Monday, May 9, 2016

मूर्ख कभी प्रिय नहीं बोलता और स्पष्ट वक्ता कभी धूर्त नहीं होता।

चाणक्य ने कहा है, "मूर्ख कभी प्रिय नहीं बोलता और स्पष्ट वक्ता कभी धूर्त नहीं होता। आलोचक के आक्षेप तुम्हारे प्रतिकूल नहीं होते।" इसी से सम्बंधित एक प्रसंग है- भगवान बुद्ध के पास एक बार एक व्यक्ति पहुंचा। वह उनके प्रति ईष्र्या और द्वेष से भरा हुआ था। पहुंचते ही लगा उन पर अपशब्दों और झूठे आरोपों की बौछार करने। भगवान बुद्ध पर उसका कोई असर नहीं हुआ।

वह वैसे ही शांत बने रहे, जैसे पहले थे। इस पर वह व्यक्ति आग-बबूला हो गया। उसने पूछा, "तुम ऐसे शांत कैसे बने रह सकते हो, जबकि मैं तुम्हें अपशब्द कह रहा हूं?" बुद्ध इस पर भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने शांत भाव से मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "अगर आप मुझे कोई वस्तु देना चाहें और मैं उसे स्वीकार न करूं तो क्या होगा? वह चीज तो आपकी ही बनी रह जाएगी न! फिर मैं उसके लिए व्यथित क्यों होऊं?"

आलोचना के संदर्भ में भगवान बुद्ध का यह सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है। गायत्री तीर्थ के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा ने कहा है, 'कोई आपको तब तक नीचा नहीं दिखा सकता, जब तक कि स्वयं आपकी उसके लिए सहमति न हो।' घर हो या बाहर, ऐसी कोई जगह नहीं है जहां आपको आलोचना का सामना न करना पड़े। हर क्षेत्र में और हर जगह यह आम बात है। यह कभी स्वस्थ तरीके से की जाती है, तो कभी बीमार मानसिकता से भी।

कभी आपके व्यक्तित्व को निखारने के लिए की जाती है तो कभी उस पर थोड़ी और धूल डाल देने के लिए, यह साबित करने के लिए कि आप किसी से कम हैं। ठीक इसी तरह इसे ग्रहण करने की बात भी है। कुछ लोग इसे स्वस्थ मन से स्वीकार करते हैं और कुछ इसी से अपने मन को बीमार बना लेते हैं। कुछ लोग इसे अपने व्यक्तित्च के विकास का साधन मान लेते हैं और कुछ इसके शिकार बन जाते हैं।

कुछ को ऐसा लगता है कि यह जो आलोचना की जा रही है, सही है तो वे खुद को सुधारने लगते हैं। कुछ कुढ़ने लगते हैं और कुछ हताश हो जाते हैं। कुछ लोग अपने कान बंद कर लेते हैं। कुछ एक कान से सुनते हैं और दूसरे से निकाल देते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो सुनते हैं, अगर उन्हें लगता है कि बात सही है तो सुनते हैं, वरना ठहाका लगाते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।

किसी की आलोचना का आप पर कैसा असर होता है, यह एक सीमा तक आपके दृष्टिकोण पर निर्भर है। इस सच का एक दूसरा पक्ष भी है। वह यह कि इस दृष्टिकोण से ही यह निश्चित होता है कि आप अपनी जिदगी में किस हद तक सफल होंगे। इसीलिए सजग लोग आलोचना को भी अपने व्यक्तित्व विकास की योजना का एक जरूरी हिस्सा बना लेते हैं। आप चाहें तो इसे आलोचना प्रबंधन का नाम दे सकते हैं। जी हां, जैसे समय का प्रबंधन होता है, संसाधनों और स्थितियों का प्रबंधन होता है, वैसे ही आलोचना का भी प्रबंधन किया जा सकता है। आलोचना का प्रबंधन करके आप उसका पूरा लाभ उठा सकते हैं, और न केवल अपने व्यक्तित्व, बल्कि व्यावसायिक विकास के लिए भी महत्वपूर्ण पूंजी बना सकते हैं।

आलोचना प्रबंधन का मतलब

कुछ समय पहले मैंने बेस्ट सेलिंग लेखक अरिंदम चौधरी की एक पुस्तक 'खुद में तलाशें हीरा' पढ़ी। इस पुस्तक की भूमिका फिल्म अभिनेता शाहरुख खान ने लिखी है। शाहरुख खान की सफलता आज किसी से छुपी नहीं है। वह कहते हैं कि असफलताओं से मुझे बहुत डर लगता है। असफल होने के डर से मैंने जहां कहीं जो कुछ भी किया उसमें अपना सौ फीसदी से ज्यादा दिया और ज्यादातर मामलों में मुझे सफलता मिलती गई।

अगर आप नाकाम नहीं होंगे तो कभी सीख नहीं पाएंगे। सबसे बड़ी बात अपनी भूमिका में शाहरुख ने जो लिखी है वह है, 'सफलता हमेशा अंतिम नहीं होती, वैसे ही जैसे असफलता हमेशा घातक नहीं होती।'

इस पुस्तक में अरिंदम चौधरी ने भी आलोचनाओं को हल्क में न लेने की सलाह दी है। मैंने भी अपने अब तक के राजनीतिक जीवन में यही सीखा है। आप कुछ भी करें लोग आपकी आलोचना का अवसर निकाल ही लेंगे। अब यह आपके ऊपर है कि आप उस आलोचना से अपना मार्ग और उस पर चलने का तरीका किस तरह सुधारते हैं। यह भी आप पर है कि आप आलोचना से घबरा कर अपने मार्ग से ही हट जाएं और चलना बंद कर दें। उचित यह होगा कि आलोचनाओं का विश्लेषण करके आप उनसे अपने जीवन और लक्ष्य तक पहुंचने के प्रयासों में सुधार कर लें। इसी को आलोचना प्रबंधन कहते हैं।

आलोचना प्रबंधन का आशय यह है कि किसी बात पर तुरंत प्रतिक्रिया न करें। पहले यह समझें कि आलोचना करते वाले का मंतव्य क्या है। क्या जो बात वह कह रहा है उसमें सचमुच कुछ दम है या ऐसे ही वह केवल अपनी संतुष्टि के लिए या आपको अपमानित करने के लिए ही आलोचना किए जा रहे हा है?

इसका आरंभ आप स्वयं अपने प्रति अपने नजरिए को स्पष्ट करके कर सकते हैं। जब भी कोई आपके विरुद्ध कोई बात करे तो सबसे पहले यह देखें कि क्या वास्तव में यह बात सच है।
इसके लिए जरूरी है कि आप अपने संबंध में पूरी तरह विश्वस्त हों। अपने गुण-दोषों के आकलन के लिए आप दूसरों पर कतई निर्भर न रहें, चाहे वे आपके परिवार के सदस्य ही क्यों न हों। यह विश्वास रखें कि अपने गुण-दोष आप सबसे अच्छी तरह से जानते हैं।

लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि समझ के दूसरे दरवाजे बंद कर लें, क्योंकि गलती करना मनुष्य का स्वभाव है और आप उससे अलग नहीं हैं। अत: जब भी कोई आपकी कार्यप्रणाली या व्यवस्था या व्यक्तित्व के किसी भी पक्ष को लेकर कुछ कहे तो उसे सुनें जरूर, फिर आत्मनिरीक्षण करें। यह सीखें कि क्या अगला जो कह रहा है, वह सही है या बस ऐसे ही उसने बिना जाने-बूझे ही कुछ कह दिया है।

अगर आपको कभी यह लगे कि वास्तव में उसकी बात सही है तो आप स्वयं को सुधारने की शुरूआत तुरंत कर दें, इसके विपरीत यदि यह जाहिर हो कि इसमें आपकी गलती बिल्कुल नहीं है, दूसरे व्यक्ति ने केवल अपनी गलती छिपाने के लिए आप पर दोषारोपण किया है, तो उसे तुरंत अपने मन से निकाल दें। उसको लेकर कुछ भी सोचने या करने की कोई जरूरत नहीं है।
  

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