Sunday, February 14, 2016

सामाजिक पत्रिका

भारत भाग्य विधाता
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दिग्भर्मित सामाजिक नेता लोग
१९४७ में लोग गांधीजी के विचारो का जवाब नहीं दे पाये तो उन्हें रस्ते से हटाना उन्हें सही लगा तथा परिणाम ये हे की गांधीवादी समाजवाद से होते हुए आज स्वछता अभियान तक सभी जगह गांधीजी की जयजयकार करनी पड़ रही हे।
आजकल लोगो की सोच उधार की ज्यादा हो चली हे।
बंद मस्तिष्क को ही लोग वैचारिक दृढ़ता समझने लगे हे।
जातिगत या सामाजिक संस्थाओ में भी बड़ा बुरा हाल हे।
न तो अध्यन ,न ही चिंतन तथा ज्ञान भी नहीं लेकिन सामाजिक पत्रकारिता या प्रबंधन में बिना किसी अनुभव के घुश आते हे लोग अपनी अंटी के दम पे जो एक खतरे का संकेत हे.
माहेश्वरी कन्या निधि , माहेश्वरी जाती की एक बड़ी कल्पना देश के बेटी बढ़ाओ अभियान की रही हे जिसपे माहेश्वरी इंटरनेशनल जैसी जिम्मेवार पत्रिका ने विशेषांक निकाला वही अनेक पत्रिकाओ ने जो दावे अधिक करती हे इसको लेकर अपने नेताओ की विकृत मानसिकता के चलते या पत्रिका में विज्ञापन का अकाल न पड जाये इसके लिए इसकी ऐतिहाशिकता को रेखांकित ही नहीं किया।
जब संस्थाए बूढी हो जाती हे या नेता या संपादक विचारहीन हो जाते हे तो ये सामान्य लक्षण समाज को नज़र आने लगते हे की वो गैरजरूरी बातो में समाज का ध्यान भटका देते हे।
सेठो या नेताओ के स्वागत सत्कार को ही सबसे बड़ा कार्यक्रम मान लेते हे तथा समाज का समय तथा साधन कितने बर्बाद हो रहे हे उसपे ख़ामोशी ही लगा लेते हे.
समाज के आम मध्यमवर्ग के लोग तो आर्थिक स्वतंत्रता को छूते ही स्वाभिमानी बन जाते हे तथा शिक्षित तो होते ही हे लेकिन वो खामोश बहुसंख्यक की तरह हो जाते हे जिसका फायदा उठाके सामाजिक व्यापार करने वाले या अपने अहंकार को पोषण वाले लोग एकत्र हो के स्वयं को ही समाज या संस्था समझने लग जाते हे।
खुदको ही महासभा या समाज समझने वाले लोग भी होने लगे हे।
ऐसे लोग लकीर के फ़क़ीर की तरह बने रहते हे तथा न तो खुद ही जगह रिक्त करते हे न ही नए विचारो को ही आने देते हे। पत्रिका में नहीं छापेंगे तो नए विचार ही खत्म हो जायेंगे ये गलतफहमी ऐसे बंधुओ को हो जाती हे।
माहेश्वरी कन्या निधि के साथ सामाजिक नेताओ ने या पत्रकारों ने जो किया उससे समाज में न तो नेताओ की कोई सामाजिक सम्मान की बात बची हे न ही पत्रिकाओ को लोग खोल के पढने की जहमत ही उठाते हे तथा अनेक तो रद्दी में सीधे ही डाल देते हे.
जिन्हे गलतफहमी हे माहेश्वरी पत्रिका समाज की गीता हे वो एक महीने किसी को पत्रिका नहीं भेजे तथा वापिस क्या कोई रिमाइंडर आता हे वो जाँच ले। पत्रिका की दुर्गति की जिम्मेवारी व्यवस्था की होती हे।
नागपुर की माहेश्वरी महासभा की पत्रिका ने तो अपने स्वयं के ही विज्ञापन भी मुफत में भिजवाने के निकाले हे लेकिन समाज ने उसकी व्यवस्था की मनमानी के चलते मुश्किल से १ % समाज के लोग ही उसको अपने ही समाज की हे ऐसा सोच के मंगवा लेते हे लेकिन उसमे धर्मान्धता से लेकर टैक्स बचाने के नुस्के तथा स्वयं आपस में ही नेताओ के '' अहो रूपम अहो धवनि '' की बाते आजकल ज्यादा बढ़ गयी हे।
पत्रिकाओ को नेताओ ने अपनी जीवनी छपाने का माध्यम बना लिया हे जबकि स्वयं की पत्नी ही अधिकांश को घर में ही नेता नहीं मानती .... बात मानना तो दूर !
अगर पत्रिका ने स्वयं को नहीं सुधारा तो वो दिन भी अधिक दूर नहीं जब लोग उसको महासभा की पत्रिका की बजाई सिर्फ नेताओ की ही पत्रिका मानने लग जायेंगे।
देश में आजकल अलग विचार वाले को दुश्मन मानने वाले मतिअंधो का साहश बढ़ रहा हे।
आज मुंबई में कुलकर्णी के चेहरे पे कालिख पोती गयी ये सोच के की उसको प्रचार मिलेगा लेकिन लेने के देने पड गए तथा संभावना ये हो गयी हे की ऐसा करने वालो को इसी बहाने से सत्ता से हकाला भी जा सकता हे मौका देख के क्योकि सवाल वैचारिक स्वतन्त्रा का हो गया हे।
विचारो की सबसे बड़ी शक्ति ये हे की ये किसी को भी अपना बना सकते हे ,पसंद आ सकते हे तथा किसी को भी दुसरो से पहले आ सकते हे।
सेठो या नेताओ को ही विचार आते हे ऐसा सोचना सही नहीं हे। आज के युवा तथा महिलाये कल्पनाशील हे।
सामाजिक संस्थाओ के नेता अधिकतर अर्धज्ञानी लोग रहते हे जो विचार उसको ही मानते हे जिसके लिए वो प्रस्ताव पास कर लेते तथा सर्वसम्मति हो जाती हे।
ये तरीका आदिम हो चूका हे लेकिन सामाजिक पत्रिकाओ के संपादक कोई सवाल नहीं पूछते बल्कि सामाजिक संस्थाओ की पत्रिका को बेहतर बनाने का एक तरीका ये हुकुमसाही को मानते हे की बाकि पत्रिकाओ में कोई बोलेगा या लिखेगा नहीं तथा विज्ञापन नहीं देगा।
बजाई बड़ी लाइन खीचने के शुतुरमुर्ग की रणनीति कंप्यूटर युग में अपना रहे हे तथा सोचते हे की समाज भी इसी को सही माने ?
माहेश्वरी महासभा के चुनाव आने वाले हे सो लोग सावचेत हो गए हे की क्या छपे तथा क्या नहीं इसको सेंसर किया जाये तथा पत्रिका का दुरुपयोग किया जाये। ये असहनीय हे क्योकि पत्रिका को समाज की बोलके छापते हे।
दिवंगत मधुश्री जी काबरा ने जीवन भर इसका लेखा जोखा समाज को दिया की कैसे लोग वो सब कर रहे हे जो नहीं किया जाना चाइये।
माहेश्वरी समाज की सभी पत्रिकाओ की सम्मिलित संख्या करीब ७०००० हे एक अनुमान से।
ये समाज के १० % घरो में भी नहीं जाती जिसके कारण मेने तो गिनाये हे लेकिन समाज को पहले से भी मालूम हे।
महासभा के पिछले ३ अध्यक्ष कौन हे ये समाज का ३ % युवा भी नहीं जानता जिससे अनुमान लगाया जा सकता हे की पत्रिकाओ की पठनीयता कितनी हे तथा कैसी हे ?
महासभा अध्यक्ष योग्यता से नहीं बल्कि बहुमत से चुना जाता हे जिसके लिए एक व्यवस्था ऐसी बनायीं गयी हे की कोई नया व्यक्ति उसमे प्रवेश नहीं कर सकता तथा आपस में खो खेलते रहने की तजबीज जमाई हुई हे जबकि समाज में तो योग्यता का अभाव नहीं हे।
महिलाओ तथा मध्यमवर्ग को तो पहले ही अयोग्य की श्रेणी में डाला गया हे ऐसा आरोप अनेको दसको से एक कलंक की तरह महासभा पे आरोपित हो चूका हे।
पदमश्री राठीजी ने चुनाव की जगह चयन को समाज हित में माना लेकिन बुजर्गो की आवाज की तरह उनके विचार को नेता बन गए सेठ माने नहीं तथा न ही सीधे ही अमेरिका की तरह समाज के सभी लोगो को वोट का अधिकार दे के अपनी लोकप्रियता को जांचने का साहश ही करते हे।
ये सब बाते शोभायमान नहीं हे, लेकिन कायम हे जिसका अनेक दसको से विरोध भी हुआ लेकिन संविधान संशोधनों के सिवा कुछ अमृत समाज के लिए तो निकला नहीं।
विरोध बिखरा रहा तथा वैचारिक नहीं था जबकि स्वार्थ या व्यवस्था संघटित थी सो कायम हे।
महासभा को जब विचार से जोड़ा जा रहा था तब दिवंगत राम गोपाल जी को मेने मिल के निवेदन किया की संस्था के प्रस्तावित'' लोगो को'' सुधारा जाना ठीक।
समाज को ''सेवा की'' नहीं'' सुधार''' की जरुरत हे। सेवा तात्कालिक सुधार तक ठीक, संघटन तो गरीब जातियों या पिछड़ी माने जानी वाली जातियों की जरुरत हे तथा महाजन कहलाती हे माहेश्वरी जाती सो संघटन की जगह विचार को महत्ता दी जनि चाइये तथा सदाचार की जगह व्यवहार को अपनाना समसामयिकता को निरंतरता दे सकता हे लेकिन उन्होंने ये बोलके की लोगो कोई स्थायी व्यवस्था तो हे नहीं तथा जो तै हो चूका उसको महासभा पे लाद दिया जिसका परिणाम ये हुआ की समाज को वो मान्य नहीं हुआ।
संस्था के ईमारत की नीव ही वैचारिक तिरछेपन का शिकार हो गयी।
सेवा की जगह नाम का अहंकार , संघटन की बजाई हर जगह तेरी मेरी तथा सदाचार की स्पषटा के अभाव में कोई सांस्कृतिक पहचान भी नहीं।
कोई कार पे स्टीकर तो कोई जय महेश तो कोई लोहागाल तो कोई पथरो से आदमी बनने की अवधारणाओं को ही संस्कृति समझने लगा।
समाज की संस्कृति को अंधे का हाथी बना दिया नेताओ ने।
हा ,झंडा उन्होंने नहीं बनाने का औचित्य स्वीकार किया नहीं तो अभी जिस तरह राजनैतिक दलो के लोग अपने झंडो से बाद में पोछा बना लेते वैसे ही माहेश्वरी महासभा के झंडे का भी हश्र हुआ होता।
रामगोपालजी की जन्मशताब्दी मेरे सिवा नागपुर के श्री श्याम सोनीजी ने मनाई, ऐसा मुझे बताया गया।
महासभा के संस्थापक महामंत्री राठीजी की जनम सताब्दी का तो मुझे राष्ट्रिय संयोजक भी बनाया गया था
देश बड़े सुधारो के दौर में प्रवेश कर रहा हे तथा माहेश्वरी उसमे कुछ एक परिवारो के अलावा भी सामूहिक रूप से उन्नयन के लिए तैयार हो इसकी भूमिका लेना जरुरी हे जिसके लिए धर्मान्धता तथा पैसे को ही विचार मानने वाले लोगो को नेतृत्व से दूर रखा जाना चाइये नहीं तो जैसे पिछले ३ साल बर्बाद हुए वैसे ही कोई ख़ाश नहीं होगा तथा समाज का युवा स्वयं अपना रास्ता बना लेगा जो सामाजिक एकता के लिए नहीं विकल्प के लिए ठीक होगा

किसी ने शायद ठीक ही कहा है “जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो” हमने व हमारे अतीत ने इस बात को सच होते भी देखा है। याद किजिए वो दिन जब देष गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब अंग्रेजी हुकूमत के पांव उखाड़ने देष के अलग-अलग क्षेत्रों में जनता को जागरूक करने के लिये एवं ब्रिटिष हुकूमत की असलियत जनता तक पहुंचाने के लिये कई पत्र-पत्रिकाओं व अखबारों ने लोगों को आजादी के समर में कूद पड़ने एवं भारत माता को आजाद कराने के लिए कई तरह से जोष भरे व समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का बाखूबी से निर्वहन भी किया। तब देष के अलग-अलग क्षेत्रों से स्वराज्य, केसरी, काल, पयामे आजादी, युगान्तर, वंदेमातरम, संध्या, प्रताप, भारतमाता, कर्मयोगी, भविष्य, अभ्युदय, चांद जैसे कई ऐसी पत्र-पत्रिकाओं ने सामाजिक सरोकारों के बीच देषभक्ति का पाठ लोगों को पढ़ाया और आजादी की लड़ाई में योगदान देने हेतु हमें जागरूक किया। आज यदि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया की भूमिका पर बात की जाये, तो समाज में मीडिया की भूमिका पर कई तरह के सवाल वर्तमान में उठाये जा सकते हैं, अतीत में इसी मीडिया के पीठ थपथपा सकते हैं, तो भविष्य के लिये एक नई सोच जागृत करने का प्रयत्न कर सकते हैं। जब भी मीडिया और समाज की बात की जाती है तो मीडिया को समाज में जागरूकता पैदा करने वाले एक साधन के रूप में देखा जाता है, जो की लोगों को सही व गलत करने की दिषा में एक प्रेरक का कार्य करता नज़र आता है। वर्तमान परिपेक्ष्य में भय, भूख, भ्रष्टाचार व महंगाई से त्रस्त जनता का “अन्ना हजारे” के आंदोलन को देषभर में व्यापक जन समर्थन मिलना मीडिया के कारण ही संभव हो सका है अर्थात् यह भी कह सकते हैं कि ”जनलोकपाल“ पर लोगों को एकजुट करने में मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है, लेकिन दूसरी ओर इसी का दूसरा पक्ष यह भी है कि भ्रष्टाचार के कई मुद्दों पर मीडिया घरानों की कई प्रमुख हस्तियों के नाम आने के बाद मीडिया की किरकिरी को भी इस जन आंदोलन में मीडिया ने जनता का साथ देकर दबाने का प्रयास किया है। कुल मिलाकर देखा जाये, तो आज के परिपेक्ष्य में मीडिया की स्थिति एक बिचौलिये से कम नहीं है, आज मीडिया केवल और केवल बिचौलिये का कार्य करने में लिप्त है।
पत्रकारिता और आज:- जैसे-जैसे विकास एवं आधुनिकता के नये-नये आयाम स्थापित होते जा रहे है, ठीक उसी प्रकार मीडिया की निष्पक्षता तथा समाचार को जनता के बीच प्रसारित करने की तकनीक में भी कई तरह के परिवर्तन एवं उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजमी है। वर्तमान में मीडिया जगत में युवाओं की चमक-दमक काफी बढ़ी है, अब इसे युवक-युवतियां अपने उज्जवल कैरियर के रूप में देखने लगे हैं। चमकता-दमकता कैरियर, नेम-फेम की चाह ने युवाओं को काफी हद तक इस ओर खीचा है, जिससे हजारों युवा पत्रकार बनने की चाह लेकर मीडिया जगत में आ रहे हैं और नित्य नये-नये पत्र-पत्रिकाएँ व न्यूज चैनल भी सामने आ रहे हैं। लेकिन समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर पाने में आज ये काफी पीछे रह गये हैं। आज ये पत्रकार उद्योगपतियों व राजनीतिज्ञांे के आगे घुटने टेके नज़र आते हैं। सामाजिक सरोकारों से इतिश्री करने के साथ ही पैसा कमाने की होड़ में आम जनता का दर्द व उनकी परेषानियां उद्योग घरानों व राजनीतिज्ञों के रूपये के आगे दबकर रह गये हैं। यहीं कारण है कि पत्रकारिता की निष्पक्षता को लेकर पत्रकार खुद जनता के कटघरे में खड़ा hai

जिस पेज व समय पर संपादकीय की जरूरत होती है, वहां आज नेताओं, उद्योगपतियों व अन्य रूपये-पैसे वालों के कसीदे पढ़ी जाती हैं। ज्वलंत मुद्दों पर त्वरित टिप्पणी पढ़ने व देखने वाली जनता को अब पेज-3 व नेताओं, उद्योगपतियों के विज्ञापन व साक्षात्कार पढ़कर व देखकर काम चलाना पड़ता है। जिस पेज पर कल तक खोजी पत्रकारों के द्वारा ग्रामीण पृष्ठभूमि की समस्या, ग्रामीणों की राय व गांव की चौपाल प्रमुखता से छापी जाती थी, वहीं आज फिल्मी तरानों की अर्द्धनग्न तस्वीरें नज़र आती हैं। क्योंकि आधुनिकता व वैष्वीकरण के इस दौर में इन पत्र-पत्रिकाओं व नामी-गिरामी न्यूज चैनलों को ग्रामीण परिवेष से लाभ नहीं हो पाता और सरोकार भी नहीं है। इसलिए वे धीरे-धीरे इससे दूर भाग रहे हैं और औद्योगीकरण के इस दौर में पत्रकारिता ने भी सामाजिक सरोकारों को भुलाते हुए उद्योग का रूप ले लिया है। यही कारण है कि देष में बड़े-बड़े भ्रष्टाचार हो जाते हैं और मीडिया कुछ भी कहने से बचती नज़र आती है, क्योंकि भ्रष्टाचार में भी 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में नीरा राडिया, प्रभू चावला व संसद नोट कांड में राज सर देसाई सहित कई अन्य मामलों में उच्च मीडिया घरानों के बरखा दत्त जैसे सक्सियतों के नाम प्रमुखता से आ रहे हैं, जिसके कारण मीडिया ने मौन रूख अपनाते हुए राजनीतिज्ञों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना शुरू कर दिया है और सामाजिक सरोकार व जनजागरूकता नामक जानवर को एक कोने पर रख कर अपनी भलाई समझने की भूल कर रहा है।
मीडिया, समाज और कल:- अपनी शुरूआत के दिनों में पत्रकारिता हमारे देष में एक मिषन के रूप में जन्मी थी। जिसका उद्ेष्य सामाजिक चेतना को और अधिक जागरूक करने का था, तब देष में गणेष शंकर विद्यार्थी जैसे युवाओं की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक आजादी के लिये संघर्षमयी पत्रकारिता को देखा गया, कल के पत्रकारों को न यातनाएं विचलित कर पाती थीं, न धमकियां। आर्थिक कष्टों में भी उनकी कलम कांपती नहीं थी, बल्कि दुगुनी जोष के साथ अंग्रेजों के खिलाफ आग उगलती थी, स्वाधीनता की पृष्ठ भूमि पर संघर्ष करने वाले और देष की आजादी के लिये लोगों मंे अहिंसा का अलख जगाने वाले महात्मा गांधी स्वयं एक अच्छे लेखक व कलमकार थे। महामना मालवीय जी ने भी अपनी कलम से जनता को जगाने का कार्य किया। तब पत्रकारिता के मायने थे देष की आजादी और फिर आजादी के बाद देष की समस्याओं के निराकरण को लेकर अंतिम दम तक संघर्ष करना और कलम की धार को अंतिम दम तक तेज रखना। इसका अंदाजा आज केवल एक उदाहरण सा लगता है:- बात सन् 1907 की है, तब देष भर में “स्वदेषी आंदोलन” चल रहा था, उसी दरम्यान इलाहाबाद से श्री शांति नारायण भटनागर ने अपनी जमीन-जायदाद बेच कर “स्वराज्य” नामक अखबार निकाला और अंग्रेजों के खिलाफ कलम की धार को उग्र किया, उन्हें 3 वर्ष के लिये कैद की सजा तथा जुर्माना ना पटाने पर 6 माह अतिरिक्त सजा मिली। इसके बाद “स्वराज्य” के सम्पादक हुए श्री रामदास (प्रकाषानंद सरस्वती), इनके बाद बाबू रामहरि। इसके बाद तो यह सिलसिला चलता ही रहा एक सम्पादक गिरफ्तार होता तो दूसरा उसकी जगह ले लेता, इसी क्रम में बाबू रामहरि को 21 वर्ष की कैद, मुंषी रामसेवक को अण्डमान में कैद, नन्द गोपाल चोपड़ा को 30वर्ष देष से निर्वासन की सजा, लद्धा राम कपूर ने तीन अंक ही निकाला था कि उन्हें भी 30 वर्ष की कालेपानी की सजा हुई। इसके बाद अमीर चन्द बम्बवाल ने स्वराज्य का प्रकाषन शुरू किया। अमीर चन्द बम्बवाल ने अखबार में विज्ञापन दिया कि “सम्पादक चाहिए, वेतन त्र दो सूखी रोटियां, गिलास भर पानी और हर सम्पादकीय लिखने पर दस वर्ष के कालेपानी की सजा।” इसके बाद भी एक-एक कर आठ सम्पादक और हुए जिन्हें कुल 125 वर्ष कालेपानी की सजा दी गई, लेकिन इसके बावजूद स्वराज्य का प्रकाषन निरंतर जारी रहा और आमजनों में आजादी के जिये जागरूकता का संचार लगातार होता रहा। लेकिन आज के इस दौर में पत्रकारिता कहां पर है और आमजनों को उनकी समस्या का हल कौन देगा यह बताने वाली पत्रकारिता अपने आप से आज यह सवाल पूछ रही है कि मैं कौन हूँ? आज देष आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, लेकिन इससे निपटने के लिये आमजनों को क्या करना चाहिए, सरकार की क्या भूमिका हो सकती है, सहित कई मुद्दों पर मीडिया आज मौन रूख अख्तियार किये हुये है। लेकिन वहीं दूसरी ओर आतंकी गतिविधियों से लेकर नक्सली क्रूरता को लाइव दिखाने में भी यह मीडिया पीछे नहीं है, यहां तक की आज सर्वप्रथम किसी खबर को दिखाने की होड़ में मीडिया के समक्ष आतंकी व नक्सली हमला के तुरंत बाद ही हमला करने वाले कमाण्डर व अन्य आरोपियों के फोन व ई-मेल तक आ जाते हैं। न्यूज चैनलों से लेकर अखबारों में आतंकियों व नक्सलियों के इण्टरब्यू छप जाते हैं। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि बार-बार व प्रतिदिन इस समाचार को दिखाने व छापने से फायदा किसका होता है, आमजनता का, पुलिस का, नक्सली व आतंकी का या फिर मीडिया घरानों का। निष्चित रूप से इसका फायदा मीडिया व इन देषद्रोही तत्वों (आतंकी व नक्सली) को होता है, जिन्हें बिना किसी कारण से बढ़ावा मिलता है, क्यांेकि बार-बार इनको प्रदर्षित करने से आमजनों व बच्चों में संबंधित लोगों के खिलाफ खौफ उत्पन्न हो जाता है और ये असामाजिक तत्व चाहते भी यही हैं। इसलिये आज जरूरी है कि मीडिया और इसको चलाने वाले ठेकेदारों को यह तय करना होगा, कि मीडिया ने सामाजिक सरोकारों को दूर करने में कितनी कामयाबी हासिल की है, यह उन्हें खुद ही देखना व समझना होगा। ऐसा भी नहीं है कि मीडिया ने सामाजिक सरोकारों को एकदम से अलग कर दिया है लेकिन लगातार मीडिया की भूमिका कई मामलों में संदिग्ध सी लगती है। कई विषयों जहां पर उन्हें न्याय दिलाने की जरूरत होती है एवं लोगों को मीडिया से यह अपेक्षा होती है, कि मीडिया के द्वारा उनकी मांगों व समस्याओं पर विषेष ध्यान देते हुए समस्या का समाधान किया जायेगा, ऐसे कई मौकों पर मीडिया की भूमिका से लोगों को काफी असहज सा महसूस होता है। कभी-कभी तो ऐसा भी महसूस किया जाता है कि कुछ मीडिया घराना मात्र किसी एक व्यक्ति, पार्टी व संस्था के लिये ही कार्य कर रही है, अतः मीडिया को एक बार फिर से ठीक उसी तरह निष्पक्ष होना पड़ेगा, जिस तरह की आजादी के पहले व अभी कुछ आंदोलनों में जनता के साथ देखा गया।
धन्यवाद!

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