Thursday, May 12, 2016

वाराणसी। दिवाली थी। पूरा शहर रोशनी में डूबा हुआ था। पर मेरा मन किसी गहरे अंधेरे में दिशाहीन सा भटक रहा था। जेब में पैसे नहीं थे, और घर पर ढेरों उम्मीदें मेरा इन्तजार कर रही थी। ऐसे में घर कैसे जाता। बार-बार अपने होने पर रंज हो रहा था। खैर, किसी तरह से पैसों का इंतजाम किया और गोदौलिया से ठेले पर बिक रही मिठाई खरीद कर घर पहुंचा। बूढ़ी मां के हाथों पर मिठाई रखकर डबडबाई आखों से कहा- मां इस बार इतना ही कर पाया हूं। ... और फिर उस संपादक का चेहरा जेहन में आया। जो एक मिनट आफिस देर से पहुंचने पर पैसा काट लेता था और तय समय के बाद भी घंटों काम करवाकर उसके पैसे नहीं देता था।
सच कहूं तो पत्रकारिता का ये पतन का युग है जिसमें हर ऐरा-गैरा संपादक बन बैठा है। ऐसे लोग जिनके लिए पत्रकारिता मिशन नहीं कमीशन है, पत्रकारिता अपना हित साधने का माध्यम भर है, वे लोग संपादक की कुर्सी पर विराजमान होकर संपादक होने का दंभ भर रहे है। अरूण यादव भी उन्हीं लोगो में से है। फिलहाल बनारस से निकलने वाले सांध्य कालीन अखबार भारत दूत के संपादक के पद पर विराजमान हैं। पत्रकारिता का कितना ज्ञान इन्हें हैं, ये तो मुझे पता नहीं लेकिन अपने यहां काम कर रहे कर्मचारियों को टार्चर करने का पूरा अनुभव इनके पास है। इसके लिए इनके पास ढेरों तरीके हैं।

जिन लोगों को ये सीधे तौर पर कुछ नहीं कहते उन्हें अपने ससुर राम मूर्ति यादव से परेशान करवाते है। इस अखबार में इन्होंने नियम भी अजीबो-गरीब बना रखे हैं। मसलन अगर आप एक मिनट देर से दफ्तर पहुंचते हैं, तो रजिस्टर में आपके नाम के आगे लाल स्याही लगा दी जाती है, आपसे कुछ कहा नहीं जाता, और अगर 4 दिन तक आपसे दफ्तर पहुंचने में देर हो जाती है तो वेतन आपके हाथों में देते समय एक पूरे दिन का पैसा काट लिया जाता है। लेकिन तयशुदा वक्त के बाद भी घंटों काम करने के ऐवज में आपको यहां कुछ नहीं दिया जाता।

मुझे याद आता है कि एक बार मैंने इनसे एडंवास में कुछ रूपये लिये थे, वक्त पर तनख्वाह मिलने पर उससे कटवाकर चुका भी दिया। एक दिन जब मैंने उनसे पूछा कि मैं तो अक्सर तयशुदा वक्त से ज्यादा काम करता हूं, उसके ऐवज में मुझे क्या मिलेगा, तो उनका जवाब था- वो तो रुपये एडंवास लेने के ऐवज में सूद था जो तुम्हें चुकाना था।

खैर मेरी तनख्वाह से ज्यादा मेरी परिवार की जरूरत और मेरे बेटियों के सपने थे जिनके लिए मैं कुछ हजारों की नौकरी सब सहने के बाद भी करता चला जा रहा था। उस दिन जब मैं दफ्तर पहुंचा तो अरूण यादव ने मुझे बुलाकर कहा कि तुम्हारी तनख्वाह अब आधी की जाती है। मैंने सुना तो जैसे मेरे पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गयी। जेहन में परिवार आ गया जिनके सारे सपने और उम्मीद मेरे छोटे से तनख्वाह से जुडे़ थे। उनका क्या होगा। दिपावली भी सामने है। निर्णय लेने का वक्त था, पर मन ने कहा कि बर्दाश्त की भी हद होती है। मैंने कहा कि अब मैं काम नहीं कर सकता। मेरा हिसाब कर दीजिए।  जवाब मिला- ठीक है, अगले महीने आकर ले जाना। अब मेरी बारी थी। सब्र का पैमाना छलका। मेरा जवाब था- पैसे लेकर ही मैं यहा से जांउगा, ऐसे नहीं जनाब।

मैंने तेवर कड़ा किया तब जाकर मेरा पैसा मुझे मिला। नहीं तो यहां काम करने वालों को यहां से विदा करते समय उनके पैसे काटने का इस अखबार की परम्परा रही है। वहां से निकल कर सड़क पर आ गया हूं। आगे की जिदंगी, बच्चों की जरूरत, घर का खर्चा... यही दिमाग में घूम रहा हूं। क्या करूं, नौकरी की तलाश में हूं इन दिनों। घूम रहा हूं..... चक्कर काट रहा हूं.....सड़कों को नाप रहा हूं...... बार-बार सोच रहा हूं कब तक ऐसी जिंदगी जीता रहूंगा जिसमें मेहनत है, संघर्ष है, पर उसका कोई फल नहीं है.

ये दास्तान है पत्रकार मनोज सिन्हा का जो मुझसे गोदौलिया पर मिले तो बताते चले गए. उनकी कहानी को सुनकर मुझे धूमिल की कविता याद आ गयी...
सचमुच मजबूरी है
पर जिंदा रहने के लिए पालतू होना जरूरी है।
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यह ठगी है तो इस देश में कोई है जो इसे रोके? भारत सरकार द्वारा निर्मल भारत अभियान और स्वास्थ्य अभियान चलाये जाते हैं। अमर उजाला में चार जनवरी को एक विज्ञापन आया है। कोई ''अभियान फाउंडेशन'' है जो यूपी में इन योजनाओं के लिए दसवीं बारहवीं पास बेरोजगारों को 11000 तक की नौकरी देगा। कुल 33072 पद हैं। अगर वाकई नियुक्ति हुई तो हर महीने सिर्फ वेतन में 30 करोड़ खर्च होगा। साल में लगभग 350 करोड़। केंद्र या राज्य सरकार के पास ऐसी कौन सी योजना है? या कि इस ''अभियान फाउंडेशन'' को सीधे कुबेर का खजाना हाथ लग गया? मजे की बात यह है कि नौकरी लगेगी यूपी में, और आवेदन जमा होगा रांची जीपीओ के पोस्ट बाॅक्स नंबर 97 में।
एक और हिसाब देखिये। 33072 पद हैं। आवेदन के साथ 300 रुपये जमा करने हैं। एक पद के लिए औसत 25 आवेदन आये तो लगभग आठ लाख आवेदन आ सकते हैं। इससे 25 करोड़ से भी ज्यादा की रकम आ सकती है। पैरवी के नाम पर कुछ बेरोजगार अपनी जमीन या जेवर भी बेच डालेंगे। यह वास्तविक नियुक्ति है या ठगी? ऐसे विज्ञापन छापने वाले अखबार का कोई दायित्व है या नहीं?
जीपीओ के पोस्ट बाॅक्स क्या ठगी का माध्यम हैं? यूपी और झारखंड की सरकारें अगर ऐसी साफ दिखने वाली ठगी को रोकने लायक नहीं तो किसी आतंकी गिरोह का मुकाबला कैसे करेगी? क्या भारत सरकार के पास ऐसा कोई इंतजाम है जो केंद्र की योजनाओं के नाम पर होने वाली ठगी को रोके? उन दसवीं-बारहवीं पास बेरोजगारों की सोचिये, जो बरसों से नौकरी की आस लगाये बैठे हैं और इस विज्ञापन से फिर एक झूठी आस लगाकर चार-पांच सौ रुपये गंवायेंगे, और कई महीनों इंतजार करेंगे। जिस समाज में शिक्षित और अग्रणी लोग ऐसी ठगी का साथ देते हों, या उसे देखकर भी अंधे बने रहते हों, वैसे समाज को धिक्कार।
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विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर : एक पराडकर जी हुआ करते थे। अखबार के ही काम से गए लेकिन काशी नरेश का आतिथ्य स्वीकार नहीं किया। एक आज के पत्रकार हैं। वे अपने निजी काम के लिए भी सूचना विभाग की गाड़ी के ऐड़ी चोटी का जोर लगा देंगे। बच्चे को जिले के नामी गिरामी स्कूल में दाखिला दिलवाने का मामला हो या फीस माफ करवाने का, सारे घोड़े खोल डालेंगे। एक कहावत है भ्रष्टाचार रूपी गंगोत्री ऊपर से नीचे को बहती है। यह फार्मूला अखबार या यूं कहें मीडिया पर पूरी तरह से लागू होता है। पहले छोटे अखबार के छोटे कर्मचारी ही जुगाड़ में लगे देखे जाते थे आज हर कोई बहती गंगा में हाथ धोने को आतुर रहता है।
बहरहाल, सेल्फी की तरह यह राष्ट्रीय रोग हो गया है कि पत्रकार भिखारी की तरह कटोरा लिए कुछ मिलने की प्रत्याशा में दिख जाता है चाहे प्रेस कान्फ्रेंश में एक अदद पेन और राइटिंग पैड के लिए हो या सरकारी सुविधा के लिए। पत्रकार संगठनों के लिए अपने सम्मेलनों में मुख्यमंत्री या सूचना प्रसारण मंत्री को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया ही इसलिए जाता है कि उनसे थोक में घोषणाएलं करवा लेंगे। अब यह अलग बात है कि घाघ मंत्री शुभकामना संदेश भिजवा कर थोपे गए इस धर्म संकट से निजात पा लेते हैं।
बात मुद्दे की... पत्रकार या पत्रकार संगठन हमेशा सरकार के आगे कटोरा लिए क्यों खडे रहते हैं? मसलन हमें चिकित्सा सुविधा दे दो सरकार, रियायती दर पर यात्रा की मिलनी चाहिए। सस्ते दर पर मकान मिल जाए तो क्या बात है। पत्रकारों के लिए फोकट में कालोनी बनवा दो माई बाप। सिटी बस में भी फ्री की सुविधा दिलवा हुजूर। अंगुरी धरत पहुंचा पकडना कोई पत्रकारों से सीखे। इन दिनों पत्रकार संगठन अपना (अगर कुछ दिनों बाद अपने परिवार का और अगर यही हाल रहा तो अपनी महिला मित्र का महिला पत्रकार से क्षमा चाहता हूं) बीमा कराने की मांग कर रहे हैं वो भी सरकार से। सवाल यह उठता है कि हम मांगते क्यूं हैं? और मांगते ही हैं तो सरकार से ही क्यों? हमें क्या हक बनता है सरकार से मांगने का? हम सरकारी कर्मचारी हैं क्या? सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हमें दे? क्यों दे।
पत्रकार समाचार कवर करने जाता है तो उसे कन्वेंश एलाउंस मिलता है। जिले से बाहर जाने पर टीए डीए और स्थानीय यात्रा भत्ता अलग से तो फिर बस और रेल में मुफ्त यात्रा की सुविधा क्यों? लोकल कन्वेंश के लिए मंत्रियों विधायकों और सूचना विभाग की गाड़ी क्यों? पत्रकार बंधुओं हमारा और हमारे परिवार का किसी भी तरह का बीमा केंद्र या प्रदेश सरकारें क्यों करायें? सस्ता मकान और सस्ती जमीन के लिए हम सरकार की और टकटकी क्यों लगाये रहते/रखते हैं? इसलिए की काम के बदले दाम कम मिलता है। हमें अपने काम का दाम सही मिले तो शायद नहीं निश्चित रूप से हमें कटोरा नहीं फैलाना पड़ेगा।
एक बार फिर मूल मुद्दे पर। हम सरकार के बजाय मालिक या नियोक्ता से क्यों नहीं मांगते। हमारा नियोक्ता सरकार है क्या? इसी से जुड़ा एक और सवाल। अगर हम सरकार मंत्री, सांसद, विधायक , मेयर, सभासद या ग्राम प्रधान से व्यक्तिगत या संगठन के लिए सहयोग लेंगे और वह कोई घपला/घोटाला करेगा तो क्या उसके खिलाफ कुछ लिख पाएंगे। अब यह अलग बात है कि हम पत्रकार अपने मालिक/ संपादक की मर्जी के बिना भी एक लाइन नहीं लिख पाते।

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