हे राम .......... शायद नही गाँधी होते तो अब कहते हाय राम..........२अक्तुबर को एक बार फिर जयंती के नाम पर महात्मा गाँधी याद किये गये ......बिलासपुर के कलेक्टोरेट परिसर में बापू कि प्रतिमा एक समारोह के जरिये लोकार्पित करवाई गई .....विधानसभा अध्यछ की मौजूदगी में बापू को याद करने की रस्म पूरी हुई .......सबने बापू के बताये आदर्शो पर चलने की कसमे खाई ....सत्य,अहिंसा के मार्ग पर चलकर गाँधी को हमेशा याद करने का भरोसा एक दूसरे को दिलाया लेकिन बापू की उस दुर्दशा का ख्याल किसी के जेहेन में भी नही आया जो शहर के समारोह स्थल से महज १८ किलोमीटर की दूरी पर ग्राम गनियारी में है ........यहा बापू की प्रतिमा खुद की बदहाली पर आंसू बहा रही थी .... प्रतिमा देख कर यकीन हो गया की बापू को इस गाव के लोग याद नही करते ......सडक के किनारे ग्राम पंचायत के परिसर में लगी प्रतिमा पर यक़ीनन हर गुजरने वाले की नजरे पड़ती होंगी लेकिन भीड़ की राजनीती करने वालो ने कभी रूककर ये आवाज नही लगाई की महात्मा की सूरत इतनी बिगड़ी बिगड़ी सी क्यों है......शायद यहा आवाज लगाते तो सुनने के लिए ना तमाशाई थे ना मिडिया वालो का मेला....हां गाव की जगह प्रतिमा शहर में होती तो कुछ लोगो को हल्ला मचाकर मिडिया में छपने का अवसर जरुर मिल जाता .....मैने गाव के कुछ जागरूक लोगो से बातचीत की तो पता चला की बरसो से बापू की ओर किसी ने नही देखा ......बताने वाले को भी शायद शर्म नही आई .....गाव का जागरूक उपसरपंच जितेन्द्र राज बापू की दुर्दशा पर बेबाकी से बोलता रहा ......बापू के प्रति खुद के कर्तव्यो को भूल चूका उपसरपंच विरोधी सरपंच की बातो बातो में बखिया उधेड़ता रहा ....चंद रुपयों की माला खरीदकर बापू की बदहाल प्रतिमा के गले में उपसरपंच नही डाल सका .....हम सारी दुर्दशा को देखकर वापस शहर लौटने लगे तो उपसरपंच ने हमे चाय पिला दी ...जेब से पर्स निकालकर उस जागरूक इन्सान ने दुकानदार को रूपये दिए .....रास्ते में हमने सोचा जिस उपसरपंच ने बापू को १० रूपये की माला खरीदकर नही पहनाई उसने हमको १८ रूपये की चाय केसे पिला दी ...? थोड़ी देर में उस सज्जन का स्वार्थ भरा चेहरा हमारी आँखों के शामने था....बापू पर खर्च किये गए १० रूपये का रिटर्न नही था....हम १८ रूपये की बदले उसे पब्लिसिटी देते .....सोचते सोचते हम वापस शहर लौट आये .....ये ही बापू के प्रति उन लोगो की सही श्रदांजली है.
Saturday, August 6, 2016
समाज का नजरिया
बुलंदशहर काण्ड कोई अकेली घटना नहीं है। यह किसी गैंग की कारिस्तानी नहीं है। और इसे न तो कोई मुख्यमंत्री रोक सकता है , न कोई प्रधानमंत्री। यह आइसोलेशन में घटी घटना नहीं है।
रिक्शावाला जब किसी महिला सवारी को बिठाता है तो देखिये उसकी आँखों में लालच का पानी। एक ऑटो ड्राइवर जब किसी युवती या बच्ची को बिठाता है तो देखिये उसकी नजर। वह आधा वक्त मिरर में ही देखता रहता है। बस कंडक्टर, ड्राइवर को देखिये, हवस होती है उनकी आँखों में। न न। जो रेप नहीं करता या नहीं किया, वह भी रेपिस्ट होता है। स्त्रियां समझती है।
दूर मत जाइये, अपने पास के बाजार में सब्जी वाले लौंडो की बातें सुनिये, फल बेचने वाले लड़को की बाते सुनिये, उनके द्विअर्थी संवाद सुनिये , केला, बाबूगोशा, नासपाती, संतरा के कई कई मांयने बनाये होते हैं। वे रिपीटेडली रेप करते हैं, बातों से, नज़रों से। स्त्रियां रोज़ झेलती हैं।
दूर मत जाइये, अपने पास के बाजार में सब्जी वाले लौंडो की बातें सुनिये, फल बेचने वाले लड़को की बाते सुनिये, उनके द्विअर्थी संवाद सुनिये , केला, बाबूगोशा, नासपाती, संतरा के कई कई मांयने बनाये होते हैं। वे रिपीटेडली रेप करते हैं, बातों से, नज़रों से। स्त्रियां रोज़ झेलती हैं।
स्कूल की बच्चियों से पूछिये, कैसे देखता हैं उन्हें गार्ड, स्कूल बस का कंडक्टर, ड्राइवर, माली और उनका टीचर भी। स्कूल टीचर से पूछिये, कहाँ कहाँ कैसे कैसे बचती हैं वे। काम वाली बाइयों से पूछिये। बैंक में काम करने वाली स्मार्ट वुमेन से पूछिये, पुलिस में काम करने वाली एम्पावर्ड वुमेन से पूछिये, सब टारगेट हैं। और उन्हें कोई एलियन टारगेट नहीं कर रहा।
अपने आसपास देखिये। रेल में देखिये। मेट्रो में देखिये। हवाईअड्डे पर देखिये। किसी अकेली लड़की को घूरती नज़रों को देखिये। शरीफ लोग स्कैन कर लेते हैं उन्हें। ये सब एक तरह से रेप ही है। स्त्रियां रोज़ गुज़रती हैं इस पीड़ा से।
देखिये कभी अपनी पुलिस को भी। स्त्रियों के प्रति उनका नजरिया कभी अनौपचारिक बातचीत में सुनिये। घर से निकलने वाली हर औरत उनके लिए ख़राब है, और घर के भीतर वाली औरतें चीज़।
यह समस्या क़ानून व्यवस्था की नहीं है। यह शिक्षा की भी नहीं है। यह समस्या सोसल कंडीशनिंग की है। जहाँ चारो ओर केवल यही सिखाया जाता है कि स्त्री केवल स्त्री है। उपभोग की चीज़ है। इसका न किसी पोलिटिकल पार्टी से सम्बन्ध है, न किसी राज्य से। सब जगह एक ही सोच है। स्त्री एक चीज़ है। रोज़ ही बुलंदशहर, रोज़ ही निर्भया काण्ड होता है हमारे बीच। यह कोई ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम नहीं है कि पुलिस पेट्रोलिंग, मुखबिर से, इंटेलिजेंस के सपोर्ट से रोक लेंगे आप।
और हाँ , कभी लोकल संगीत को देख लीजिये, किसी भी भाषा में देख लीजिये, उत्तर से दक्खिन तक, पूरब से पश्चिम तक, कितना गन्दा है वह, कितना हिंसक है वह । साथ ही , कितनी सहजता से उपलब्ध है पोर्न। ये सब कॉकटेल बना रहे हैं। समाज को हिंसक बना रहे हैं और बलात्कारी पैदा कर रहे हैं।
और हाँ , कभी लोकल संगीत को देख लीजिये, किसी भी भाषा में देख लीजिये, उत्तर से दक्खिन तक, पूरब से पश्चिम तक, कितना गन्दा है वह, कितना हिंसक है वह । साथ ही , कितनी सहजता से उपलब्ध है पोर्न। ये सब कॉकटेल बना रहे हैं। समाज को हिंसक बना रहे हैं और बलात्कारी पैदा कर रहे हैं।
और हम सब शिकार होंगे, plz save indian women's n change ur mind... N iss par rajneeti karana band kare ye partiya koi v party jaan bhujh k nhi karati h n ye hum sabhi ko khud me change lane se sab badal jayega... So pls respect girls n women.....
www.mainstree.com
Tuesday, August 2, 2016
कैसे जानूँ कि मैं सही हूँ?
प्रश्न: सर, आपने कहा कि बाहरी ताकतों के इशारों पर मत नाचो, अपनी समझ के अनुसार चलो। पर अगर अपनी समझ के अनुसार चलूँ तो क्या प्रमाण है इस बात का कि जो होगा वो सही ही होगा? मैं कैसे जानूँ कि अगर मैं अपनी समझ से काम कर रहा हूँ तो मैं सही हूँ? कैसे पता?
वक्ता: तुम्हें अभी कैसे पता है कि जो हो रहा है वो ठीक है? तुम्हें अभी सही और ग़लत का कैसे पता है? अभी तुम्हें सही और गलत का बस इतना ही पता है कि किसी और ने तुम्हें सिखा दिया है कि क्या सही है और क्या गलत और तुमने मान लिया है कि अगर ऐसा हो जाए तो सही होता है, और ऐसा हो जाए तो गलत होता है। अब ये तो बड़ी गहरी बीमारी हो गयी कि सही और गलत भी वही है जो किसी और ने बता दिया। हमारे सही और ग़लत भी हमारे नहीं हैं, आयातित हैं। और अलग-अलग लोगों के सही और ग़लत उनके अपने दृष्टिकोण हैं। तुमने ये कैसे मान लिया कि वो सही और ग़लत जो तुम्हें सिखाये गए हैं वो सही ही हैं? तुम्हें सिखाया गया कि सफ़लता सही है और असफ़लता ग़लत है। तुम्हें सिखाया गया है कि इस प्रकार की नैतिकता सही है और उस प्रकार की अनैतिकता ग़लत है। तुम्हें कैसे पता कि सही और ग़लत जैसा कुछ होता भी है? क्या तुम ये नहीं जानते हो कि जो बात एक देश में सही है वो दूसरे देश में ग़लत है? क्या तुम नहीं जानते कि एक ही जगह पर जो आज सही है वो कल ग़लत था? क्या तुम ये नहीं जानते हो कि एक धर्म में जो बात सही है वो दूसरे धर्म में ग़लत है? एक घर में जो सही है दूसरे घर में वो ग़लत है, क्या तुम ये नहीं जानते? सही और ग़लत कुछ है ही नहीं सिवाय कुछ लोगों के व्यक्तिगत दृष्टिकोण के। इसी सही और ग़लत की घुट्टी हमें पिलायी गयी है और हम सोचते हैं कि जैसे ये कोई दैवीय बात है, जैसे वास्तव में कुछ सत्य होता है सही और ग़लत में।
न कुछ सही है और न कुछ ग़लत है, बस कुछ लोगों ने मान लिया है कि कुछ सही है और उस पर ठप्पा लगा दिया सही का। और कुछ लोगों ने मान लिया कि कुछ ग़लत है और उस पर ठप्पा लगा दिया ग़लत का। आज से दो सौ साल पहले इस देश में इस बात को सही माना जाता था कि पति मर जाये तो पत्नी उसके साथ आत्मदाह कर ले। आज आप में से कितने लोग ये चाहेंगे? इसी देश में, दो सौ साल पहले तक यह सही था। सही और ग़लत तो समय, काल, परिस्थिति, जगह, इन सब पर निर्भर बातें हैं, आदमी के मन से निकली हैं। तुम्हें किसने बोल दिया कि कुछ सही है ही? पर बहुत सारी बातों को तुम मन में बहुत गहरी जगह दे कर बैठे हो और तुम सोचते हो कि ये तो निश्चित रूप से सही हैं। तुम्हें लगता है शिक्षा निश्चित रूप से सही है, तुम्हें लगता है कि पैसे कमाना निश्चित रूप से सही है, तुम्हें लगता है कि आदर, सम्मान और ये जो तमाम तरह की बातें जो बचपन से तुम्हें सिखा दी गयीं, ये निश्चित रूप से सही हैं। तुम ये भूल जाते हो कि ये तुमको किसी ने दे दी हैं और जिसने तुमको दे दी हैं, उसको भी किसी और ने दे दी थीं। किसी के मन की पैदाईश हैं ये सारी बातें। दुनिया भरी हुई है ऐसे लोगों से जो सही ही सही करना चाहते हैं? हर बच्चे को बचपन से सिखाया जाता है कि झूठ मत बोलो, हिंसा मत करो, सम्मान करो, प्रेमपूर्ण रहो और दुनिया भरी हुई है हिंसा से, नफरत से, झूठ से, बलात्कारियों से और तुम कभी नहीं सोचते कि ये वही लोग हैं जिन्हें बचपन में तमाम सही सिखाया गया था और ग़लत से दूर रहने की हिदायत दी गयी थी।
तुम सोचते नहीं हो कि एक-एक बच्चे से ये बातें कही जाती हैं, फिर भी दुनिया ऐसी क्यों है? वो ऐसी इसलिए है क्योंकि ये सब सही और ग़लत उधार की बातें हैं, इनका कोई अर्थ नहीं है। बच्चा इनको बाहरी-बाहरी तौर पर ले तो लेता है पर उनको कभी अपना जीवन नहीं बना पाता। बना सकता ही नहीं है क्योंकि ये बात उसकी समझ से नहीं आयी है, वो बस एक बाहरी प्रभाव है उसके ऊपर। माँ ने सिखा दिया है। और अगर बच्चा थोड़ा समझदार है तो पूछेगा माँ से कि माँ हिंसा गलत क्यों है, माँ सच क्यों बोलूँ? माँ के पास कोई जवाब नहीं होगा या अगर कोई होगा भी तो वही होगा जो उसे उसकी माँ ने दिया था। और अगर बच्चा शरारती है तो और पूछेगा, और थप्पड़ खा जाएगा। सही और ग़लत तो आदमी के मन की धारणाएँ हैं, तुम इन पर चल कर क्या पाओगे? तुम मुझसे पूछ रहे हो कि इस बात की क्या गारण्टी है कि अपनी समझ से जो किया जा रहा है वो सही ही है। कुछ भी सही-ग़लत होता ही नहीं तो गारण्टी कैसी। अब तुम थोड़े भौंचक्के हो गए हो।
तुम्हारे मन में सवाल चल रहा होगा कि तो क्या सब कुछ सही है, सब कुछ चलता है। सब सही ही सही है, सब ग़लत ही ग़लत है। अगर आखिरी तौर पर कुछ सही है तो वो यही है कि तुम अपनी समझ के अनुसार चलो, अपने होश में जियो और ग़लत बस यही है कि अपने होश में जीवन न बिताना। बेहोशी की स्थिति में तुम जो भी करोगे वही ग़लत है और अपने विवेक से, अपने होश में, तुम जो करोगे वही सही है। फिर भले ही पूरी दुनिया बोलती रहे कि ग़लत है, पर मान मत लेना। ठीक है, हो सकता है कि समाज के नियमों के अनुसार वो ग़लत हो, पर अस्तित्व के नियमों के अनुसार वो सही ही है। अस्तित्व के नियम और समाज के नियम मेल नहीं खाते, बल्कि बड़े विपरीत होते हैं।
जीवन के नियम और समाज के नियम बिलकुल अलग़-अलग़ होते हैं। सही और ग़लत सामाजिक अवधारणाएँ हैं, समाज के नियम हैं। बात समझ रहे हो? ये गारण्टी मांगो ही मत कि मैं सही हूँ या ग़लत हूँ। तुम अपनी समझ से अगर कुछ कर रहे हो तो वो सही ही है, तुम्हें किसी के सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं, तुम्हारी अपनी दृष्टि ही काफी है। अब ये बहुत बेचैन कर देने वाली बात है। ‘सर कोई नहीं मान रहा क्या तब भी हम सही हैं?’ हाँ, तब भी तुम सही हो। ‘सर पूरी दुनिया कह रही कि हम गलत हैं, क्या तब भी हम सही हैं?’ हाँ, तब भी तुम सही हो।
जीवन के नियम और समाज के नियम बिलकुल अलग़-अलग़ होते हैं। सही और ग़लत सामाजिक अवधारणाएँ हैं, समाज के नियम हैं। बात समझ रहे हो? ये गारण्टी मांगो ही मत कि मैं सही हूँ या ग़लत हूँ। तुम अपनी समझ से अगर कुछ कर रहे हो तो वो सही ही है, तुम्हें किसी के सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं, तुम्हारी अपनी दृष्टि ही काफी है। अब ये बहुत बेचैन कर देने वाली बात है। ‘सर कोई नहीं मान रहा क्या तब भी हम सही हैं?’ हाँ, तब भी तुम सही हो। ‘सर पूरी दुनिया कह रही कि हम गलत हैं, क्या तब भी हम सही हैं?’ हाँ, तब भी तुम सही हो।
अगर वो बात गहराई से तुम्हारी समझ से निकली है, अगर वो बात तुमने किसी से सुनकर रट नहीं ली है, अगर वो बात किसी बाहरी प्रभाव का नतीजा नहीं है, अगर वो बात एक सामाजिक धारणा नहीं है जो तुमने ओढ़ ली है, तो निश्चित रूप से जो तुम कर रहे हो वही ठीक है, फिर भले ही वो नियमों के खिलाफ जाता हो, या कानून के खिलाफ जाता हो। थोड़ी भयानक सी बात है, डर लग रहा है। ‘क्या अपराधी बन जाएँ? सर जेल भेजना चाहते हो?’ डर शोभा नहीं देता, जवान लोग बैठे हो। गारण्टी मत माँगो। गारण्टी तो एक डरे हुए मन का लक्षण है कि ‘क्या गारंटी है?’ और दुकानदार बोल रहा है ‘दो महीने की’। जीवन कोई दुकान नहीं है जहाँ गारंटियाँ माँगने बैठ गए ।
– ‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।
'अभिव्यक्ति के विरोध की अभिव्यक्ति' का भी उतना ही संवैधानिक अधिकार है
यह ठीक है कि 'अभिव्यक्ति के विरोध की अभिव्यक्ति' का भी उतना ही संवैधानिक अधिकार है जितना आर्टिस्टिक अभिव्यक्ति का। लेकिन यह विरोध एक सीमा तक हो तो ही संवैधानिक रहता है। निर्देशक ने अपनी अभिव्यक्ति कलात्मक ढंग से कर दी। आप उसके विचारों से सहमत नहीं, कोई बात नहीं। आप तर्कों और प्रमाणों से उसकी बात का विरोध कर सकते हैं। लेकिन यह कहाँ तक ठीक है कि आप उसकी अभिव्यक्ति को प्रतिबंधित करने की माँग करें। वो भी केवल इस आधार पर कि उसका विचार आपके विचार के अनुरूप नहीं है! विरोध करके जबरन अपनी बात मनवाना कहाँ तक उचित है? कल बजरंग दल के नवयुवकों नें यहाँ कानपुर के एक मॉल में तोड़ फ़ोड़ की। पोस्टर फाड़े। दूसरी जगह से भी ऐसी ख़बरें आ रही हैं। वो भी ये सब तब जब हाईकोर्ट ने भी कह दिया है कि अगर आपको फ़िल्म नहीं पसन्द तो मत देखें।
एक तरफ आप कहते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिए। मगर इन हालातों में कोई कैसे अभिव्यक्ति करेगा? संभव है इसीलिए बहुत से निर्देशक इन मुद्दों से दूर ही रहना पसंद करते हैं, तभी आजतक दोनों हाथों की उँगलियों से गिनने लायक अभिव्यक्तियाँ भी नहीं हैं। ऊपर से विरोध का कारण भी समझ से परे है। वह गलत है यह तो ठीक है, मगर आप सही हैं इसे कैसे प्रमाणित करेंगे?
धर्म की कोई बात हुई नहीं कि आपकी धार्मिक भावनायेँ आहत हो जाया करती हैं। आप हमसे अपेक्षा रखते हैं कि हम आपके धर्म, जो कि विचारों का एक संकलन है, का सम्मान करें। मगर आप यह क्यों भूल जाते हैं कि आपको भी उसी नाते हमारे विचारों का सम्मान करना चाहिए। हमारी भी भावनायें हैं, जो आहत हो सकती हैं। मगर यह इन विरोध से नहीं, बल्कि आपके उन कृत्यों से जिनसे हमारे मूल अधिकार छिन जाने का ख़तरा रहता है! और ऐसे कृत्य बिना किसी अपवाद के केवल आपकी ओर से ही देखने को मिलते हैं।
अपने अपने सापेक्ष दोनों इस बात पर अटल हैं कि वही सही हैं। फिर आपको यह अधिकार किसने दे दिया कि आप जज करें और कहें कि "मैं ही सही हूँ आप गलत हैं?" दोनों को केवल अपनी बात रखने का अधिकार हो सकता है, तर्कों तथ्यों से अपनी बात को मजबूत करने का भी अधिकार हो सकता है। लेकिन अगर किसी को आपका विचार पसंद नहीं आता है तो उसपर जोर जबरदस्ती कैसी? जिसे जो पसंद आएगा, उसे स्वीकार करेगा। आपको अपने विचारों को जबरदस्ती ही किसी पर नहीं थोपना चाहिए, है न? फिर जब आज कोई अपनी बात रखता है, तो आपको इतनी परेशानी क्यों होने लगती है? आप तो हजारों वर्षों से अपनी बात रखते ही आ रहे हैं, तब किसी ने आपका विरोध नहीं किया। जिसने किया था, तब भी आपने उसे दबा दिया था और आज भी आप यही चाहते हैं।
आपको तो बस कहना है।
कभी कोई अच्छा काम करता है, तो कुछ बुद्धिजीवी अपनी बौद्धिकता का प्रमाण देते हुए उसके कार्य की सराहना नहीं करते बल्कि उन कारणों को ढूँढने की कोशिश करते हैं कि इससे उसका क्या क्या फ़ायदा हो रहा है। कुछ नहीं मिलता तो यही कह देते हैं वह ये सब अपना नाम अपनी ख्याति बढ़ाने के लिए कर रहा है। और कुछ नहीं तो उनसे भी महान लोगों को उदहारण के तौर पर ले आते हैं और कहते हैं कि ये तो इनसे आगे कुछ नहीं। कुछ बुद्धिजीवी और अधिक समस्याएँ ले आते हैं और गिनवाना चालू करते हैं कि यहाँ ये ये कमी है, इसे करना चाहिए था, ये क्यों नहीं किया, ये ही क्यों किया?
अब इस तरह के लोगों को क्या कहूँ? खुद तो बोलने के अलावा कुछ करते नहीं, जो करते हैं उसे चैन से करने नहीं देते। या शायद इस तरह के लोगों में ईर्ष्या की भावना होती हो, कि वे नहीं कर पाए, तो वो कैसे कर सकता है? कारण जो भी हो, मुझे बहुत खीझ लगती है जब कोई किसी अच्छे काम के पीछे उसके स्वार्थ को ढूँढने की कोशिश करता है।
भाई, किसी द्वारा किये जा रहे काम से अगर बहुत सारे लोगों को लाभ हो रहा है, अप्रत्यक्ष रूप से भी उन्हें भविष्य में इससे हानि की सम्भावना नहीं है, फिर इस काम को करने वाला भी अगर लाभ कमा रहा है, तो इससे हमें क्या? हम उसकी प्रशंशा करने की बजाय उसकी आलोचना सिर्फ इसलिए करें क्यूँकी उसे भी इससे लाभ मिल रहा है? या उसकी आलोचना इसलिए करें क्यूँकी आप किसी और को पसन्द करते हैं? या उसकी आलोचना इसलिए करें, कि वो 100 समस्याओं में से किसी विशेष समस्या पर ही क्यूँ काम कर रहा है? भाई वो जिस भी समस्या पर काम करता, आप उसपर भी यही कहते यही काम क्यूँ कर रहा है? इससे कितना कमाया? आपको तो बस कहना है।
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'वाद' ही समाज में गड़बड़ी उत्पन्न करता है और सम्पूर्ण एकता से वंचित रखता है। मनुवाद का प्रभाव तो आदिकाल से अबतक दिखाई पड़ ही रहा है। अम्बेडकर ने इसी वाद के खिलाफ़ आवाज़ उठाई और आज उसका प्रभाव नज़र आ रहा है। भले समाज पूरी तरह से न सुधरा हो, मगर मनुवादी विचारधारा में पिछले पचास सालों के मुकाबले में आज काफ़ी हद तक गिरावट आई ही है। धीरे धीरे आगे भी आती जायेगी। प्रभाव एकदम से तो ख़तम नहीं हो सकता क्योंकि हज़ारों वर्षों तक यह साथ रहा है और लोगों के दिलों दिमाग में अपनी पैठ बना चुका है। मगर इस वाद के विरुद्ध जो भी आज हो पा रहा है वह सब अम्बेडकर के प्रयासों से ही संभव हुआ है। और इस कार्य के लिए हम बाबा साहेब अम्बेडकर के बहुत आभारी हैं।
मगर, आज बहुतायत में दिखाई पड़ रहा है कि कुछ लोग मनुवाद के विरोध में अम्बेडकरवाद को जन्म दे रहे हैं। फिर से वही वाद! आज नहीं तो आगे चलकर फिर से यही वाद मनुवाद की तरह कट्टरता का रूप ले लेगा। (आज भी कम नहीं ले रखा है) और फिर से समाज दो वर्गों में बँट जाएगा। ऐसे में एकता कैसे आएगी? समानता कैसे आएगी? आप अम्बेडकर के विचारों से प्रभावित हों, उनके कार्यों से प्रभावित हों, उनके विचारों को प्रचारित करने का काम करें, मगर अम्बेडकर से प्रभावित क्यूँ होते हैं? व्यक्तिपूजा में क्यूँ शामिल होते हैं? आखिर वो इसी व्यक्तिपूजा के विरोध में ही तो जन्मे थे, फिर आप उन्हीं की पूजा करके क्या उनके साथ न्याय कर रहे हैं? उनका सन्देश समानता का था, समाज में जो नीच समझे जाते थे, उन्हें समाज में बराबरी का दर्ज देनें का था, उनसे ऊपर उठने का नहीं। आप अम्बेडकर की फ़ोटो लगाकर, दूसरों को, उनकी विचारधारा को गाली देते नज़र आते हैं, इससे आप अम्बेडकर को सम्मान दे रहे हैं या उन्हें अपमानित कर रहे हैं? आपने अम्बेडकर की विचारधारा को स्वीकार किया है, इसलिए आप उनकी विचारधारा को फैलायें, किसी अन्य विचारधारा का सम्मानित शब्दों के साथ उनकी कमियों का विरोध करें। मगर गालियाँ देकर, गलत शब्दों कइ साथ किसी विचारधारा का विरोध करने से वह विरोध वाकई समाज में बदलाव ला सकता है, मुझे ऐसा कतई नहीं लगता।
माना कि उनके वाद ने यह सब पहले शुरू किया था, मगर क्या अब आप इसका बदला लेंगे? फ़िर उनके वाद और आपके वाद में अंतर ही क्या रहा? और जब कोई अंतर ही नहीं, फिर विरोध करके उनके वाद को बंद करके अपने वाद को पैदा करने से क्या मिलेगा? इस तरह समाज में एकता तो नहीं आने वाली।
Monday, August 1, 2016
विचार
अभिषेक मेहरोत्रा
सोशल मीडिया पर टाइम्स नाउ के प्रेजिडेंट अरनब गोस्वामी को लेकर एनडीटीवी की कंसल्टिंग एडिटर बरखा दत्त की फेसबुक पर लिखी पोस्ट वायरल हो रही है। कई तरह के कॉमेंट उस पर पढ़ने को मिल रहे हैं, ऐसे में हमने मीडिया जगत के कई वरिष्ठ संपादकों से इस मुद्दे पर बात की है। पेश हैं उस बातचीत के प्रमुख अंश…
मेरा मानना है कि इस तरह दो सम्मानित पत्रकारों का एक- दूसरे पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाना अच्छा नहीं है। इसे सार्वजनिक बहस का विषय बनाया जा रहा है, जबकि इसे किसी एक मंच पर बैठकर भी विमर्श किया जा सकता था। वैसे भी टीवी मीडिया गंभीर विमर्श से दूर ही रहता है, उसी तरह दोनों टीवी पत्रकार भी सिर्फ छीछालेदार टिप्पणी कर रहे हैं।
मेनस्ट्रीम मीडिया हमेशा ही मीडिया के अहम विषयों पर चुप्पी साध लेता है। चाहे नीरा राडिया मामला हो या अन्य, मुख्य मीडिया इन विषयों से दूरी ही बनाता है। अगर मीडिया अपने विषयों पर गंभीर विमर्श करे तो इस तरह की फजीहत की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हमें ये भी देखना होगा कि अयोध्या विवाद और हाल ही में कश्मीर में मीडिया बैन पर भी मीडिया कवरेज किस तरह की हुई है। वैसे टीवी एडिटर्स की संस्था बीईए को भी इस तरह हो रही व्यक्तिगत टिप्पणियों पर कोई एक्शन लेना चाहिए।
इस तरह की टिप्पणियों को करने में मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती। यहां पत्रकारिता की प्रतिष्ठा और मूल्यों को लेकर बात हो रही है,जो सही है। किसी भी विषय पर डॉयलॉग्स होने ही चाहिए। बरखा दत्ता ने अरनब गोस्वामी की बातों का जवाब दिया है, जो जरूरी भी था।
इस तरह के विवाद से पत्रकारिता को नुकसान हो रहा है, ऐसा मैं नहीं मानता हूं। आदर्श स्थिति तो ये थी कि अरनब को बरखा पर इस तरह का अटैक नहीं करना चाहिए था। दोनों पुराने साथी हैं। वैसे कई बार टीवी शो की टीआरपी के चक्कर में अरनब इस तरह की भाषा का प्रयोग करते हैं।
रामकृपाल सिंह, पूर्व संपादक, नवभारत टाइम्स
इस विषय पर मेरा यही कहना है कि वैचारिक तौर पर मतभेद होने ही चाहिए, पर उसे व्यक्तिगत स्तर पर नहीं ले जाना चाहिए। कई बार लोग इसे खुद ही पर्सनल लेवल पर ले लेते हैं। कई विषयों पर पॉइंट ऑफ व्यू अलग-अलग होता है, उस पर चर्चा होनी चाहिए, पर व्यक्तिगत नाम लेकर आक्षेप लगाना सही नहीं लगता है।
आज समाज बदल रहा है और मीडिया भी इसी समाज का हिस्सा है, तो उसमें भी बदलाव आना स्वाभाविक ही है। मीडिया को ये गलतफहमी दूर करनी चाहिए कि वे समाज में विशिष्ट है, इसी के चलते उनमें अहंकार बहुत हो जाता है और फिर वे कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। Put you Before I अगर इसे फॉलो करेंगे तो We कभी I में नहीं बदलेगा और कई मुद्दे स्वस्थ चर्चा का विषय बनेंगे। अगर आप कोई विचार पेश करेंगे तो कुछ लोग उसकी मुखालफत भी करेंगे। अगर कोई आपका नाम न लेकर किसी एक समूह की बात कर रहा है तो आपको भी जवाब उसी भाषा में ही देना चाहिए।
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