ी रही इस आस में ,
आएगा कोई बचाव में,
टूट गया मेरा विश्वास ,
तब मैनंे ली एक अंतिम श्वास,
जो अब तक समाज की बेटी थी ,
वो मृत होकर अब लेटी थी,

मैनें पायी मौत दर्दनाक, नहीं अपने कर्मो से 
जिंदगी की जंग, मैं हारी थी बेशर्मों से
वों अत्याचारी केवल ना, सजा का हकदार था
यह समाज भी मेरी मौत का, बराबर हिस्सेदार था

मैं घायल पड़ी राह में, दी भगवान की मैने दुहाई थी
पर मेरी मदद की उन लोगो ने, जहमत नहीं उठाई थी
दूजे दिन उन्हीं लोगों ने, छिड़का नमक मेरे घावों पर
हाथ में मोमबत्ती लिये, वे निकल पड़े थें उन राहो पर।

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नफरतों के कांटे प्रेम से काटते चलो,
छोटी है जिंदगी दिल खोल कर प्यार बाँटते चलों।

आसमान में छाए रहेंगे सदा बादल श्वेत और श्याम,
दुःख के शूलों में से खुशियों के फूल छाँटते चलो।

अपनों से बैर ना रहे कभी जिंदगी में,
दूरियों की खाई को स्नेह से पाटते चलो।

गुरूर से न जीता है किसी ने दुनिया का,े
अपनों को जीता कर खुद को हारते चलों।

पैसे की दौड़ में अक्सर पीछे छूट जाते है अपने,
शोर से भरी दुनिया में अपनों को पुकारते चलो।

हर मोड़ पर दोराहा होता है मन के संसार में,
तम को नकार कर धर्म को स्वीकारते चलो।

बैठ कर रहने से मंजिले चल कर नहीं आएगी,
मेहनत के कर्मों से ख्वाबों को सँवारते चलों।

नफरतों के कांटे प्रेम से काटते चलो,
छोटी है जिंदगी दिल खोल कर प्यार बाँटते चलों।


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तुमने दिए कांटे उन्हें मैं फूलों का उन्हें ताज पहनाउंगा
उलाहने जो मिले हमे उसी से जीवन साज बनाउंगा

कहते थे लोग कि तुम कल तक भी यह न कर पाओगे
तुम खुद देखों जरा इसी रोज इसे मैं आज कर जाउंगा

जिन जरूरतों कोे दबा कर तुम मालिक बन बैठे हो
उन्हीं जरूरतो को विरूद्ध तुम्हारें मै आवाज बनाउंगा

परों को काटने से कभी हौसलें नहीं झुका करते
गिरते हौसलों को फिर से मैं परवाज़ बनाउंगा

थमा था शोर जिंदगी का जिस राह जिस मोड़ पर
उसी शोर को दबे कदमों का विजयी आगाज बनाउंगा

टूट कर बिखरेगी जो वो माला मोतियों की होगी
बिखर के जो जुड़ेगा खुशियों का ऐसा समाज बनाउंगा

बिजलियां गिराने का हुनर फखत़ आसमां नहीं जानता “राम”
तख्ता पलट कर सके अपनी कलम से ऐसी गाज बरसाउंगा

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१. विरह की इस शाम का एक खुबसूरत सवेरा हु 
प्रेम की इस खान का एक सिरफिरा पहेरा हु 
कलम के इस दीवाने के मुरीद होंगे लाखो मगर 
मै कल भी सिर्फ तेरा था मैं आज भी सिर्फ तेरा हु। 

२. दर्द न दर्द रहे गर हाथ में तेरा हाथ रहे 
   हर दिन सुहाना हो गर वक्त से ऊपर तेरा साथ रहे। 

३. प्रेम के इस समंदर में एक तुम ही मेरी आस हो 
    ज़िन्दगी से हु दूर लेकिन तुम ही दिल के पास हो 
    तेरे हर इम्तिहान को सर आँखों पर रखते है 
    क्योकि तुम ही मेरी श्रद्धा हो तुम ही मेरा विश्वास हो। 

४.  रग रग में है जो बिखरी वो खुशबु तुम्हारी है 
     मैदान इ इश्क़ की बाज़ी इस दिल ने भी हारी है 
     मुझे यु छोड़ जा बेशक भले पर भूल ना पाओगी 
     तेरे हर शिकवे पर भारी ये मोहब्ब्त हमारी है। 

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जनता तुम जूते बरसाओ, मेरा भ्रष्ट नेता आया है........
भ्रष्टो तुम शर्म से मर जाओ, नाक तुमने कटाया है.......

 
ओ काले कोयले की कालिख लगा इस झूठे चेहरे पर,
लाओ एक जूते की माला सजाओ इनके कांधो पर,
सैर इन्हे गधे पर करवाओ, मेरा भ्रष्ट नेता आया है .....

बंधुओ बांध दो हर तरफ अब एक लोहे की चादर ,
बड़ा डरपोक नेता है चला जाये ना घबराकर ,
सैर इन्हे गांव में करवाओ मेरा भ्रष्ट नेता आया है .....

सजायी है जवा दिलो ने अब यह माला जूतो की,
इन्हे मालूम था आएगी एक दिन रूत कपूतो की,
ढिंढोरा गांव में पिटवाओ मेरा भ्रष्ट नेता आया है ........
भ्रष्टो तुम शर्म से मर जाओ, नाक तुमने कटाया है......


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1. वो यु ही खुद को होशियार समझते है,
इज्जत क्या मिली परवरदिगार समझते है, 
हैसियत उनकी क्या है वे खुद भी जानते है,
हम तो सिर्फ उनको चौकीदार समझते है.


2. यु डराकर कब तक चलोगे जनाब,
हिम्मत तो कभी देगी जवाब,
हम तो कोई दूसरी राह चुन लेंगे,
फिर पूरोगे कैसे तुम अपने ख्वाब.

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हे जीव रूप के शिरोमणि,
क्यों मानवता को कुचल रहा ?
क्यों गरल प्रवाह है उगल रहा,
हैं मानवता कर्तव्य तेरा, 
क्यों मानवता को निगल रहा.
हे जीव रूप के शिरोमणि.................

नारी जाति का एहसान रहा है,
माँ भगिनी जीवन संगिनी
तीनो रूपों की महिमा अनगिनी
जब तक इसका मान रहा है
इश्वर भी मेहरबान रहा है,
इनके मान-सम्मान का सदियों के एहसान का 
हैं रक्षा का कर्तव्य तुम्हारा ,
हे जीव रूप के शिरोमणि...................

सब एक शक्ति की संतान है,
वो भेदभाव से अनजान है,
तरुवर फल से सरोवर जल से 
सब की क्षुधा मिटाता है ,
है भिन्न अगर हम यथार्थ में,
तो ये भेदभाव क्यों नहीं जताता है,
सन्देश सभी धर्मो का मानव सब समान है,
हे जीव रूप के शिरोमणि.......................

परोपकार ही जीवन का मुख्य धर्म पालन है,
सर्वश्रेष्ठ था, सर्वश्रेष्ठ है, सर्वश्रेष्ठ तभी रह पायेगा,
जो शिरोमणि परिभाषा को यथार्थ में निभा पायेगा,
सच्चे अर्थो में वो ही आदर्श मानव कहलायेगा,
हे जीव रूप के शिरोमणि..................

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सोचता तो होगा ख़ुदा ,मर्द बना कर कितनी गुस्ताखी की है उसने,
………. हर जगह अत्याचार , व्याभिचार का लगा दिया इन्होने बाज़ार!!
कहीं महिलाएं, बच्चियां तो कहीं, मासूम बच्चे हो रहे हैं इनके शिकार,
……………बहुत रोया होगा ,कई रातों न सोया होगा!!
इंसानियत के इन दुश्मनों को बना कर,
…………मर्द के रूप में हैवान दरिदों को धरती पर लाकर !!
काश ख़त्म हो जाये इनका धरती से वज़ूद ,
………. इन्हें कर दिया जाये नेस्तनाबूद,
नामर्दों को मिटा दिया जाये,
……….. फिर से धरा पर शांति, प्रेम, वफ़ा, करुणा बहाल हो जाये !!
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//1//
कुछ कर गुजरने की गर तमन्ना उठती हो दिल में
भारत मा का नाम सजाओ दुनिया की महफिल में |
//2//
हर तूफान को मोड़ दे जो हिन्दोस्तान से टकराए
चाहे तेरा सीना हो छलनी तिरंगा उंचा ही लहराए |
//3//
बंद करो ये तुम आपस में खेलना अब खून की होली
उस मा को याद करो जिसने खून से चुन्नर भिगोली |
//4//
किसकी राह देख रहा , तुम खुद सिपाही बन जाना
सरहद पर ना सही , सीखो आंधियारो से लढ पाना |
//5//
इतना ही कहेना काफी नही भारत हमारा मान है
अपना फ़र्ज़ निभाओ देश कहे हम उसकी शान है |
//6//
विकसित होता राष्ट्र हमारा , रंग लाती हर कुर्बानी है
फक्र से अपना परिचय देते,हम सारे हिन्दोस्तानी है |
किसकी राह देख रहा , तुम खुद सिपाही बन जाना
सरहद पर ना सही , सीखो आंधियारो से लड़ पाना!